माला-1434:महाराज जी,मुझे खुद पर संशय है, डर और डिप्रेशन से बाहर कैसे निकलूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: मुझे खुद पर संशय है, डर और डिप्रेशन से बाहर कैसे निकलूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर और संसार की आवश्यकताओं में इतना उलझ जाता है कि धीरे-धीरे उसकी इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं। इन इच्छाओं को पूरा करने की चिंता में मन अनेक प्रकार के विचार बनाने लगता है। छोटी-छोटी बातों में भय, संशय और भविष्य की चिंता होने लगती है। यही स्थिति मनुष्य को मानसिक अशांति की ओर ले जाती है।

महाराज जी बताते हैं कि केवल सांसारिक सुख-सुविधाएँ बढ़ाने से मन को स्थायी शांति नहीं मिल सकती। चाहे कितना भी धन और वैभव एकत्रित कर लिया जाए, भगवान से विमुख रहने पर मन संतुष्ट नहीं होगा। वास्तविक शांति के लिए या तो अपने स्वरूप का बोध होना चाहिए या भगवान के चरणों में भक्ति होनी चाहिए।

वे इससे बाहर निकलने के लिए चार उपाय बताते हैं—भगवान का नामजप, सत्संग, शास्त्रों का स्वाध्याय और परोपकार। जिस नाम के प्रति आपकी श्रद्धा हो, उसका नियमित जप करें। राम, कृष्ण, शिव, हरि या राधा—जिस नाम से आपका हृदय जुड़ता हो, उसी का स्मरण करते रहें।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि मन खाली रहने पर व्यर्थ की कल्पनाएँ और चिंताएँ बढ़ती हैं। इसलिए मन को अनावश्यक विचारों से हटाकर भगवान के चिंतन में लगाना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करना भी जीवन में अपनाएँ।

महाराज जी की सीख है कि डर, संशय और मानसिक अशांति से बाहर आने के लिए आध्यात्मिक जीवन अपनाएँ। नियमित नामजप करें, सत्संग सुनें, शास्त्रों का अध्ययन करें और परोपकार में समय लगाएँ।

प्रश्न 2: पद में तो मन लगता है, पर नामजप में मन नहीं लगता!

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि भगवान की लीलाओं से जुड़े पदों का भावपूर्वक गायन करना भी भजन है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यदि किसी साधक का मन मंत्र या नामजप में नहीं लगता, लेकिन वह भगवान के प्रेममय पद गाता है, तो उसकी साधना का कोई महत्त्व नहीं है।

महाराज जी सलाह देते हैं कि इन पदों को केवल गाने के लिए न गाएँ, बल्कि उनके भाव में पूरी तरह तन्मय होकर गाएँ। वे कहते हैं कि किसी एकांत स्थान पर बैठकर ऊँचे स्वर में पदों का गायन करें और उसमें वर्णित श्रीजी तथा प्रियतम की लीलाओं का चिंतन करें।

वे विशेष रूप से रसिक संतों द्वारा रचे गए पदों का उल्लेख करते हैं। इन पदों में श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी लीलाओं का वर्णन है। इन्हें बार-बार गुनगुनाने और इनके भाव में डूबने से साधक का मन उसी प्रेमरस में रमने लगता है।

महाराज जी समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति पद गायन करते हुए श्यामा प्यारी और कुंज बिहारी की लीलाओं में तल्लीन हो जाता है, तो वह भी भजन का ही मार्ग है। इसलिए पद गायन को कम महत्त्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए और न ही यह सोचकर निराश होना चाहिए कि मुझसे नामजप नहीं हो पा रहा।

वे चौरासी जी के पदों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि उनके गायन और श्रवण का भी आध्यात्मिक महत्त्व है। साधक को इन पदों के भाव को समझते हुए नियमित रूप से उनका गायन करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि जिस भजन में आपकी स्वाभाविक रुचि है, उसे पूरे प्रेम और तन्मयता से करें। पदों को केवल आवाज से न गाएँ, बल्कि उनमें वर्णित भगवान की लीलाओं का हृदय से चिंतन करें।

प्रश्न 3: जब से पति के धर्मविरुद्ध आचरण के बारे में पता चला है, भजन तो दूर, मैं डिप्रेशन में चली गई हूँ। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस परिस्थिति में समझाते हैं कि संसार के संबंध स्थायी नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे का हमेशा के लिए नहीं होता। इसलिए किसी संबंधी के गलत आचरण के कारण अपने मन को लगातार उसी चिंता में डुबोए रखना उचित नहीं है। ऐसा करने से साधक का ध्यान भगवान से हटकर राग-द्वेष और सांसारिक उलझनों में फँस जाता है।

महाराज जी कहते हैं कि यदि पति धर्म के मार्ग पर चल रहा है, तो उसके अच्छे कार्यों में सहयोग करना चाहिए। लेकिन यदि वह अधर्म और गलत आचरण में लगा हुआ है, तो उसके अनुचित व्यवहार से मन की आसक्ति हटाकर स्वयं धर्म के मार्ग पर बने रहना चाहिए।

वे समझाते हैं कि भगवान के अतिरिक्त संसार में कोई भी संबंध हमेशा साथ रहने वाला नहीं है। जब कोई व्यक्ति अपने इंद्रिय-सुख के पीछे भागता है, तो उसकी आसक्ति भी उन्हीं सुखों में रहती है। ऐसे व्यक्ति के व्यवहार के कारण अपने जीवन का आध्यात्मिक उद्देश्य नष्ट नहीं करना चाहिए।

महाराज जी प्रश्नकर्ता को इस परिस्थिति को भगवान की ओर बढ़ने का अवसर मानने की सलाह देते हैं। उनके अनुसार, यदि संसार के संबंधों से ममता कम हो रही है, तो उस ममता को भगवान के चरणों में लगाना चाहिए। अपने मन में यह दृढ़ भाव रखें कि वास्तविक प्रेम और आश्रय देने वाले भगवान ही हैं।

वे श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम मानकर उनकी शरण में रहने, एकांत में उनसे प्रार्थना करने और खूब नामजप करने की सलाह देते हैं। किसी दूसरे के गलत व्यवहार की प्रतिक्रिया में स्वयं गलत मार्ग पर नहीं जाना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि किसी के अधर्म के कारण अपना धर्म और भजन न छोड़ें। सांसारिक आसक्ति कम करके श्रीकृष्ण को अपना वास्तविक आश्रय बनाएँ और निरंतर नामजप करते रहें।

प्रश्न 4: भगवान कहते हैं कि “मैं सत और असत दोनों हूँ और मैं दोनों ही नहीं हूँ।” इसका क्या अर्थ है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान के इस कथन को समझने के लिए पहले सत और असत का अर्थ जानना आवश्यक है। वे बताते हैं कि हमारी आँखों से जो संसार दिखाई देता है और जिसका अनुभव इंद्रियों तथा मन के माध्यम से होता है, वह परिवर्तनशील है। इसलिए उसे असत कहा गया है। इसके पीछे जो परमात्मतत्त्व विद्यमान है, वही सत है।

महाराज जी कहते हैं कि जहाँ तक हमारी दृष्टि, इंद्रियों और मन की पहुँच है, वहाँ तक संसार के नाम और रूप दिखाई देते हैं। लेकिन जो परम तत्त्व इन सबका आधार है, वह हमारी सामान्य इंद्रियों से दिखाई नहीं देता।

वे सोने और आभूषण का उदाहरण देते हैं। सोने से हार, कंगन और अंगूठी जैसे अनेक आभूषण बनते हैं। उनके नाम और आकार अलग-अलग होते हैं, लेकिन उनका मूल तत्त्व सोना ही रहता है। आभूषण का रूप समाप्त होने पर भी सोना बना रहता है। इसी प्रकार सृष्टि के अनेक रूपों के पीछे मूल तत्त्व परमात्मा ही है।

महाराज जी समुद्र और लहरों का उदाहरण भी देते हैं। समुद्र में अनेक लहरें उत्पन्न होती हैं, लेकिन उनका अस्तित्व समुद्र से अलग नहीं है। जब लहरों का विकार शांत होता है, तो वे समुद्र में ही लीन हो जाती हैं।

वे समझाते हैं कि पहले साधक ब्रह्म को सत्य मानकर संसार के परिवर्तनशील रूपों से वैराग्य प्राप्त करता है। फिर जब उसे परमात्मतत्त्व का अनुभव होता है, तो वह समस्त जगत में उसी ब्रह्म की सत्ता को देखने लगता है।

भगवान सत भी हैं, असत रूप में प्रकट होने वाली सृष्टि के आधार भी हैं और इन दोनों सीमित धारणाओं से परे भी हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को पूरी तरह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

महाराज जी की सीख है कि संसार के अलग-अलग नाम और रूपों के पीछे एक ही परमात्मतत्त्व को समझने का प्रयास करें। इसके लिए भजन, नामजप और अंतःकरण की शुद्धता आवश्यक है।

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प्रश्न 5: नामजप के समय यदि मन भटके, पर भाव शुद्ध हो, तो क्या भगवान उस जप को स्वीकार करते हैं?

उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि भगवान के नाम में स्वयं इतनी सामर्थ्य है कि मन पूरी तरह एकाग्र न होने पर भी नामजप का फल प्राप्त होता है। वे अग्नि का उदाहरण देते हैं। अग्नि में जलाने की शक्ति होती है। कोई उसे श्रद्धा से छुए, बिना श्रद्धा के छुए या अनजाने में छू जाए, वह अपना प्रभाव अवश्य दिखाती है।

इसी प्रकार भगवान के नाम में पापों का नाश करने और जीव का कल्याण करने की शक्ति है। महाराज जी गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई का भाव समझाते हैं कि भगवान का नाम अच्छे या बुरे भाव से, श्रद्धा या अश्रद्धा से लिया जाए, फिर भी उसका मंगलकारी प्रभाव होता है।

वे बताते हैं कि शुरुआत में सभी साधकों का मन भजन में नहीं लगता। लेकिन लगातार अभ्यास करते रहने से मन धीरे-धीरे नामजप में लगने लगता है। जब मन पवित्र होता है, तब उसे भगवान के आनंद का अनुभव होने लगता है और सांसारिक विषयों का आकर्षण कम होने लगता है।

महाराज जी विशेष रूप से धैर्य रखने की सलाह देते हैं। साधक को नामजप से ऊबना नहीं चाहिए और न ही जल्दी परिणाम पाने की अपेक्षा रखनी चाहिए। मन बार-बार गलत विचारों और अनुचित इच्छाओं की ओर जाएगा, लेकिन उसके पीछे चलने के बजाय भगवान का नाम लेते रहना चाहिए।

वे एकांत के समय विशेष सावधानी रखने को कहते हैं, क्योंकि अकेले में मन गलत चिंतन और अनुचित दृश्यों की ओर खींच सकता है। ऐसे समय नामजप और सत्संग का सहारा लेना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि मन भटकने पर भी नामजप बंद न करें। धैर्यपूर्वक भगवान का नाम लेते रहें, गलत विचारों के सामने मन को मनमानी न करने दें और अपनी साधना में निरंतर बने रहें।

प्रश्न 6: मन को संतुष्टि कब और कैसे मिलेगी?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मन की वास्तविक संतुष्टि भगवान की प्राप्ति और उनके भजन से ही मिल सकती है। मनुष्य जितने भी सांसारिक भोग प्राप्त कर ले, उसकी इच्छाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा जन्म लेने लगती है। इसलिए केवल धन, वैभव और सुविधाओं से मन को स्थायी शांति नहीं मिलती।

महाराज जी बताते हैं कि किसी व्यक्ति के पास सभी सुख-सुविधाएँ हों, लेकिन यदि वह भगवान से विमुख है, तो उसका मन अशांत रह सकता है। इसके विपरीत, जिसके पास सीमित साधन हैं, लेकिन हृदय में भगवान के प्रति भरोसा, संतोष और नामजप है, वह भी चैन से जीवन बिता सकता है।

वे भगवान श्रीहरि के शेषनाग पर शयन करने का उदाहरण देते हैं। सामान्य दृष्टि से शेषनाग की शय्या प्रतिकूल परिस्थिति जैसी दिखाई देती है, लेकिन भगवान शांत हैं। इससे महाराज जी समझाते हैं कि वास्तविक शांति बाहरी सुविधाओं में नहीं, बल्कि भगवान के चिंतन में है।

महाराज जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य कामनाओं और सांसारिक इच्छाओं के पीछे भागता रहेगा, तब तक उसका मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं होगा। इसलिए अपनी अनावश्यक इच्छाओं को कम करके भगवान की भक्ति में समय लगाना चाहिए।

वे यह भी सलाह देते हैं कि जीवन का जो समय अभी शेष है, उसे केवल भोगों की प्राप्ति में व्यर्थ न करें। भगवान का नामजप करें, बुरे आचरणों को छोड़ें और उनके प्रति विश्वास बढ़ाएँ।

महाराज जी की सीख है कि मन की स्थायी संतुष्टि भगवान के भजन, नामजप और उनके प्रति अटूट विश्वास से प्राप्त होती है। सांसारिक भोगों में शांति खोजने के बजाय अपनी कामनाओं को कम करें और भगवान का स्मरण करते हुए संतोषपूर्वक जीवन बिताएँ।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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