माला-1395: गृहस्थ में भगवत् प्राप्ति हो सकती है, तो वैराग्य की क्या जरूरत है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,पहले संत-महात्मा गृहस्थ में भी रहकर भगवत्प्राप्ति करते थे, तो वैराग्य की क्या जरूरत है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि वैराग्य का अर्थ केवल कपड़े उतारकर घर छोड़ देना नहीं है और गृहस्थ होने का अर्थ केवल स्त्री, परिवार और भोग में लगे रहना भी नहीं है। असली बात है आसक्ति का नाश। यदि मन संसार के विषयों में ही फँसा हुआ है, तो केवल बाहर से वेश बदल लेने से वैराग्य नहीं आ जाएगा।

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि हमारे यहाँ ऐसे महात्मा हुए हैं जिन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी भगवान को प्राप्त किया। उनका जीवन ऐसा था कि वे अपनी पत्नी के साथ भी अत्यंत संयमित और तपस्वी जीवन जीते थे। करदम जी का उदाहरण देते हुए महाराज जी बताते हैं कि उन्होंने हजारों वर्षों तक तपस्या की और भगवान के प्रकट होने पर गृहस्थ जीवन की इच्छा व्यक्त की। बाद में भी उनका जीवन भजन और तपस्या में ही लगा रहा। इससे यह समझना चाहिए कि गृहस्थ होना अपने आप में भगवान की प्राप्ति में बाधा नहीं है।

महाराज जी का कहना है कि किसी के भाग्य में वैराग्य का मार्ग हो सकता है और किसी के जीवन में गृहस्थ धर्म। इसलिए गृहस्थ को अपने भोगों को ही जीवन का उद्देश्य नहीं बना लेना चाहिए, बल्कि जो परिस्थितियाँ मिली हैं, उन्हीं को भगवान की ओर जाने का साधन बनाना चाहिए। गृहस्थ जीवन में रहते हुए अपने धन को धर्मपूर्वक कमाना, परिवार का पालन करना, अपनी पत्नी के प्रति मर्यादा रखना और भगवान का भजन करना भी साधना है।

महाराज जी स्पष्ट भाव देते हैं कि भगवान को वही प्राप्त करेगा जो भगवान का भजन करेगा—चाहे वह गृहस्थ हो या विरक्त।

लेकिन इसका अर्थ मनमाना भोग करना नहीं है। गृहस्थ रहते हुए भी संयम चाहिए। निषिद्ध आचरण से बचना है, धर्मपूर्वक धन कमाना है और भगवान का स्मरण करते रहना है। महाराज जी तो यहाँ तक कहते हैं कि जो व्यक्ति एक पत्नीव्रत का पालन करता है और धर्म से कमाए धन से परिवार का पालन करता है, वह गृहस्थ में रहते हुए भी महात्मा के समान जीवन जी सकता है।

इसलिए वैराग्य का वास्तविक अर्थ घर छोड़ना नहीं, आसक्ति छोड़ना है। गृहस्थ को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान की ओर बढ़ना है और विरक्त को संसार से अलग रहकर भगवान में लगना है। मार्ग अलग हो सकता है, लेकिन लक्ष्य भगवान की प्राप्ति ही है।


प्रश्न 2: क्या हमारी जीवात्मा हमें सही-गलत के लिए प्रेरित करती है?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को समझाते हुए सबसे पहले एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि जीवात्मा हमसे अलग कोई दूसरी चीज नहीं है। हम स्वयं ही जीवात्मा हैं। इसलिए यह कहना कि “मेरी जीवात्मा मुझे सही काम करने के लिए प्रेरित करती है और मैं अलग हूँ” ठीक नहीं है। वास्तव में हमारा वास्तविक स्वरूप ही जीवात्मा है।

फिर महाराज जी मन, बुद्धि और आत्मा के बीच का अंतर समझाते हैं। जब मन और बुद्धि किसी गलत काम की ओर जाने लगते हैं, तब भीतर से एक रोकने वाली प्रेरणा आती है—जैसे अंदर से महसूस होता है कि “यह काम नहीं करना चाहिए।” लेकिन समस्या यह है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर मन और बुद्धि के साथ इतने तन्मय हो जाते हैं कि उनकी बात मान लेते हैं और भीतर से आने वाली सही प्रेरणा को ठुकरा देते हैं।

महाराज जी बताते हैं कि जब मन किसी गलत दिशा में जाना चाहता है तो भीतर से चेतावनी आती है। उदाहरण के लिए व्यक्ति के भीतर से आवाज आती है कि यह काम मत करो, लेकिन बाहर का मन कहता है कि यही करना है। यदि हम मन की बात मान लेते हैं तो बाद में उसका परिणाम भी भुगतना पड़ता है।

इसी कारण महाराज जी कहते हैं कि यदि हम अपनी वास्तविक आत्मिक स्थिति को पहचानें और आत्मा, गुरु तथा शास्त्र की बात को महत्व दें, तो हमारा कल्याण हो सकता है। लेकिन जब हम बार-बार मन की इच्छाओं के पीछे चलते हैं तो वही मन हमें छोटे-छोटे भोगों और विषयों में फँसाता रहता है।

महाराज जी के अनुसार आत्मा चिदानंद स्वरूप है, जबकि मन कामनाओं और विषय-चिंतन का स्थान है। मन का स्वभाव ही किसी न किसी विषय को पकड़ना है। इसलिए साधना का उद्देश्य मन की अनावश्यक कामनाओं और विषय-चिंतन को धीरे-धीरे कम करना है।

इसलिए जब भीतर से किसी गलत काम के लिए रोकने वाली भावना आती है, तो उसे दबाकर मन की बात मान लेने के बजाय रुककर विचार करना चाहिए। हमारा वास्तविक स्वरूप मन की हर इच्छा नहीं है। मन को भगवान की ओर लगाना और नामजप बढ़ाना ही धीरे-धीरे इस अंतर को स्पष्ट करता है।


प्रश्न 3: मन छोटे-छोटे भोगों में फँस जाता है, इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मन का स्वभाव ही विषयों और भोगों की ओर जाना है। बड़ी-बड़ी इच्छाओं से पहले मन अक्सर छोटी-छोटी चीजों में फँसता है। जैसे चाय, बीड़ी, तंबाकू या दूसरे छोटे-छोटे व्यसन—व्यक्ति जानता भी है कि यह उसके लिए ठीक नहीं है, फिर भी मन बार-बार उसी की तरफ खींचता है।

महाराज जी यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि भोगों से लड़ने के बजाय भजन की शक्ति बढ़ानी चाहिए। जितना भजन बढ़ेगा, उतना ही धीरे-धीरे भोगों का आकर्षण कम होता जाएगा। यदि किसी भोग का तुरंत पूरी तरह त्याग नहीं हो पा रहा है, तो भी भजन को छोड़ना नहीं चाहिए। भजन में इतनी शक्ति है कि वह धीरे-धीरे मन को विषयों से हटाकर भगवान की ओर ले जाता है।

महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि शरीर को चलाने के लिए कुछ आवश्यक चीजें चाहिए। भोजन, पानी, वायु और शरीर के लिए जरूरी पोषण को भोग नहीं कहा जा सकता। जैसे गाड़ी चलाने के लिए पेट्रोल आवश्यक है, वैसे ही शरीर को चलाने के लिए आवश्यक भोजन और जल चाहिए। समस्या आवश्यकता में नहीं, बल्कि स्वाद और अनावश्यक चाहत में है।

इसी बात को महाराज जी कामनाओं के संदर्भ में भी समझाते हैं। भूख लगी है तो भोजन करना कामना नहीं, आवश्यकता है। प्यास लगी है तो पानी पीना कामना नहीं है। शरीर ढकने के लिए वस्त्र चाहिए, यह भी आवश्यकता है। लेकिन भोजन कैसा हो, कपड़ा कैसा हो, कितना अच्छा हो—इसकी लगातार इच्छा करना कामना बन सकती है।

इसलिए मन के छोटे-छोटे भोगों से बचने का रास्ता यह नहीं है कि हम हर समय उन्हीं के बारे में सोचते रहें कि इन्हें छोड़ना है। महाराज जी कहते हैं कि भोगों का चिंतन ही नहीं करना चाहिए, भगवान का चिंतन करना चाहिए। खूब नामजप करें और धीरे-धीरे मन की दिशा बदलें।

सबसे बड़ी बात यह है कि मनुष्य जन्म भगवान की प्राप्ति के लिए मिला है। इसलिए मन को छोटी-छोटी इच्छाओं में उलझाकर पूरा जीवन नहीं निकालना चाहिए। नामजप बढ़ाते रहें, पवित्र भोजन लें, अच्छे आचरण करें और मन को बार-बार भगवान की ओर लगाएँ। यही धीरे-धीरे छोटे-छोटे भोगों के बंधन को कमजोर करेगा।


प्रश्न 4: प्रेम का क्या स्वरूप होना चाहिए? क्या प्रेम अपनी इच्छाओं के लिए करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी प्रेम को कोई साधारण या केवल बोलकर समझा देने वाली चीज नहीं मानते। वे बताते हैं कि भगवान और प्रेम अलग-अलग नहीं हैं। भगवान ही प्रेम स्वरूप हैं और प्रेम ही भगवान का स्वरूप है। इसलिए भगवान के प्रति जैसा हमारा भाव होगा, वैसा ही हमारा अनुभव भी बनेगा।

महाराज जी प्रेम की सबसे महत्वपूर्ण पहचान बताते हुए कहते हैं कि जिस व्यक्ति या भगवान से प्रेम किया जा रहा है, उसके प्रति अपनी कोई स्वार्थपूर्ण चाहत नहीं होनी चाहिए। प्रेम का भाव यह नहीं कि “वह मेरे लिए क्या करेगा?” बल्कि भाव यह होना चाहिए कि “मैं उसके लिए हूँ।” यही प्रेम की एक बहुत गहरी पहचान है।

सामान्य रूप से हम जिसे प्रेम समझते हैं, उसमें कहीं न कहीं अपनी इच्छा जुड़ी होती है। हमें सामने वाले से कुछ चाहिए होता है—उसका साथ, उसका व्यवहार, उसका ध्यान या अपनी इच्छा के अनुसार उसका रहना। महाराज जी के अनुसार यह वास्तविक भगवतिक प्रेम की पूर्ण अवस्था नहीं है। वास्तविक प्रेम में अपनी स्वार्थपूर्ण कामना पीछे छूटती जाती है।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि केवल शरीर को देखकर प्रेम करना भी प्रेम की बहुत स्थूल अवस्था है। कोई सुंदर है, जवान है, हमारे मन के अनुसार व्यवहार करता है—इन बातों के आधार पर जो आकर्षण होता है, वह उस सूक्ष्म प्रेम की स्थिति नहीं है जिसकी बात महाराज जी कर रहे हैं। वास्तविक प्रेम में सामने वाले के भीतर के भगवत भाव को देखने की बात है।

महाराज जी कहते हैं कि इस प्रेम को समझने के लिए पहले डटकर भजन करना जरूरी है। केवल प्रेम के विषय में बातें सुनने से प्रेम की वास्तविक स्थिति नहीं आती। खूब नामजप करने से हृदय में भगवान के नाम की भूख बढ़ती है। ऐसी स्थिति आती है कि व्यक्ति को लगता है—मैं जितना भजन कर रहा हूँ, वह भी पर्याप्त नहीं है। भगवान से और भजन माँगने की इच्छा होती है।

महाराज जी के अनुसार जब नामजप इतना गहरा हो जाए कि चलते-फिरते, बोलते और अपने काम करते हुए भी भीतर भगवान का नाम चलता रहे, तब साधना का प्रभाव दिखाई देने लगता है।

इसलिए प्रेम का अर्थ भगवान से अपनी इच्छाएँ पूरी करवाना नहीं है। प्रेम में अपनी चाहत पीछे और भगवान की प्रसन्नता आगे आती है। इस प्रेम को पाने के लिए लगातार नामजप, भजन और भगवान का चिंतन करते रहना ही महाराज जी द्वारा बताया गया मार्ग है।


प्रश्न 5: बचपन में जो प्रभु-प्रेम था, वह अब नहीं रहा। ज्ञान और सूक्ष्म अहंकार हावी हो जाता है, क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी इस स्थिति का समाधान बहुत सीधे रूप में बताते हैं—नामजप में चित्त को जोड़ दो। वे कहते हैं कि चाहे व्यक्ति कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले, यदि भगवान का निरंतर नाम उसके जीवन में नहीं चल रहा और उसका मन भगवान के चिंतन में नहीं लगा है, तो केवल ज्ञान उसके लिए पर्याप्त नहीं है।

महाराज जी बताते हैं कि संसार का चिंतन छूटना साधना है और भगवान का चिंतन होना साध्य है। इसलिए यदि मन बार-बार संसार की तरफ जा रहा है, तो उसे भगवान के नाम के माध्यम से वापस लाना चाहिए। इसके लिए किसी विशेष कठिन उपाय की बात नहीं कही गई है—जिस नाम से प्रेम हो, उसी नाम का बार-बार जप करना है।

महाराज जी नामजप की महिमा को बहुत ऊँचा बताते हैं। वे कहते हैं कि भगवान के नामजप से बढ़कर उनके अनुसार कोई ज्ञान, कोई व्रत, कोई दान या कोई विद्या नहीं है। इसलिए ज्ञान के साथ-साथ नामजप को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

बचपन में जो प्रेम और भाव था, वह अब कम दिखाई देता है तो उसका कारण यह हो सकता है कि जीवन में संसार और विषयों का चिंतन अधिक बढ़ गया है। महाराज जी समझाते हैं कि भोगानंद भगवान के आनंद के मार्ग में बाधा बनता है। जब मन विषयों में अधिक उलझता है, तो भगवान के प्रति वह पुरानी तड़प कमजोर पड़ सकती है।

इसलिए पुराने भाव को केवल याद करते रहने से बात नहीं बनेगी। वर्तमान में साधना करनी होगी। खूब नामजप करना होगा, अच्छे आचरण रखने होंगे और भगवान की शरण में रहना होगा। महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि केवल संत की कृपा या किसी के कह देने से साधना अपने आप पूरी नहीं हो जाती। साधक को स्वयं भी साधन करना पड़ता है।

महाराज जी यह भी कहते हैं कि भगवान स्वयं अर्जुन को अपना चिंतन करने, मन को भगवान में लगाने और भक्त बनने के लिए कहते हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवान का चिंतन करना पड़ेगा, नामजप करना पड़ेगा। केवल यह सोच लेना कि मुझे ज्ञान है या कभी बचपन में बहुत भाव था, पर्याप्त नहीं है।

इसलिए यदि ज्ञान और सूक्ष्म अहंकार बार-बार हावी हो रहे हैं तो ज्ञान को लेकर अपने ऊपर गर्व करने के बजाय नामजप बढ़ाइए, भगवान का चिंतन बढ़ाइए और अच्छे आचरण में रहिए। धीरे-धीरे मन की दिशा बदलने लगेगी और भगवान के प्रति वह भूख फिर गहरी हो सकती है।


प्रश्न 6: जब एक फौजी छुट्टी से वापस ड्यूटी पर जाता है तो उसे घर की बहुत याद आती है। ऐसे में वह इस वियोग को कैसे सहन करे?

उत्तर:
महाराज जी सैनिक के जीवन के इस दर्द को बहुत गहराई से समझते हुए कहते हैं कि देश का सैनिक अपने परिवार से दूर रहकर राष्ट्र की सेवा करता है। छोटी बच्ची की आँखों के आँसू, पत्नी की प्रतीक्षा और माँ की खाली गोद—इन सबको पीछे छोड़कर वह अपनी ड्यूटी पर जाता है। कई बार ऐसी जगह ड्यूटी होती है जहाँ घोर ठंड, बर्फबारी, गोलीबारी और जीवन का लगातार खतरा रहता है।

महाराज जी सैनिकों के इस त्याग को बहुत सम्मान देते हैं। वे कहते हैं कि सैनिक को यह भी निश्चित नहीं होता कि अगली बार वह अपने परिवार से मिल पाएगा या नहीं। फिर भी वह अपने व्यक्तिगत सुख और परिवार के मोह से ऊपर उठकर राष्ट्र की रक्षा के लिए खड़ा रहता है। इसी त्याग के कारण महाराज जी सैनिकों को प्रणाम और सलाम करते हैं।

ऐसे सैनिकों के लिए महाराज जी एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि यदि वे बिना भजन किए भी शरीर छोड़ते हैं तो उन्हें बड़े-बड़े यज्ञों के फल के समान स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है, लेकिन यदि वे “राधा राधा” कहते हुए शरीर छोड़ते हैं तो भगवत्प्राप्ति की बात कही गई है। इसलिए सैनिक को अपनी राष्ट्रसेवा के साथ भगवान का चिंतन भी करते रहना चाहिए।

महाराज जी सैनिक को परिवार से प्रेम करने से नहीं रोकते। बल्कि वे कहते हैं कि जब परिवार की ओर जा रहे हों तो उस समय पूरे प्रेम से परिवार के साथ रहें। लेकिन जब राष्ट्र की ड्यूटी पर हों तो उस समय अपने कर्तव्य को प्रधानता दें। उनका भाव है कि जीवन राष्ट्र को समर्पित है—यदि जीवन सुरक्षित रहा तो परिवार के लिए लौटेंगे, नहीं तो राष्ट्र के लिए बलिदान होगा।

महाराज जी सैनिकों को सामान्य जीवन से अलग जिम्मेदारी वाला व्यक्ति बताते हैं। क्योंकि उनके कष्ट सहने के कारण ही देश के बाकी लोग सुरक्षित वातावरण में अपने जीवन और साधना के कार्य कर पाते हैं। वे कहते हैं कि यदि सीमा पर सैनिक सुरक्षा में थोड़ी भी चूक कर दे तो यहाँ बहुत से लोगों का जीवन संकट में पड़ सकता है।

इसलिए घर की याद आना स्वाभाविक परिस्थिति है, लेकिन उस वियोग को राष्ट्रसेवा और भगवान के चिंतन के साथ सहना है। महाराज जी सैनिकों से भगवान का नाम लेते हुए अपनी राष्ट्रसेवा को प्रधानता देने की बात कहते हैं और उन्हें आश्वस्त करते हैं कि उनका परिवार भी भगवान की कृपा में सुरक्षित रहेगा।

महाराज जी के अनुसार सैनिक का यह त्याग साधारण त्याग नहीं है—वह अपने परिवार के सुख का त्याग करके पूरे राष्ट्र की रक्षा के लिए खड़ा होता है। इसलिए उसके जीवन में भगवान का चिंतन और राष्ट्रसेवा दोनों महत्वपूर्ण हैं।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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