माला-1416:भगवान के दर्शन के लिए कितनी संख्या में नामजप करना पड़ेगा?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,भगवान के दर्शन के लिए कितनी संख्या में नामजप करना पड़ेगा?

उत्तर: भगवान की प्राप्ति के लिए कितनी संख्या में नामजप करना चाहिए? क्या लाखों या करोड़ों बार नामजप करने के बाद ही भगवान के दर्शन हो सकते हैं? पूज्य महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए समझाते हैं कि भगवान को किसी निश्चित संख्या में नामजप करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। भगवान कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं, जिन्हें एक निश्चित संख्या पूरी करने पर प्राप्त कर लिया जाए।

महाराज जी बताते हैं कि संभव है कोई व्यक्ति पाँच बार सच्चे हृदय से पुकारे और भगवान उसे दर्शन दे दें। यह भी संभव है कि कोई हजारों जन्मों तक साधना करता रहे। यह इस बात पर निर्भर करता है कि भगवान के प्रति उसके हृदय में कितना प्रेम है, उसकी पुकार में कितनी व्याकुलता है और उसका मन भगवान में कितना तल्लीन है।

इसे समझाने के लिए महाराज जी नारद जी और दो वृक्षों के नीचे भजन करने वाले महात्माओं का प्रसंग सुनाते हैं। एक महात्मा को बताया गया कि भगवान के दर्शन में अनेक जन्म लगेंगे। यह सुनकर वह निराश नहीं हुआ, बल्कि प्रसन्न होकर नाचने लगा कि भगवान ने उसकी साधना की सुध तो ली। उसकी इसी तन्मयता और प्रेम को देखकर भगवान तत्काल प्रकट हो गए।

इसलिए नामजप की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण। नामजप करते हुए संसार की आसक्ति कम करें और भगवान के चरणों में प्रेम बढ़ाएँ।

भगवान को पाने के लिए केवल गिनती पूरी करने पर ध्यान न दें, बल्कि ऐसी भावना से उनका नाम लें कि मन पूरी तरह उन्हीं की ओर लग जाए।

प्रश्न 2: क्या भक्ति करने से पहले मन को जीतना होता है, या भक्ति करने से ही मन को जीता जा सकता है?

उत्तर: बहुत से लोग सोचते हैं कि जब तक मन पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक भक्ति कैसे होगी? लेकिन पूज्य महाराज जी इस धारणा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मन को पहले जीतकर फिर भगवान में लगाने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। मन को भगवान में लगाना ही उसे जीतने का मार्ग है।

महाराज जी समझाते हैं कि मन का स्वभाव संसार के विषयों की ओर भागना है। यदि उसे बिना अभ्यास के छोड़ दिया जाए, तो वह बार-बार उन्हीं चीजों की ओर जाएगा, जिनमें उसे आकर्षण दिखाई देता है। इसलिए मन को बलपूर्वक रोकने के बजाय उसे भगवान के नाम, रूप, लीला और सेवा में लगाना सीखना चाहिए।

जब मन संसार की ओर भागे, तब उसे वहाँ से हटाकर फिर नामजप में लगा दें। भगवान की कथा सुनें, उनकी सेवा करें और घर-परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों को भी भगवद्भाव से निभाएँ। महाराज जी बताते हैं कि जितना अधिक मन भगवान में लगेगा, उतना ही वह धीरे-धीरे निर्मल और नियंत्रण में होने लगेगा।

मन को जीतने की केवल प्रतिज्ञा कर लेना पर्याप्त नहीं है। कई बार मनुष्य दृढ़ संकल्प करता है, लेकिन मन उसे फिर अपनी पुरानी आदतों की ओर खींच लेता है। इसलिए मन के साथ संघर्ष करने के बजाय उसे सही दिशा देना अधिक आवश्यक है।

महाराज जी का संदेश है कि पहले भगवान के चरणों का आश्रय लें और नामजप आरंभ करें। भजन के अभ्यास से मन की संसार में भटकने वाली प्रवृत्ति कम होगी और वह धीरे-धीरे भगवान में स्थिर होने लगेगा।

प्रश्न 3: क्या सद्गुरुदेव और भक्ति की प्राप्ति में भी प्रारब्ध का योगदान होता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि सद्गुरुदेव की प्राप्ति, भगवान के नाम में रुचि उत्पन्न होना और भक्ति के प्रति प्रेम जागना केवल प्रारब्ध का फल नहीं है। इसमें भगवान की कृपा का विशेष योगदान होता है।

महाराज जी समझाते हैं कि सामान्यतः शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार मनुष्य को सुख और दुःख प्राप्त होते हैं। लेकिन भगवान का आनंद, संतों के संग का आनंद और भगवान के प्रति प्रेम सांसारिक सुख-दुःख से ऊपर के विषय हैं। इन्हें केवल शुभ कर्मों के फल के रूप में नहीं समझना चाहिए।

वे बताते हैं कि भगवान की कृपा से ही मनुष्य को संतों का संग मिलता है और सद्गुरुदेव का आश्रय प्राप्त होता है। सद्गुरुदेव की कृपा से साधक को भगवान के नाम, रूप और लीलाओं का वास्तविक महत्व समझ में आने लगता है। फिर नामजप में रुचि बढ़ती है और धीरे-धीरे भगवान के प्रति प्रेम जागृत होता है।

महाराज जी शुभ और अशुभ कर्मों की तुलना क्रमशः सोने और लोहे की जंजीरों से करते हैं। दोनों ही बाँधते हैं, भले ही एक अच्छा दिखाई दे और दूसरा बुरा। भगवान की प्राप्ति का मार्ग इन बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग है।

इसलिए भक्ति को केवल अपने पुण्य या प्रारब्ध का परिणाम मानकर अभिमान नहीं करना चाहिए। यदि जीवन में संतों का संग मिला है, सद्गुरुदेव का आश्रय प्राप्त हुआ है और नामजप में रुचि जागी है, तो इसे भगवान की कृपा समझना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार, भगवान की कृपा और सद्गुरुदेव के मार्गदर्शन से ही साधक सांसारिक सुख-दुःख से ऊपर उठकर भगवद्-आनंद और प्रेम की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

प्रश्न 4: जो निर्णय लिया वह गलत निकला, अब पछतावा हो रहा है; क्या करूँ?

उत्तर: जीवन में कई बार हम जल्दबाजी या मन के आवेग में कोई निर्णय ले लेते हैं। बाद में जब उसका परिणाम गलत निकलता है, तो मन पछतावे से भर जाता है। पूज्य महाराज जी बताते हैं कि किसी भी निर्णय को लेने से पहले शास्त्रों और गुरुजनों के मार्गदर्शन का विचार करना चाहिए।

महाराज जी समझाते हैं कि मन अपनी इच्छाओं के पक्ष में तर्क देने लगता है। कई बार हमें पता होता है कि कोई कार्य गलत है, फिर भी मन उसे सही ठहराने की कोशिश करता है। इसलिए केवल अपनी इच्छा के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं है।

यदि पहले कोई गलती हो गई है, तो उसके लिए भगवान से क्षमा माँगें और आगे उस गलती को न दोहराने का दृढ़ संकल्प करें। लेकिन केवल पछताते रहना पर्याप्त नहीं है। अपने आचरण में परिवर्तन लाना भी आवश्यक है।

महाराज जी बताते हैं कि मन जब गलत कार्य करने के लिए प्रेरित करे और हम उसे मना कर दें, तो वह भीतर बेचैनी पैदा कर सकता है। यदि हम उस बेचैनी को सहन करना सीख लें और गलत कार्य न करें, तो आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।

भविष्य में निर्णय लेते समय पहले विचार करें कि वह शास्त्रसम्मत है या नहीं। यदि शास्त्रों का ज्ञान नहीं है, तो संतों और गुरुजनों से मार्गदर्शन लें। नियमित भजन, नामजप और सत्संग से बुद्धि में विवेक विकसित होता है।

इसलिए पुरानी गलती को अपने जीवन पर बोझ बनाकर न रखें। उससे सीखें, भगवान से प्रार्थना करें और आगे सही आचरण अपनाएँ। महाराज जी का संदेश है कि निर्णय लेने से पहले विवेक का प्रयोग करना चाहिए, ताकि बाद में पछताने की स्थिति न आए।

प्रश्न 5: हमारा जन्म माँ मीराबाई जी के वंश में हुआ, फिर भी हमारा मन उनकी तरह भगवान में क्यों नहीं लगता?

उत्तर: माँ मीराबाई जी का भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम देखकर स्वाभाविक रूप से मन में प्रश्न उठता है कि हमारा मन भी उसी तरह भगवान में क्यों नहीं लगता। पूज्य महाराज जी इस विषय में समझाते हैं कि केवल किसी भक्त के वंश में जन्म लेने से वैसी भक्ति अपने आप प्राप्त नहीं हो जाती। उसके लिए स्वयं भी साधना करनी पड़ती है।

महाराज जी मन के स्वभाव को पानी के उदाहरण से समझाते हैं। जैसे पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, वैसे ही मन को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तो वह संसार और उसके विषयों की ओर चला जाता है। उसे भगवान में लगाने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है।

वे बताते हैं कि इसके लिए मंत्र का सहारा लेना चाहिए। अपने गुरुजी से प्राप्त नाम का निरंतर जप करने का प्रयास करें। मन भटके तो उसे बार-बार भगवान के नाम में लगाएँ। एक दिन में मन पूरी तरह स्थिर हो जाए, ऐसी अपेक्षा रखने के बजाय नियमित अभ्यास करते रहना चाहिए।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि मीराबाई जी की भक्ति केवल उनके मुख से निकले शब्दों तक सीमित नहीं थी। उनका भाव था कि गिरधर गोपाल के अतिरिक्त उनका कोई दूसरा नहीं है। ऐसा अनन्य प्रेम तभी परिपक्व होता है, जब मनुष्य अपनी आसक्ति को भगवान के चरणों में केंद्रित करता है।

इसलिए मीराबाई जी की भक्ति से प्रेरणा लें, लेकिन अपने मन की वर्तमान स्थिति देखकर निराश न हों। नामजप करें, सत्संग का सहारा लें और अपने आराध्य के प्रति प्रेम बढ़ाने का प्रयास करें।

महाराज जी का संदेश है कि मन को भगवान में लगाने के लिए निरंतर चेष्टा करनी चाहिए। अभ्यास और कृपा से मन की दिशा बदल सकती है और भक्ति अधिक गहरी हो सकती है।

प्रश्न 6: संतजन इतना जप-तप करते हैं, फिर भी कष्ट में दिखाई देते हैं। क्या सभी को प्रेम प्राप्त होता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि भगवान के मार्ग पर चलने वाले संत-महात्माओं को सांसारिक दृष्टि से कष्ट सहते हुए देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे भीतर से भी दुःखी हैं। उनके लिए भगवान का आनंद इतना महत्वपूर्ण होता है कि बाहरी कठिनाइयाँ उनके आध्यात्मिक सुख को समाप्त नहीं कर पातीं।

महाराज जी अपने जीवन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि साधना के मार्ग पर कई बार भोजन की कमी, गर्मी-सर्दी, मान-अपमान और अन्य कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन भगवान की कृपा से प्राप्त आनंद के सामने ये परिस्थितियाँ छोटी लगने लगती हैं।

वे उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार युद्धभूमि में विजय की भावना से भरा वीर कठिनाइयों को सह लेता है, उसी प्रकार भगवान के प्रेम और आनंद में डूबे साधक के लिए बाहरी कष्ट सहना संभव हो जाता है। संसार का मार्ग भोगों और अपेक्षाओं से जुड़ा है, जबकि परमात्मा का मार्ग आनंद का मार्ग है।

लेकिन क्या हर साधक को भगवान का प्रेम प्राप्त होता है? महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि कल्याण, आनंद और प्रेम अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। कल्याण की प्राप्ति संभव है, आनंद भगवान के प्रति अपनापन होने से मिलता है, लेकिन भगवान के प्रति अनन्य प्रेम अत्यंत दुर्लभ है।

प्रेम प्राप्त करने के लिए संसार के संबंधों और वस्तुओं के प्रति ममता को समेटकर भगवान के चरणों में लगाना पड़ता है। यह कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी धर्मपूर्वक आचरण, नामजप और संतों का आश्रय लेकर इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

महाराज जी बताते हैं कि संतों की शरण और उनके वचनों का पालन साधक को उस लक्ष्य तक पहुँचा सकता है, जिसके लिए संतों ने स्वयं कठिन साधना की है।

प्रश्न 7: ऑफिस में लंच करते हुए भगवान को भोग कैसे लगाएँ?

उत्तर: जो लोग नौकरी या व्यवसाय के कारण घर से बाहर रहते हैं, उनके मन में अक्सर यह प्रश्न आता है कि भोजन करते समय भगवान को भोग कैसे लगाया जाए। पूज्य महाराज जी इसका सरल उपाय बताते हैं कि भगवान को केवल घर के मंदिर तक सीमित न मानें, बल्कि जहाँ भी हों, अपने हृदय में विराजमान भगवान का स्मरण करें।

महाराज जी समझाते हैं कि यदि घर में ठाकुर जी विराजमान हैं, तो घर पर भोजन करते समय पहले उन्हें भोग लगाकर भोजन करना चाहिए। लेकिन यदि ऑफिस या किसी अन्य स्थान पर हों, तो वहाँ भी भगवान का स्मरण करके उन्हें मानसिक रूप से भोग अर्पित किया जा सकता है।

इसके लिए भोजन करने से पहले कुछ क्षण शांत होकर अपने हृदय में विराजमान भगवान का ध्यान करें। प्रेमपूर्वक प्रार्थना करें कि प्रभु, यह भोजन आपको अर्पित है, कृपया इसे स्वीकार करें। इसके बाद भगवान का नाम लेकर भोजन ग्रहण करें।

महाराज जी भगवद्गीता के उस भाव का उल्लेख करते हैं, जिसमें भगवान स्वयं को सभी प्राणियों के शरीर में स्थित वैश्वानर अग्नि बताते हैं, जो भोजन को पचाती है। इस दृष्टि से भोजन करते समय भी भगवान का स्मरण किया जा सकता है।

यदि यात्रा या बाहर रहने के कारण ठाकुर जी की नियमित बाहरी सेवा संभव न हो, तो गुरुजी से प्राप्त नाम का जप करते रहना चाहिए। महाराज जी बताते हैं कि भगवान के नाम का स्मरण भी सेवा का महत्वपूर्ण माध्यम है।

इसलिए ऑफिस में भोजन करते समय यह सोचकर परेशान न हों कि मंदिर जैसी व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। श्रद्धा और भावना से भगवान का स्मरण करें, उन्हें भोजन अर्पित करें और फिर प्रसाद समझकर भोजन ग्रहण करें।

प्रश्न 8: गुरु नानक जी मेरे इष्ट रहे हैं, लेकिन अब दूसरे मंदिरों में जाने पर वहाँ के भगवान भी अच्छे लगने लगे हैं। क्या मेरा प्रेम सच्चा नहीं है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में भक्ति और अनन्य प्रेम के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान के विभिन्न रूपों और संतों के प्रति श्रद्धा होना अलग बात है, लेकिन प्रेम की परिपक्व अवस्था में मन एक ही आराध्य के चरणों में पूरी तरह लग जाता है।

महाराज जी समझाते हैं कि गुरु नानक साहब, सोमनाथ जी के भगवान शिव और वृंदावन के बिहारी जी—इन सबके पीछे परम तत्त्व एक ही है। भगवान के रूप अनेक हो सकते हैं, लेकिन तत्त्व में भेद नहीं है। इसलिए किसी दूसरे रूप के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होने से यह आवश्यक नहीं कि पहले आराध्य के प्रति श्रद्धा गलत हो गई।

हालाँकि, महाराज जी कहते हैं कि अनन्य प्रेम में मन बार-बार अपना लक्ष्य नहीं बदलता। यदि किसी एक आराध्य के प्रति गहरी प्रीति है, तो साधक को उसी की उपासना में स्थिर रहने का प्रयास करना चाहिए। जहाँ मन को वास्तविक शांति मिलती है और साधना आगे बढ़ती है, वहाँ दृढ़ता बनाए रखना आवश्यक है।

वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल अलग-अलग स्थानों पर आकर्षण अनुभव करने को प्रेम की परिपक्व अवस्था नहीं कहा जा सकता। प्रेम में आराध्य के प्रति ऐसी निष्ठा होती है कि मन उसी में तल्लीन रहता है।

इसलिए अपने मन में उठ रहे प्रश्न को लेकर स्वयं को दोषी न मानें। सभी रूपों के प्रति श्रद्धा रखते हुए अपने गुरु और इष्ट के मार्गदर्शन के अनुसार साधना करें। यदि आपके गुरुजी ने कोई विशेष नाम या उपासना बताई है, तो उसे नियमित रूप से अपनाएँ।

महाराज जी का संदेश है कि भगवान के रूप अनेक हैं, लेकिन साधक को अपनी उपासना में स्थिरता और अपने आराध्य के प्रति गहरी प्रीति विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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