माला-1412:महाराज जी,कामिनी में फिसल गया, अब क्या करूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, लोग कहते हैं कि तू जोरू का गुलाम है। पत्नी से बहुत प्रेम करना क्या गलत है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि पत्नी से प्रेम करना गलत नहीं है, लेकिन उस प्रेम का आधार समझना बहुत आवश्यक है। प्रेम शरीर से नहीं, बल्कि उसके भीतर विराजमान परमात्मा से होना चाहिए। शरीर नाशवान है, आज नहीं तो कल इसका साथ छूट जाएगा। यदि हमारा प्रेम केवल शरीर और उससे मिलने वाले भोग तक सीमित है, तो उससे वास्तविक प्रेम का उद्देश्य पूरा नहीं होता।

महाराज जी ने समझाया कि पति-पत्नी के बीच प्रेम एक पवित्र संबंध है। यदि पति अपनी पत्नी में भगवान का स्वरूप देखे और पत्नी अपने पति में भगवान का भाव रखे, तो यह संबंध आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन सकता है। जैसे गुरु के शरीर में परमात्मा का भाव रखकर उनसे प्रेम किया जाता है, वैसे ही पत्नी के भीतर भी भगवान को देखकर प्रेम किया जा सकता है।

लोग क्या कहते हैं, इस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। यदि पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान हैं, मर्यादा में रहते हैं, भगवान का नाम जपते हैं और किसी प्रकार के व्यभिचार से दूर रहते हैं, तो उनका जीवन धर्म के अनुकूल है। समस्या प्रेम में नहीं, बल्कि उस प्रेम में छिपी आसक्ति और भोग की भावना में है।

इसलिए पत्नी से प्रेम करें, उसकी देखभाल करें और उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें, लेकिन उसके शरीर को ही सब कुछ न मानें। उसके भीतर बैठे परमात्मा का स्मरण रखें। जब प्रेम का आधार भगवान बन जाते हैं, तब वही सांसारिक संबंध भी भगवत्प्राप्ति का साधन बन सकता है।

प्रश्न 2: जीवन के अच्छे समय में संयम और धैर्य कैसे बनाए रखें?

उत्तर: जीवन में सुख और अनुकूलता आने पर मनुष्य के भीतर अहंकार बढ़ सकता है, जबकि दुख आने पर वह शोक और निराशा में डूब सकता है। पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि प्रकृति का स्वभाव ही परिवर्तनशील है। कभी सुख मिलता है, कभी दुख; कभी सम्मान मिलता है, तो कभी अपमान। यदि हमारा मन केवल परिस्थितियों पर निर्भर रहेगा, तो उसमें स्थिरता नहीं आ सकती।

महाराज जी के अनुसार, वास्तविक संतुलन तब आता है जब हम परमात्मा से जुड़कर संसार के व्यवहार करते हैं। सुख के समय बहुत अधिक फूलना नहीं चाहिए और दुख के समय पूरी तरह टूटना नहीं चाहिए। दोनों परिस्थितियों में भगवान का आश्रय बनाए रखना ही संयम और धैर्य का आधार है।

इसके लिए महाराज जी ने नामजप और सत्संग का नियमित अभ्यास करने को कहा। प्रतिदिन कुछ समय भगवान के प्रिय नाम का जप करें और कुछ समय संतों के विचार सुनें। शुरुआत में दस-पंद्रह मिनट भी नियमित रूप से बैठकर नामजप करना लाभकारी अभ्यास बन सकता है। इससे मन धीरे-धीरे बलवान होता है और बुद्धि को सही दिशा मिलती है।

संसार की वस्तुएँ, धन, पद और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं हैं। इसलिए केवल इन्हीं में सुख खोजने से मन की अतृप्ति समाप्त नहीं होती। परमात्मा से संबंध जोड़ने पर ही भीतर पूर्णता और शांति का अनुभव होने लगता है।

अच्छे समय में संयम बनाए रखने का अर्थ यह है कि सफलता मिलने पर अपने आपको सबसे बड़ा न समझें और यह याद रखें कि सब कुछ भगवान की कृपा से मिला है। इसी तरह कठिन समय में भी यह विश्वास रखें कि भगवान का आश्रय हमारे साथ है।

नामजप, सत्संग और भगवान पर भरोसा—इनके सहारे सुख में अहंकार से और दुख में निराशा से बचा जा सकता है।

प्रश्न 3: मैं अपनी चेतना को ऊपर उठाना चाहती हूँ और भय व दुःखों से मुक्त होना चाहती हूँ। इसके लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: पूज्य महाराज जी ने चेतना की उन्नति के लिए जीवन को आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़ने की बात कही है। इसके लिए केवल अच्छी बातें सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने आहार, आचरण, विचार और दिनचर्या को भी शुद्ध बनाना आवश्यक है।

महाराज जी ने इसके लिए मुख्य रूप से चार बातें बताईं—नियमित शास्त्र-स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य का पालन, पवित्र आहार और निरंतर नामजप। इनका उद्देश्य केवल बाहरी जीवन को व्यवस्थित करना नहीं, बल्कि बुद्धि और मन को शुद्ध करना है।

महाराज जी ने शरीर, इंद्रियों, मन और बुद्धि का उदाहरण देते हुए समझाया कि शरीर एक रथ के समान है, इंद्रियां उसके घोड़े हैं, मन उनकी लगाम है और बुद्धि सारथी है। यदि बुद्धि सही दिशा में काम नहीं करती, तो मन पर नियंत्रण नहीं रहता और इंद्रियां मनमाने ढंग से चलने लगती हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपनी इच्छाओं और आकर्षणों में फंसकर गलत दिशा में आगे बढ़ सकता है।

इसलिए बुद्धि को शुद्ध करना बहुत जरूरी है। शास्त्रों का अध्ययन और सत्संग हमें सही-गलत का विवेक देते हैं। पवित्र भोजन से मन की शुद्धि में सहायता मिलती है और ब्रह्मचर्य से स्मरणशक्ति, तेज तथा अपने लक्ष्य पर चलने की क्षमता बढ़ती है।

महाराज जी ने यह भी कहा कि यदि प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन संभव न हो, तो मोबाइल पर संतों का सत्संग सुना जा सकता है। इसके साथ भगवान के नाम का निरंतर जप करना चाहिए। केवल कभी-कभी नाम लेने के बजाय उसे जीवन का नियमित हिस्सा बनाना चाहिए।

जब बुद्धि शुद्ध होगी, मन संयमित होगा और इंद्रियां सही दिशा में चलेंगी, तब चेतना की उन्नति होगी। इसलिए भय और दुःखों से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए अपने जीवन को नामजप, सत्संग, पवित्र आहार और पवित्र आचरण से जोड़ना चाहिए।

प्रश्न 4: कुछ दिन सेवा अच्छे से होती है, लेकिन सुख-दुःख आने पर सेवा छूट जाती है। क्या करना चाहिए?

उत्तर: पूज्य महाराज जी ने समझाया कि साधक को अपनी भक्ति और अपने आचरण पर ध्यान देना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों को भक्त बना देना हमारे हाथ में नहीं है। कोई व्यक्ति स्वयं भक्ति करना चाहे, तभी वह उस मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। इसलिए परिवार के दूसरे लोगों के व्यवहार को देखकर दुखी होने के बजाय अपनी साधना को मजबूत करना चाहिए।

महाराज जी ने कहा कि हर परिस्थिति में भगवान की सेवा और भजन बनाए रखना चाहिए। यदि किसी कारण शरीर से नियमित सेवा करना संभव न हो, तब भी मन को भगवान से जोड़े रखा जा सकता है। गृहस्थ जीवन में अनेक जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन उनका निर्वाह करते हुए भी भगवान का स्मरण किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, घर में रिश्तेदार आ जाएं और उनके भोजन या देखभाल में समय लग जाए, तो इसे केवल संसार का काम मानकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। महाराज जी ने समझाया कि परिवार और रिश्तेदारों में भी भगवान विराजमान हैं। यदि उनके प्रति सेवा का भाव रखा जाए, तो गृहस्थ जीवन के काम भी भगवान की सेवा के भाव से किए जा सकते हैं।

इसी प्रकार रसोई बनाते समय, लोगों को भोजन परोसते समय या अन्य घरेलू कार्य करते हुए भी मन में भगवान का नाम चलता रह सकता है। शरीर अपने कर्तव्यों में लगा हो और मन ठाकुर जी के चिंतन में रहे, तो व्यस्तता के बीच भी भजन बना रहता है।

महाराज जी ने यह भी समझाया कि अपनी इच्छा से पूरे परिवार को भक्ति में नहीं लगाया जा सकता। हमें अपने भजन को बढ़ाना चाहिए। जब हमारी भक्ति दृढ़ होगी, तो उसका प्रभाव परिवार और आसपास के लोगों पर भी पड़ सकता है।

इसलिए सुख आने पर भगवान को भूलना नहीं है और दुख आने पर सेवा छोड़नी नहीं है। परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए अपने हिस्से का भजन करते रहना चाहिए। परिवार को बदलने की चिंता से अधिक जरूरी है कि स्वयं भगवान के प्रति समर्पित बने रहें।

प्रश्न 5: जीवन में संतोष का क्या अर्थ है? संतोष प्राप्त होने के क्या लक्षण हैं?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, संतोष का अर्थ है जैसी परिस्थिति प्राप्त हुई है, उसमें भगवान के विधान को स्वीकार करते हुए प्रसन्न रहना। केवल अनुकूल परिस्थितियों में संतुष्ट रहना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक संतोष तब दिखाई देता है, जब व्यक्ति सुख और दुख, सम्मान और अपमान, अनुकूलता और प्रतिकूलता—सभी में अपना धैर्य बनाए रखता है।

महाराज जी ने बताया कि संतोषी व्यक्ति हर समय परिस्थितियों को बदलने की इच्छा में परेशान नहीं रहता और न ही दूसरों से कोई अपेक्षा रखता है। वह जो प्राप्त हुआ है, उसमें संतुष्ट रहना सीखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान के भजन, संत-समागम या भगवत्प्राप्ति की इच्छा भी छोड़ दी जाए। महाराज जी ने स्पष्ट किया कि भगवान के धाम में रहने, संतों का संग प्राप्त करने और अधिक भजन करने की कामना करनी चाहिए। ऐसी सात्विक कामनाएं सांसारिक इच्छाओं को छोड़ने में सहायता करती हैं।

सबसे कठिन परीक्षा दुख और अपमान के समय होती है। उस समय संतोष बनाए रखना तभी संभव है, जब मनुष्य भगवान पर भरोसा रखता हो। भक्त यह सोच सकता है कि इस प्रतिकूल परिस्थिति में भी भगवान उसका कोई मंगल कर रहे हैं और कोई अमंगल दूर हो रहा है। ऐसा भाव कठिन समय को सहन करने की शक्ति देता है।

महाराज जी ने रात और सुबह का उदाहरण दिया। जैसे व्यक्ति को विश्वास रहता है कि रात के बाद सुबह होगी और सूर्य का प्रकाश अंधकार को दूर कर देगा, वैसे ही भगवान पर भरोसा रखने वाला साधक दुख के समय भी आशा बनाए रख सकता है।

संतोष का एक महत्वपूर्ण लक्षण यह भी है कि सुख मिलने पर अहंकार न आए और दुख मिलने पर भगवान का स्मरण न छूटे। व्यक्ति अपनी परिस्थिति को स्वीकार करते हुए धैर्यपूर्वक जीवन जीना सीखे।

इस प्रकार संतोष केवल कम इच्छाएं रखने का नाम नहीं, बल्कि भगवान पर विश्वास रखते हुए हर परिस्थिति में धैर्य और स्वीकार का भाव बनाए रखना है।

प्रश्न 6: रजोगुण और तमोगुण का त्याग तो समझ आता है, लेकिन सत्त्वगुण का त्याग क्यों करना चाहिए?

उत्तर: पूज्य महाराज जी ने समझाया कि सत्त्वगुण सामान्य रूप से शुभ और पवित्र कार्यों से जुड़ा होता है, लेकिन यदि उसके कारण अहंकार पैदा होने लगे, तो वह भी बंधन का कारण बन सकता है। समस्या अच्छे कर्म करने में नहीं, बल्कि उन कर्मों का अभिमान करने और उनसे मिलने वाले सुख में आसक्त हो जाने में है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति जरूरतमंद को धन देता है, किसी भूखे को भोजन कराता है या किसी पर दया करता है, तो ये अच्छे कार्य हैं। लेकिन बाद में वह बार-बार सोचता रहे कि “मैंने इतना दान किया”, “मैंने इतने लोगों की सहायता की” या “मैं दूसरों से अधिक पुण्यात्मा हूं”, तो उस अच्छे कर्म के साथ अहंकार जुड़ जाता है।

महाराज जी ने समझाया कि इस अहंकार से बचने के लिए दो भाव रखे जा सकते हैं। पहला, जो कुछ हमारे पास है, वह भगवान का दिया हुआ है और हम उसी की वस्तु उसी को समर्पित कर रहे हैं। दूसरा, यदि हम किसी की सहायता कर रहे हैं, तो सामने वाले को भी भगवान का ही स्वरूप मानें। जब सब कुछ भगवान का है, तो फिर अपने किए हुए कार्य का अभिमान कैसा?

करुणा के विषय में भी महाराज जी ने महत्वपूर्ण बात कही। दूसरों पर दया करनी चाहिए, लेकिन दया करते-करते ममता में नहीं फंसना चाहिए। उन्होंने भरत जी और हिरण के प्रसंग से समझाया कि एक हिरण के बच्चे पर करुणा करते-करते भरत जी को उससे अत्यधिक ममता हो गई और अंतिम समय में उसी का चिंतन होने के कारण उन्हें हिरण का जन्म प्राप्त हुआ।

इसलिए करुणा का त्याग नहीं करना है, बल्कि करुणा के साथ जुड़ी आसक्ति और अहंकार से बचना है। सेवा करें, दान दें और दूसरों का कल्याण करें, लेकिन यह भाव न रखें कि सब कुछ मैंने किया है।

सात्त्विक कर्म करते हुए भी यदि “मैंने किया” का अभिमान बना रहता है, तो बंधन बना रह सकता है। इसलिए कर्म करते हुए उसे भगवान को समर्पित करना और अहंकार से दूर रहना आवश्यक है।

प्रश्न 7: आपने कहा था कि नीरस भोजन पाओ, लेकिन भगवान को अच्छा भोग लगाते हैं और वही हमें प्राप्त होता है। ऐसे में क्या करना चाहिए?

उत्तर: पूज्य महाराज जी ने समझाया कि भगवान को उत्तम भोग लगाना और स्वयं साधना के अनुकूल भोजन करना—इन दोनों में अंतर है। भगवान को अच्छे-अच्छे व्यंजन अर्पित करने में कोई बाधा नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि साधक को भी प्रतिदिन वही भारी और स्वादिष्ट भोजन अधिक मात्रा में खाना चाहिए।

महाराज जी ने स्वामी हरिदास जी का उदाहरण दिया। ठाकुर जी को छप्पन प्रकार के भोग लगाए जाते थे, लेकिन स्वामी हरिदास जी स्वयं थोड़े से चने खाते थे और भोग की सामग्री ब्रजवासियों तथा पशु-पक्षियों में बांट देते थे। इस उदाहरण से महाराज जी ने समझाया कि भगवान को उत्तम भोग लगाकर उस सामग्री का उचित उपयोग भी किया जा सकता है।

यदि भगवान को खीर, पूरी, हलवा, मेवा या अन्य स्वादिष्ट व्यंजन अर्पित किए हैं, तो अपनी आवश्यकता के अनुसार प्रसाद ग्रहण करें और शेष गायों, बंदरों, कुत्तों या अन्य जरूरतमंद जीवों को दे सकते हैं। इस प्रकार भगवान को अर्पित सामग्री का सदुपयोग भी हो जाएगा और साधक अपने भोजन को भी साधना के अनुकूल रख सकेगा।

महाराज जी ने बताया कि मनुष्य का शरीर प्राकृतिक है और उसे ऐसा भोजन चाहिए, जो आसानी से पच सके तथा भजन में बाधा न बने। यदि प्रतिदिन बहुत अधिक भारी और गरिष्ठ भोजन किया जाए, तो शरीर पर उसका प्रभाव पड़ सकता है और मन भोग-विलास की ओर अधिक आकर्षित हो सकता है। इसलिए भोजन उतना ही और वैसा होना चाहिए, जिससे शरीर स्वस्थ रहे और भजन में रुचि बनी रहे।

उन्होंने एक महापुरुष का उदाहरण भी दिया, जो मीठा प्रसाद मिलने पर उसे लेने से मना कर देते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि जीभ को स्वाद की आदत लगने पर बार-बार उसी की मांग बढ़ सकती है।

इसलिए भगवान को प्रेमपूर्वक उत्तम भोग लगाएं, लेकिन स्वयं अपनी शारीरिक क्षमता और साधना के अनुकूल भोजन करें। प्रसाद का सम्मान करते हुए अपनी आवश्यकता के अनुसार ग्रहण करना और शेष सामग्री का सदुपयोग करना ही उचित मार्ग है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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