माला-1436:अंदर की शांति संघर्ष से आती है या स्वीकार करने से? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: अंदर की शांति संघर्ष से आती है या स्वीकार करने से? उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के भीतर वास्तविक शांति न तो केवल संघर्ष करने से आती है और न ही परिस्थितियों को स्वीकार कर लेने मात्र से। आंतरिक शांति का वास्तविक आधार ज्ञान है। अशांति का मुख्य कारण

माला-1435:क्या पांडवों और कौरवों को भी उनके पूर्वजन्मों का फल भुगतना पड़ा था? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: क्या पांडवों और कौरवों को भी उनके पूर्वजन्मों का फल भुगतना पड़ा था? उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। इसमें कोई अपवाद नहीं है। चाहे कोई साधारण मनुष्य हो, ऋषि-महात्मा हो या पुण्यात्मा, सभी को अपने पूर्वजन्मों में किए गए कर्मों

माला-1434:महाराज जी,मुझे खुद पर संशय है, डर और डिप्रेशन से बाहर कैसे निकलूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: मुझे खुद पर संशय है, डर और डिप्रेशन से बाहर कैसे निकलूँ? उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर और संसार की आवश्यकताओं में इतना उलझ जाता है कि धीरे-धीरे उसकी इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं। इन इच्छाओं को पूरा करने की चिंता में मन अनेक प्रकार

माला-1433:किन लोगों को अपनी मृत्यु आने का पहले ही पता लग जाता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: किन लोगों को अपनी मृत्यु आने का पहले ही पता लग जाता है? उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मृत्यु का समय पहले से पता नहीं चलता। ऐसा संकेत केवल कुछ सिद्ध महापुरुषों को हो सकता है, जिन्होंने अपना जीवन निरंतर भगवान के भजन और चिंतन में बिताया है।

माला-1432:नामजप करके कितनी माला किसी संबंधी को दें, जिससे वह भक्त बन जाए? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: नामजप करके कितनी माला किसी संबंधी को दें, जिससे वह भक्त बन जाए? उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि केवल अपनी माला या नामजप का फल किसी दूसरे व्यक्ति को समर्पित कर देने से वह व्यक्ति अपने आप भगवान का भक्त नहीं बन जाता। ऐसा करने से उसके पुण्य बढ़ सकते हैं

माला-1431:तुरीय अवस्था क्या है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,तुरीय अवस्था क्या है? उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य सामान्यतः तीन अवस्थाओं का अनुभव करता है—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। जाग्रत अवस्था में हम स्थूल शरीर और संसार को देखते हैं। स्वप्न अवस्था में स्थूल शरीर का विस्मरण होकर सूक्ष्म शरीर के माध्यम से स्वप्न का अनुभव होता है। सुषुप्ति

माला-1430:महाराज जी, मुझे गलती से भगवद्-प्राप्ति हो गई है। क्या ऐसा संभव है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, मुझे गलती से भगवद्-प्राप्ति हो गई है। क्या ऐसा संभव है? उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में सबसे पहले भगवद्-प्राप्ति के वास्तविक लक्षण समझाते हैं। वे बताते हैं कि भगवान की वास्तविक अनुभूति होने पर मनुष्य के भीतर कोई सांसारिक चाह, भय, चिंता या शोक शेष नहीं रहता।

माला-1429:मुझे प्रसिद्धि चाहिए, पर मिल नहीं रही। चाहे कुछ भी कर लूँ, क्या करूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,मुझे प्रसिद्धि चाहिए, पर मिल नहीं रही। चाहे कुछ भी कर लूँ, क्या करूँ? उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि यदि जीवन में सच्ची और स्थायी कीर्ति चाहिए, तो केवल प्रसिद्ध होने के पीछे भागने के बजाय भगवान के नाम में प्रेम बढ़ाना चाहिए। संसार में मिलने वाली प्रसिद्धि स्थायी नहीं

माला-1428:देहाभिमान का नाश कैसे हो? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: देहाभिमान का नाश कैसे हो? उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, देहाभिमान का अर्थ है स्वयं को शरीर मानना और अपने आपको ही हर कार्य का कर्ता तथा सुख-दुःख का भोक्ता समझना। जब मनुष्य सोचता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ और मुझे ही इसका सुख भोगना है, तब यह

माला-1427:क्या कोई ऐसी स्तुति है, जिसे सुनकर गर्भस्थ शिशु को शुद्ध संस्कार मिलें?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1:महाराज जी, क्या कोई ऐसी स्तुति है, जिसे सुनकर गर्भस्थ शिशु को शुद्ध संस्कार मिलें? उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, गर्भस्थ शिशु को आध्यात्मिक संस्कार देने के लिए भगवान के नाम का कीर्तन, उनकी लीलाओं का श्रवण और धार्मिक ग्रंथों का पाठ बहुत महत्त्वपूर्ण है। गर्भावस्था में माता जिस प्रकार का वातावरण रखती