प्रश्न 1: महाराज जी,इच्छाएँ खत्म होने पर कैसा अनुभव होता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, इच्छाओं का पूरी तरह शांत होना परमात्मा की प्राप्ति के बाद ही होता है। जब तक भगवान का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक अपने मन पर पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए। कभी-कभी परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर ऐसा लग सकता है कि हमारी इच्छाएँ समाप्त हो गई हैं, लेकिन अवसर मिलते ही वे फिर से जाग सकती हैं।
महाराज जी समझाते हैं कि जब तक परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती, तब तक स्वयं को इच्छारहित मान लेना भ्रम भी हो सकता है। वास्तविक स्थिति में मन द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है और किसी वस्तु को पाने की बेचैनी नहीं रहती। जैसे शांत समुद्र में लहरें नहीं उठतीं, वैसे ही परमात्मा की अनुभूति होने पर मन में सांसारिक इच्छाएँ शांत हो जाती हैं।
इसलिए साधक को अभी से यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसकी सभी इच्छाएँ समाप्त हो गई हैं। इसके बजाय भगवान को पाने की इच्छा बढ़ानी चाहिए। मन में यह लगन बनी रहे कि भगवान का साक्षात्कार हो, भजन निरंतर बढ़े, संतों का संग मिले, शास्त्रों का स्वाध्याय हो और अपने आचरण से कोई अधर्म न हो।
महाराज जी का मार्गदर्शन है: खूब नामजप करें, शास्त्रों का स्वाध्याय करते रहें, संतों का संग करें और अपने आचरण को अच्छा बनाए रखें। इन साधनों से धीरे-धीरे मन की स्थिति बदलती है और साधक परमात्मा की ओर आगे बढ़ता है।
प्रश्न 2: प्रेमलक्षणा भक्ति क्या केवल गुरु-कृपा से ही मिलती है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, प्रेमलक्षणा भक्ति प्राप्त करने के लिए नामजप, भगवान की लीला का श्रवण और कीर्तन, भगवान के चरणों की सेवा तथा अपने तन, मन और वचन से इष्टदेव के प्रति समर्पण आवश्यक है। इसके साथ ही मन में दूसरी अभिलाषाएँ नहीं होनी चाहिए और भगवान के प्रतिकूल आचरण से बचना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि प्रेमलक्षणा भक्ति केवल कह देने से प्राप्त नहीं हो जाती। जब तक भगवान के नाम का जप नहीं होगा, उनकी कथा नहीं सुनी जाएगी और उनकी सेवा नहीं की जाएगी, तब तक भगवान के प्रति गहरा प्रेम कैसे जागेगा? नवधा भक्ति के नौ अंग हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मसमर्पण। इन साधनों से भगवान के प्रति प्रियता बढ़ती है।
भगवान की चर्चा सुनने से मन में उनके प्रति आकर्षण बढ़ता है। धीरे-धीरे ऐसा भाव बनने लगता है कि जहाँ भगवान की कथा हो रही हो, वहाँ बैठकर सुनने की इच्छा हो। नामजप में रुचि बढ़े और भगवान की लीला सुनने के लिए मन लालायित रहे, तो यह भी गुरु-कृपा का स्वरूप है।
महाराज जी के अनुसार, गुरु-कृपा, संत-कृपा और भगवान की कृपा का महत्त्वपूर्ण स्वरूप यह है कि साधक को अपनी साधना में प्रेम होने लगे। जब साधना में प्रेम उत्पन्न होता है, तो साध्य अर्थात भगवान के प्रति प्रेम भी अपने आप बढ़ता जाता है।
इसलिए नामजप करते रहें, भगवान की कथा सुनें, संतों के चरणों का आश्रय लें और अपनी साधना को निरंतर बनाए रखें।
प्रश्न 3: क्या हनुमान जी ने भगवद्-प्राप्ति के लिए शरीर को कष्ट देने से मना किया है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि रामचरितमानस में हनुमान जी और रावण के बीच हुई बातचीत का संदर्भ समझना आवश्यक है। उस प्रसंग में हनुमान जी रावण को यह समझा रहे थे कि उसके अनुचरों ने पहले उन्हें मारा था, इसलिए उन्होंने भी उन्हें दंड दिया। वहाँ हनुमान जी का उद्देश्य शरीर के प्रति मोह का समर्थन करना नहीं था, बल्कि रावण को उसके प्रश्न का उत्तर देना था।
महाराज जी बताते हैं कि हनुमान जी परम ज्ञानी महापुरुष हैं। इसलिए उस प्रसंग को अलग करके यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि भगवान की प्राप्ति के लिए शरीर को कष्ट देना गलत है।
जब किसी महात्मा का मन परमात्मा में लग जाता है और भगवान के प्रति गहरा प्रेम उत्पन्न हो जाता है, तब गर्मी, सर्दी, भूख, प्यास, मान और अपमान जैसी परिस्थितियों का प्रभाव उसके ऊपर पहले जैसा नहीं रहता। उसके लिए शरीर का सुख ही जीवन का मुख्य उद्देश्य नहीं रह जाता।
महाराज जी समझाते हैं कि शरीर स्थायी नहीं है। जो रूप आज दिखाई दे रहा है, वह पहले ऐसा नहीं था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा, इसकी कोई निश्चितता नहीं है। इसलिए शरीर के प्रति अत्यधिक मोह को कम करना आवश्यक है।
तप का एक अर्थ है—गर्मी, सर्दी, भूख, प्यास, मान और अपमान जैसी परिस्थितियों को सहन करना। तप के माध्यम से शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति को कम किया जाता है।
इसलिए महाराज जी की बात का सार यह है कि भगवान के प्रति प्रेम बढ़ने पर शरीर के सुख-दुःख का महत्त्व कम हो जाता है। शरीर को कष्ट देने या तप करने के प्रसंग को समझते समय उसके संदर्भ और उद्देश्य को देखना चाहिए।
प्रश्न 4: शास्त्रों को पढ़ते हुए मन में बहुत प्रश्न उठते हैं, ऐसे में क्या करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि शास्त्रों को पढ़ते या सुनते समय मन में अनेक प्रश्न और तर्क उठें, तो उनके समाधान के लिए किसी महापुरुष के सानिध्य में शास्त्रों का श्रवण करना चाहिए। केवल स्वतंत्र रूप से पढ़ते रहने पर मन में उलझनें बढ़ सकती हैं, इसलिए शास्त्रों को गुरु या संतों के मुख से सुनने का विशेष महत्त्व है।
महाराज जी समझाते हैं कि जब हम किसी महापुरुष से भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत या अन्य शास्त्रों का श्रवण करते हैं, तो मन में उठने वाले प्रश्नों का समाधान मिलता जाता है। यदि किसी बात को लेकर संशय हो, तो उसे मन में दबाकर रखने के बजाय लिख लेना चाहिए और किसी महापुरुष से उसका समाधान कराना चाहिए।
जब तक मन में मलिनता और संशय रहते हैं, तब तक अनेक प्रश्न उठते रहते हैं। ये संशय मन में अशांति उत्पन्न करते हैं। जबकि शास्त्रों का स्वाध्याय और साधना करने का उद्देश्य चित्त को शांति की ओर ले जाना है।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि भगवान की लीला का विचार करके कोई व्यक्ति गलत आचरण को उचित नहीं ठहरा सकता। जो व्यक्ति भगवान की इच्छा और लीला को सही अर्थ में समझता है, वह अधर्म करने की छूट नहीं लेता। इसलिए शास्त्रों की बातों को अपने मन के अनुसार अर्थ देने के बजाय संतों से समझना चाहिए।
महाराज जी का मार्गदर्शन है: शास्त्रों का श्रवण महापुरुषों के सानिध्य में करें, मन में उठने वाले प्रश्नों को लिखें और उनका समाधान कराते रहें। इससे संशय दूर होंगे और साधना में आगे बढ़ने में सहायता मिलेगी।
प्रश्न 5: क्या मन ही मन भगवान का ध्यान करना भी नामजप ही माना जाएगा?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, केवल यह सोच लेना कि हम भगवान का ध्यान कर रहे हैं, पर्याप्त नहीं है। नामजप निरंतर चलना चाहिए। जीभ से नाम का उच्चारण हो या मन के भीतर नाम चलता रहे, यह अलग बात है; लेकिन नामजप को छोड़कर केवल ध्यान करने की कल्पना में नहीं रहना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि मन बहुत चंचल है। जब हम भगवान के रूप का ध्यान करने बैठते हैं, तो मन संसार की अनेक बातों में भटक सकता है। इसलिए नामजप के साथ भगवान के रूप का ध्यान करना चाहिए। जब नाम चलता रहता है और मन भगवान के स्वरूप में लगता है, तब धीरे-धीरे एकाग्रता बढ़ती है।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि हमारा मन एक साथ दो काम कर सकता है। हम किसी की बात सुनते हुए भी मन में दूसरी बातें सोचते रहते हैं। इसी प्रकार नामजप करते हुए भगवान के स्वरूप का ध्यान भी किया जा सकता है। जब मन और नाम दोनों भगवान में तन्मय होने लगते हैं, तब एकाग्रता की स्थिति बनती है।
वे दत्तात्रेय भगवान और बाण बनाने वाले व्यक्ति का उदाहरण भी देते हैं। वह व्यक्ति बाण की नोक बनाने में इतना तल्लीन था कि राजा की सवारी निकल गई, लेकिन उसे पता ही नहीं चला। इसी प्रकार साधक को भगवान में इतना तल्लीन होना चाहिए कि उसका मन बार-बार संसार की ओर न भागे।
महाराज जी की मुख्य सीख है: भगवान के रूप का ध्यान नामजप के साथ करें। नाम को छोड़कर केवल ध्यान की कल्पना में न रहें, क्योंकि चंचल मन साधक को संसार की ओर खींच सकता है।
प्रश्न 6: मेरे पति का मन पूजा-पाठ में लग गया है, जिससे उनका व्यवहार मेरे प्रति बहुत बदल गया है। मेरा मन विचलित रहता है, क्या करूँ?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि जब किसी व्यक्ति का मन वास्तव में भगवान की भक्ति में लगने लगता है, तो संसार के सुखों के प्रति उसका आकर्षण कम हो सकता है। पहले जिन सांसारिक बातों में बहुत आनंद मिलता था, वे भगवान के सुख की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण लगने लगती हैं। इस कारण व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई दे सकता है।
लेकिन महाराज जी इस बात पर भी जोर देते हैं कि गृहस्थ धर्म का पालन करना भी भगवान की भक्ति का ही एक अंग है। भजन करने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति अपने पारिवारिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने लगे।
महाराज जी पति को समझाते हैं कि यदि पत्नी गृहस्थ जीवन के सामान्य वैवाहिक संबंधों को निभाना चाहती है, तो पति को अपने धर्म का ध्यान रखना चाहिए। भगवान का नामजप करते हुए भी पत्नी के प्रति अपने उचित कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है। धर्म के अनुकूल गृहस्थ जीवन भक्ति के विरुद्ध नहीं है।
वे यह भी बताते हैं कि भगवान के प्रति प्रेम बढ़ने पर संसार के प्रति आसक्ति कम हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि परिवार के लोगों के प्रति जिम्मेदारियाँ छोड़ दी जाएँ। भगवान से प्रेम करते हुए संसार का निर्वाह किया जा सकता है।
पत्नी के लिए भी महाराज जी का संकेत है कि पति के भजन में बाधा न बने और उनके परिवर्तन को केवल अपने प्रति प्रेम की कमी के रूप में न देखे। साथ ही, पति को भी पत्नी की भावनाओं और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को समझना चाहिए।
इसलिए इस परिस्थिति में दोनों को एक-दूसरे के प्रति समझ और धर्मसम्मत व्यवहार बनाए रखना चाहिए। भक्ति ऐसी होनी चाहिए जिसमें भगवान के प्रति प्रेम बढ़े और गृहस्थ धर्म का पालन भी बना रहे।
प्रश्न 7: वाहेगुरु के नामजप से बहुत वैराग्य आता है, पर लोगों को लगता है कि मैं डिप्रेशन में हूँ!
उत्तर: पूज्य महाराज जी के सामने एक साधक ने बताया कि वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर वाहेगुरु नाम का सुमिरन करता है। नामजप के समय उसे आनंद का अनुभव होता है, आँखों से आँसू बहने लगते हैं और संसार के प्रति वैराग्य बढ़ता जाता है। एकांत में रहने की इच्छा होती है, लेकिन परिवार के लोगों को लगता है कि वह डिप्रेशन में है।
महाराज जी ने इसे नाम-सुमिरन का फल बताते हुए समझाया कि जैसे-जैसे भगवान के नाम का जप बढ़ता है, संसार के भोगों और शरीर के प्रति आसक्ति कम हो सकती है। जब साधक का मन परमात्मा में अधिक लगने लगता है, तब उसे एकांत प्रिय लग सकता है और बाहरी गतिविधियों में पहले जैसी रुचि नहीं रहती।
महाराज जी सोने और कंगन का उदाहरण देते हैं। कंगन का रूप बदल सकता है, लेकिन सोना बना रहता है। इसी प्रकार वे समझाते हैं कि संसार में जो अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं, उनके पीछे परमात्मा को सत्य मानकर उनका चिंतन करना चाहिए। नामजप से साधक की दृष्टि में परिवर्तन आने लगता है।
महाराज जी ने उस साधक को आगे भी अधिक से अधिक नामजप करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि अपने आपको सबसे छोटा और दूसरों को महान समझने का भाव भी नाम-सुमिरन से विकसित हो सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वाहेगुरु, श्रीकृष्ण, शिव और राम अलग-अलग नामों से पुकारे जाने वाले उसी परम तत्व के नाम हैं।
महाराज जी का संदेश है: नामजप जारी रखें और वैराग्य को भक्ति की दिशा में आगे बढ़ने का माध्यम बनाएँ। हालाँकि, यदि उदासी, निराशा या रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई लगातार बनी रहे, तो उसे केवल वैराग्य मानकर अनदेखा करने के बजाय उचित सहायता लेना भी आवश्यक है।
प्रश्न 8: मैं नारायण नाम का जप करता हूँ, क्या मुझे भी हरि के दर्शन हो सकते हैं?
उत्तर: पूज्य महाराज जी ने इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहा कि नारायण नाम का जप करने वाले साधक को भी भगवान के दर्शन हो सकते हैं। लेकिन नामजप के साथ जीवन में उचित आचरण और भगवान के प्रति सच्ची लगन होना आवश्यक है।
महाराज जी बताते हैं कि साधक को भगवान जिस परिस्थिति में रखें, उसमें संतुष्ट रहना चाहिए। सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि और जय-पराजय में मन को संतुलित रखने का अभ्यास करना चाहिए। किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष न हो, किसी का अहित न करें, व्यसनों से दूर रहें और स्त्रियों के प्रति पवित्र दृष्टि रखें।
इसके साथ भगवान के नाम का जप और उनकी कथा का श्रवण करते रहना चाहिए। धीरे-धीरे मन में भगवान के प्रति ऐसी लगन उत्पन्न होनी चाहिए कि साधक को केवल भगवान ही चाहिए, उनके बदले कोई सांसारिक सुख या चमत्कारी शक्ति नहीं।
महाराज जी एक छोटे बच्चे का उदाहरण देते हैं। बच्चा रोता है तो माँ पहले उसे खिलौने देती है। यदि वह खिलौनों से ही प्रसन्न हो जाए, तो माँ के पास जाने के लिए उसका रोना बंद हो जाता है। लेकिन जब वह खिलौनों से संतुष्ट नहीं होता और माँ के लिए रोता रहता है, तब माँ स्वयं उसे गोद में उठा लेती है। इसी प्रकार भगवान भी साधक की लगन देखते हैं।
जब साधक संसार के सुखों और दूसरी इच्छाओं में उलझकर अपनी भगवान-प्राप्ति की चाह नहीं छोड़ता, बल्कि केवल भगवान को चाहता है, तब उसकी लगन गहरी होती जाती है।
महाराज जी का मार्गदर्शन है: नारायण नाम का जप करते रहें, भगवान की कथा सुनें, शास्त्रों के अनुसार आचरण करें और भगवान के अतिरिक्त दूसरी इच्छाओं में न उलझें। महाराज जी ने इस साधक को नारायण नाम के जप से भगवान के दर्शन होने का आश्वासन दिया।
प्रश्न 9: शरीर महादेव हैं और प्राण राधारानी हैं, तो क्या काशी में रहते हुए राधा जी की प्राप्ति हो सकती है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी ने इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट किया कि भगवान की प्राप्ति के लिए किसी एक स्थान पर रहना अनिवार्य नहीं है। काशी में रहते हुए भी राधारानी के प्रति प्रेम और उनका चिंतन किया जा सकता है।
महाराज जी बताते हैं कि काशी भगवान विश्वनाथ की गोद के समान आनंदधाम है। इसी प्रकार वृंदावन प्रेम का धाम है। यदि किसी व्यक्ति का जीवन काशी में बीता है, वहाँ भगवान शिव के प्रति उसकी श्रद्धा रही है और अब राधारानी के प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया है, तो उसे अपने स्थान को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए।
महाराज जी के अनुसार, काशी में रहते हुए भी राधारानी के प्रेम का चिंतन किया जा सकता है। यदि मन में प्रेम जाग गया है, तो स्थान की दूरी उसके चिंतन में बाधा नहीं बननी चाहिए।
उन्होंने काशी के प्रति अपने लगाव का भी उल्लेख किया और बताया कि किसी स्थान से जुड़ी आराधना और जीवन के अनुभवों के कारण उस स्थान का स्मरण विशेष भाव उत्पन्न कर सकता है।
इसलिए काशी में रहने वाला साधक भगवान विश्वनाथ के प्रति श्रद्धा बनाए रखते हुए राधारानी के प्रेम का चिंतन कर सकता है। दोनों भावों को लेकर मन में अनावश्यक उलझन रखने की आवश्यकता नहीं है।
महाराज जी का मुख्य संदेश है: जहाँ भी रहें, भगवान का आश्रय लेकर प्रेमपूर्वक उनका चिंतन करें। काशी में रहते हुए भी राधारानी के प्रति प्रेम बढ़ाया जा सकता है; इसके लिए वृंदावन में रहना अनिवार्य नहीं है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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