माला-1403:क्या सिर्फ इस एक श्लोक से भगवान मिल सकते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,श्रीमद्भगवद्गीता जी के इस एक श्लोक से क्या भगवद्-प्राप्ति निश्चित है?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में श्रीमद्भगवद्गीता के उस भाव की ओर संकेत करते हैं जिसमें भगवान कहते हैं कि जो भक्त निरंतर उनका अनन्य चिंतन करता है, उसके लिए भगवान सुलभ हो जाते हैं। महाराज जी समझाते हैं कि केवल श्लोक को पढ़ लेना या बोल देना ही पर्याप्त नहीं है। उस श्लोक के भीतर छिपे भाव को जीवन में उतारना आवश्यक है। भगवान का अनन्य चिंतन ही वह मुख्य बात है, जिसके कारण भक्त के जीवन की दिशा पूरी तरह भगवान की ओर मुड़ जाती है।

महाराज जी बताते हैं कि भगवान स्वयं अपने भक्त का योगक्षेम वहन करने की बात कहते हैं। अर्थात जो प्राप्त नहीं है उसे प्राप्त कराने और जो प्राप्त है उसकी रक्षा करने का भार भगवान स्वयं लेते हैं। इसलिए साधक को हर समय अपनी इच्छाओं और चिंताओं का बोझ लेकर बैठने की आवश्यकता नहीं है। उसका मुख्य काम भगवान का चिंतन करना है।

लेकिन यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। बाहर से भक्ति की बहुत सारी क्रियाएं करते हुए भी यदि भीतर संसार के लोगों के प्रति राग-द्वेष, अहंकार, ममता और अपनी इच्छाएं उसी तरह बनी हुई हैं, तो केवल बाहरी भक्ति से वह अवस्था नहीं आएगी। महाराज जी उदाहरण देते हैं कि जैसे सांप भीतर बैठा हो और ऊपर से लाठी चलती रहे, तो सांप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसी प्रकार हृदय के भीतर अज्ञान और आसक्ति बनी रहे तो बाहरी क्रियाएं अकेले पर्याप्त नहीं हैं।

इसलिए तीव्र भक्ति का वास्तविक स्वरूप अनन्य चिंतन, भगवान की स्मृति और भगवान के अनुकूल आचरण है। जो आचरण भगवान के प्रतिकूल हो, उसका त्याग करना है और शास्त्र तथा संतों द्वारा बताए मार्ग के अनुसार जीवन चलाना है। साथ ही निरंतर नामजप करना है।

महाराज जी कहते हैं कि अपने कर्तव्य को भगवान की पूजा मानकर, अधर्म से बचते हुए और हर परिस्थिति में भगवान का नाम लेते हुए चलें तो भगवद्-प्राप्ति की दिशा निश्चित हो जाती है। नामजप इतना सरल है कि पवित्र या अपवित्र किसी भी अवस्था में भगवान का स्मरण किया जा सकता है।

इसलिए इस श्लोक का सार केवल उसे पढ़ लेना नहीं, बल्कि अनन्य भगवान-स्मरण को जीवन बना लेना है। जब स्मरण निरंतर होता है तो भगवान के लिए व्याकुलता पैदा होती है और महाराज जी इसी व्याकुलता को तीव्र भक्ति योग बताते हैं।


प्रश्न 2: कबीरदास जी के दोहे में वर्णित स्थिति कैसे प्राप्त की जा सकती है?

उत्तर:
कबीरदास जी के प्रसिद्ध भाव—“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं”—को महाराज जी अहंकार के पूर्ण लय से जोड़कर समझाते हैं। यहां “मैं” से केवल शरीर का नाम या व्यक्ति की पहचान नहीं है, बल्कि वह कर्तापन और अहंकार है जिसमें मनुष्य हर काम के लिए कहता है—मैंने किया, मैं कर रहा हूं, मैंने भोगा और मैं आगे ऐसा करूंगा। महाराज जी के अनुसार जब तक यह देह-अभिमान और कर्तापन बना रहता है, तब तक भगवान का वास्तविक अनुभव नहीं हो सकता।

महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य प्रकृति के तीन गुणों से बने इस शरीर रूपी यंत्र में बैठा हुआ है। बहुत-सी क्रियाएं प्रकृति के अनुसार अपने आप चल रही हैं, लेकिन अहंकार के कारण हम उन्हें अपना मान लेते हैं। जैसे ही हम किसी कर्म को “मैंने किया” मानकर स्वीकार करते हैं, उसी के फल को भी हमें भोगना पड़ता है। इसी को माया का बंधन बताया गया है।

इस स्थिति से निकलने के लिए महाराज जी नामजप, शास्त्रों का स्वाध्याय, सत्संग और अपने कर्तव्य को भगवान की पूजा मानकर करना बताते हैं। जब चित्त धीरे-धीरे भगवान के चरणों में जुड़ता है, तब अहंकार गलने लगता है। अपने शरीर को भी देखिए—उसकी रचना हमने नहीं की। आंख, कान, नाक, शरीर की शक्ति और स्वभाव हमें स्वयं बनाने नहीं पड़े। यह सब भगवान की रचना है। जब यह बात भीतर स्वीकार होने लगती है तो “मैं ही करता हूं” वाला अहंकार कमजोर पड़ता है।

महाराज जी राजा अमरीश जी का उदाहरण देकर बताते हैं कि भक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि समर्पण होना चाहिए। उनके जीवन में भगवान की भक्ति इतनी गहरी थी कि भगवान ने स्वयं भक्त के प्रति अपनी अधीनता का भाव प्रकट किया। महाराज जी इस उदाहरण से बताते हैं कि जब मनुष्य का अहंकार भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है, तब भक्ति का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है।

इसलिए कबीरदास जी द्वारा कही स्थिति कोई केवल बोलने या सोचने की बात नहीं है। “मैं नहीं, हरि ही सब कर रहे हैं”—इस भाव को जीवन में उतारना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि अपने कर्तव्यों से भाग जाएं। बल्कि अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से करते हुए कर्तापन का अहंकार भगवान को समर्पित करना है। नामजप करते हुए, सत्संग सुनते हुए और भगवान के आश्रित रहते हुए धीरे-धीरे यह भाव मजबूत होता है।


प्रश्न 3: जो कष्ट प्रभु-कृपा से कम हुए हैं, क्या उन्हें हमें बाद में भोगना पड़ेगा?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से देते हैं कि यदि भगवान की कृपा से कोई कष्ट कम हो गया है, तो यह आवश्यक नहीं कि वह बाकी कष्ट बाद में उसी रूप में भोगना ही पड़े। वे भगवान की कृपा को एक मां द्वारा बच्चे के ऑपरेशन के उदाहरण से समझाते हैं। बच्चे को लगता है कि मां उसे कष्ट दे रही है, लेकिन वास्तव में मां उसके भीतर की बड़ी बीमारी को दूर कराने के लिए डॉक्टर के पास लेकर गई है। उसी तरह भगवान अपने भक्त के भीतर के पापरूपी फोड़े का उपचार करते हैं और उसे उस कष्ट को सहने की आंतरिक शक्ति भी देते हैं।

महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि जहां बहुत भारी कर्मफल भोगना था, वहां भगवान की कृपा से उसका प्रभाव बहुत कम हो सकता है। वे उदाहरण देते हैं कि जहां किसी व्यक्ति को 100 थप्पड़ पड़ने थे, वहां भगवान की कृपा से केवल 10 में ही उसका कर्मफल समाप्त हो सकता है और बाकी 90 क्षमा हो सकते हैं। यानी भक्ति और भगवान की कृपा कर्मफल के अनुभव को बदल सकती है।

महाराज जी एक संत की कथा के माध्यम से इसे और स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार उस संत को पूर्व कर्मों के कारण अनेक जन्मों में कष्ट भोगना पड़ता, लेकिन भजन के प्रभाव से वही कर्मफल एक ही जीवन में बहुत संक्षिप्त रूप में आ गया। शरीर ने कष्ट सहा, लेकिन भगवान के ध्यान में स्थित होने के कारण साधक भीतर से उससे उसी तरह प्रभावित नहीं हुआ।

महाराज जी कर्मों के तीन स्तरों की ओर भी संकेत करते हैं। प्रारब्ध का जो भाग सामने आ चुका है, उसे शरीर के माध्यम से भोगना पड़ सकता है, लेकिन भगवान का नाम उसे सहने की शक्ति देता है। संचित कर्म भजन और भगवान के नाम से भस्म हो सकते हैं और जो नए कर्म बन रहे हैं, वे भी साधक को उसी प्रकार बांधने वाले नहीं रहते जब उसका जीवन भगवान के आश्रय में आ जाता है।

इसलिए कष्ट आने पर यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान ने मुझे छोड़ दिया। महाराज जी कहते हैं कि भजन करने वाले का सबसे बड़ा सुख यह है कि भारी विपत्ति में भी भगवान उसका मन अपने पास रखते हैं। शरीर को पीड़ा हो सकती है, लेकिन यदि मन भगवान के चरणों में लगा है तो वही मन भीतर से आनंदित रह सकता है।

महाराज जी का संदेश है कि धैर्यपूर्वक प्रारब्ध को भोगते हुए नामजप करते रहिए। संसार में सुख-दुख दोनों आएंगे, लेकिन ज्ञान का अर्थ यही है कि कोई भी परिस्थिति हमें भगवान से अलग न कर सके। जो बीत रहा है उसे भगवान की कृपा मानकर सहें और नामजप के माध्यम से आगे के जीवन को संभालें।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें: माला-1401:आज के समय में सही जीवनसाथी कैसे मिले? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply