माला-1427:क्या कोई ऐसी स्तुति है, जिसे सुनकर गर्भस्थ शिशु को शुद्ध संस्कार मिलें?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1:महाराज जी, क्या कोई ऐसी स्तुति है, जिसे सुनकर गर्भस्थ शिशु को शुद्ध संस्कार मिलें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, गर्भस्थ शिशु को आध्यात्मिक संस्कार देने के लिए भगवान के नाम का कीर्तन, उनकी लीलाओं का श्रवण और धार्मिक ग्रंथों का पाठ बहुत महत्त्वपूर्ण है। गर्भावस्था में माता जिस प्रकार का वातावरण रखती है, जिस प्रकार का चिंतन करती है और जो सुनती है, उसका प्रभाव शिशु के संस्कारों पर पड़ सकता है।

महाराज जी प्रह्लाद जी का उदाहरण देते हैं। जब उनकी माता कयाधु गर्भवती थीं, तब देवर्षि नारद जी उन्हें अपने आश्रम में ले गए। वहाँ भगवान के नाम का कीर्तन और उनकी कथा सुनने का अवसर मिला। महाराज जी बताते हैं कि प्रह्लाद जी ने गर्भ में ही भगवान के प्रति भक्ति के संस्कार प्राप्त किए।

वे अभिमन्यु का प्रसंग भी बताते हैं, जिन्होंने गर्भ में रहते हुए चक्रव्यूह भेदने की विद्या सुनी थी। इन उदाहरणों से महाराज जी गर्भावस्था में सुनने और संस्कार ग्रहण करने के महत्त्व को समझाते हैं।

इसलिए गर्भवती माता को सात्त्विक भोजन करना चाहिए, भगवान का नामजप करना चाहिए और रामायण, श्रीमद्भागवत जैसी धार्मिक कथाएँ सुननी चाहिए। राम, कृष्ण, हरि या जिस नाम में श्रद्धा हो, उसका कीर्तन भी किया जा सकता है।

महाराज जी गर्भावस्था में संयमित जीवन और शास्त्रसम्मत आचरण पर भी जोर देते हैं। परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे माता के लिए शांत और आध्यात्मिक वातावरण बनाएँ।

महाराज जी की सीख है कि गर्भस्थ शिशु के मंगल के लिए भगवान का नामजप, कीर्तन, धार्मिक कथाओं का श्रवण, सात्त्विक भोजन और पवित्र आचरण अपनाएँ। किसी एक विशेष स्तुति को ही अनिवार्य बताने के बजाय भगवान के नाम और उनकी लीलाओं से जुड़े रहने पर ध्यान दें।

प्रश्न 2: खुद के लिए कैसे जिएँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न में समझाते हैं कि सबसे पहले हमें यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि हम वास्तव में कौन हैं। सामान्यतः मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, रूप, स्त्री या पुरुष के रूप में पहचानता है और अपने जीवन का अधिकांश समय शरीर की इच्छाओं तथा सुख-सुविधाओं को पूरा करने में लगा देता है। लेकिन महाराज जी के अनुसार, हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर से अलग अविनाशी आत्मतत्त्व है।

वे बताते हैं कि जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक वह यह भी ठीक से नहीं समझ पाता कि जीवन किस उद्देश्य से जीना चाहिए। केवल अपने सुख, स्वाद और इच्छाओं के पीछे भागने से जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।

महाराज जी की दृष्टि में सार्थक जीवन वह है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के कल्याण के लिए भी जीता है। इसके लिए भगवान का नामजप करना, उनकी लीलाओं की कथा सुनना और सत्संग करना चाहिए। साथ ही, परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। माता-पिता और सास-ससुर की सेवा करें, पति-पत्नी तथा परिवार के दूसरे सदस्यों को भगवान की भावना से देखें और समाज के लोगों के प्रति भी भलाई का भाव रखें।

यदि परिवार के किसी सदस्य का व्यवहार कठोर हो, तो परिस्थितियों को सहन करने और सही ढंग से निभाने का प्रयास करना चाहिए। अपने भीतर के भय और असुरक्षा को दूर करने के लिए भगवान का आश्रय लेना भी आवश्यक है।

महाराज जी यह समझाते हैं कि स्वयं को पहचानने का अर्थ स्वार्थी बनना नहीं है। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है, तो उसके भीतर दूसरों की सेवा करने की भावना बढ़ती है।

महाराज जी की सीख है कि भगवान का नाम जपें, सत्संग सुनें और अपने परिवार तथा समाज के कल्याण के लिए जीवन जिएँ। अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करें और जीवन को केवल निजी सुख-सुविधाओं तक सीमित न रखें।

प्रश्न 3: अगर एक बार राम-नाम लेने से कल्याण हो जाता है, तो बार-बार क्यों लें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान के नाम की महिमा अपार है। नाम का एक बार उच्चारण भी कल्याणकारी हो सकता है, लेकिन नाम के प्रभाव को पूरी तरह समझने के लिए भक्त के हृदय में प्रेम, दीनता और अहंकार का क्षय होना महत्त्वपूर्ण है।

महाराज जी बताते हैं कि जब मनुष्य भगवान का नाम लेता है, लेकिन उसका मन संसार की इच्छाओं और विषयों में लगा रहता है, तो नामजप का अभ्यास अभी परिपक्व नहीं हुआ है। वे समझाते हैं कि माला हाथ में चल रही हो, मुख से नाम निकल रहा हो और मन कहीं दूसरी ओर भटक रहा हो, तो स्मरण की पूर्णता नहीं आती। नामजप का वास्तविक उद्देश्य मन, वाणी और अभ्यास को भगवान की ओर लगाना है।

वे अजामिल का उदाहरण देते हैं। जीवन के अंतिम समय में अजामिल ने अपने पुत्र को पुकारते हुए नारायण नाम का उच्चारण किया। उस समय उसका भाव पुत्र के प्रति था, फिर भी भगवान के नाम की महिमा से उसे एक विशेष अवसर मिला। इसके बाद उसने साधना की और आगे चलकर भगवत्प्राप्ति की दिशा में बढ़ा।

इस प्रसंग से महाराज जी समझाते हैं कि भगवान का नाम अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन साधक को केवल एक बार नाम लेकर रुक नहीं जाना चाहिए। उसे बार-बार सावधानी से नामजप करना चाहिए, ताकि मन शुद्ध हो और भगवान के प्रति प्रेम जागे।

वे यह भी बताते हैं कि नामजप के साथ सत्संग और प्राणिमात्र के प्रति परोपकार की भावना आवश्यक है। इन सभी का आपस में संबंध है।

महाराज जी की सीख है कि भगवान के नाम की महिमा पर भरोसा रखें और निरंतर नामजप करें। नाम को केवल गिनती या उच्चारण तक सीमित न रखें; धीरे-धीरे मन को भी भगवान के स्मरण में लगाने का प्रयास करें।

प्रश्न 4: नियम और दिनचर्या पूरी नहीं कर पाता। माता-पिता की मार के बाद भी सुधार नहीं हो रहा, क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि पुरानी आदतों और गलतियों को एक ही दिन में समाप्त कर देना आसान नहीं होता। इसलिए बार-बार स्वयं को कोसने या यह संकल्प करने के बजाय कि अब कभी गलती नहीं होगी, धीरे-धीरे अपने आचरण को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।

महाराज जी बताते हैं कि अपनी गलतियों को पहचानकर एक-एक करके उन्हें दूर करना अधिक उपयोगी है। इसके लिए आध्यात्मिक बल की आवश्यकता होती है, जो भगवान के नामजप, शास्त्रों के श्रवण, स्वाध्याय और संतों के संग से बढ़ सकता है। यदि साधक नियमित रूप से नामजप करता है, तो उसे अपनी कमजोरियों से लड़ने की शक्ति मिलती है।

महाराज जी माता-पिता के प्रति सम्मान बनाए रखने पर विशेष जोर देते हैं। वे कहते हैं कि माता-पिता डाँटें या कठोर बातें कहें, तब भी उनके प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसी परिस्थिति में हाथ जोड़कर शांत रहना और उनके चरणों में प्रणाम करना चाहिए। क्रोध में पलटकर उत्तर देने से विवाद और बढ़ सकता है।

यदि दिनचर्या का पालन नहीं हो पा रहा है, तो एक साथ बहुत सारे नियम बनाने के बजाय कुछ नियमों से शुरुआत करें। उन्हें नियमित रूप से निभाने का अभ्यास करें और फिर धीरे-धीरे दूसरे नियम अपनाएँ।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि माता-पिता को बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करने चाहिए। बच्चों के मार्गदर्शन में अनुशासन आवश्यक हो सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि उनके भीतर भय या दूरी पैदा करना।

महाराज जी की सीख है कि निराश होकर साधना न छोड़ें। नामजप, सत्संग और शास्त्रों के अध्ययन से आध्यात्मिक बल बढ़ाएँ, अपनी गलतियों को धीरे-धीरे सुधारें और माता-पिता के प्रति सम्मान बनाए रखें।

प्रश्न 5: श्रीजी को पोशाक धारण कराने में क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, श्रीजी की सेवा करते समय सबसे महत्त्वपूर्ण भाव यह होना चाहिए कि उनकी सेवा प्रेमपूर्वक और उनके सुख को ध्यान में रखकर की जा रही है। जिस प्रकार मनुष्य मौसम के अनुसार अपने शरीर के लिए आरामदायक वस्त्र और भोजन चुनता है, उसी प्रकार अपने इष्टदेव की सेवा में भी ऋतु और सुविधा का ध्यान रखना चाहिए।

महाराज जी समझाते हैं कि गर्मियों में हल्के, पतले और स्पर्श में कोमल वस्त्र धारण कराने चाहिए, जिससे श्रीजी को गर्मी न लगे। सर्दियों में ऐसे वस्त्र चुनें, जो ठंड से बचाने और आराम देने वाले हों। स्नान कराते समय पानी का तापमान भी ध्यान से जाँचना चाहिए। जैसे पानी अपने ऊपर डालने से पहले उसे हाथ से परखते हैं, वैसे ही श्रीजी के स्नान के लिए भी उचित तापमान का ध्यान रखना चाहिए।

भोग लगाते समय ऋतु के अनुकूल फल, जल, शरबत और दूसरे पदार्थ प्रेमपूर्वक अर्पित किए जा सकते हैं। महाराज जी के अनुसार, सेवा में वस्तुओं की संख्या से अधिक महत्त्व उस भाव का है, जिससे उन्हें अर्पित किया जाता है।

वे पोशाक की सफाई और देखभाल के विषय में भी सावधानी बताते हैं। यदि वस्त्र साफ है, तो उसे संभालकर दोबारा धारण कराया जा सकता है। यदि धोने की आवश्यकता हो, तो पवित्रता का ध्यान रखते हुए उसे उचित स्थान पर धोना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वस्त्र या उसका पानी अपवित्र स्थानों पर न जाए। फूलों से बने आभूषणों को दोबारा धारण कराने के विषय में भी महाराज जी ने अलग सावधानी बताई है।

पोशाक के रंग को लेकर वे कोई अनिवार्य नियम नहीं बताते। भक्त अपनी श्रद्धा और भाव के अनुसार रंग चुन सकता है।

महाराज जी की सीख है कि श्रीजी की सेवा में ऋतु, आराम, स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखें। सबसे बढ़कर, सेवा ऐसी भावना से करें कि आपके इष्टदेव को सुख मिले।

प्रश्न 6: नामजप कर रहा हूँ, फिर भी कहीं मन नहीं लग रहा। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि केवल नामजप शुरू कर देना ही पर्याप्त नहीं है; मन की अशांति के कारणों को भी समझना आवश्यक है। कई बार मन के भीतर कोई इच्छा, आसक्ति या ऐसी बात बनी रहती है, जिसे हम पहचान नहीं पाते। वही बार-बार मन को अशांत करती रहती है।

महाराज जी बताते हैं कि जब तक मन में अनावश्यक कामनाएँ बनी रहती हैं, तब तक पूर्ण शांति प्राप्त करना कठिन हो सकता है। इसलिए जीवन में संतोष का भाव विकसित करना चाहिए। भगवान जिस परिस्थिति में रखें, उसमें संतुष्ट रहने का अभ्यास करें और हर समय किसी नई वस्तु या परिस्थिति की इच्छा करते रहने से बचें।

वे यह भी समझाते हैं कि कभी-कभी भजन में रुचि बढ़ने पर संसार के सामान्य काम पहले जैसे आकर्षक नहीं लगते। फिर भी नौकरी, परिवार और दूसरी जिम्मेदारियों से उदासीन नहीं होना चाहिए। अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भगवान का नामजप जारी रखना आवश्यक है।

यदि नामजप के साथ मन अशांत रहता है, तो अपने भीतर विचार करें कि किस बात की चिंता या इच्छा बार-बार उभर रही है। नामजप को ध्यानपूर्वक करने का प्रयास करें और अपनी दिनचर्या तथा आहार पर भी ध्यान दें।

महाराज जी यह भी कहते हैं कि यदि नींद न आने जैसी शारीरिक समस्या बनी हुई है, तो उसे केवल भजन से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। शरीर में किसी प्रकार की परेशानी होने पर चिकित्सक से सलाह लेना उचित है।

महाराज जी की सीख है कि नामजप जारी रखें, मन के भीतर की इच्छाओं और आसक्तियों को पहचानें तथा संतोष का अभ्यास करें। साथ ही, अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते रहें और आवश्यकता होने पर स्वास्थ्य संबंधी सहायता भी लें।

प्रश्न 7: किसी व्यक्ति के बारे में ज्यादा सोचने पर वह सपने में आने लगता है, तो भगवान सपने में क्यों नहीं आते?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि किसी व्यक्ति के बारे में बार-बार सोचने से उसका स्वप्न में दिखाई देना सामान्य अनुभव हो सकता है, लेकिन भगवान की लीला के स्वप्न देखने की अपेक्षा मात्र से भगवान की प्राप्ति नहीं हो जाती। इसके लिए साधना, भक्ति और भगवान के स्वरूप का गहरा चिंतन आवश्यक है।

महाराज जी प्रश्नकर्ता को समझाते हैं कि भगवान की लीलाओं को सुनने और उनके बारे में विचार करने का अभ्यास बढ़ाना चाहिए। उन्होंने पूछा कि साधक ने कितनी धार्मिक कथाएँ सुनी हैं, किन ग्रंथों का अध्ययन किया है और कितना नामजप तथा कीर्तन करता है। उनका आशय था कि भगवान के स्वप्न में आने की इच्छा रखने से अधिक आवश्यक है कि साधक अपने जीवन में भजन को गहरा बनाए।

वे विशेष रूप से रामचरितमानस, रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत जैसे ग्रंथों को पढ़ने तथा उनमें वर्णित लीलाओं पर विचार करने की सलाह देते हैं। महाराज जी के अनुसार, केवल टीवी पर भगवान की लीलाओं का अभिनय देखना और वास्तविक शास्त्रीय वर्णन का अध्ययन करना एक समान नहीं है। शास्त्रों के माध्यम से भगवान की लीलाओं को समझने और उन पर चिंतन करने से साधक के भीतर पवित्रता और भक्ति बढ़ती है।

वे यह भी बताते हैं कि भगवान की लीलाओं में गहरा प्रवेश करने के लिए अपने आचरण को सुधारना आवश्यक है। केवल स्वप्न में दर्शन पाने की इच्छा रखते हुए जीवन में साधना की उपेक्षा करना उचित नहीं है।

इसलिए भगवान के दर्शन या स्वप्न को अपनी साधना का एकमात्र लक्ष्य न बनाएँ। भगवान का स्मरण, नामजप, कथा-श्रवण और पवित्र आचरण जारी रखें।

महाराज जी की सीख है कि भगवान की लीलाओं का नियमित अध्ययन करें, उनके नाम का जप करें और अपने जीवन को भक्ति के अनुकूल बनाएँ। स्वप्न में दर्शन होने या न होने की चिंता करने के बजाय साधना को गहरा करने पर ध्यान दें।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

यह भी पढ़ें: माला-1426: क्या व्रत, स्नान और तीर्थ-भ्रमण से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply