प्रश्न 1: किन लोगों को अपनी मृत्यु आने का पहले ही पता लग जाता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मृत्यु का समय पहले से पता नहीं चलता। ऐसा संकेत केवल कुछ सिद्ध महापुरुषों को हो सकता है, जिन्होंने अपना जीवन निरंतर भगवान के भजन और चिंतन में बिताया है। उनका अंतःकरण परमात्मा से जुड़ा रहता है, इसलिए उन्हें अपने शरीर के छूटने का समय पहले ही ज्ञात हो सकता है।
महाराज जी इस संदर्भ में पूज्य बाबा जी और वृंदावन के राधा टीला के महंत जी के प्रसंग सुनाते हैं। वे बताते हैं कि इन महापुरुषों को अपने अंतिम समय का आभास हो गया था। उन्होंने अपने आवश्यक कार्य पूरे किए, भगवान की सेवा की और अपने प्रियजनों से क्षमा माँगकर शांत भाव से शरीर त्याग की तैयारी की।
महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि सामान्य मनुष्य के लिए भोजन की तरह मृत्यु का समय पहले से जान लेना संभव नहीं है। संसार में कई लोग अचानक भोजन करते हुए या सामान्य कार्य करते हुए भी शरीर छोड़ देते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी मृत्यु का संकेत पहले से मिल जाएगा, ऐसा मानना उचित नहीं है।
वे योगियों और भगवान के प्रेमी भक्तों के मार्ग में भी अंतर बताते हैं। कुछ योगी प्राणों को नियंत्रित करके अपनी आयु बढ़ा सकते हैं, लेकिन भक्त अपनी इच्छा को भगवान की इच्छा में मिला देता है। उसे न तो जीने की अपनी जिद होती है और न ही मृत्यु से शिकायत।
महाराज जी की सीख है कि मृत्यु का समय जानने की जिज्ञासा में उलझने के बजाय जीवन को भगवान के भजन में लगाएँ। निरंतर नामजप और भगवत्-चिंतन करें तथा अपने जीवन को इस प्रकार बनाएँ कि अंतिम समय में भी भगवान का स्मरण बना रहे।
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प्रश्न 2: क्या भक्ति के लिए कारोबार आदि से आसक्ति हटानी पड़ेगी?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भक्ति करने के लिए अपने कारोबार या नौकरी से मन हटाना आवश्यक नहीं है। बल्कि अपने कर्तव्य को ही भगवान की पूजा समझकर पूरी ईमानदारी और एकाग्रता से करना चाहिए। यदि व्यक्ति अपने काम में ध्यान नहीं लगाएगा, तो वह जिम्मेदारी भी ठीक से पूरी नहीं कर पाएगा।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि यदि कोई संत आपको भगवान की सेवा के लिए दिल्ली से कोई वस्तु लाने का आदेश दे, तो आप उस काम को उत्साह से करेंगे। रास्ते में कठिनाई आने पर भी उसे सेवा समझकर पूरा करेंगे। इसी प्रकार अपने कार्यालय और कारोबार को समाज की सेवा तथा भगवान की पूजा मानना चाहिए।
वे बताते हैं कि जिस भी विभाग या कार्यक्षेत्र में हम हैं, वहाँ ईमानदारी से लोगों के हित में काम करना चाहिए। किसी के साथ बेईमानी न करें, शराब और दूसरे व्यसनों से बचें, मांसाहार तथा अनुचित आचरण से दूर रहें। अपने काम के माध्यम से समाज को सुख पहुँचाने की भावना रखें।
महाराज जी संत रैदास जी का उदाहरण देते हैं, जो अपने पारंपरिक काम को करते हुए भी भगवान का नामजप करते थे। वे सदन जी का भी उल्लेख करते हैं, जिन्होंने अपने पारंपरिक व्यवसाय के साथ नामजप जारी रखा और महान भक्त बने।
इसलिए कारोबार छोड़ देना ही भक्ति नहीं है। अपने काम को भगवान को समर्पित करके, नामजप करते हुए और ईमानदारी से जिम्मेदारी निभाना भी भक्ति का मार्ग है।
महाराज जी की सीख है कि कारोबार से भागें नहीं, बल्कि उसे भगवान की सेवा समझकर करें। काम में पूरी एकाग्रता रखें, बेईमानी और व्यसनों से बचें तथा अपने कार्यों के बीच भगवान का नाम स्मरण करते रहें।
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प्रश्न 3: आपके समीप जो भी साधक हैं, क्या वे पूर्वजन्म के भजन के कारण सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में आए हैं?
उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में बताते हैं कि साधकों का संतों के पास आना और उनके जीवन में परिवर्तन होना केवल पूर्वजन्म के भजन या प्रारब्ध का परिणाम नहीं है। इसमें संतों के संग का विशेष प्रभाव और भगवान की कृपा महत्त्वपूर्ण है।
महाराज जी समझाते हैं कि जब भगवान किसी जीव पर कृपा करते हैं, तब उसे संतों का संग प्राप्त होता है। सत्संग का प्रभाव ऐसा होता है कि व्यक्ति के विचार, आदतें और जीवन जीने का तरीका बदलने लगता है। वह अपने पुराने गलत आचरणों को छोड़कर अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है।
वे बताते हैं कि उनके पास आने वाले सभी साधक दीक्षित हों, यह आवश्यक नहीं है। कई लोग केवल सत्संग सुनकर ही शराब छोड़ देते हैं, मांसाहार त्याग देते हैं और अपनी गंदी आदतों में सुधार करने लगते हैं। ऐसे लोगों का भी संत-संग से मंगल होता है, चाहे वे किसी के शिष्य बने हों या नहीं।
महाराज जी संत-संग के प्रभाव को काजल की कोठरी के उदाहरण से समझाते हैं। जैसे काजल की कोठरी में जाने पर व्यक्ति के कपड़ों पर काजल का रंग लग जाता है, उसी तरह संतों के संग में रहने से उनके विचारों और आचरण का प्रभाव साधक पर पड़ता है।
वे रामचरितमानस की चौपाई का भाव भी बताते हैं कि भगवान की कृपा के बिना संतों का मिलना कठिन है। जब संतों का संग प्राप्त होता है, तो उसका अच्छा प्रभाव धीरे-धीरे अवश्य दिखाई देने लगता है।
महाराज जी की सीख है कि संतों का संग भगवान की कृपा से मिलता है और उसका लाभ उठाकर अपने आचरण को सुधारना चाहिए। सत्संग सुनें, बुरी आदतें छोड़ें और भगवान की भक्ति में आगे बढ़ें।
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प्रश्न 4: भक्ति जीवन को सरल बनाने के लिए है या भगवद्-प्राप्ति के लिए?
उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि भक्ति का उद्देश्य केवल जीवन को सरल बनाना नहीं, बल्कि भगवान को प्राप्त करना है। सरलता भक्ति का एक गुण अवश्य है, लेकिन भक्ति का सामर्थ्य इससे कहीं अधिक है।
महाराज जी बताते हैं कि भक्ति में शांति, निर्भयता, विनम्रता, संतोष और अनेक सद्गुण प्रकट होते हैं। सच्ची भक्ति वह है, जिसमें भगवान भक्त के प्रेम के अधीन हो जाते हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों के पीछे-पीछे चलने की बात कहते हैं, क्योंकि वे अपने भक्तों के प्रेम से बँध जाते हैं।
वे भक्त के कुछ विशेष लक्षण भी बताते हैं। सच्चा भक्त किसी से सांसारिक अपेक्षा नहीं रखता, किसी के सामने अपने स्वार्थ के लिए हाथ नहीं फैलाता, हर परिस्थिति में शांत रहता है और किसी से शत्रुता नहीं रखता। उसके भीतर समदृष्टि होती है और वह सबमें भगवान की सत्ता देखने का प्रयास करता है।
महाराज जी समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति भगवान की चर्चा करके उसके बदले धन या किसी प्रकार का लाभ माँगता है, तो वह भक्ति के बजाय व्यापार की भावना है। भक्ति में स्वार्थ और अपेक्षा का स्थान नहीं होना चाहिए। भगवान के प्रति प्रेम ही साधक का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।
इसलिए भक्ति को केवल इस दृष्टि से नहीं देखना चाहिए कि इससे हमारी परेशानियाँ कम होंगी या जीवन आसान हो जाएगा। भक्ति तो मनुष्य को भगवान के चरणों तक पहुँचाने वाला अत्यंत सामर्थ्यशाली मार्ग है।
महाराज जी की सीख है कि भक्ति को केवल जीवन की कठिनाइयाँ दूर करने का साधन न बनाएँ। निष्काम भाव से भगवान का नाम जपें, उनसे प्रेम करें और अपने भीतर शांति, विनम्रता, संतोष तथा समदृष्टि जैसे गुण विकसित करें।
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प्रश्न 5: प्रभु! हम भी शरणागत हैं, स्वीकार करो तो जानें।
उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रार्थना के भाव को बहुत सुंदर बताते हैं। वे कहते हैं कि भगवान के सामने अपनी दीनता प्रकट करना और उनसे शरण देने की विनती करना अच्छा भाव है। लेकिन केवल वाणी से प्रार्थना कर देना ही वास्तविक शरणागति नहीं है। उस प्रार्थना का प्रभाव हमारे जीवन और आचरण में भी दिखाई देना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि जब साधक के हृदय में वास्तव में दीनता आती है, तब उसे अपने दोषों का अनुभव होने लगता है। उसके मन में यह भाव जागता है कि प्रभु, मैं बहुत दोषों वाला हूँ, फिर भी क्या आप मुझे अपनी शरण में स्वीकार करेंगे? ऐसी भावना के साथ भगवान का निरंतर स्मरण भी आवश्यक है।
वे विशेष रूप से कहते हैं कि यदि हम भगवान से बहुत प्रार्थना करें, लेकिन अपने व्यवहार में गलत काम करते रहें, किसी को दुःख दें, छल-कपट करें और बेईमानी से धन कमाएँ, तो हमारी प्रार्थना का वास्तविक भाव प्रकट नहीं होता। भगवान को दिखावे की आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदय और आचरण का भाव देखते हैं।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति भगवान की आज्ञा और शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार जीवन जीता है, गलत आचरण से बचता है और भगवान का नामजप करता है, तो उसे बार-बार अपनी प्रार्थना का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं है। भगवान स्वयं उसका मंगल करते हैं।
महाराज जी की सीख है कि शरणागति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि तन, मन, वाणी और आचरण में दिखाई देनी चाहिए। राधा नाम का निरंतर स्मरण करें, किसी को दुःख न पहुँचाएँ और पवित्र जीवन जीने का प्रयास करें।
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प्रश्न 6: रामचरितमानस में काकभुशुण्डि जी किस रहस्य की बात कर रहे हैं?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि काकभुशुण्डि जी जिस रहस्य की ओर संकेत करते हैं, वह भगवान श्रीराम की अनंत और असीम लीलाओं से जुड़ा हुआ है। भगवान की शक्ति और उनके स्वरूप को सामान्य बुद्धि से पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं है।
महाराज जी काकभुशुण्डि जी के एक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। भगवान श्रीराम की बाललीला के समय काकभुशुण्डि जी उनके पीछे-पीछे दौड़कर उनका जूठन लेने का प्रयास कर रहे थे। भगवान उनसे बचने के लिए आगे बढ़ते रहे। एक समय भगवान ने हँस दिया और काकभुशुण्डि जी उनके मुख के भीतर पहुँच गए।
जब उन्होंने भगवान के उदर में प्रवेश किया, तो वहाँ उन्हें अनगिनत ब्रह्मांड दिखाई दिए। उन ब्रह्मांडों को देखकर वे आश्चर्यचकित और व्याकुल हो गए। बाद में भगवान की लीला से वे पुनः बाहर आ गए और उन्हें वही बालरूप दिखाई दिया।
इस प्रसंग से महाराज जी समझाते हैं कि भगवान की महिमा असीम है। वे इतने सूक्ष्म हैं कि चींटी के हृदय में भी विराजमान हैं और इतने विशाल हैं कि उनके भीतर अनंत ब्रह्मांड समाए हुए हैं। उनकी लीलाएँ हमारी सामान्य समझ और कल्पना से बहुत आगे हैं।
इसी कारण काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि भगवान रघुनाथ की लीला का रहस्य कोई नहीं जान सकता। लेकिन जिसे भगवान की कृपा प्राप्त हो जाती है, उसके भीतर मोह और अज्ञान नहीं टिकते।
महाराज जी की सीख है कि भगवान की लीलाओं को अपनी सीमित बुद्धि से पूरी तरह समझने का अहंकार नहीं करना चाहिए। उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए श्रद्धा, भक्ति और निरंतर नामस्मरण का आश्रय लें।
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प्रश्न 7: कुछ समय से मन भयभीत है, लगता है कि मैं दंभी हूँ और मेरे भीतर अहंकार है। क्या यह भजन में कोई कमी है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि अपने भीतर अहंकार और दूसरे दोष दिखाई देने लगना निराशा की बात नहीं है। वे इसे भगवान की विशेष कृपा का संकेत बताते हैं। जब तक मनुष्य स्वयं को योग्य, श्रेष्ठ और भगवान की प्राप्ति का अधिकारी मानता रहता है, तब तक उसके भीतर अहंकार बना रह सकता है। लेकिन जब उसे अपनी कमियाँ दिखाई देने लगती हैं और वह स्वयं को दीन तथा दोषों से भरा हुआ मानकर भगवान की शरण में जाता है, तब उसके भीतर वास्तविक विनम्रता विकसित होती है।
महाराज जी महाप्रभु चैतन्य देव का एक प्रसंग सुनाते हैं। एक व्यक्ति अपने तीर्थ-भ्रमण और फलाहार करने पर गर्व करता था। उसे लगा कि महाप्रभु उसके आने पर प्रसन्न होकर गले लगा लेंगे। लेकिन जब वह वहाँ पहुँचा, तो महाप्रभु ने उसे अहंकार के कारण स्वीकार नहीं किया। बाद में वह व्यक्ति एकांत में जाकर रोने लगा और अपनी दीनता प्रकट करते हुए भगवान से शरण माँगने लगा। तब महाप्रभु दौड़कर आए और उसे गले लगा लिया।
इस प्रसंग से महाराज जी समझाते हैं कि भगवान के मार्ग में अपने गुणों और पुण्य कर्मों का अहंकार नहीं करना चाहिए। जब व्यक्ति को अपनी वास्तविक कमियाँ दिखाई देती हैं और वह भगवान से सच्चे हृदय से कृपा माँगता है, तब उसके भीतर भक्ति का भाव गहरा होने लगता है।
महाराज जी प्रश्नकर्ता को बताते हैं कि यह स्थिति गलत नहीं है। अपने भजन को और बढ़ाएँ। यदि प्रतिकूल परिस्थिति में सत्संग सुनने या जोर-जोर से नामजप करने से मन को सहारा मिलता है, तो ऐसा करते रहें। घर या बाहर के लोग कुछ भी कहें, उससे विचलित न हों।
महाराज जी की सीख है कि अपने भीतर दोष दिखाई देने पर निराश न हों, बल्कि उसे भगवान की कृपा मानकर दीनता और विनम्रता बढ़ाएँ। एकांत में भगवान को पुकारें, निरंतर नामजप करें और भजन के मार्ग पर दृढ़ रहें।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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