① महाराज जी,जैसे अभी सब सत्य लग रहा है, पर सब झूठ है, तो भगवद्-प्राप्ति सत्य है यह कैसे पता चलेगा?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि स्वप्न में जो कुछ दिखाई देता है, उस समय वह बिल्कुल सत्य लगता है। स्वप्न में शरीर भी होता है, सुख-दुख भी अनुभव होते हैं और भूख-प्यास भी वास्तविक लगती है। लेकिन जब जागते हैं तो पता चलता है कि स्वप्न में दिखाई देने वाला शरीर और उसमें मिला सुख-दुख स्थायी सत्य नहीं था। इसी प्रकार जागृत अवस्था में जो कुछ हमें दिखाई दे रहा है, उसके सत्य होने का अनुभव भी अवस्था के अनुसार है। लेकिन भगवान और ब्रह्म का सत्य तीनों अवस्थाओं में सत्य रहता है। वह जागृत में भी सत्य है, स्वप्न में भी सत्य है और सुषुप्ति में भी सत्य है।
महाराज जी कहते हैं कि जब उस सत्य वस्तु का वास्तविक अनुभव होता है तो फिर उसके सत्य होने को लेकर कोई संशय नहीं रहता। सत्य के अनुभव में प्रश्नचिह्न नहीं रहता। जैसे वास्तविक रूप से भोजन करने के बाद तृप्ति का अनुभव होता है, उसके लिए किसी दूसरे व्यक्ति के प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ब्रह्म का बोध होने पर उसका अनुभव स्वयं प्रमाण बन जाता है।
फिर भी यदि साधक को अपनी अनुभूति को लेकर संशय हो तो गुरु का महत्व सामने आता है। गुरु उस अनुभव को प्रमाणित करते हैं। महाराज जी ने श्री सुखदेव जी का उदाहरण देते हुए बताया कि ब्रह्म-बोध के बाद भी जब उन्हें अपनी स्थिति के विषय में निर्णय चाहिए था तो व्यास जी ने उन्हें जनक जी के पास भेजा। जनक जी ने उनकी स्थिति की परीक्षा की और अंत में बताया कि उनकी ब्रह्मानुभूति सत्य है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि वास्तविक अनुभूति के बाद व्यक्ति में चाह समाप्त हो जाती है और मान-सम्मान, काम-क्रोध आदि से ऊपर उठने की स्थिति आती है।
इसलिए केवल किसी अनुभव को देखकर यह मान लेना कि यही भगवद्-प्राप्ति है, पर्याप्त नहीं है। वास्तविक अनुभव होने पर भीतर संशय नहीं रहता और यदि फिर भी संदेह हो तो गुरु तथा महापुरुष उस अनुभूति की स्थिति को प्रमाणित कर सकते हैं।
② क्या भगवद्-प्राप्ति से पहले देह-भाव से रहित हुआ जा सकता है?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को भगवान के निरंतर और अनन्य चिंतन से जोड़कर समझाते हैं। वे कहते हैं कि जब तक हमारा चिंतन मुख्य रूप से देह का है, तब तक भगवत्-प्राप्ति संभव नहीं है। इसके विपरीत जब भगवान का चिंतन इतना गहरा हो जाए कि भगवान के अतिरिक्त किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान का अलग अस्तित्व मन में न रहे, तब धीरे-धीरे देह-भाव छूटने लगता है।
महाराज जी इसके लिए निद्रा का उदाहरण देते हैं। जब हम गहरी नींद में होते हैं तो उस समय हमें अपने शरीर का भान नहीं रहता। उसी प्रकार भजन की गहरी अवस्था में जागते हुए भी ऐसी तन्मयता आ सकती है जिसमें साधक को यह होश नहीं रहता कि मैं कौन हूँ और मेरा शरीर क्या कर रहा है।
लेकिन यह स्थिति अचानक नहीं आती। इसका निरंतर अभ्यास करना पड़ता है। महाराज जी कहते हैं कि धीरे-धीरे नाम-जप बढ़ाना चाहिए और धीरे-धीरे नाम में मन लगाना चाहिए। जब मन नाम में डूबने लगता है तो उसे तन्मय स्थिति कहा जाता है। उस समय भगवान की रूप-माधुरी, गुण-माधुरी, लीला-माधुरी और नाम में मन इतना डूब सकता है कि शरीर का भान भी कम होने लगता है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि एक-एक भजन के साथ संसार से वैराग्य, भगवान से प्रेम और अपने स्वरूप का बोध बढ़ता जाता है। जैसे भोजन के प्रत्येक कौर से भूख कम होती और शरीर की पुष्टि होती जाती है, वैसे ही प्रत्येक भजन से शरीर के प्रति आसक्ति कम होती जाती है। इसलिए देहाभिमान की चिंता करके परेशान नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रेमपूर्वक भजन करते रहना चाहिए।
जब नाम-जप में स्वाद आने लगता है और भगवान के नाम का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि साधक उसी में तन्मय होने लगता है, तब शरीर का भान बहुत पीछे चला जाता है। महाराज जी के अनुसार यही भजन की गहरी स्थिति है।
इसलिए देह-भाव को जबरदस्ती हटाने का प्रयास करने के बजाय भगवान के नाम और चिंतन में मन को लगातार लगाते रहना चाहिए। भजन गहरा होगा तो देहाभिमान अपने आप कम होता जाएगा।
③ शिष्य जो अयोग्य है और भोगों में आकर्षित है, उसका चित्त गुरुदेव को कैसे समर्पित हो?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का मूल समाधान समर्पण और अहंकार के त्याग में बताते हैं। वे कहते हैं कि हमारा सबसे बड़ा बंधन देहाभिमान और कर्तृत्वाभिमान है। हम मानते हैं कि “मैं करता हूँ”, “मैं भोगता हूँ” और “मैं अपने बल से सब कुछ कर सकता हूँ।” यही अहंकार दुख का मूल बनता है।
महाराज जी कहते हैं कि यदि गुरु, संत और भगवान की शरण में जाकर अपने अहंकार को समर्पित कर दें तो स्थिति बदलने लगती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि अपने बल से हम सब कुछ नहीं कर सकते। जब अपनी सामर्थ्य का अभिमान गलने लगता है और व्यक्ति भगवान की शरण में जाता है, तभी वास्तविक शरणागति शुरू होती है।
गुरुदेव को चित्त समर्पित करने का अर्थ केवल शब्दों से यह कहना नहीं है कि “मैं आपका हूँ।” महाराज जी इसे बहुत स्पष्ट उदाहरण से समझाते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अपनी जमीन किसी दूसरे के नाम कर देता है तो उस जमीन पर अधिकार उसी व्यक्ति का हो जाता है, वैसे ही जब तन, मन और प्राण गुरुदेव को समर्पित कर दिए जाते हैं तो चित्त पर भी गुरुदेव का अधिकार हो जाता है। फिर गुरुदेव हमारे मन और चित्त को संभाल सकते हैं।
लेकिन समर्पण की परीक्षा भी होती है। यदि गुरुदेव डांट दें और हमें बुरा लगे, तो इसका अर्थ है कि अभी समर्पण पूर्ण नहीं हुआ। महाराज जी कहते हैं कि यदि तन-मन-प्राण वास्तव में समर्पित हैं तो गुरु द्वारा अहंकार को तोड़ने पर भी व्यक्ति उसी शरण में रहता है। समर्पण से अहंकार के नाश की प्रक्रिया शुरू होती है।
माया में आकर्षण होने पर भी हमें अपनी माया को पहचानना और उससे भगवान की शरण में जाना है। महाराज जी बताते हैं कि माया का एक रूप भगवान को समर्पित होने पर प्रसाद रूप हो जाता है और दूसरा स्वतंत्र रहने पर विषाद रूप। इसलिए जीवन, शरीर और मन को भगवान को समर्पित कर देना चाहिए।
अंततः महाराज जी के अनुसार बात यह नहीं है कि शिष्य कितना योग्य है। वास्तविक बात यह है कि वह अपना अहंकार कितना समर्पित करता है। जब “मैं” का अभिमान गलता जाता है और “मैं आपका हूँ” की स्थिति आती है, तब गुरुदेव का चित्त पर अधिकार स्थापित होता जाता है।
④ संकल्प-विकल्प को छोड़कर अखंड नामजप कैसे करूँ?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि नाम-जप करते समय मन में बार-बार संकल्प-विकल्प उठना मनोराज्य है। शुरुआत में मन का पूरी तरह नाम में टिक जाना कठिन होता है। इसलिए यह देखकर निराश नहीं होना चाहिए कि नाम-जप करते समय मन कहीं और चला जाता है।
महाराज जी बताते हैं कि जब नाम में हमारी प्रियता बढ़ती जाएगी तो संकल्प-विकल्प धीरे-धीरे अपने आप कम होने लगेंगे। शुरुआत में यदि एक-दो मिनट भी मन नाम में टिक जाए तो उसी को आधार बनाना चाहिए। फिर धीरे-धीरे उस समय को बढ़ाना चाहिए। आज एक-दो मिनट, फिर कुछ अधिक समय—इस प्रकार अभ्यास बढ़ता जाएगा।
जब मन भाग रहा हो तो नाम पर और अधिक जोर देना चाहिए। महाराज जी विशेष रूप से भगवान के नाम का चिंतन करने की बात कहते हैं। यदि मन को चिंतन में लगा दिया जाए तो संकल्प-विकल्प रुकने लगते हैं। इसलिए केवल माला चलाने के बजाय नाम के साथ भगवान का चिंतन भी करना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि पाँच मिनट ही सही, दस मिनट ही सही, लेकिन चिंतन सहित नाम करना चाहिए। यदि निष्काम भाव से, गुप्त रूप से और ध्यान सहित नाम-जप किया जाए तो नाम का प्रभाव जल्दी पड़ता है।
धीरे-धीरे ऐसा अभ्यास बनाना है कि दिन-रात भगवान के नाम का पहरा रहे और भगवान के ध्यान का दरवाजा बंद रहे। तब मन चाहे जितने संकल्प-विकल्प करे, उसे बार-बार भगवान के नाम और चिंतन की ओर लौटाना है।
महाराज जी एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि अभी हमें संसार अपना और भगवान पराए लगते हैं। पत्नी, पुत्र, शरीर, रुपया, घर और मकान को हम “मेरा” मानते हैं और भगवान दूर लगते हैं। लेकिन नाम-जप करते-करते जब भगवान अपने लगने लगेंगे, तब यही संसार स्वप्न जैसा लगने लगेगा। तब समझना चाहिए कि भजन सही दिशा में जा रहा है।
इसके लिए जीवन की दिनचर्या में भी संयम रखना बताया गया है—युक्त और सात्त्विक भोजन, कम निद्रा, मौन या उचित वचन, निंदा और अशुद्ध बातचीत से बचना तथा नाम-जप करने वाले संतों का संग करना। भक्तों के चरित्र सुनने से भी भगवान के चरणों में प्रीति बढ़ती है।
इसलिए अखंड नाम-जप का मार्ग मन को जबरदस्ती रोकना नहीं, बल्कि नाम में प्रियता बढ़ाना, चिंतन सहित जप करना और मन के भटकने पर बार-बार उसे भगवान के नाम में लौटा देना है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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