प्रश्न 1: देहाभिमान का नाश कैसे हो?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, देहाभिमान का अर्थ है स्वयं को शरीर मानना और अपने आपको ही हर कार्य का कर्ता तथा सुख-दुःख का भोक्ता समझना। जब मनुष्य सोचता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ और मुझे ही इसका सुख भोगना है, तब यह भावना उसके भीतर अहंकार और संसार के प्रति आसक्ति को बढ़ाती है।
महाराज जी समझाते हैं कि मन में पहले किसी विषय का विचार आता है। यदि हम उस विचार में रुचि लेने लगते हैं, तो वह संकल्प बन जाता है। संकल्प से इच्छा पैदा होती है और फिर व्यक्ति उस इच्छा को पूरा करने के लिए कर्म करता है। इस प्रकार वह सुख-दुःख और कर्मों के बंधन में उलझता चला जाता है।
इससे बचने के लिए महाराज जी निरंतर नामजप करने, सात्त्विक तथा सीमित भोजन करने और पवित्र आचरण अपनाने पर जोर देते हैं। गलत संगति और विषय-भोगों में अधिक रुचि रखने से मन की मलिनता बढ़ती है, जबकि संतों का संग और भगवान का स्मरण मन को निर्मल बनाने में सहायता करते हैं।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन हर कार्य में अहंकारपूर्वक स्वयं को ही कर्ता नहीं मानना चाहिए। अपने पद और जिम्मेदारियों के अनुसार व्यवहार करते हुए मन में भगवान का स्मरण बनाए रखना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि निरंतर नामजप करें, पवित्र भोजन और आचरण अपनाएँ तथा मन में उठने वाली इच्छाओं के प्रति सावधान रहें। अभ्यास से कर्तापन और भोग की लालसा कम होने लगती है तथा देहाभिमान धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है।
प्रश्न 2: ‘सब कुछ भगवान की इच्छा से हो रहा है’, यह भाव कैसे उत्पन्न होगा?
उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि सब कुछ भगवान की इच्छा से हो रहा है, इस भाव की वास्तविक अनुभूति तभी होती है जब मनुष्य के भीतर का अहंकार कम होने लगता है। केवल यह कह देना कि सब भगवान की इच्छा से हो रहा है, पर्याप्त नहीं है। पहले अपने जीवन को शास्त्रों के अनुसार ढालना और भगवान के अनुकूल आचरण करना आवश्यक है।
महाराज जी सावधान करते हैं कि जब तक मन में इच्छाएँ और अहंकार बने हुए हैं, तब तक व्यक्ति अपनी मनमानी को भी भगवान की इच्छा कहकर उचित ठहरा सकता है। इसलिए सही और गलत का निर्णय अपनी सुविधा से नहीं, बल्कि शास्त्रों के मार्गदर्शन से करना चाहिए।
इसके लिए भगवान के प्रतिकूल आचरणों को छोड़ना, सत्संग सुनना, शास्त्रों का स्वाध्याय करना और नियमित नामजप करना आवश्यक है। जब साधना के प्रभाव से अहंकार कमजोर होने लगता है, तब व्यक्ति परिस्थितियों को एक व्यापक दृष्टि से देख पाता है।
महाराज जी समझाते हैं कि संसार में सृजन, पालन और परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं। जो महापुरुष भगवान की लीला को समझते हैं, वे विपरीत परिस्थितियों में भी अत्यधिक व्याकुल या अशांत नहीं होते। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अनुचित कार्यों को भी भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया जाए। गलत आचरण का त्याग करना और धर्म के अनुसार चलना आवश्यक है।
महाराज जी की सीख है कि पहले अपने आचरण को शास्त्रसम्मत बनाएँ, नामजप और सत्संग में लगे रहें तथा अहंकार को कम करने का प्रयास करें। जब मन निर्मल होगा, तब भगवान की इच्छा के प्रति समर्पण का भाव भी गहराने लगेगा।
प्रश्न 3: हम आपसे बहुत प्रेम करते हैं, आपके बिना एक पल भी नहीं जी सकते। क्या करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य के जीवन में शरीर का बिछुड़ना एक निश्चित सत्य है। इस संसार में कोई भी शरीर हमेशा नहीं रहता। इसलिए किसी महापुरुष के प्रति प्रेम होने पर उनके शरीर के सदा साथ रहने की इच्छा से व्याकुल रहने के बजाय उनके बताए मार्ग पर चलना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
महाराज जी बताते हैं कि वे स्वयं भी हर समय भगवान के स्मरण में रहने का प्रयास करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि अगला क्षण या अगला शब्द भी मिलेगा या नहीं। इसलिए वे प्रत्येक क्षण को भगवान के चिंतन से जोड़कर रखते हैं। इसी प्रकार साधक को भी जीवन का कोई समय भगवान के स्मरण से खाली नहीं जाने देना चाहिए।
वे समझाते हैं कि जब गुरु प्रत्यक्ष रूप से सामने दिखाई नहीं देते, तब भी उनके उपदेशों और आज्ञाओं का पालन करके उनके सानिध्य का अनुभव बनाए रखा जा सकता है। गुरु की वाणी को जीवन में उतारना, उनके बताए अनुसार भजन करना और भगवान का निरंतर चिंतन करना साधक को आध्यात्मिक रूप से गुरु से जोड़े रखता है।
इसलिए गुरु के शरीर के बिछुड़ने की आशंका से भयभीत होकर जीवन को दुःखमय नहीं बनाना चाहिए। प्रेम को ऐसी साधना में बदलना चाहिए, जिससे जीवन में भक्ति और अनुशासन बढ़े।
महाराज जी की सीख है कि गुरु के प्रति प्रेम को उनके उपदेशों के पालन और निरंतर भजन के रूप में प्रकट करें। उनके बताए मार्ग पर चलते हुए भगवान का नाम स्मरण करें, ताकि प्रत्यक्ष सानिध्य न होने पर भी उनका मार्गदर्शन आपके जीवन में बना रहे।
प्रश्न 4: शास्त्रों का श्रवण करते हैं और उन पर चलने का प्रयास भी करते हैं, फिर भी मन मलिन है। क्या करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि केवल शास्त्रों को सुनने या पढ़ने से मन पूरी तरह शुद्ध नहीं होता। उनके बताए हुए सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना और उन पर लगातार विचार करना भी आवश्यक है। कई बार हम बहुत कुछ सुन लेते हैं, लेकिन उसे व्यवहार में लाने का पर्याप्त प्रयास नहीं करते। इसीलिए मन की पुरानी प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं।
महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी ग्रंथ की एक पंक्ति भी पढ़ी है, तो उसे समझने और अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए। केवल अधिक सुनने और पढ़ने में समय लगाने के बजाय सीखी हुई बात का अभ्यास करना अधिक उपयोगी है।
वे निरंतर नामजप पर विशेष जोर देते हैं। नामजप करते समय केवल माला चलाने या मुख से नाम बोलने तक सीमित न रहें, बल्कि मन को भी उसी नाम में लगाएँ। उदाहरण के लिए, यदि कोई महामंत्र जप रहे हैं, तो उसके प्रत्येक शब्द को ध्यानपूर्वक सुनें और मन में उसी का चिंतन करें। जब माला, जिह्वा और मन एक साथ भगवान के नाम में लगने लगते हैं, तब साधना अधिक एकाग्र होती है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि आरंभिक साधक को गुरु द्वारा निर्धारित जप-संख्या का पालन करना चाहिए। यदि मन एकाग्र नहीं हो रहा, तो अलग से कुछ मिनट ध्यानपूर्वक नाम लिखने या जपने का अभ्यास किया जा सकता है। लेकिन इस अभ्यास के कारण निर्धारित जप-संख्या को छोड़ना उचित नहीं है।
महाराज जी की सीख है कि शास्त्रों की बातों को आचरण में उतारें, नियमित नामजप करें और मन को बार-बार भगवान में लगाएँ। सुनने के साथ अभ्यास करने से मन की मलिनता और संशय धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
प्रश्न 5: अनन्य भक्ति की प्राप्ति कैसे होगी?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, अनन्य भक्ति तब विकसित होती है, जब साधक का मन बार-बार भगवान की ओर लौटने के बजाय निरंतर उन्हीं में लगा रहने लगता है। इसके लिए नवधा भक्ति के विभिन्न अंगों का अभ्यास करना आवश्यक है।
नवधा भक्ति के नौ अंग हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। अर्थात भगवान की कथा सुनना, उनका नाम और गुण गाना, उनका स्मरण करना, सेवा करना, पूजा-अर्चना करना, प्रणाम करना, स्वयं को उनका सेवक तथा सखा मानना और अंततः अपना सब कुछ उन्हें समर्पित करना।
महाराज जी समझाते हैं कि जब साधक इन साधनों में नियमित रूप से आगे बढ़ता है, तो भगवान के प्रति उसका प्रेम गहरा होने लगता है। धीरे-धीरे दूसरी इच्छाओं और आसक्तियों का प्रभाव कम होने लगता है और मन भगवान के चिंतन में स्थिर होने लगता है।
इसके साथ भोजन की पवित्रता, कम बोलना, सत्य और मधुर वाणी का प्रयोग करना तथा अनावश्यक देखने-सुनने और सांसारिक चर्चाओं में समय न गँवाना भी आवश्यक है। अपनी ममता को केवल परिवार, धन और संपत्ति तक सीमित रखने के बजाय भगवान के चरणों में समर्पित करने का अभ्यास करना चाहिए। इसका अर्थ परिवार के कर्तव्यों को छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें भी भगवान की भावना से निभाना है।
महाराज जी बताते हैं कि जब भक्त अनन्य भाव से भगवान का चिंतन करता है, तब भगवान उसके योगक्षेम का भार लेते हैं।
महाराज जी की सीख है कि नवधा भक्ति का अभ्यास करें, सात्त्विक जीवन जिएँ और भगवान के नाम का निरंतर स्मरण बनाए रखें। जब दूसरी आसक्तियाँ कम होकर भगवान के प्रति प्रेम प्रबल होने लगता है, तब अनन्य भक्ति की दिशा में प्रगति होती है।
प्रश्न 6: जैसे पाँच तत्त्व, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच देव और पाँच पांडव होते हैं—तो क्या पाँच का कोई विशेष आध्यात्मिक महत्त्व है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी इस विषय में समझाते हैं कि संसार में अनेक चीजों की संख्या तीन, चार, पाँच, छह या सात होती है। इन संख्याओं को आपस में जोड़कर अलग-अलग मान्यताएँ बनाई जा सकती हैं, लेकिन केवल समान संख्या होने से उन सभी के बीच कोई विशेष आध्यात्मिक संबंध सिद्ध नहीं हो जाता।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि पाँच तत्त्व, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच पांडव हैं। इसी प्रकार अन्य अनेक विषयों में भी एक जैसी संख्याएँ मिल सकती हैं। लेकिन हर जगह एक ही संख्या दिखाई देने के आधार पर कोई विशेष निष्कर्ष निकालते रहना आवश्यक नहीं है।
वे समझाते हैं कि भगवान एक हैं, जो अनेक रूपों में अपनी लीलाएँ करते हैं। साधक का उद्देश्य हर संख्या के पीछे अलग-अलग आध्यात्मिक अर्थ खोजते रहना नहीं, बल्कि भगवान के वास्तविक तत्त्व को समझना और उनकी भक्ति में आगे बढ़ना होना चाहिए।
महाराज जी विशेष रूप से कहते हैं कि मृत्यु से मुक्त होने या आध्यात्मिक कल्याण प्राप्त करने के लिए संख्याओं के ऐसे मेल खोजने से अधिक महत्त्वपूर्ण है भगवान का भजन करना और अच्छे कर्म अपनाना। बुरे कर्मों का त्याग करके भगवान के नाम का जप करना ही साधक के लिए आवश्यक है।
इसलिए किसी संख्या को केवल इसलिए विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं मान लेना चाहिए कि वह कई अलग-अलग विषयों में दिखाई देती है। आध्यात्मिक जीवन में शास्त्रों के सिद्धांत और साधना का अभ्यास अधिक महत्त्व रखते हैं।
महाराज जी की सीख है कि संख्याओं के मेल में उलझने के बजाय भगवान को समझने और उनकी भक्ति करने पर ध्यान दें। अच्छे कर्म करें, गलत आचरण छोड़ें और नियमित नामजप के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक बनाएँ।
प्रश्न 7: कोई भी भगवद्-अनुभव होने के बाद ऐसा क्यों लगता है कि यह सब झूठ था?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि यदि किसी अनुभव के बाद मन में डर, निराशा, भ्रम या बार-बार संशय उत्पन्न हो रहा है, तो केवल उस अनुभव को भगवद्-अनुभूति मान लेना उचित नहीं है। कभी-कभी मन अपनी कल्पना या भावनाओं के प्रभाव से भी विशेष अनुभव कर सकता है। इसलिए अनुभव के साथ उत्पन्न होने वाली आंतरिक स्थिति को समझना आवश्यक है।
महाराज जी के अनुसार, वास्तविक भगवद्-अनुभूति में निर्भयता, निश्चिंतता, शोक से मुक्ति, संशय का अभाव और विपरीत भावनाओं का क्षय जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसके साथ आनंद की अनुभूति होती है, जो साधक को भगवान के चिंतन में और अधिक तन्मय करती है।
वे बताते हैं कि सच्चे प्रेम से उत्पन्न आनंद क्षणभर बढ़कर फिर पूरी तरह समाप्त हो जाने वाला अनुभव मात्र नहीं होता। भगवान के प्रति प्रेम बढ़ने के साथ आनंद की गहराई भी बढ़ती जाती है। ऐसी स्थिति में साधक बार-बार यह सोचकर परेशान नहीं होता कि उसका अनुभव वास्तविक था या केवल भ्रम।
इसलिए किसी छोटे अनुभव के बाद बहुत बड़ी अपेक्षा बाँध लेना या अनुभव समाप्त होने पर स्वयं को असफल मान लेना उचित नहीं है। साधना का उद्देश्य केवल विशेष अनुभव प्राप्त करना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण बढ़ाना है।
महाराज जी भगवान का आश्रय दृढ़ करने और भजन बढ़ाने की सलाह देते हैं। नियमित नामजप और सत्संग के माध्यम से साधक अपने मन को स्थिर करने का प्रयास कर सकता है।
महाराज जी की सीख है कि अनुभवों को लेकर भय और संशय में न उलझें। भगवान का आश्रय लें, नामजप बढ़ाएँ और पवित्र आचरण बनाए रखें। साधना में निरंतरता रखते हुए भगवान के प्रति प्रेम को विकसित करना ही अधिक महत्त्वपूर्ण है।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।