प्रश्न 1: महाराज जी ,कैसे कम बोलूँ और ज्यादा सुनूँ?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि कम बोलने का सबसे सरल उपाय है कि मन को भगवान के नाम में लगा दिया जाए। जब नामजप में मन लगने लगता है, तो व्यर्थ बोलने की इच्छा अपने आप कम होने लगती है। इसलिए अलग से केवल यह अभ्यास करने की जरूरत नहीं कि “मुझे कम बोलना है।” इसके बजाय नामजप को बढ़ाइए।
महाराज जी समझाते हैं कि जब जिह्वा भगवान के नाम का स्वाद लेने लगती है, तब बार-बार संसार की बातें करने की इच्छा कम हो जाती है। सामने वाला कुछ कहे तो उसे अपनी बात पूरी करने का अवसर दें और आवश्यकता हो तभी संक्षेप में उत्तर दें। इस तरह आपका समय भी बचेगा और भजन भी चलता रहेगा।
महाराज जी समय की कीमत समझाते हुए कहते हैं कि जीवन की सांसें इतनी मूल्यवान हैं कि संसार की सारी संपत्ति देकर भी कुछ अतिरिक्त सांसें नहीं खरीदी जा सकतीं। इसलिए व्यर्थ की बातचीत और चिंतन में समय गंवाने के बजाय नामजप में समय लगाना चाहिए। जितना नाम बढ़ेगा, उतना ही अनावश्यक बोलने का अभ्यास कम होता जाएगा।
प्रश्न 2: सब विकार हैं और क्रिया भी हो जाती है, इनका चिंतन और क्रिया कैसे छूटे?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि विकारों की क्रिया अचानक नहीं होती। पहले मन में उसका चिंतन पैदा होता है। जब हम किसी विषय या भोग के बारे में बार-बार सोचते हैं, तो वही चिंतन धीरे-धीरे इच्छा और फिर क्रिया का रूप ले सकता है। इसलिए केवल बाहरी क्रिया को रोकने से काम पूरा नहीं होगा; मन के चिंतन को भी बदलना पड़ेगा।
इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मन को खाली न छोड़ें। जब मन खाली रहता है तो वह विषयों को पकड़ लेता है। महाराज जी बताते हैं कि यदि उसी समय भगवान का चिंतन और नामजप किया जाए तो गलत चिंतन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है और भगवान का चिंतन मजबूत होने लगता है।
नामजप करते समय पुराने विचारों का बाहर आना भी हो सकता है। महाराज जी इसे देखकर घबराने के बजाय नामजप बढ़ाने को कहते हैं। जैसे कोई गंदगी बाहर निकल रही हो, वैसे ही पुराने संस्कार और विचार सामने आ सकते हैं। इसलिए साधक को निराश नहीं होना चाहिए।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे दोषों को जड़ से कमजोर करने के लिए महाराज जी निरंतर नामजप को मुख्य साधन बताते हैं। मन को भगवान के नाम में लगाए रखिए; धीरे-धीरे विषयों का चिंतन कम होगा और मन निर्मल होने लगेगा।
प्रश्न 3: नामजप और भजन से मन उदासीन रहता है, लोग कहते हैं कि मैं डिप्रेशन में जा रही हूँ!
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भजन और नामजप के कारण संसार की बहुत-सी अनावश्यक बातों से मन का हटना स्वाभाविक हो सकता है। व्यक्ति को व्यर्थ की बातचीत, गलत संगति या संसार के अनावश्यक व्यवहार में पहले जैसी रुचि नहीं रहती। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने कर्तव्यों से भाग जाए या हर समय उदास बैठा रहे।
दूसरे लोग क्या कह रहे हैं, इस पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। महाराज जी उदाहरण देकर समझाते हैं कि मनुष्य चाहे जैसा व्यवहार करे, लोग अपनी-अपनी राय देते ही रहेंगे। इसलिए साधक को यह देखना चाहिए कि वह वास्तव में गलत दिशा में तो नहीं जा रहा। यदि भीतर नकारात्मकता, निराशा या गलत भाव बढ़ रहे हों तो उस पर ध्यान देना चाहिए।
भक्ति का अर्थ संसार और कर्तव्यों को छोड़ देना नहीं है। महाराज जी बताते हैं कि भगवान ने अर्जुन को भी कर्तव्य से भागने के लिए नहीं कहा। भक्ति करते हुए अपने संबंधों और जिम्मेदारियों को अच्छे ढंग से निभाना चाहिए। परिवार में जो भी संबंध मिले हैं, उनका प्रेमपूर्वक और मधुर व्यवहार से पालन करना भी साधना का हिस्सा है।
इसलिए यदि भजन के कारण गलत चीजों से मन हट रहा है, लेकिन भीतर शांति, प्रसन्नता और भगवान की ओर रुचि बढ़ रही है, तो केवल लोगों की बात सुनकर परेशान नहीं होना चाहिए। भक्ति मनुष्य को बुझा हुआ नहीं, बल्कि भीतर से प्रसन्न और व्यवहार में मधुर बनाती है।
प्रश्न 4: गृहस्थ में रहते हुए विरक्त भाव को निरंतर कैसे बनाए रखें?
उत्तर:
महाराज जी गृहस्थ साधक को सबसे पहले यह समझने को कहते हैं कि हम केवल गृहस्थ नहीं हैं; हम भगवान के अंश हैं। गृहस्थ जीवन हमारी एक जिम्मेदारी और कर्तव्य की भूमिका है। समस्या तब पैदा होती है जब हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर पूरी तरह “मैं और मेरा” में डूब जाते हैं।
महाराज जी उदाहरण देकर समझाते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की किसी वाहन में इतनी तन्मयता हो जाए कि वह स्वयं को वही समझने लगे, तो उसकी पहचान उसी से जुड़ जाती है। इसी प्रकार यदि हमारी पूरी तन्मयता परिवार और गृहस्थी में हो गई तो हम स्वयं को केवल गृहस्थ मानने लगेंगे। लेकिन वही तन्मयता भगवान में लगानी है।
इसका अर्थ परिवार छोड़ना नहीं है। माता-पिता, पत्नी, बच्चे और परिवार को भगवान का दिया हुआ मानकर उनकी सेवा करनी है। धर्मपूर्वक धन कमाना है, परिवार की उचित आवश्यकताओं को पूरा करना है और साथ-साथ नामजप करना है। इस तरह गृहस्थ जीवन भी भगवान की सेवा और भक्ति से जुड़ सकता है।
महाराज जी के अनुसार असली विरक्ति कपड़े बदलने या गृहस्थ जीवन से भागने में नहीं है। भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति ही मुख्य बात है। गृहस्थ अपने धर्म का पालन करते हुए भजन करे तो उसका भी कल्याण हो सकता है। जहाँ धर्म को लेकर भ्रम हो, वहाँ शास्त्रों का अध्ययन और संतों से मार्गदर्शन लेना चाहिए।
प्रश्न 5: खुद को श्रीकृष्ण की लीलाओं में देखना क्या कल्पना मात्र है या सत्य है?
उत्तर:
महाराज जी इस विषय को बहुत भावपूर्ण ढंग से समझाते हैं। वे कहते हैं कि यदि किसी साधक के भीतर भगवान के प्रति ऐसा भाव जाग रहा है कि वह स्वयं को अपने प्रिय भगवान की लीलाओं में अनुभव करता है, तो उसे केवल इसलिए व्यर्थ की चिंता नहीं करनी चाहिए कि लोग इसे क्या कहेंगे। यह साधक और भगवान के बीच का आंतरिक विषय है।
महाराज जी के अनुसार संसार के प्रति किया गया भाव अंततः नश्वर वस्तुओं से जुड़ा है, जबकि भगवान स्वयं सत्य हैं। इसलिए भगवान के प्रति किया गया भाव, भावना या चिंतन साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि भगवान के प्रति प्रेमपूर्ण भावना से कोई चिंतन हो रहा है, तो उसे केवल “कल्पना” कहकर नकार देने की आवश्यकता नहीं है।
साथ ही महाराज जी यह भी कहते हैं कि इन आंतरिक अनुभवों को लेकर लोगों से प्रमाण लेने की जरूरत नहीं है। साधक को यह नहीं देखना चाहिए कि दुनिया उसे क्या समझती है या उसके भाव पर कौन-सी मुहर लगाता है। अपने प्रभु के चिंतन में रहना और अपने आचरण को ठीक रखना अधिक महत्वपूर्ण है।
इसलिए यदि श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम से कोई भाव या लीला-चिंतन भीतर आता है, तो उसे लेकर अहंकार नहीं करना है और न ही लोगों से अपनी आध्यात्मिक स्थिति का प्रमाण मांगना है। नामजप करते रहें और भगवान के प्रति जो प्रेमपूर्ण चिंतन हो रहा है, उसे श्रद्धा से बनाए रखें।
प्रश्न 6: शांत और आनंद की जिंदगी जी रहा हूँ, पर धन और परिवार का मोह कैसे खत्म होगा?
उत्तर:
महाराज जी पहले यह स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक शांति और आनंद क्या है। उनके अनुसार जिस व्यक्ति को भगवान के तत्व का वास्तविक बोध हो गया है, वही स्थायी शांति को प्राप्त करता है। केवल धन, परिवार और सांसारिक सुविधाएं ठीक चल रही हों और इसलिए मन शांत महसूस हो रहा हो, तो इसे परम शांति नहीं कहा जा सकता।
महाराज जी एक कसौटी बताते हैं—यदि धन चला जाए, परिवार में कोई बड़ी हानि हो जाए या परिस्थितियां अचानक बदल जाएं, तब भी यदि मन के भीतर कोई बड़ी हलचल न हो, तभी वास्तविक शांति की स्थिति कही जा सकती है। क्योंकि धन, शरीर, परिवार और संसार की परिस्थितियां स्थायी नहीं हैं।
इस मोह को धीरे-धीरे कम करने का उपाय महाराज जी नामजप, संतों का संग और उनकी वाणी सुनना बताते हैं। साथ ही गीता और भागवत जैसे शास्त्रों का स्वाध्याय करने की बात कही गई है। संसार की नश्वरता को समझते हुए साधक को हर समय भगवान के नाम से जुड़ते रहना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि जब नामजप लगातार चलता रहता है तो संसार का राग धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है। परिवार और धन की आवश्यकता के अनुसार व्यवस्था होती रहेगी, लेकिन उनका मोह साधक को उसी तरह बांध नहीं पाएगा। भजन के बिना मोह से पूरी तरह बाहर निकलना संभव नहीं है।
प्रश्न 7: नामजप की शुरुआत कैसे करूँ?
उत्तर:
महाराज जी नए साधक के लिए नामजप की शुरुआत को बहुत सरल बताते हैं। वे कहते हैं कि शुरुआत किसी कठिन प्रक्रिया से नहीं, बल्कि “राधा-राधा” नाम से की जा सकती है। सबसे पहले नाम को जीवन में लाना है और धीरे-धीरे उसकी आदत बनानी है।
लेकिन महाराज जी केवल नाम बोलने तक बात सीमित नहीं रखते। वे जीवन के आचरण को भी सुधारने पर जोर देते हैं। भोजन को शुद्ध करने, मांस-मछली और शराब से बचने तथा पराई माता-बहनों के प्रति गलत दृष्टि न रखने की बात कहते हैं। उनका भाव है कि नामजप के साथ जीवन भी पवित्र दिशा में जाना चाहिए।
नामजप को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ना है। जब भी समय मिले, भगवान का नाम लिया जा सकता है। महाराज जी पहले भी बताते हैं कि नामजप के लिए हर परिस्थिति में भगवान का नाम लिया जा सकता है; इसे जीवन का निरंतर अभ्यास बनाना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि जब साधक नामजप के साथ गलत आचरणों को छोड़ता जाता है, तो भीतर एक अलग आनंद और मस्ती आने लगती है। यही साधक को कठिन परिस्थितियों को सहने की शक्ति भी देती है। इसलिए शुरुआत को कठिन मत समझिए—नाम पकड़िए, आचरण सुधारिए और धीरे-धीरे नामजप को जीवन का हिस्सा बनाइए।
प्रश्न 8: अच्छे कर्म करते हैं फिर भी दुखी हैं, और जो गलत कर रहा है वह मजे में है—ऐसा क्यों?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि केवल वर्तमान में किसी व्यक्ति की सुख-दुख की स्थिति देखकर उसके पूरे कर्मफल का निर्णय नहीं किया जा सकता। कर्मों का परिणाम तुरंत और एक ही क्रम में दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं है। उन्होंने समझाया कि किसी के पूर्व कर्मों में पुण्य अधिक और पाप कम हो सकता है, तो उसके जीवन में पहले उस पुण्य या पाप के अनुसार परिणाम दिखाई दे सकते हैं।
इसी कारण कभी ऐसा दिखाई देता है कि कोई व्यक्ति गलत आचरण कर रहा है फिर भी उसके पास धन, स्वास्थ्य या दूसरी सुविधाएं हैं। महाराज जी इसे उसके पहले के पुण्य के फल से जोड़कर समझाते हैं। जब वह पुण्य समाप्त होता है और उसके वर्तमान पापों का परिणाम सामने आता है, तब परिस्थितियां बदल सकती हैं।
इसी तरह जो व्यक्ति भजन और अच्छे कर्म कर रहा है, उसे भी जीवन में कठिनाइयां आ सकती हैं। महाराज जी बताते हैं कि पुराने कर्मों का फल भोगना पड़ सकता है। इसलिए किसी साधक के जीवन में दुख देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि उसके भजन या अच्छे कर्म व्यर्थ जा रहे हैं।
इसलिए हमें दूसरों को देखकर अपने कर्म और भजन से विचलित नहीं होना चाहिए। महाराज जी का संदेश सीधा है—पाप कर्मों से बचें, अच्छे कर्म करें, दूसरों का हित करें और भगवान का नामजप करते रहें। कर्मों का पूरा विधान हमारी तत्काल दृष्टि में दिखाई नहीं देता, लेकिन अपने वर्तमान आचरण को सही रखना हमारे हाथ में है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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