माला-1405:मेरा मन संसार में ही खेलने को करता है। इसे भगवान की ओर कैसे लगाएँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, मेरा मन संसार में ही खेलने को करता है। इसे भगवान की ओर कैसे लगाएँ?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि मन का संसार और माया की तरफ जाना देखकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले भगवान की शरण में आकर थोड़ा शांत होना चाहिए और यह भरोसा रखना चाहिए कि हम बहुत बड़े आश्रय में हैं। मनुष्य जीवन केवल संसार में भटकने और चिंता करने के लिए नहीं मिला है। साधना का मुख्य उद्देश्य मन को ठीक करना है।

महाराज जी कहते हैं कि मन चंचल तब तक रहता है जब तक उसमें पाप और गलत प्रवृत्तियाँ रहती हैं। जब मन निष्पाप होने लगता है तो वह शांत होने लगता है। इसके लिए नाम-जप, मंत्र-जप, गुरु-वाणी का गायन, गुरु-वाणी के आदेश का पालन, संत सेवा और समाज सेवा जैसे साधनों का सहारा लेना चाहिए। इन सेवाओं और साधनों को गुरु तथा भगवान को समर्पित करने से धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है।

माया अपने आप में बाधक नहीं है। शरीर माया है, कपड़े माया हैं, मोबाइल भी माया है। उसी मोबाइल से यदि गलत चीज देखी जाए तो वह बाधक बन जाता है और उसी मोबाइल से सत्संग सुना जाए तो वही साधन बन जाता है। इसलिए वास्तविक बाधा भगवान के विपरीत चलना है।

महाराज जी मन को जंगली घोड़े के समान बताते हैं। जैसे जंगली घोड़े को प्रेम और संयम दोनों से सही दिशा में लगाया जाता है, वैसे ही मन को भी अभ्यास से साधना पड़ता है। मन गलत दिशा में जाए तो संयम रखना है और सही दिशा में आए तो उसे भजन में लगाए रखना है।

इसलिए मन संसार की ओर भागता है तो निराश नहीं होना चाहिए। भगवान की शरण लेकर नाम-जप, सेवा, सत्संग और गुरु-वाणी के अनुसार जीवन जीते हुए मन को बार-बार भगवान की ओर लगाते रहना चाहिए। सुमिरन से मन निष्पाप होता है और सेवा से शरीर निष्पाप होता है।

प्रश्न 2: भगवद्-बोध और भगवत्-प्राप्त महापुरुषों में क्या अंतर होता है?

उत्तर:
महाराज जी इस अंतर को तत्व-बोध और भगवत्-साक्षात्कार के रूप में समझाते हैं। उनके अनुसार तत्व-बोध संपन्न महापुरुष सर्वत्र एक ही तत्व का दर्शन करता है। उसे हर जगह उस परम तत्व की अनुभूति होती है। वहीं भगवत्-साक्षात्कार करने वाला प्रेमी महापुरुष सर्वत्र अपने प्रभु के साकार रूप का दर्शन करता है।

महाराज जी बताते हैं कि तत्व ज्ञानी को ब्रह्म तत्व दिखाई देता है, जबकि प्रेमी भक्त को अपने प्रभु का रूप सर्वत्र दिखाई देता है। जैसे गोपियों को हर जगह श्याम दिखाई देते हैं और गोस्वामी जी कहते हैं कि सब जगत में सियाराम दिखाई देते हैं। अर्थात तत्व-बोध में सर्वत्र एक ही निराकार तत्व का दर्शन होता है और भगवत्-साक्षात्कार में अपने आराध्य भगवान के साकार रूप का दर्शन होता है।

महाराज जी के अनुसार तत्व-बोध को मोक्ष की पदवी और भगवत्-साक्षात्कार को प्रेम की पदवी कहा गया है। तत्व-बोध में भगवान के निराकार तत्व की अनुभूति होती है, जो सर्वत्र व्याप्त है। वहीं प्रेमी भक्त के लिए उसके प्रियतम भगवान का नाम और रूप होता है और वह हर जगह अपने प्रभु को देखता है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि एक महापुरुष को दोनों अनुभव हो सकते हैं। तत्व-बोध प्राप्त होने के बाद भी यदि भगवान का रूप आकर्षित कर ले तो वह प्रेम मार्ग की ओर जा सकता है। इसके उदाहरण के रूप में मधुसूदन सरस्वती जी का उल्लेख किया गया है, जिनका चित्त भगवान श्रीकृष्ण के रूप से आकर्षित हुआ।

भगवत्-साक्षात्कार का अनुभव पूरी तरह शब्दों में बताया नहीं जा सकता। महाराज जी इसे “अनिर्वचनीय” बताते हैं। प्राकृतिक वस्तुओं की उपमाएँ केवल उस अनुभव का थोड़ा-सा आभास करा सकती हैं, वास्तविक अनुभव को पूरी तरह शब्दों में नहीं उतारा जा सकता।

इस प्रकार महाराज जी के अनुसार मुख्य अंतर यह है कि तत्व-बोध में सर्वत्र निराकार तत्व का दर्शन होता है, जबकि भगवत्-साक्षात्कार में अपने आराध्य के साकार रूप का अनुभव होता है।

प्रश्न 3: जैसे भोग भोगने से तत्काल थोड़ा सुख अनुभव होता है, वैसे ही नाम-जप से तुरंत आनंद क्यों नहीं होता?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि नाम-जप में आनंद होता है, लेकिन उसकी शुरुआत और परिणाम संसार के भोग से अलग होते हैं। सांसारिक भोग में शुरुआत में सुख जैसा अनुभव होता है, लेकिन उसका परिणाम धीरे-धीरे दुख और खालीपन की ओर ले जाता है। इसके विपरीत नाम-जप की शुरुआत कठिन लग सकती है, लेकिन उसका परिणाम अमृत जैसा होता है।

महाराज जी समझाते हैं कि नाम-जप पहले हमारे पाप और पाप की प्रवृत्तियों का नाश करता है। इसलिए प्रारंभ में नाम-जप करते समय मन को वैसा आनंद अनुभव नहीं होता जैसा किसी सांसारिक भोग में तुरंत अनुभव हो जाता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि सुबह तीन बजे उठकर स्नान करके माला जपना कठिन लगता है, जबकि देर तक सोना शुरू में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जिसकी शुरुआत सुख जैसी है, उसका परिणाम विष जैसा हो सकता है और जिसकी शुरुआत विष जैसी लगती है, उसका परिणाम अमृत जैसा होता है।

महाराज जी समुद्र-मंथन का उदाहरण देते हैं कि सबसे पहले विष निकला और उसके बाद अमृत निकला। उसी प्रकार नाम-जप में भी पहले भीतर की पाप-वासनाएँ और पाप-प्रवृत्तियाँ नष्ट होती हैं। इसके बाद भगवत्-आनंद का अनुभव बढ़ने लगता है।

इसलिए महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप करते समय शुरुआत में आनंद की चिंता नहीं करनी चाहिए। धैर्यपूर्वक नाम-जप करते रहना चाहिए। जब आनंद का अनुभव प्रारंभ होगा तो वह लगातार बढ़ता जाएगा। यह आनंद घटता नहीं है।

इसके विपरीत विषयों का सुख धीरे-धीरे घटता जाता है। महाराज जी उदाहरण देते हैं कि कोई स्वादिष्ट चीज पहली बार अच्छी लगती है, लेकिन बार-बार उसी को पाने पर उससे घृणा होने लगती है। विषय-सुख में तृप्ति स्थायी नहीं होती। लेकिन भगवत्-आनंद में जितना आनंद मिलता है, उतनी ही भगवान के भजन की भूख बढ़ती जाती है।

महाराज जी भगवद्-आनंद को सुख के समुद्र के समान बताते हैं। जितना नाम-जप किया जाएगा, उतना ही उस आनंद में डूबने का अवसर मिलेगा। इसलिए नाम-जप का मूल्य तत्काल मिलने वाले अनुभव से नहीं मापना चाहिए। शुरुआत कठिन हो सकती है, लेकिन उसका परिणाम अमृत जैसा है और भगवत्-आनंद बढ़ता ही जाता है।

प्रश्न 4: कठिन परिस्थितियों में समाधान न मिलने पर भगवान में अश्रद्धा होने लगती है। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में सबसे पहले यह समझना चाहिए कि समाधान निकालने के लिए ज्ञान आवश्यक है। यदि हमारे पास अध्यात्म का ज्ञान नहीं है तो हम यह भी ठीक से तय नहीं कर पाते कि स्थिति में क्या सही है और क्या गलत। सत्संग सुनने, शास्त्रों का स्वाध्याय करने, नाम-जप करने और सेवा करने से भीतर ज्ञान आता है और ज्ञान के द्वारा समाधान दिखाई देने लगता है।

यदि कहीं हमारी गलती है तो उसका पश्चाताप करके सुधार करना चाहिए। यदि हमने गलती नहीं की है और कठिन परिस्थिति आई है तो उसे सहन करते हुए नाम-जप करना चाहिए और उस परिस्थिति पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

कठिन समय में भगवान पर दोष लगाना उचित नहीं है। महाराज जी समझाते हैं कि भगवान ने हमें शरीर दिया, बुद्धि दी, भोजन दिया और जीवन की अनेक सुविधाएँ दीं। फिर भी जब हमारी इच्छा के अनुसार कोई काम नहीं होता तो हम भगवान से शिकायत करने लगते हैं। महाराज जी प्रश्न करते हैं कि हमने भगवान को क्या दिया है? इसके बाद भी भगवान हमसे कोई शिकायत नहीं करते।

महाराज जी कर्म के सिद्धांत की बात करते हुए बताते हैं कि जो कर्म हम करते हैं उसका फल हमें भोगना पड़ता है। अच्छे कर्मों का फल सुख और बुरे कर्मों का फल दुख के रूप में आ सकता है। कभी-कभी कठिनाई हमारी अपनी कमजोरी के कारण भी आती है। उदाहरण के रूप में परीक्षा में असफलता की बात कही गई है। यदि पढ़ाई या अभ्यास में कमी है तो उस कमजोरी को ठीक करना चाहिए, भगवान को दोष नहीं देना चाहिए।

और यदि किसी परिस्थिति में हमारी कमजोरी नहीं है फिर भी कठिनाई आती है तो उसे प्रारब्ध का भोग मानकर सहना चाहिए। निराश नहीं होना चाहिए।

भगवान से प्रार्थना भी माता-पिता से मांगने की तरह करनी चाहिए—बुद्धि, सामर्थ्य और सही कार्य करने की शक्ति मांगनी चाहिए। भगवान हमारी इच्छा के अनुसार कुछ न दें तो इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा समाप्त हो जाए। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भगवान के प्रति श्रद्धा खत्म करना अपने जीवन को नीचे गिराने जैसा है, क्योंकि वही श्रद्धा हमें ऊपर उठाती है।

इसलिए कठिन समय में श्रद्धा छोड़ने के बजाय सत्संग, नाम-जप, स्वाध्याय, सेवा और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए परिस्थिति का सामना करना चाहिए।

प्रश्न 5: विशुद्ध भक्ति के लक्षण क्या हैं और भक्ति में किन सावधानियों को रखना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि विशुद्ध भक्ति का पहला लक्षण यह है कि हमारे सभी आचरण भगवान को समर्पित हों और भगवान के अनुकूल हों। जो भगवान के प्रतिकूल है उसका त्याग होना चाहिए। हमारे कर्म और व्यवहार भगवान के अनुकूल होने चाहिए।

दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण निरंतर भगवान का स्मरण है। महाराज जी बताते हैं कि यदि थोड़े समय के लिए भी भगवान का विस्मरण हो जाए और उससे अत्यधिक व्याकुलता होने लगे, तो यह भक्ति की गहरी अवस्था का लक्षण है। जैसे जल से बाहर निकली मछली तड़पती है, वैसे ही भक्त भगवान के विस्मरण में व्याकुल होता है।

तीसरा लक्षण भगवान की कथा और भगवान की चर्चा में अत्यंत अनुराग होना है। भक्त को भगवान की चर्चा सुनने और करने की भूख रहती है। कथा सुनते-सुनते ऐसी स्थिति आ सकती है कि कंठ गद्गद हो जाए और आंखों से आंसू बहने लगें।

चौथा लक्षण अपने प्रिय भगवान के श्री-अंग की सेवा की भावना है। भगवान की प्रतिमा या छवि को अपने इष्ट के रूप में स्थापित करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सेवा करना और उन्हें भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करना बताया गया है।

पांचवीं बात भगवान की लीला-विहार स्थली के प्रति प्रेम और उसका चिंतन है। जिन्हें वृंदावन जैसे धाम में रहने का अवसर नहीं मिलता, वे भावना से धाम का चिंतन कर सकते हैं। वृंदावन की परिक्रमा, बिहारी जी के दर्शन, संतों का दर्शन और यमुना जी का दर्शन भावना से करना भी बताया गया है।

भक्ति में कुछ सावधानियाँ भी बताई गई हैं—कम बोलना, उचित और सत्य बोलना, कम सोना और युक्त आहार लेना। किसी की निंदा न सुनना और न करना। अपनी निंदा सुनकर आनंदित होना और अपनी प्रशंसा सुनकर दुखी होना बताया गया है।

अपने जीवन को भगवान के आश्रित मानना, गुरु-परंपरा के ग्रंथों का स्वाध्याय करना और भगवान के पदों का गायन करना भी बताया गया है। रात को सोने से पहले दिनभर के आचरण की जांच करनी चाहिए कि भगवान के विरुद्ध कोई भाषण, दर्शन या आचरण तो नहीं हुआ। यदि त्रुटि हुई हो तो उसे स्वीकार करके सुधार का प्रयास करना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार बाहरी दिखावे से अधिक महत्व भक्त के आंतरिक लक्षणों का है। जब संसार अच्छा न लगे, मन भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल हो और हृदय में भगवान के प्रेम की तड़प उत्पन्न हो, तब प्रेम की पहचान प्रकट होती है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें: माला-1403:क्या सिर्फ इस एक श्लोक से भगवान मिल सकते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply