1. महाराज जी,कामिनी में फिसल गया, अब क्या करूँ?
प्रश्न: कामिनी में फिसल गया, अब क्या करूँ?
उत्तर:
पूज्य महाराज जी ने इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात भगवान का आश्रय न छोड़ने की बताई है। मनुष्य से भूल हो सकती है, परिस्थितियां ऐसी आ सकती हैं कि वह अपने साधना मार्ग से विचलित हो जाए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अब उसका आध्यात्मिक जीवन समाप्त हो गया। असली गिरावट तब होती है जब व्यक्ति भगवान का हाथ छोड़ देता है।
महाराज जी ने मां और बच्चे का उदाहरण देकर समझाया कि बच्चा यदि मां का हाथ पकड़े हुए है तो उसके गिरने की संभावना बहुत कम है, लेकिन वह स्वयं हाथ छोड़ दे तो गिर सकता है। ठीक इसी प्रकार भगवान का नाम और भगवान का आश्रय साधक को संभाले रखते हैं। इसलिए किसी कमजोरी या गलती के कारण नामजप और भगवान का स्मरण छोड़ देना सबसे बड़ी भूल होगी। 1411
कामिनी के विषय में महाराज जी ने दृष्टि को सुधारने की बात कही। स्त्री को भोग की दृष्टि से देखने पर मनुष्य पतन की ओर जाता है, लेकिन माताओं और बहनों के प्रति पूज्य भाव रखा जाए तो वही दृष्टि साधक की रक्षा करती है। अपनी पत्नी के प्रति भी केवल भोग का भाव नहीं, बल्कि उचित और मर्यादित दृष्टि होनी चाहिए। 1411
इसी प्रकार कंचन और कीर्ति भी अपने आप में बुरी नहीं हैं। धन भगवान की दी हुई वस्तु है। उसका सदुपयोग हो सकता है। कीर्ति के माध्यम से भी किसी को भगवान के मार्ग की ओर आने का अवसर मिल सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब इन चीजों के कारण भगवान से संबंध टूट जाता है और उनमें अहंकार या आसक्ति पैदा हो जाती है। 1411
इसलिए यदि कभी मनुष्य फिसल भी जाए, तो निराश होकर मार्ग छोड़ना नहीं चाहिए। भगवान का नाम पकड़कर फिर से उठना चाहिए। हाथ भगवान का पकड़ना है और अपनी दृष्टि तथा आचरण को सुधारते हुए आगे बढ़ते रहना है।
2. क्या बिना किंचित खराब हुए भी श्रीजी हमें मिल जाएंगी?
प्रश्न: क्या बिना किंचित खराब हुए भी श्रीजी हमें मिल जाएंगी?
उत्तर:
भगवान की प्राप्ति के मार्ग में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साधक भगवान का आश्रय न छोड़े और अपने जीवन को उनके नाम तथा भजन से जोड़ता रहे। मनुष्य का मन और इंद्रियां संसार की ओर खिंचती हैं, इसलिए साधना के मार्ग में परीक्षा और आकर्षण आना स्वाभाविक है। लेकिन आकर्षण आ जाना और उसके सामने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर देना—इन दोनों में अंतर है।
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति तब गिरता है जब वह भगवान का हाथ और उनका आश्रय छोड़ देता है। यदि भगवान का नाम हाथ में है और साधक बार-बार भगवान की ओर लौटता है, तो वह संभल सकता है। 1411
साथ ही अपने आचरण को लेकर सजग रहना जरूरी है। विशेषकर कामिनी, कंचन और कीर्ति के विषय में दृष्टि और भाव की शुद्धता आवश्यक है। महाराज जी ने कहा कि माताओं और बहनों को पूज्य भाव से देखने पर कामिनी साधक को गिरा नहीं सकती। धन को भी भगवान की संपत्ति मानकर सेवा और सदुपयोग में लगाया जाए तो वही धन मंगलमय बन सकता है। कीर्ति भी यदि भगवान की ओर ले जाने वाली बन जाए और उससे अहंकार न पैदा हो, तो वह भी बाधक नहीं रहती। 1411
इसलिए केवल बाहरी रूप से यह सोच लेना कि “मुझसे कभी कोई गलती नहीं होगी” पर्याप्त नहीं है। असली बात यह है कि भीतर भगवान के प्रति आश्रय बना रहे और गलती होने पर मनुष्य उसे सही ठहराने के बजाय स्वयं को सुधारने का प्रयास करे।
महाराज जी के अनुसार भगवान की शरण में रहकर, नामजप करते हुए और अपने आचरण को लगातार सुधारते हुए साधक आगे बढ़ सकता है। लक्ष्य यह नहीं कि मनुष्य अपने बल पर कभी न गिरे; लक्ष्य यह है कि भगवान का हाथ कभी न छोड़े।
3. भगवान हमारी पूजा-पाठ देखते हैं या हमारे अच्छे-बुरे कर्म?
प्रश्न: भगवान क्या हमारी पूजा-पाठ देखते हैं या हमारे अच्छे-बुरे कर्म?
उत्तर:
पूज्य महाराज जी ने समझाया कि पूजा-पाठ, दान-पुण्य, तीर्थ-स्नान, शास्त्रों का अध्ययन और परोपकार आदि भी कर्म हैं और इन्हें शुभ कर्म कहा जाता है। इनके फलस्वरूप मनुष्य को लौकिक सुख प्राप्त होते हैं। दूसरी ओर हिंसा, छल-कपट, चोरी, गलत आचरण, मदिरापान आदि अशुभ कर्म हैं और उनका परिणाम दुख के रूप में सामने आता है। 1411
अर्थात केवल यह मान लेना कि हमने पूजा-पाठ कर लिया, इसलिए हमारे सभी कर्म समाप्त हो गए—यह सही समझ नहीं है। शुभ और अशुभ दोनों कर्मों का अपना फल होता है। यदि शुभ कर्म किए हैं तो उनका फल मिलेगा और अशुभ कर्म किए हैं तो उनका भी फल भोगना पड़ेगा।
लेकिन महाराज जी ने इससे भी ऊपर भगवान की शरण का मार्ग बताया। जब मनुष्य भगवान की शरण में जाकर उनका भजन करता है, तब भगवान उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करने की बात कहते हैं। इसे उन्होंने एक उदाहरण से समझाया—जैसे किसी व्यक्ति को न्यायालय से दंड का निर्णय मिल चुका हो, लेकिन विशेष अधिकार रखने वाला व्यक्ति उसे जीवनदान दे सकता है, वैसे ही भगवान की शरण कर्मबंधन से बचाने वाली है। 1411
फिर भी प्रारब्ध के विषय में महाराज जी ने महत्वपूर्ण अंतर बताया है। इस शरीर से संबंधित जो प्रारब्ध है, उसका भोग बड़े-बड़े महापुरुषों को भी करना पड़ा। भगवान की शरण में आने से अनेक जन्मों के संचित कर्म और आगे बनने वाले कर्मों का बंधन समाप्त हो सकता है, लेकिन जिस प्रारब्ध से यह शरीर बना है, उसका अनुभव शरीर को करना पड़ सकता है। 1411
इसलिए पूजा-पाठ को केवल कर्मों का हिसाब मिटाने का साधन नहीं समझना चाहिए। भजन का वास्तविक प्रभाव तब है जब हमारी पाप करने की प्रवृत्ति ही बदलने लगे। केवल ऊपर से पाप को ढक देना पर्याप्त नहीं; भीतर का चिंतन और आचरण बदलना आवश्यक है। 1411
4. मेरा मन बहुत चंचल है, नामजप के समय एक चीज में नहीं लगता!
प्रश्न: मेरा मन बहुत चंचल है। नामजप करते समय एक चीज में नहीं लगता। क्या करूँ?
उत्तर:
पूज्य महाराज जी ने सबसे पहले यह समझाया कि केवल एक व्यक्ति का मन चंचल नहीं है। सामान्य अवस्था में लगभग सभी का मन विषयों, भोगों, बातों और अलग-अलग दृश्यों की ओर भागता रहता है। मन का स्वभाव ही ऐसा है कि जहां राग या द्वेष होता है, जहां अपनापन या आकर्षण होता है, वह बार-बार वहीं चला जाता है। 1411
इसलिए नामजप करते समय मन भटक जाए तो निराश नहीं होना चाहिए। उपाय यह है कि वह जहां भी जाए, वहां से उसे वापस भगवान के नाम में लगाते रहें। यदि “राधा-राधा” का नामजप करते हुए मन किसी दूसरी चीज की ओर चला गया, तो उसे पहचानकर फिर नाम में लगा दें। दो-चार नाम के बाद वह फिर भागेगा, फिर उसे वापस ले आएं। यही अभ्यास धीरे-धीरे मन को स्थिर करता है। 1411
महाराज जी ने एक और महत्वपूर्ण बात बताई कि जहां-जहां मन जाता है, वहां भगवान की भावना करने का अभ्यास किया जा सकता है। क्योंकि मन किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान की ओर राग या द्वेष के कारण जाता है। यदि हर जगह भगवान का भाव जोड़ने का अभ्यास हो जाए तो मन धीरे-धीरे संसार के आकर्षण से हटकर भगवान की ओर मुड़ने लगता है। 1411
लेकिन यदि यह तुरंत संभव न हो तो केवल नामजप में मन को बार-बार वापस लाना ही पर्याप्त अभ्यास है। इसके लिए खुद को दोष देकर परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि निराश नहीं होना है और परेशान नहीं होना है।
मन के साथ यह संघर्ष बहुत लंबा भी हो सकता है। इसलिए धैर्य जरूरी है। लगातार नामजप और बार-बार मन को भगवान में लगाने से धीरे-धीरे उसकी चंचलता कम होती है। 1411
सबसे सुंदर बात यह है कि मन भाग गया तो साधना असफल नहीं हुई; मन को वापस भगवान के नाम में ले आए—यही साधना है।
5. रामचरितमानस में हनुमान जी को मूर्छित या दुखी देखकर दुख और आश्चर्य क्यों होता है?
प्रश्न: श्रीरामचरितमानस में हनुमान जी के मूर्छित होने या उन पर प्रहार होने की बात सुनकर दुख और आश्चर्य होता है। यदि हनुमान जी भगवान के भक्त हैं तो ऐसा कैसे हो सकता है?
उत्तर:
पूज्य महाराज जी ने इस प्रसंग को भगवान की लीला के रूप में समझाया। उन्होंने बताया कि हनुमान जी कोई साधारण जीव नहीं हैं। वे भगवान के पार्षद हैं और साक्षात रुद्र स्वरूप हैं। इसी प्रकार रावण और कुंभकरण को भी केवल साधारण शत्रु के रूप में नहीं देखना चाहिए। उनके मूल स्वरूप को समझने पर लीला का अर्थ अलग दिखाई देता है। 1411
महाराज जी ने बताया कि जय और विजय भी भगवान के पार्षद हैं और भगवान की लीला के लिए उन्होंने विरोधी पक्ष की भूमिका स्वीकार की। भगवान के साथ युद्ध करने वाला भी साधारण शक्ति वाला जीव नहीं हो सकता। इसलिए राम-रावण का युद्ध केवल दो सामान्य व्यक्तियों का संघर्ष नहीं, बल्कि भगवान की दिव्य लीला का एक भाग है। 1411
हनुमान जी के विषय में महाराज जी ने भीम और हनुमान जी का प्रसंग सुनाया। भीम जी ने अपनी पूरी शक्ति लगाने के बाद भी हनुमान जी की पूंछ को नहीं उठा सके। इससे उनकी वास्तविक शक्ति का संकेत मिलता है। महाराज जी ने कहा कि किसी साधारण जीव के द्वारा हनुमान जी को परास्त कर देना संभव नहीं है। 1411
इसलिए रामायण के युद्ध प्रसंगों को केवल बाहरी घटना मानकर दुखी होने के बजाय उसके पीछे छिपी लीला को समझना चाहिए। जैसे रंगमंच पर कलाकार अपने वास्तविक संबंध भूलकर अपने पात्र के अनुसार अभिनय करता है, वैसे ही भगवान के पार्षद भी भगवान की इच्छा के अनुसार अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। 1411
महाराज जी ने अंत में बहुत सुंदर भाव बताया कि भगवान की लीला के सभी पात्र दिव्य हैं। इसलिए हनुमान जी, रावण, कुंभकरण और अन्य पात्रों को उनके मूल स्वरूप और लीला के संदर्भ में समझने पर शोक के स्थान पर भगवान की लीला का आनंद आने लगता है।
भगवान की लीला में जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे भी वही परम सत्ता है—इस भाव से देखने पर दुख धीरे-धीरे आनंद में बदलने लगता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”