प्रश्न 1: महाराज जी,क्या गुरु को प्रसन्न करने के लिए भी कोई विशेष मंत्र होता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, गुरुदेव को प्रसन्न करने के लिए किसी अलग मंत्र की आवश्यकता नहीं है। गुरुदेव ने जो मंत्र या नाम दिया है, उसी का श्रद्धापूर्वक जप करना चाहिए। जितनी अधिक इष्टदेव के प्रति प्रीति बढ़ेगी, उतना ही गुरुदेव भी प्रसन्न होंगे।
महाराज जी समझाते हैं कि केवल मंत्र जप लेना ही पर्याप्त नहीं है। गुरुदेव ने जिस प्रकार का आचरण करने के लिए कहा है, उस मार्ग पर चलना भी आवश्यक है। यदि गुरु ने किसी गलत आचरण को छोड़ने, पवित्र जीवन जीने और नियमित भजन करने की आज्ञा दी है, तो उसका पालन करना चाहिए।
कई बार साधक सोचता है कि गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिए कोई विशेष मंत्र, पूजा या अलग साधना करनी होगी। लेकिन महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि गुरुदेव को प्रसन्न करने का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय उनकी आज्ञा का पालन करना है।
गुरु की आज्ञा मानना ही उनकी सच्ची सेवा है। यदि शिष्य लगातार नामजप करता है, अपने इष्टदेव के प्रति प्रेम बढ़ाता है और गुरुदेव के बताए हुए आचरण के अनुसार जीवन जीता है, तो उसकी साधना सही दिशा में आगे बढ़ती है।
गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोग भी अपने दैनिक कार्य करते हुए भगवान का नाम स्मरण कर सकते हैं। महाराज जी ने घर के काम करते समय भी नामजप जारी रखने को उचित बताया है।
इसलिए गुरुदेव को प्रसन्न करने के लिए अलग मंत्र खोजने के बजाय उनके दिए हुए नाम का जप करें, उनकी आज्ञा का पालन करें और अपने आचरण को पवित्र बनाएँ। यही गुरु-सेवा का वास्तविक स्वरूप है।
प्रश्न 2: क्या मानसिक ब्रज-यात्रा करने से भी वास्तविक ब्रज-यात्रा का फल प्राप्त हो सकता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, मानसिक ब्रज-यात्रा और प्रत्यक्ष ब्रज-यात्रा का अपना-अपना महत्त्व है, लेकिन दोनों को पूरी तरह एक समान नहीं मानना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि जब कोई साधक प्रत्यक्ष रूप से वृंदावन की परिक्रमा करता है, तो उसे पैदल चलना पड़ता है। इस दौरान शरीर को थकान, भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी और दूसरे प्रकार के कष्ट सहने पड़ सकते हैं। साथ ही, परिक्रमा करते हुए काफी समय तक भगवान का नामजप भी होता है।
इसके विपरीत, मानसिक परिक्रमा में साधक अपने मन को ब्रज और भगवान के चिंतन में लगाता है। इससे मानसिक एकाग्रता का अभ्यास होता है, लेकिन प्रत्यक्ष परिक्रमा में लगने वाला समय और शरीर द्वारा सहा गया कष्ट उसी प्रकार इसमें नहीं होता।
महाराज जी का सुझाव है कि यदि संभव हो, तो पहले प्रत्यक्ष रूप से ब्रज-यात्रा या परिक्रमा करनी चाहिए और शेष समय में मानसिक परिक्रमा भी करते रहना चाहिए। यदि किसी कारण से कोई व्यक्ति वहाँ पहुँच नहीं सकता, तो वह मानसिक रूप से ब्रज का चिंतन कर सकता है। फिर भी, महाराज जी प्रत्यक्ष परिक्रमा के महत्त्व पर जोर देते हैं।
वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि स्वप्न में भगवान या किसी विग्रह के दर्शन होना अच्छा अनुभव हो सकता है, लेकिन केवल स्वप्न को भगवत्-साक्षात्कार नहीं मान लेना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि मानसिक ब्रज-यात्रा से मन को भगवान के चिंतन में लगाएँ, लेकिन अवसर मिलने पर प्रत्यक्ष ब्रज-यात्रा और परिक्रमा का लाभ भी लें। दोनों के महत्त्व को समझते हुए अपनी सामर्थ्य के अनुसार साधना करें।
प्रश्न 3: भगवान ने संसार का विनाश ही करना था, तो इसे बनाया ही क्यों?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान की सृष्टि-रचना, पालन और संहार की लीलाओं को केवल मनुष्य की सीमित बुद्धि से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। वे कहते हैं कि इस प्रश्न का पूर्ण उत्तर तो भगवान ही दे सकते हैं; भक्त के रूप में हमारा कार्य उनके विधान को समझने का प्रयास करना और भजन करना है।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान की तीन प्रमुख लीलाएँ हैं—ब्रह्मा के रूप में सृष्टि की रचना, विष्णु के रूप में उसका पालन और शिव के रूप में संहार। ये तीनों कार्य उसी परमात्मा की लीला के रूप हैं।
वे बच्चों के घरौंदा बनाने और फिर उसे बिगाड़ देने का उदाहरण देते हैं। बच्चे ऐसा खेल के भाव से करते हैं। इसी प्रकार महाराज जी संसार की रचना और उसके परिवर्तन को भगवान की लीला के रूप में समझाते हैं।
वे यह भी बताते हैं कि जिसे हम विनाश कहते हैं, वह पूर्णतः अस्तित्व समाप्त हो जाना नहीं है, बल्कि रूप का परिवर्तन है। शरीर पंचमहाभूतों से बना है और मृत्यु के बाद ये तत्त्व अपने-अपने स्वरूप में लौट जाते हैं। जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार आगे की यात्रा करती है।
महाराज जी के अनुसार, हमारा भय और दुःख इस बात से जुड़ा है कि हम स्वयं को केवल शरीर मानकर संसार के संबंधों और वस्तुओं से जुड़ जाते हैं। जब तक यह देहाभिमान बना रहता है, तब तक जन्म-मरण, सुख-दुःख और हानि-लाभ को लेकर चिंता बनी रहती है।
आध्यात्मिक ज्ञान से साधक समझने लगता है कि परमात्मा ही सबमें विद्यमान हैं। तब संसार के प्रति आसक्ति कम होने लगती है।
महाराज जी का संदेश है कि सृष्टि के रहस्य में उलझकर रहने के बजाय भगवान का भजन करें, अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करें और परमात्मा का आश्रय लेकर जीवन को सार्थक बनाएँ।
प्रश्न 4: मन में अपनों को खोने का एक अजीब-सा डर बना रहता है। इससे कैसे बाहर निकलें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि अपनों को खोने का भय संसार में रहने वाले लगभग सभी लोगों को किसी न किसी रूप में होता है। इसका कारण यह है कि हम अपने परिवार और प्रियजनों से बहुत अधिक जुड़ जाते हैं और उनके बिछड़ने की कल्पना से ही दुःखी होने लगते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि इस संसार में मृत्यु निश्चित है। किसी की आयु कब पूरी हो जाए और किस परिस्थिति में शरीर छूट जाए, यह कोई नहीं जानता। बड़े-बड़े महापुरुषों और भगवान के अवतारों ने भी अपने शरीर को छोड़ने की लीला की है। इसलिए केवल यह सोचते रहना कि अपने कभी हमसे दूर न हों, भय को समाप्त नहीं कर सकता।
वे समझाते हैं कि शरीर का छूटना एक परिवर्तन है। शरीर पंचमहाभूतों से बना है और अंत में उन्हीं तत्त्वों में मिल जाता है। जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार आगे की यात्रा करती है। लेकिन संसार के प्रति हमारी आसक्ति इतनी गहरी होती है कि इस परिवर्तन को स्वीकार करना कठिन लगता है।
महाराज जी के अनुसार, ऐसे भय से मुक्त होने के लिए भगवान की शरण लेनी चाहिए। नियमित नामजप करें, भगवान की लीला-कथा सुनें और उनकी सेवा में मन लगाएँ। जब मन भगवान से जुड़ता है, तो भीतर ज्ञान और आत्मबल विकसित होता है। इसी बल के सहारे व्यक्ति अपने प्रियजनों के बिछोह का दुःख सहने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि परिवार के प्रति प्रेम छोड़ दिया जाए, बल्कि अपने संबंधों के बीच भी भगवान का आश्रय बनाए रखा जाए।
महाराज जी की सीख है कि मृत्यु के भय और अपनों के बिछोह की चिंता में डूबने के बजाय भगवान का नाम जपें। भगवान की शरण से मिलने वाला बल कठिन परिस्थितियों को स्वीकार करने और उनका सामना करने में सहायता करता है।
प्रश्न 5: संसार में रिश्ते ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं या पैसा?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, संसार में न तो पैसा स्थायी है और न ही सांसारिक रिश्ते। जीवन में धन और संबंधों की अपनी उपयोगिता है, लेकिन इन दोनों को जीवन का सर्वोच्च आधार मान लेना उचित नहीं है। सबसे अधिक महत्त्व भगवान की भक्ति और आध्यात्मिक जीवन का है।
महाराज जी समझाते हैं कि धन अपने आप में सुख नहीं देता। धन से हम भोजन, वस्त्र और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करते हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत सारा पैसा हो, लेकिन उसे भोजन और पानी न मिले, तो केवल पैसा उसे संतुष्ट नहीं कर सकता। इससे स्पष्ट होता है कि धन का महत्त्व उससे मिलने वाली सुविधाओं के कारण है।
इसी प्रकार पारिवारिक संबंधों में जो प्रेम और अपनापन अनुभव होता है, उसमें भी भगवान की सत्ता का महत्त्व है। महाराज जी उदाहरण देते हैं कि जब किसी प्रियजन का शरीर छूट जाता है, तो उसी शरीर को पहले जैसा प्रिय मानकर हमेशा अपने पास नहीं रखा जाता। इससे वे समझाते हैं कि संबंधों में अनुभव होने वाली प्रियता का आधार केवल शरीर नहीं है।
वे यह भी बताते हैं कि यदि जीवन में आध्यात्मिकता और भगवान का आश्रय नहीं हो, तो धन तथा संबंधों के बीच भी अशांति उत्पन्न हो सकती है। मनुष्य को धन कमाने और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निभाने के साथ-साथ अपने आचरण की पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।
इसलिए रिश्तों की उपेक्षा करना या धन को बेकार समझना महाराज जी का संदेश नहीं है। उनका जोर इस बात पर है कि इन दोनों के प्रति अत्यधिक आसक्ति न हो और जीवन का वास्तविक उद्देश्य न भूलें।
महाराज जी की सीख है कि धन से परिवार का पालन करें और रिश्तों को उचित सम्मान दें, लेकिन अपने जीवन का सबसे बड़ा आधार भगवान की भक्ति को बनाएँ।
प्रश्न 6: मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि मोक्ष प्राप्त करने का एक मार्ग ज्ञान है, लेकिन ज्ञान के मार्ग पर चलना बहुत कठिन है। इसके लिए संसार और परलोक के भोगों से वैराग्य, सत्य और असत्य का विवेक, इंद्रियों तथा मन पर नियंत्रण, गुरु और शास्त्रों के प्रति श्रद्धा, चित्त को परमात्मा में लगाने का अभ्यास और मुक्ति की प्रबल इच्छा आवश्यक है।
महाराज जी समझाते हैं कि केवल ज्ञान की बातें जान लेना पर्याप्त नहीं है। उस ज्ञान को अपने जीवन में अनुभव के रूप में उतारना पड़ता है। इसके लिए निरंतर साधना और आत्मसंयम की आवश्यकता होती है।
वे बताते हैं कि कलियुग में भगवान की भक्ति मोक्ष और कल्याण का सहज मार्ग है। साधक को भगवान का नाम निरंतर जपना चाहिए, जो भोजन प्राप्त हो उसे भगवान को अर्पित करके ग्रहण करना चाहिए और अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित करने चाहिए।
जब मनुष्य अपने कर्मों को केवल अपने अहंकार और स्वार्थ के लिए करने के बजाय भगवान को समर्पित करता है, तब वह कर्मों के बंधन से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है। नामजप से हृदय शुद्ध होता है और भगवान की कृपा से ज्ञान प्रकट हो सकता है।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि भगवान का आश्रय साधक को कठिन परिस्थितियों में संभालता है। यदि साधना के दौरान उससे कोई त्रुटि हो जाए, तो उसे निराश होकर भगवान से दूर नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी गलती सुधारकर भजन जारी रखना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि भगवान का नाम निरंतर जपें, अपने कर्म उन्हें समर्पित करें और उनकी शरण में रहें। भक्ति, पवित्र आचरण और समर्पण के माध्यम से मोक्ष तथा भगवत्-कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है।
प्रश्न 7: क्या नवधा भक्ति के सभी नौ प्रकार आने पर ही भगवद्-प्राप्ति होती है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, नवधा भक्ति के सभी नौ अंगों का अलग-अलग अभ्यास पूर्ण होने की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है। यदि साधक किसी एक अंग में भी सच्चे भाव से लग जाता है, तो उसी के माध्यम से भक्ति आगे बढ़ सकती है और अन्य अंग भी धीरे-धीरे विकसित होने लगते हैं।
नवधा भक्ति के नौ अंग हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। इनमें भगवान की कथा सुनना, उनका नाम और गुण गाना, निरंतर स्मरण करना, सेवा करना तथा स्वयं को भगवान के प्रति समर्पित करना शामिल है।
महाराज जी समझाते हैं कि साधक को किसी एक अंग से शुरुआत करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि भगवान की कथा सुनने में रुचि है, तो श्रद्धापूर्वक कथा सुनें। यदि नामजप में रुचि है, तो नामजप करें। यदि भगवान की सेवा में मन लगता है, तो सेवा को नियमित बनाएँ।
लेकिन इसके साथ पवित्र आचरण आवश्यक है। गलत आचरणों को छोड़ने और भगवान का नाम स्मरण करने का प्रयास करना चाहिए। केवल बाहरी रूप से किसी भक्ति-विधि को पूरा करना ही उद्देश्य नहीं है; उससे हृदय में भगवान के प्रति प्रेम बढ़ना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि नवधा भक्ति की पूर्णता प्रेमलक्षणा भक्ति है। जब भगवान के प्रति गहरा प्रेम जागृत होता है, तब भक्त का जीवन भगवान की ओर अधिकाधिक समर्पित होने लगता है।
महाराज जी की सीख है कि नौ प्रकार की भक्ति का अभ्यास एक साथ शुरू करने की चिंता न करें। किसी एक अंग से श्रद्धापूर्वक शुरुआत करें, पवित्र आचरण रखें और नामजप तथा भगवान के स्मरण में निरंतर लगे रहें।
प्रश्न 8: हर समय नामजप करने का प्रयास करता हूँ, पर फिर भी भगवान पर अभी तक पूर्ण भरोसा नहीं हो पा रहा। क्या करूँ?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान पर दृढ़ विश्वास मन के निर्मल होने के साथ-साथ बढ़ता है। मन में जब तक पुरानी आदतें, सांसारिक आसक्तियाँ और अनेक प्रकार के संशय बने रहते हैं, तब तक भगवान पर पूर्ण भरोसा बनने में समय लग सकता है।
महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य का मन बहुत लंबे समय से संसार की ओर आकर्षित होता रहा है। इसलिए केवल कुछ समय नामजप करने से उसका पूरी तरह निर्मल हो जाना आवश्यक नहीं है। साधक को धैर्यपूर्वक और निरंतर नामजप करते रहना चाहिए।
वे बताते हैं कि जब मन शुद्ध होने लगता है, तो भगवान के प्रति विश्वास दृढ़ होता जाता है। फिर साधक के भीतर भगवान के प्रति प्रेम और तन्मयता बढ़ने लगती है। ऐसी अवस्था में मन, बुद्धि और चित्त भगवान की ओर अधिकाधिक लगने लगते हैं।
महाराज जी रामायण में वर्णित उस प्रसंग का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें पहले गलत शब्द का उच्चारण करने वाला व्यक्ति निरंतर अभ्यास से महान ऋषि बन गया। इसके माध्यम से वे नाम की महिमा और निरंतर अभ्यास का महत्त्व समझाते हैं।
साधक को नामजप करते समय ध्यानपूर्वक नाम सुनने और उसके स्मरण में लगे रहने का प्रयास करना चाहिए। मन बार-बार भटके, तो निराश होने के बजाय उसे फिर भगवान के नाम में लगाएँ।
महाराज जी की सीख है कि भगवान पर भरोसा न बनने के कारण नामजप छोड़ना नहीं चाहिए। नियमित और ध्यानपूर्वक नामजप करते रहें। मन के निर्मल होने के साथ भगवान के प्रति विश्वास और प्रेम भी दृढ़ होने लगता है।
प्रश्न 9: हर समय भय बना रहता है कि कहीं अपने आचरण और कुटिलता के कारण इष्ट या गुरु से दूर न हो जाऊँ। क्या यह भय सही है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, यदि साधक को यह चिंता रहती है कि कहीं उसके गलत आचरण से गुरुदेव या भगवान अप्रसन्न न हो जाएँ, तो यह सावधानी उसके आध्यात्मिक जीवन में सहायक हो सकती है। इस भय को त्यागने के बजाय इसे अपने आचरण को सुधारने की प्रेरणा बनाना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि जब व्यक्ति के भीतर गुरु, भगवान और धर्म के प्रति आदर रहता है, तो वह गलत कार्य करने से पहले सावधान होता है। उसे यह ध्यान रहता है कि ऐसा कोई आचरण न हो जिससे उसके इष्ट या गुरु की आज्ञा का उल्लंघन हो।
वे उड़िया बाबा का एक प्रसंग सुनाते हैं। एक बार बाबा ने स्वप्न में देखा कि कुछ सुंदर स्त्रियाँ उन्हें रत्न आदि भेंट कर रही हैं और उन्हें सांसारिक आकर्षणों में खींचने का प्रयास कर रही हैं। बाबा ने उन वस्तुओं को स्वीकार नहीं किया और उनसे दूर भागे। जब उनकी आँख खुली, तो उन्हें इस बात से संतोष हुआ कि स्वप्न में भी वे उन आकर्षणों की ओर खिंचे नहीं।
इस प्रसंग के माध्यम से महाराज जी समझाते हैं कि सच्चे साधक को केवल बाहरी आचरण में ही नहीं, बल्कि अपने मन और विचारों के स्तर पर भी सावधान रहने का प्रयास करना चाहिए।
हालाँकि, इस भय का उद्देश्य निरंतर घबराते रहना नहीं है। इसका उद्देश्य अपने आचरण को पवित्र रखना, अहंकार कम करना और गुरु की आज्ञा के अनुसार चलना है।
महाराज जी की सीख है कि गुरु और भगवान के प्रति आदरयुक्त सावधानी बनाए रखें। ऐसा भाव रखें कि जाग्रत अवस्था ही नहीं, स्वप्न में भी उनके विरुद्ध आचरण न हो। यह भावना साधक को गलतियों से बचने और आध्यात्मिक उन्नति करने में सहायता करती है।
प्रश्न 10: बड़े-बड़े संतों का जीवन-चरित्र पढ़ने पर लगता है कि हममें तो कोई भी गुण नहीं है। क्या करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि महापुरुषों के जीवन-चरित्र पढ़कर अपने भीतर कमियाँ दिखाई देना अपने आप में बुरी बात नहीं है। यदि इससे अपने अहंकार में कमी आती है और भगवान की शरण में जाने की भावना जागती है, तो यह दीनता की शुरुआत हो सकती है।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान को वह भक्त प्रिय है, जो अपने आपको बड़ा या पूर्ण योग्य नहीं मानता, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार करके भगवान की शरण ग्रहण करता है। भगवान को दीनबंधु और पतितपावन कहा जाता है। अर्थात वे दीन और पतित जीवों का भी कल्याण करते हैं।
वे उदाहरण देते हैं कि जैसे छोटे बच्चे को उसकी माता स्वयं नहलाती, खिलाती और उसकी देखभाल करती है, उसी प्रकार यदि साधक अपने आपको छोटा मानकर भगवान की शरण में चला जाए, तो भगवान की कृपा से उसका कल्याण हो सकता है।
महाराज जी का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति अपनी कमियों को देखकर निराश हो जाए या स्वयं को सुधारने का प्रयास छोड़ दे। इसके बजाय अपनी अयोग्यता का अनुभव करके अहंकार से बचना चाहिए और भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।
संतों के जीवन से प्रेरणा लेकर नामजप करना चाहिए, भगवान की कथाएँ सुननी चाहिए और गलत आदतों तथा अनुचित आचरणों का त्याग करने का प्रयास करना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि महापुरुषों के गुण देखकर निराश न हों। अपने भीतर दीनता विकसित करें, स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित करें और निरंतर नामजप तथा पवित्र आचरण के माध्यम से आगे बढ़ें।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।