1. प्रश्न: महाराज जी ,जीवन में सब कुछ प्राप्त है, फिर भी एक तनाव और डर क्यों बना रहता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार में मनुष्य को बहुत कुछ प्राप्त हो जाने के बाद भी भीतर की अपूर्णता समाप्त नहीं होती, क्योंकि जो कुछ हमें संसार में मिला है, वह स्थायी नहीं है। शरीर भी कुछ समय के लिए मिला है। कुछ समय पहले यह शरीर नहीं था और कुछ समय बाद यह शरीर भी नहीं रहेगा। इसी शरीर को अपना मानकर हम रुपया, पद, प्रतिष्ठा, परिवार और भोग-सामग्री को अपना सब कुछ मान लेते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी वस्तु हमारे साथ नहीं जाने वाली।
आज हमारे पास धन है, पद है, परिवार है, सम्मान है और अनेक प्रकार की सुविधाएं हैं, लेकिन शरीर छूटने के बाद इनमें से कुछ भी साथ नहीं जाएगा। साथ जाएंगे तो केवल हमारे कर्म—शुभ और अशुभ कर्म। इसलिए भीतर कहीं न कहीं यह बोध बना रहता है कि अभी वह प्राप्त नहीं हुआ जिसके मिलने के बाद कोई अपूर्णता नहीं रहती।
महाराज जी के अनुसार वह पूर्णता परमात्मा की प्राप्ति से आती है। परमात्मा की प्राप्ति होने पर जीव पूर्ण, निर्भय, निश्चिंत और निशोक हो जाता है। संसार की वस्तुएं चाहे कितनी भी मिल जाएं, उनसे वह स्थायी पूर्णता नहीं मिल सकती।
इसीलिए मनुष्य को उन वस्तुओं के पीछे अपनी पूरी शक्ति नहीं लगा देनी चाहिए जो उसके साथ जाने वाली ही नहीं हैं। जीवन प्रतिपल मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। जैसे नदी का पानी एक क्षण में आगे निकल जाता है और हमें लगता रहता है कि वही पानी हमारे सामने है, वैसे ही जीवन भी निरंतर आगे बढ़ रहा है।
महाराज जी इसलिए नाम जप को बहुत महत्वपूर्ण बताते हैं। कलिकाल में भगवान के नाम का जप भगवत प्राप्ति का सहज और सरल उपाय है। अपने प्रिय भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करते हुए परोपकार करना चाहिए और गंदे भोजन तथा गंदे व्यवहार से बचना चाहिए। इससे मन धीरे-धीरे निर्मल होता जाता है और भगवान के अनुभव से भीतर की अपूर्णता पूर्णता में बदलती है।
2. प्रश्न: क्या पश्यंती और मानसिक नामजप अलग-अलग हैं?
उत्तर:
महाराज जी ने नाम-जप की अलग-अलग अवस्थाओं को समझाते हुए बताया कि जब साधक उपांश से आगे बढ़ता है तो एक ऐसी स्थिति आती है जहां बाहरी रूप से किसी प्रकार की चेष्टा दिखाई नहीं देती। नाम भीतर चलता रहता है। सामने जैसे मंत्र या नाम लिखा हुआ अनुभव होता है और वह हर क्षण, प्रतिपल चलता रहता है।
महाराज जी ने नाम-जप की अवस्थाओं को परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी के रूप में समझाया। वैखरी वह है जिसमें हम बोलकर नाम लेते हैं। मध्यमा कंठ से संबंधित बताई गई है, जबकि पश्यंती अंतर्दृष्टि से संबंधित अवस्था है। इसके आगे परा की स्थिति आती है, जिसमें नाम स्वतः चलता है और अजपा की स्थिति होती है। अर्थात वहां ऐसा नहीं रहता कि व्यक्ति बैठकर प्रयास करके नाम जप रहा है, बल्कि नाम की स्फूर्ति भीतर निरंतर बनी रहती है।
महाराज जी ने साधक को अपनी स्थिति देखने की बात कही है। यदि मन बहुत चंचल है और पश्यंती की स्थिति नहीं बनी है, तो उपांश में अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए। नाम-स्मरण को निरंतर करते रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि मध्यमा में भी नाम स्मरण चलता रहे और आगे की अवस्था अपने आप आती जाएगी।
इसलिए साधक को किसी ऊंची अवस्था को जबरदस्ती प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जो अवस्था अभी उपलब्ध है, उसी में निरंतर नाम-स्मरण करते रहना चाहिए। आगे की स्थिति अपने आप विकसित होती जाएगी।
महाराज जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि निरंतर नाम-स्मरण और गुरु से प्राप्त मंत्र का स्मरण ही जीवन की सार्थकता है। इसलिए नाम-जप की अवस्था चाहे प्रारंभिक हो या आगे की, मुख्य बात यह है कि नाम का स्मरण टूटना नहीं चाहिए। निरंतर अभ्यास करते रहने से पश्यंती और उसके आगे की अवस्थाएं स्वतः आती जाती हैं।
3. प्रश्न: भगवान तो झूठे से भी मिल जाते हैं, लेकिन मैं तो झूठ और ढोंग से भरा हूँ, फिर भगवान कैसे मिलेंगे?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को अपने भीतर की कमी का बोध होना शुरू हो जाए। जब कोई व्यक्ति यह स्वीकार करने लगता है कि “मैं झूठा हूं, मुझे सच्ची भक्ति चाहिए”, तो यही सच्ची भक्ति की ओर बढ़ने की सीढ़ी बन जाती है। अपनी कमी को पहचान लेना स्वयं साधना की एक शुरुआत है।
महाराज जी ने समझाया कि भले ही शुरुआत में मनुष्य का भाव पूरी तरह शुद्ध न हो, लेकिन यदि वह भगवान का नाम ले रहा है तो भगवान का नाम तो सत्य है। व्यक्ति राम-राम या कृष्ण-कृष्ण किसी भी भाव से बोले, नाम की सत्यता बनी रहती है। इसलिए नाम-जप को छोड़ना नहीं चाहिए।
उन्होंने ऐसे उदाहरणों से समझाया कि भगवान के मार्ग में कोई व्यक्ति शुरुआत में पूर्ण भाव से न भी चले, फिर भी उस मार्ग पर चलने का मंगल परिणाम होता है। एक उदाहरण में एक व्यक्ति ने साधु का रूप केवल परिस्थिति के कारण धारण किया था, लेकिन उसी रूप के कारण उसे एक संत का दर्शन और स्पर्श प्राप्त हुआ और उसका उद्धार हुआ। दूसरे प्रसंग में एक व्यक्ति ने नकली साधु का रूप धारण करके कुछ समय के लिए साधु होने का अभिनय किया, लेकिन उस अनुभव ने उसके भीतर वैराग्य जगा दिया और वह भगवान के मार्ग पर चल पड़ा।
इसीलिए महाराज जी कहते हैं कि भगवान के मार्ग में चलना कभी व्यर्थ नहीं जाता। भले ही अभी भाव पूरी तरह निर्मल न हुआ हो, लेकिन भगवान का नाम लेना, भगवान को प्रणाम करना और भक्ति के मार्ग पर बने रहना अपने आप में मंगलकारी है।
नाम-जप करते रहना चाहिए, वाणी से भगवान का नाम लेना चाहिए और भगवत चर्चा सुननी चाहिए। धीरे-धीरे भीतर का भाव भी बदलता है। आज जहां केवल शब्द हैं, वहां आगे चलकर सच्चा भाव भी प्रकट हो सकता है। इसलिए अपनी वर्तमान कमी देखकर निराश होने के बजाय नाम-जप को और बढ़ाना चाहिए।
4. प्रश्न: अगर भजन करते हुए भी भगवद्-प्राप्ति नहीं हुई, तो हमारा क्या होगा?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार भगवान के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता। यदि किसी साधक ने सत् मार्ग पर चलने का प्रयास किया, असत् मार्ग का त्याग किया और भगवान की आराधना की, लेकिन इसी जन्म में भगवद्-प्राप्ति नहीं हो सकी, तो उसकी साधना व्यर्थ नहीं जाती।
ऐसे साधक का अगला जन्म ऐसे कुल और वातावरण में हो सकता है जहां उसे फिर से अपनी रुकी हुई साधना को आगे बढ़ाने का अवसर मिले। महाराज जी बताते हैं कि उसे भगवान के भक्तों के बीच जन्म मिल सकता है और ऐसा वातावरण प्राप्त हो सकता है जो उसकी साधना के अनुकूल हो। जहां से साधना पिछले जन्म में रुक गई थी, वहीं से उसे आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त होगा।
यदि किसी साधक की साधना संसार की किसी वासना के कारण रुक गई हो तो आगे उसे वही भोग बहुतायत से मिल सकते हैं। उन भोगों को प्राप्त करने के बाद उसमें वैराग्य उत्पन्न होगा और संतों का संग प्राप्त होने पर वह फिर भगवान के मार्ग पर चल पड़ेगा। इस प्रकार भगवान के मार्ग में चलने वाले की साधना नष्ट नहीं होती।
महाराज जी ने इसे एक प्रसंग के माध्यम से भी समझाया कि किसी व्यक्ति के वर्तमान जीवन में विषयों की ओर आकर्षण देखकर उसके पूरे आध्यात्मिक जीवन का निर्णय नहीं किया जा सकता। पूर्व जन्म की साधना और संस्कार भी उसके वर्तमान जीवन को प्रभावित करते हैं।
इसलिए भजन करते हुए यदि अभी भगवद्-प्राप्ति नहीं हुई है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। भगवान के मार्ग में किया गया प्रयास सुरक्षित रहता है। नाम का उच्चारण भी नष्ट नहीं होता। महाराज जी ने कहा कि भगवान का नाम एक बार बोलने पर भी वह अविनाशी है और भगवान के यहां जमा हो जाता है। इसलिए भगवान के मार्ग पर चलते रहना चाहिए और नाम-जप करते रहना चाहिए।
5. प्रश्न: क्या नामजप से कोई ऐसी शक्ति मिल सकती है, जिससे मैं दुखियों और पीड़ितों का दुःख दूर कर सकूँ?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार भगवान के नाम में बहुत बड़ी सामर्थ्य है। नाम-जप केवल स्वयं के लिए ही मंगलकारी नहीं है, बल्कि उसके प्रभाव से दूसरों का भी मंगल हो सकता है। उन्होंने नाम की शक्ति को अपने अनुभव से जोड़कर बताया कि नाम-जप ने उन्हें भी अनेक कठिन परिस्थितियों में संभालकर रखा है।
महाराज जी ने बताया कि यदि कोई पीड़ित व्यक्ति स्वयं भगवान का नाम जपने लगे तो उसके लिए भी बहुत बड़ा सहारा बन सकता है। नाम-जप के संबंध में उन्होंने कहा कि इसमें बहुत बड़ी सामर्थ्य है और भगवान के नाम में कष्ट निवारण की अपार शक्ति है।
लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति के दुःख को दूर करने का अर्थ केवल यह नहीं है कि नाम-जप करने वाला अपनी किसी व्यक्तिगत शक्ति से हर सांसारिक रोग या कष्ट को समाप्त कर देगा। महाराज जी ने स्वयं कहा कि उनके पास कोई सिद्धि या चमत्कार नहीं है। उन्होंने सत्य उपदेश और नाम-जप को ही मुख्य साधन बताया।
नाम-जप का प्रभाव मनुष्य के भीतर भी परिवर्तन करता है। महाराज जी बताते हैं कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भीतर से पवित्र करना आवश्यक है। केवल बाहर से शरीर को पवित्र कर लेने से मन की गंदगी दूर नहीं होती। नाम-जप से मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की शुद्धि होती है और जीव भगवान की ओर बढ़ता है।
इसलिए यदि किसी दुखी या पीड़ित व्यक्ति के सामने अवसर आए तो उसे भगवान का नाम लेने के लिए प्रेरित करना, उसके साथ भगवान का स्मरण करना और भगवान की शरण में जाने का भाव देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। नाम-जप स्वयं के लिए भी मंगलकारी है और दूसरों के लिए भी मंगल का कारण बन सकता है।
महाराज जी का संदेश यही है कि भगवान के नाम में अपार सामर्थ्य है। इसलिए नाम-जप को स्वयं अपनाना चाहिए और दूसरों को भी भगवान के नाम से जोड़ना चाहिए।
6. प्रश्न: मैं सबके साथ अच्छा करती हूँ, फिर भी मुझे बुराई ही मिलती है! परहित कब करें और कब न करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि परहित करने के बाद सामने वाले से तुरंत अच्छी प्रतिक्रिया मिलने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। संसार में ऐसा हो सकता है कि आप किसी का हित करें और सामने वाला आपका धन्यवाद न करे, आपकी अच्छाई को न माने या उल्टा आपके साथ बुरा व्यवहार करे। लेकिन इससे आपके द्वारा किया गया परहित व्यर्थ नहीं हो जाता।
समस्या तब पैदा होती है जब हम किसी का हित करने के बदले उससे अपने लिए अनुकूलता चाहते हैं। हम सोचते हैं कि हमने किसी की मदद की है तो वह हमारा सम्मान करे, हमारी बात माने या हमारे सामने झुके। महाराज जी के अनुसार यही अपेक्षा हमारे दुख का कारण बनती है। यदि हम सामने वाले से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया की अपेक्षा छोड़ दें तो परहित करने में दुख नहीं होगा।
परहित करने का सही भाव यह होना चाहिए कि भगवान ने सेवा का अवसर दिया है और हम उस अवसर का उपयोग कर रहे हैं। कोई भूखा व्यक्ति सामने आए तो उसे भोजन देना, कोई बीमार हो तो उसकी औषधि की व्यवस्था करना और कोई समस्या में हो तथा हम उसका समाधान कर सकते हों तो उसकी सहायता करना—यह परहित है।
लेकिन इसके बदले में धन्यवाद, सम्मान या भविष्य में अपने काम आने की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। महाराज जी ने इसे “नेकी कर दरिया में डाल” के भाव से समझाया है। परहित भगवान के लिए किया जाए। यह भावना हो कि भगवान ने हमें किसी की सहायता करने का अवसर दिया है और हम केवल अपना कर्तव्य कर रहे हैं।
यदि सहायता करने के बाद सामने वाला प्रणाम करे या धन्यवाद दे तो उसे पाने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। जब यह अपेक्षा हट जाती है तो हृदय में परेशानी भी नहीं रहती।
इसलिए परहित के लिए कोई अलग अवसर खोजने की आवश्यकता नहीं है। जब हमारे सामने किसी की वास्तविक आवश्यकता आए और हम उसकी सहायता कर सकते हों, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहायता कर देनी चाहिए। बदले में कुछ पाने की इच्छा छोड़कर किया गया परहित ही मन को आनंद देता है।
7. प्रश्न: भगवान ने ऐसी चीजें ही क्यों बनाई हैं कि युवा पीढ़ी गलत आचरणों में जा रही है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस प्रश्न को समझाने के लिए प्रकृति और जीवन में विपरीत परिस्थितियों के उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि यदि रात न हो तो दिन का महत्व क्या रहेगा? यदि धूप न हो तो छाया का आनंद कैसे समझ में आएगा? यदि बुराई न हो तो अच्छाई की महिमा का अनुभव कैसे होगा? भगवान ने संसार में दोनों प्रकार की स्थितियां रखी हैं और मनुष्य को यह स्वतंत्रता दी है कि वह किस मार्ग को चुनता है।
महाराज जी ने समझाया कि संसार एक ऐसे बगीचे की तरह है जिसे भगवान ने अपनी व्यवस्था के अनुसार बनाया है। उसमें अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के विकल्प हैं। मनुष्य को चुनना है कि वह किस ओर जाता है। बुरे मार्ग का परिणाम बुरा होता है और अच्छे मार्ग का परिणाम अच्छा होता है। इसलिए मनुष्य के सामने चुनाव की जिम्मेदारी भी है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि बुराई बिल्कुल न होती तो अच्छाई का महत्व समझ में नहीं आता। जैसे अंधकार के बिना प्रकाश का महत्व स्पष्ट नहीं होता और धूप के बिना छाया का सुख अनुभव नहीं होता, वैसे ही बुराई के सामने अच्छाई का महत्व प्रकट होता है।
युवा पीढ़ी के गलत आचरण के संबंध में महाराज जी ने निराशा की बात नहीं कही। उन्होंने बताया कि समाज को सुधारने के लिए शास्त्र और संतजन महत्वपूर्ण हैं। शास्त्र बताते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए तथा संतजन शास्त्र की बातों को समाज तक पहुंचाते हैं।
महाराज जी ने यह भी कहा कि आज भी बहुत से नौजवान सही मार्ग की ओर जा रहे हैं। उनके अनुसार अनेक युवा भगवान का नाम ले रहे हैं, भक्ति की ओर बढ़ रहे हैं और गलत आदतों को छोड़ रहे हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि पूरी युवा पीढ़ी गलत मार्ग पर जा रही है।
मनुष्य के सामने अच्छा और बुरा दोनों मार्ग हैं। चुनाव उसे स्वयं करना है। भगवान ने संसार की व्यवस्था पूरी बनाई है; अब मनुष्य को यह देखना है कि उसे क्या चुनना है। बुरा करेगा तो बुरा भोगेगा और अच्छा करेगा तो अच्छा भोगेगा।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”