माला-1405:मेरा मन संसार में ही खेलने को करता है। इसे भगवान की ओर कैसे लगाएँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, मेरा मन संसार में ही खेलने को करता है। इसे भगवान की ओर कैसे लगाएँ? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि मन का संसार और माया की तरफ जाना देखकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले भगवान की शरण में आकर थोड़ा शांत होना चाहिए और यह भरोसा रखना

माला-1404:राधा नाम का ध्यान कैसे किया जाता है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,राधा नाम का ध्यान कैसे किया जाता है? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि राधा नाम को मन में स्थिर और स्पष्ट करने के लिए सबसे जरूरी चीज है—निरंतर और आदरपूर्वक अभ्यास। शुरुआत में हमारा मन एक जगह टिकता ही नहीं। कभी बीती हुई बातें याद आती हैं, कभी भविष्य की चिंता होती

माला-1403:क्या सिर्फ इस एक श्लोक से भगवान मिल सकते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,श्रीमद्भगवद्गीता जी के इस एक श्लोक से क्या भगवद्-प्राप्ति निश्चित है? उत्तर:महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में श्रीमद्भगवद्गीता के उस भाव की ओर संकेत करते हैं जिसमें भगवान कहते हैं कि जो भक्त निरंतर उनका अनन्य चिंतन करता है, उसके लिए भगवान सुलभ हो जाते हैं। महाराज जी समझाते हैं कि

माला-1402:भोग-भोग कर थक गया हूँ, अब क्या करूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,भोग-भोग कर थक गया हूँ, अब क्या करूँ? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य भोगों से इसलिए तृप्त नहीं हो पाता क्योंकि मन बार-बार यही सोचता रहता है कि अगली बार, अगली वस्तु या अगला अनुभव मुझे सुख देगा। थोड़ी देर के लिए लगता है कि अब कुछ नहीं चाहिए, लेकिन फिर

माला-1401:आज के समय में सही जीवनसाथी कैसे मिले? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,यदि अपनी संतान द्वारा कष्ट मिले, तो क्या उसे भी दंड मिलेगा? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि यदि माता-पिता को अपनी संतान के द्वारा अपमान या कष्ट मिलता है, तो माता-पिता अपने पूर्व कर्मों का फल भोग रहे हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संतान के कर्म का कोई

माला-1400:कैसे कम बोलूँ और ज्यादा सुनूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी ,कैसे कम बोलूँ और ज्यादा सुनूँ? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि कम बोलने का सबसे सरल उपाय है कि मन को भगवान के नाम में लगा दिया जाए। जब नामजप में मन लगने लगता है, तो व्यर्थ बोलने की इच्छा अपने आप कम होने लगती है। इसलिए अलग से केवल यह

माला-1399:वैराग्य के साथ चिड़चिड़ापन क्यों आता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,कुछ समय से संसार से वैराग्य और अंदर चिड़चिड़ापन बना रहता है, क्या करें? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि भजन बढ़ने पर संसार की बहुत-सी बातें भीतर से अच्छी लगना कम हो सकती हैं। व्यक्ति को संसार का बनावटी व्यवहार, विषय-भोग और अनावश्यक बातचीत पसंद नहीं आती। यह भाव भीतर आ सकता

माला-1398: एकनिष्ठ भक्ति करें तो क्या बाकी देवता नाराज़ होंगे? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,यदि देवताओं की पूजा न करूँ, तो क्या यह अपराध होगा? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि यदि किसी साधक की श्रीराम जी में एकनिष्ठ श्रद्धा है और वह अपने इष्ट श्रीराम जी की ही आराधना करना चाहता है, तो दूसरे देवी-देवताओं की पूजा न करने पर अपराध का भाव रखने की आवश्यकता

माला-1397: नामजप करते हुए मन में जो विकार आते हैं, उन्हें कैसे संभालें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,नामजप करते हुए मन में जो विकार आते हैं, उन्हें कैसे संभालें? उत्तर:नामजप करते समय मन में तरह-तरह के गलत विचार, पुराने संस्कार और विकार आना इस बात का प्रमाण नहीं है कि आपका भजन गलत हो रहा है। महाराज जी समझाते हैं कि हमारा मन एक ऐसी चिप की तरह है

माला-1396: ऐसा क्या करूँ कि नामजप में ध्यान दिन-प्रतिदिन गहरा होता जाए? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,ऐसा क्या करूँ कि नामजप में ध्यान दिन-प्रतिदिन गहरा होता जाए? उत्तर:महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में सबसे पहले भजन की निरंतरता पर जोर देते हैं। कई बार ऐसा होता है कि नामजप में मन बहुत लग जाता है और कभी मन बिल्कुल नहीं लगता। उस समय जबरदस्ती भी नामजप करना