माला-1420:जब काउंटर नहीं थे, संतजन कैसे गिनते थे नामजप? क्या भगवान की प्राप्ति के लिए गिनती ज़रूरी है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,पूर्वकाल में संतजन माला और नामजप की गिनती किस प्रकार करते थे?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान के नामजप की गिनती करने के लिए माला या काउंटर का उपयोग साधक को मन लगाने और नियमित अभ्यास करने में सहायता देता है। लेकिन भगवान की प्राप्ति केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि किसी व्यक्ति ने कितनी मालाएँ पूरी की हैं।

महाराज जी के अनुसार, साधना के आरंभ में माला, काउंटर या निश्चित संख्या का नियम उपयोगी होता है, क्योंकि इससे मन को एक निश्चित अभ्यास में लगाया जा सकता है। लेकिन जब मन भगवान के नाम में रमने लगता है, तब साधक का उद्देश्य केवल गिनती पूरी करना नहीं रहता, बल्कि हर क्षण भगवान का स्मरण करना बन जाता है।

वे बताते हैं कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारी एक भी श्वास और एक भी मानसिक वृत्ति भगवान से विमुख न हो। नामजप करते हुए यदि माला हाथ में चल रही है, लेकिन मन संसार के विचारों में भटक रहा है, तो साधना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा।

इसलिए केवल माला की संख्या पर ध्यान देने के बजाय मन को भगवान में लगाने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में ऐसा नियम बनाना चाहिए कि भगवान को भूलना नहीं है और निरंतर उनका नाम स्मरण करना है।

महाराज जी की मुख्य सीख है कि माला और काउंटर साधन हैं, लक्ष्य नहीं। भगवान की प्राप्ति के लिए नामजप को जीवन का निरंतर अभ्यास बनाना और मन को भगवान में स्थिर करना आवश्यक है।

प्रश्न 2: यदि आत्महत्या या अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति की मुक्ति के लिए कुछ करना हो, तो क्या कर सकते हैं?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु आत्महत्या या अन्य कारण से हुई हो और परिवार उसके कल्याण के लिए कुछ करना चाहता हो, तो धार्मिक अनुष्ठान, भगवान के नाम का कीर्तन और संतों की सेवा जैसे कार्य किए जा सकते हैं।

महाराज जी विशेष रूप से श्रीमद्भागवत के सप्ताह-पारायण का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार, धर्मग्रंथों का पाठ और भगवान के नाम का कीर्तन करके उसका पुण्य उस जीवात्मा के कल्याण के लिए समर्पित किया जा सकता है। साधु-संतों की सेवा और भोजन की व्यवस्था जैसे पुण्यकर्म भी किए जा सकते हैं।

वे श्रीमद्भागवत में वर्णित धुंधकारी का प्रसंग सुनाते हैं। धुंधकारी अपने पापपूर्ण कर्मों के कारण प्रेतयोनि को प्राप्त हुआ था। उसके भाई गोकर्ण जी ने उसके कल्याण का उपाय जानने के लिए भगवान सूर्य से मार्गदर्शन प्राप्त किया। उन्हें श्रीमद्भागवत का श्रवण कराने का उपाय बताया गया। महाराज जी के वर्णन के अनुसार, सात दिनों तक श्रीमद्भागवत सुनने के बाद धुंधकारी प्रेतयोनि से मुक्त होकर भगवान के पार्षद स्वरूप को प्राप्त हुआ।

इस प्रसंग के माध्यम से महाराज जी भगवान के नाम, श्रीमद्भागवत के श्रवण और पुण्यकर्मों के महत्त्व को समझाते हैं।

महाराज जी का मार्गदर्शन है कि दिवंगत व्यक्ति के कल्याण की भावना से श्रीमद्भागवत का पाठ, नामकीर्तन और संत-सेवा करें तथा इनका पुण्य उसके लिए समर्पित करें।

प्रश्न 3: कहा जाता है कि जो दीन है, वही अनन्य है; तो दीन कौन होता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि यहाँ दीन होने का अर्थ गरीब या धनहीन होना नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से दीन वह है, जिसके भीतर अहंकार नहीं है और जो स्वयं को दूसरों से बड़ा नहीं समझता।

मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार के अभिमान हो सकते हैं। कोई अपने धन पर गर्व करता है, कोई विद्या पर, कोई पद पर और कोई अपने परिवार या सामर्थ्य पर। महाराज जी के अनुसार, यही अहंकार मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप से दूर रखता है और दुःख का कारण बनता है।

जब भगवान के भजन, सत्संग और शास्त्रों के स्वाध्याय से यह समझ विकसित होती है कि भगवान सभी में विराजमान हैं, तब व्यक्ति के भीतर का अहंकार धीरे-धीरे कम होने लगता है। वह दूसरों को छोटा समझने के बजाय सबके प्रति सम्मान और प्रेम का भाव रखने लगता है।

महाराज जी दीनता के लक्षण बताते हुए समझाते हैं कि भक्त को स्वयं को तिनके से भी छोटा समझना चाहिए, वृक्ष के समान सहनशील होना चाहिए और दूसरों को सम्मान देना चाहिए। स्वयं अपने लिए मान-सम्मान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

सच्ची दीनता केवल बोलने या दिखावा करने से नहीं आती। यदि कोई अपमान कर दे और भीतर क्रोध तथा अहंकार जाग उठे, तो साधक को अपने मन की स्थिति पर विचार करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि दीनता अहंकार का अभाव है। जितना नामजप और भगवत्-चिंतन बढ़ेगा, उतना ही अपने आपको बड़ा मानने का भाव घटेगा और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम विकसित होगा।

प्रश्न 4: क्या भूल-चूक से प्राप्त बुद्धि का नाश भी प्रारब्ध के कारण हो सकता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न में समझाते हैं कि भगवत्-कृपा से प्राप्त आध्यात्मिक समझ और अनुभव का उद्देश्य स्वयं का तथा दूसरों का मंगल करना है। इसलिए किसी आध्यात्मिक स्थिति या समझ को नष्ट करने की चिंता करने के बजाय साधक को अपने भजन और आचरण पर ध्यान देना चाहिए।

महाराज जी प्रश्नकर्ता को समझाते हैं कि यदि यह विचार आता है कि सब कुछ भगवान की लीला है और सभी में वही परमात्मा विराजमान हैं, तो इस बात को केवल बुद्धि से मान लेना पर्याप्त नहीं है। उस अवस्था को अपने वास्तविक अनुभव में उतारना भी आवश्यक है। जब तक यह स्थिति जीवन में पूरी तरह प्रकट नहीं होती, तब तक दुःख, सुख और दूसरी परिस्थितियों का प्रभाव अनुभव होता रह सकता है।

महाराज जी बार-बार नामजप करने और गलत आचरणों का त्याग करने पर जोर देते हैं। उनके अनुसार, नामजप में बहुत सामर्थ्य है और निरंतर भजन से साधक को ऐसा ज्ञान मिलता है, जिससे उसकी उलझनें धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं।

वे प्रारब्ध को पूर्व में किए गए कर्मों का फल बताते हैं। लेकिन यह भी समझाते हैं कि यदि साधक दृढ़तापूर्वक भगवान का भजन करता है, तो उसका प्रभाव बहुत शक्तिशाली हो सकता है। इसलिए प्रारब्ध के भय से साधना छोड़ना उचित नहीं है।

महाराज जी की सीख है कि आध्यात्मिक समझ को लेकर अनावश्यक तर्क-वितर्क में न उलझें। भगवान का नाम जपें, अनुचित आचरण छोड़ें और जो परिस्थितियाँ प्राप्त हों, उनमें संतोष रखते हुए भजन करते रहें।

प्रश्न 5: क्या भगवान के दर्शन इन्हीं आँखों से होते हैं, या वे कोई विशेष दृष्टि प्रदान करते हैं?

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि भगवान के साक्षात्कार में हृदय के प्रेम और आंतरिक दृष्टि का विशेष महत्त्व है। वे समझाते हैं कि जिस प्रकार आत्मतत्त्व को समझने के लिए केवल बाहरी आँखें पर्याप्त नहीं हैं, उसी प्रकार भगवान के वास्तविक स्वरूप को अनुभव करने के लिए हृदय में प्रेम की दृष्टि विकसित होना आवश्यक है।

महाराज जी कहते हैं कि जब हृदय में प्रेम के नेत्र खुलते हैं, तब साधक को भगवान का साक्षात्कार होता है। इसके बाद बाहरी दृष्टि से संसार को देखने पर भी उसे भगवान की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। उसके लिए भगवान केवल मंदिर की मूर्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समस्त संसार में उनकी सत्ता दिखाई देने लगती है।

वे सोने से बने कंगन और हार का उदाहरण देते हैं। नाम और आकार अलग-अलग होने पर भी दोनों का मूल तत्त्व सोना ही है। इसी तरह संसार में जड़ और चेतन अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन तत्त्व की दृष्टि से उनमें परमात्मा की सत्ता विद्यमान है।

महाराज जी के अनुसार, भगवान सबमें विराजमान हैं और फिर भी सबसे परे हैं। जो इस सिद्धांत को वास्तविक अनुभव में समझ लेता है, उसकी दृष्टि बदल जाती है।

इसलिए भगवान के दर्शन को केवल बाहरी आँखों से दिखाई देने वाले किसी दृश्य तक सीमित नहीं समझना चाहिए। महाराज जी की सीख है कि भगवान के नाम का जप करें, हृदय में प्रेम विकसित करें और ऐसी दृष्टि प्राप्त करने का प्रयास करें, जिसमें समस्त संसार में भगवान की उपस्थिति का अनुभव हो।

प्रश्न 6: अपने इष्ट में पूर्ण शरणागति और सभी आसक्तियों का समर्पण कैसे करें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, अपने इष्ट में पूर्ण शरणागति प्राप्त करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन निरंतर नामजप है। जितना अधिक भगवान के नाम का जप होगा, उतना ही संसार के प्रति वैराग्य और भगवान के प्रति प्रेम बढ़ने की संभावना होगी।

महाराज जी भोजन का उदाहरण देते हैं। जैसे भोजन का प्रत्येक कौर शरीर को तृप्ति प्रदान करता है, वैसे ही भगवान के नाम का निरंतर जप साधक के भीतर परिवर्तन लाता है। नामजप से संसार की आसक्ति कम होने लगती है और भगवान के स्वरूप का ज्ञान विकसित होता है।

लेकिन वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल माला फेरना पर्याप्त नहीं है, यदि व्यक्ति साथ-साथ मनमाना और अनुचित आचरण करता रहे। साधक को अपनी इंद्रियों पर संयम रखना चाहिए और सुख-दुःख, मान-अपमान तथा निंदा-स्तुति जैसी परिस्थितियों में संतुलित रहने का प्रयास करना चाहिए। किसी के प्रति द्वेष, घृणा या नफरत नहीं रखनी चाहिए।

महाराज जी गुरु के प्रति निष्ठा और उनकी आज्ञा का पालन करने की सामर्थ्य के लिए भी भगवान से प्रार्थना करने की सलाह देते हैं। जब भगवान की कृपा से भीतर दृढ़ता आती है, तब साधक कठिन परिस्थितियों में भी अपने इष्ट और गुरु के प्रति निष्ठावान रह सकता है।

इसलिए पूर्ण शरणागति केवल शब्दों से नहीं आती। इसके लिए निरंतर भजन, पवित्र आचरण, संयम और भगवान के प्रति सच्ची लगन आवश्यक हैं।

महाराज जी की सीख है कि खूब नामजप करें, गलत प्रवृत्तियों का त्याग करें और भगवान से प्रार्थना करें कि वे आपको अपने इष्ट के चरणों में दृढ़ निष्ठा तथा पूर्ण शरणागति प्रदान करें।

प्रश्न 7: गुरु की दृष्टि में आने और दूर से गुरु मानकर नामजप करने में क्या अंतर है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि गुरु को केवल मन से स्वीकार कर लेना और उनके मार्गदर्शन के अनुसार वास्तव में जीवन जीना, दोनों में अंतर है। यदि किसी व्यक्ति ने किसी महापुरुष को अपना गुरु माना है, तो उसके उपदेशों को सुनना और अपने आचरण में उतारना भी आवश्यक है।

महाराज जी बताते हैं कि गुरु का प्रत्यक्ष सानिध्य साधक के लिए विशेष महत्त्व रखता है। गुरु के पास जाने, उनके दर्शन करने, उनके चरणों में बैठने और उनकी आज्ञा का पालन करने से साधक को अपने आचरण की कमियों को समझने तथा उन्हें सुधारने का अवसर मिलता है।

वे उदाहरण देते हैं कि किसी अनजान स्थान पर जाने के लिए मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। केवल यह मान लेने से कि कोई व्यक्ति हमारा मार्गदर्शक है, यात्रा पूरी नहीं हो जाती। उसके निर्देशों का पालन भी करना पड़ता है। इसी प्रकार गुरु को स्वीकार करने के साथ उनकी वाणी और आज्ञा को मानना भी आवश्यक है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि सभी शिष्यों के लिए हर समय गुरु के पास रहना संभव नहीं होता। ऐसे में गुरु के सत्संग को सुनना, उनके उपदेशों का पालन करना और उनसे जुड़े रहना चाहिए। लेकिन अवसर मिलने पर प्रत्यक्ष दर्शन और सानिध्य का लाभ भी लेना चाहिए।

गुरु का अनुशासन साधक को अपनी गलतियों से बचने और सही मार्ग पर चलने में सहायता करता है।

महाराज जी की मुख्य सीख है कि गुरु को केवल मानना पर्याप्त नहीं है, उनकी आज्ञा का पालन करना भी आवश्यक है। प्रत्यक्ष सानिध्य, सत्संग और गुरु-वचनों को जीवन में उतारना साधक की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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