प्रश्न 1: महाराज जी,तुरीय अवस्था क्या है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य सामान्यतः तीन अवस्थाओं का अनुभव करता है—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। जाग्रत अवस्था में हम स्थूल शरीर और संसार को देखते हैं। स्वप्न अवस्था में स्थूल शरीर का विस्मरण होकर सूक्ष्म शरीर के माध्यम से स्वप्न का अनुभव होता है। सुषुप्ति यानी गहरी नींद में बुद्धि और मन की गतिविधियाँ भी लीन हो जाती हैं।
इन तीनों से अलग तुरीय अवस्था है। महाराज जी बताते हैं कि इस अवस्था में बुद्धि जाग्रत रहती है, लेकिन महापुरुष परमात्मा में स्थित रहते हैं। वे न जाग्रत अवस्था के सामान्य अनुभवों में बँधे होते हैं, न स्वप्न और न ही सुषुप्ति की अवस्था में। उनका अंतःकरण निरंतर परमात्मा में तन्मय रहता है।
महाराज जी विशेष रूप से स्पष्ट करते हैं कि तुरीय अवस्था स्वयं आत्मा नहीं है, बल्कि आत्मतत्त्व में तन्मय हुए महापुरुष की एक स्थिति है। जब मनुष्य का अंतःकरण निर्मल होता है, तब उसमें आत्मतत्त्व का बोध प्रकट होता है। इसके लिए केवल शास्त्रों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है; भजन, नामजप और सत्संग भी आवश्यक हैं।
वे दर्पण का उदाहरण देते हैं। जैसे गंदे दर्पण में अपना प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं दिखाई देता, वैसे ही मलिन मन-बुद्धि में आत्मस्वरूप का बोध नहीं हो पाता। इसलिए मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को निर्मल करना आवश्यक है।
महाराज जी की सीख है कि तुरीय अवस्था को केवल बौद्धिक चर्चा से नहीं समझा जा सकता। नामजप, भजन, सत्संग और शास्त्रों के स्वाध्याय से अंतःकरण को शुद्ध करें। साथ ही, इस विषय को और गहराई से समझने के लिए योगवाशिष्ठ का अध्ययन करने की सलाह भी दी गई है।
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प्रश्न 2: परिवार और रिश्तों में अभिमान और स्वाभिमान में कैसे फर्क करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि अभिमान और स्वाभिमान को एक जैसा नहीं समझना चाहिए। अक्सर लोग अपने परिवार, जाति, पद, प्रतिष्ठा या शरीर से जुड़ी पहचान को ही स्वाभिमान मान लेते हैं, जबकि महाराज जी के अनुसार वास्तविक स्वाभिमान का संबंध आत्मतत्त्व और धर्म से है।
वे बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति यह सोचता है कि मैं पिता हूँ, मैं बड़ा भाई हूँ, मेरा पद बड़ा है या मेरा परिवार श्रेष्ठ है, तो यह देहाभिमान और सांसारिक अहंकार के अंतर्गत आता है। ऐसे विचारों के कारण व्यक्ति अपने संबंधों में दूसरों पर अधिकार जताने लगता है और अपनी बात मनवाने के लिए क्रोध भी कर सकता है।
इसके विपरीत, स्वाभिमान का अर्थ है अपने आत्मस्वरूप और धर्म के प्रति दृढ़ रहना। यदि कोई परिस्थिति हमें धर्म के विरुद्ध जाने के लिए बाध्य करे, तो उसका विरोध करना स्वाभिमान है। अपने धर्म, भगवान और राष्ट्र के सम्मान की रक्षा के लिए दृढ़ रहना भी इसी भाव में आता है।
महाराज जी समझाते हैं कि परिवार में होने वाले विवादों में अक्सर लोग अपने अहंकार को ही स्वाभिमान का नाम दे देते हैं। यदि कोई हमारी बात न माने या हमारा अपमान कर दे, तो हम तुरंत क्रोधित हो जाते हैं। इससे बचने के लिए आध्यात्मिक बल आवश्यक है।
वे नामजप के माध्यम से इस बल को विकसित करने की सलाह देते हैं। जब कोई अपमान करे, तब तुरंत उत्तर देने या झगड़ा करने के बजाय शांत रहकर भगवान का नाम स्मरण करने का अभ्यास करना चाहिए। मान-अपमान, स्तुति-निंदा और सुख-दुःख में समान रहने की क्षमता भजन से विकसित होती है।
महाराज जी की सीख है कि परिवार, पद और शरीर से जुड़ा अहंकार स्वाभिमान नहीं है। वास्तविक स्वाभिमान धर्म और आत्मतत्त्व के प्रति निष्ठा है। नामजप करके इतना आत्मबल विकसित करें कि अपमान के समय भी विवेक और शांति बनाए रख सकें।
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प्रश्न 3: प्रभु के श्रीविग्रह में तो भगवद्-भाव हो जाता है, पर सबमें नहीं हो पाता। ऐसा क्यों?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि श्रीविग्रह में भगवान का भाव रखना अच्छी बात है, लेकिन साधना का उद्देश्य धीरे-धीरे समस्त संसार में भगवान की सत्ता को अनुभव करना भी है। इसके लिए सबसे पहले अपने वास्तविक स्वरूप को समझने और हृदय को निर्मल बनाने की आवश्यकता है।
महाराज जी पूछते हैं कि जब हम अभी तक स्वयं को ही पूरी तरह नहीं जान पाए हैं, तो दूसरों में भगवान को कैसे पहचान पाएँगे? हम सामान्यतः किसी को उसके शरीर, व्यवहार, पद और गुणों के आधार पर देखते हैं। इसी कारण किसी में अच्छाई दिखाई देती है और किसी में बुराई। लेकिन ज्ञानी महापुरुष बाहरी भेदों से आगे बढ़कर सबमें स्थित परमात्मा को देखते हैं।
वे बिजली का उदाहरण देते हैं। बिजली से पंखा चलता है, हीटर गर्मी देता है और बल्ब प्रकाश करता है। उपकरण अलग-अलग हैं और उनका काम भी अलग है, लेकिन उनमें काम करने वाली शक्ति बिजली ही है। उसी प्रकार मनुष्यों के शरीर और व्यवहार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन सभी में विद्यमान परमात्मा की सत्ता एक ही है।
महाराज जी बताते हैं कि सबमें भगवद्-भाव विकसित करने के लिए नामजप, शास्त्रों का स्वाध्याय, संतों का संग, माता-पिता की सेवा और परोपकार करना आवश्यक है। इनसे हृदय शुद्ध होता है और धीरे-धीरे सबको भगवान की दृष्टि से देखने की क्षमता विकसित होती है।
वे यह भी समझाते हैं कि किसी व्यक्ति के गलत आचरण को सही मान लेना भगवद्-भाव नहीं है। व्यक्ति के व्यवहार और उसके भीतर स्थित आत्मतत्त्व को अलग-अलग समझना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि पहले अपने हृदय को निर्मल करें, फिर सबमें भगवान की सत्ता देखने का अभ्यास करें। भगवान का नाम जपें, संतों का संग करें और सभी के प्रति परोपकार की भावना रखें।
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प्रश्न 4: काम सफल न होने पर लगता है कि हमसे भगवान के प्रति कोई त्रुटि हो गई है। क्या यह सही है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि किसी कार्य में बार-बार असफलता मिलने का अर्थ यह नहीं है कि भगवान हमसे नाराज हैं या हमने उनकी भक्ति में कोई गलती कर दी है। इसके पीछे हमारे पूर्व कर्मों का प्रारब्ध भी कारण हो सकता है।
महाराज जी बताते हैं कि जैसे किसी किसान को खेत और बीज मिलते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होते हैं। हमने पहले जो शुभ या अशुभ कर्म किए हैं, उनका प्रभाव वर्तमान जीवन में सामने आ सकता है। इसलिए कभी-कभी व्यक्ति वर्तमान में अच्छा प्रयास करता है, फिर भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिलती।
वे सलाह देते हैं कि ऐसी परिस्थिति में भगवान को दोष देने या स्वयं को भक्ति में अपराधी मानने के बजाय नामजप बढ़ाना चाहिए। भगवान का नाम, शास्त्रों का स्वाध्याय, स्तोत्रों का पाठ, तीर्थयात्रा, गंगा-स्नान और परोपकार जैसे पुण्य कार्यों से पूर्व के प्रतिकूल प्रारब्ध के प्रभाव को दबाने का प्रयास किया जा सकता है।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि कभी-कभी ऐसा दिखाई देता है कि गलत आचरण करने वाला व्यक्ति सुखी है, जबकि धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कठिनाई में है। इसका कारण यह हो सकता है कि किसी के पूर्व पुण्य का फल अभी मिल रहा हो और दूसरे व्यक्ति को पूर्व कर्मों का परिणाम भोगना पड़ रहा हो।
इसलिए असफलता आने पर निराश होकर साधना नहीं छोड़नी चाहिए। अपने प्रयास जारी रखें और भगवान के नाम का आश्रय लें।
महाराज जी की सीख है कि असफलता को भगवान की नाराजगी न समझें। अपने कर्मों को सुधारें, नामजप बढ़ाएँ, अच्छे कार्य करें और धैर्यपूर्वक प्रयास जारी रखें।
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प्रश्न 5: जब एक निहंग सिख के प्रश्न पर महाराज जी ने त्राटक और प्राणायाम की विधि बताई, तो वह क्या थी?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि कई बार साधक नामजप तो करता है, लेकिन उसका मन लगातार संसार के विचारों और इंद्रियों के सुखों में भटकता रहता है। नामजप में निरंतरता न बन पाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मन अभी किसी सांसारिक सुख में आसक्त है। इसलिए मन को एकाग्र करने के साथ-साथ उन आकर्षणों पर भी नियंत्रण करना आवश्यक है।
महाराज जी एकाग्रता बढ़ाने के लिए त्राटक और श्वास के अभ्यास का तरीका बताते हैं।
त्राटक का अभ्यास: किसी एक बिंदु को सामने रखकर उस पर दृष्टि स्थिर करें। मन में उसी बिंदु पर भगवान का नाम लिखने की भावना रखें और लगातार नामजप करते रहें। जब आँखों में जलन होने लगे, तो आँखें बंद कर लें। महाराज जी बताते हैं कि इस प्रक्रिया में आँखों से आँसू आ सकते हैं। कुछ समय बाद आँखें खोलकर फिर उसी बिंदु पर ध्यान लगाने का अभ्यास करें।
श्वास का अभ्यास: महाराज जी बारी-बारी से नासिका बदलकर श्वास लेने और छोड़ने की विधि बताते हैं। पहले बाईं नासिका से लंबी श्वास लेकर दाईं नासिका से छोड़ें। फिर दाईं नासिका से श्वास लेकर बाईं नासिका से छोड़ें। इस क्रम को दस बार करने का सुझाव देते हैं। वे इस अभ्यास को नियमित रूप से लगभग एक महीने तक करके देखने की बात कहते हैं।
महाराज जी बताते हैं कि इन अभ्यासों से एकाग्रता संचित करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ साधक को यह भी देखना चाहिए कि उसका मन किस विषय में सबसे अधिक आकर्षित होता है—देखने, सुनने, खाने या किसी दूसरे इंद्रिय-सुख में। उस आकर्षण को धीरे-धीरे कम करने का प्रयास करना चाहिए।
वे अल्पाहार करने, आसन पर बैठकर साधना करने और भोजन के स्वाद की अपेक्षा भजन को अधिक महत्त्व देने पर भी जोर देते हैं।
महाराज जी की सीख है कि नामजप के साथ एकाग्रता का अभ्यास करें और इंद्रियों को अनावश्यक सुखों में उलझने से बचाएँ। त्राटक तथा श्वास के अभ्यास को सावधानी से करें; आँखों पर जोर न डालें और श्वास को जबरदस्ती न रोकें।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।