माला-1429:मुझे प्रसिद्धि चाहिए, पर मिल नहीं रही। चाहे कुछ भी कर लूँ, क्या करूँ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,मुझे प्रसिद्धि चाहिए, पर मिल नहीं रही। चाहे कुछ भी कर लूँ, क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि यदि जीवन में सच्ची और स्थायी कीर्ति चाहिए, तो केवल प्रसिद्ध होने के पीछे भागने के बजाय भगवान के नाम में प्रेम बढ़ाना चाहिए। संसार में मिलने वाली प्रसिद्धि स्थायी नहीं होती, लेकिन भगवान के नाम और भक्ति से जुड़ा जीवन व्यक्ति के लिए वास्तविक कल्याण का मार्ग बन सकता है।

महाराज जी राधा नाम के निरंतर जप पर विशेष जोर देते हैं। वे समझाते हैं कि केवल थोड़े-से दान या कुछ बाहरी कार्यों से स्थायी यश प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। इसके लिए तपस्या, भजन और भगवान के प्रति सच्चा समर्पण आवश्यक है।

वे अपने अनुभव से बताते हैं कि सत्संग का उद्देश्य प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोगों का आध्यात्मिक कल्याण करना होना चाहिए। यदि किसी की वाणी या प्रयास से लोगों की बुरी आदतें छूटती हैं और उनके जीवन में अच्छा परिवर्तन आता है, तो वही कार्य सार्थक है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि यदि भगवान की कृपा से यश प्राप्त होना होगा, तो वह अपने समय पर हो सकता है। इसलिए नामजप करते समय मन में केवल मान-सम्मान पाने की इच्छा न रखें। भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाने का प्रयास करें।

महाराज जी की सीख है कि प्रसिद्धि के पीछे भागने के बजाय राधा नाम का खूब जप करें और अपने जीवन को भजन तथा अच्छे आचरण में लगाएँ। सच्ची कीर्ति की कामना हो, तो भगवान के नाम में प्रीति बढ़ाना अधिक महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 2: मन की शांति के लिए कोई मंत्र बता दीजिए।

उत्तर: पूज्य महाराज जी मन की शांति के लिए राधा नाम के जप की सलाह देते हैं। वे बताते हैं कि भगवान के अनेक नाम हैं और उनमें से जिस नाम के प्रति आपके हृदय में श्रद्धा तथा प्रेम हो, उसी का नियमित जप करना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि राम, कृष्ण, हरि और राधा जैसे भगवान के नामों में उद्धार करने की सामर्थ्य है। वे स्वयं राधा नाम को अपने जीवन का आधार मानते हैं और बताते हैं कि इसके जप तथा ध्यान से मन को शुद्ध करने और भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाने में सहायता मिलती है।

मन अशांत होने पर अक्सर व्यक्ति अनेक प्रकार के विचारों, इच्छाओं और चिंताओं में उलझा रहता है। नामजप का अभ्यास मन को भगवान की ओर लगाने का अवसर देता है। इसलिए इसे केवल किसी विशेष समय की क्रिया न मानकर दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए।

महाराज जी के मार्गदर्शन के अनुसार, नामजप के साथ भगवान की सेवा, साधना और सत्संग को भी जीवन में स्थान देना चाहिए। मन को शुद्ध करने के लिए अच्छे आचरण अपनाना तथा गलत प्रवृत्तियों से बचना भी आवश्यक है।

महाराज जी की सीख है कि मन की शांति के लिए श्रद्धापूर्वक राधा नाम जपें या अपने इष्टदेव के प्रिय नाम का स्मरण करें। नामजप को नियमित बनाएँ और धीरे-धीरे मन को भगवान के चिंतन में लगाने का अभ्यास करें।

प्रश्न 3: मेरे जीवन का कोई उद्देश्य दिखाई नहीं देता। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि यदि मनुष्य अपने जीवन का उद्देश्य केवल नौकरी, धन कमाने और सांसारिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने तक सीमित रखता है, तो एक समय बाद उसे जीवन खाली लग सकता है। धन कमाना और परिवार का पालन-पोषण करना आवश्यक है, लेकिन जीवन का उद्देश्य इससे आगे भी होना चाहिए।

महाराज जी प्रश्न करते हैं कि हम धन किसलिए कमाते हैं और उसके बाद जीते किसलिए हैं? यदि जीवन में भगवान का स्मरण, प्रेम और आध्यात्मिक लक्ष्य ही नहीं है, तो व्यक्ति धन कमाने और उसे खर्च करने के चक्र में उलझा रह सकता है।

वे बताते हैं कि मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने के लिए भगवान की प्राप्ति को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। यदि अभी इतनी उच्च साधना संभव नहीं लगती, तो कम-से-कम अच्छे कर्म करने और अगले जीवन में भी मनुष्य शरीर प्राप्त करने योग्य आचरण रखने का संकल्प किया जा सकता है।

महाराज जी दो कार्यों पर विशेष जोर देते हैं—भगवान का नामजप और परोपकार। यदि आपके पास थोड़े भी साधन हैं, तो उनमें से कुछ जरूरतमंदों की सहायता के लिए लगाएँ। किसी बीमार, भूखे या गरीब व्यक्ति की वास्तविक आवश्यकता पूरी करना भी परोपकार है।

इस प्रकार व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने जीवन को आध्यात्मिक दिशा दे सकता है।

महाराज जी की सीख है कि जीवन का उद्देश्य केवल धन कमाना नहीं, बल्कि भगवान की प्राप्ति और दूसरों का हित करना भी होना चाहिए। नियमित नामजप करें, परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाएँ और अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करें।

प्रश्न 4: मैं कर्मों में विश्वास रखता हूँ, फिर ऐसा क्यों कहते हैं कि वही होगा जो राम ने रचा है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि कर्म करना मनुष्य के जीवन का हिस्सा है, लेकिन मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल कर्म करके उनके सुख-दुःख रूपी फल को भोगते रहना नहीं है। भगवान की प्राप्ति के लिए कर्मों को सही भावना से करना और उन्हें भगवान को समर्पित करना भी आवश्यक है।

महाराज जी बताते हैं कि कर्म मुख्य रूप से शुभ और अशुभ होते हैं। शुभ कर्मों से सुखद फल और अशुभ कर्मों से दुःखद फल मिल सकता है। इस प्रकार जीव संसार में कर्म और उनके परिणामों के चक्र में फँसा रहता है।

वे समझाते हैं कि मनुष्य को अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटना चाहिए। माता-पिता की सेवा करना, परिवार का पालन-पोषण करना, अच्छे कार्य करना और दूसरों की सहायता करना आवश्यक है। लेकिन इन सभी कार्यों को अहंकार और स्वार्थ के बजाय भगवान के अनुकूल भावना से करना चाहिए।

महाराज जी रामायण की चौपाई “होइहि सोइ जो राम रचि राखा” का भाव समझाते हुए बताते हैं कि भगवान की व्यवस्था पर विश्वास रखना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य गलत या सही कर्म करने की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया। हमें शुभ कर्म करने, अशुभ कर्मों को छोड़ने और अपने कर्तव्यों को भगवान को समर्पित करने का प्रयास करना चाहिए।

जब व्यक्ति कर्म के फल को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं मानता और भगवान की प्राप्ति के लिए भजन करता है, तब उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है।

महाराज जी की सीख है कि कर्म करते रहें, लेकिन अहंकार और फल की आसक्ति में न उलझें। अपने कर्तव्य भगवान को समर्पित करें, परोपकार करें और नामजप के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ें।

प्रश्न 5: जीवन में जब भी कोई खुशी आती है, तो डर लगने लगता है कि कहीं कुछ बुरा न हो जाए। ऐसा क्यों होता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, सुख के समय भी भय और नकारात्मक विचार आने का एक कारण मन की अशुद्धता हो सकती है। जब मन में अनेक प्रकार की चिंताएँ और संशय बने रहते हैं, तो व्यक्ति खुशी के अवसर पर भी यह सोचने लगता है कि कहीं आगे कोई विपत्ति न आ जाए।

महाराज जी समझाते हैं कि मन की स्थिति बदलने पर परिस्थितियों को देखने का तरीका भी बदल जाता है। मन मलिन हो, तो सुख के समय भी वह दुःख की कल्पना कर सकता है। वहीं मन शुद्ध होने पर व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक दृष्टि बनाए रखने का प्रयास कर सकता है।

वे मन को निर्मल बनाने के लिए दो प्रमुख उपाय बताते हैं—भगवान का नामजप और परोपकार। नियमित नामजप से मन भगवान की ओर लगने लगता है। साथ ही, दूसरों का हित करने से व्यक्ति अपने निजी भय और स्वार्थ से बाहर निकलकर दूसरों के कल्याण के बारे में भी सोचता है।

महाराज जी सलाह देते हैं कि यदि कोई बीमार, भूखा या गरीब व्यक्ति सहायता चाहता है, तो अपनी क्षमता के अनुसार उसकी मदद करें। घर-परिवार के लोगों की सेवा करें और भगवान का नाम स्मरण करते रहें। इससे मन में भक्ति और सकारात्मकता बढ़ाने का अभ्यास होता है।

उनका संदेश यह भी है कि सुख के अवसर पर भविष्य की आशंका से वर्तमान की खुशी को नष्ट न करें। जीवन में जो अच्छा अवसर मिला है, उसके लिए भगवान के प्रति कृतज्ञता रखें।

महाराज जी की सीख है कि भय और नकारात्मक सोच से बाहर निकलने के लिए नामजप तथा परोपकार को जीवन में स्थान दें। मन को भगवान के स्मरण में लगाएँ और वर्तमान परिस्थिति में संतोष तथा कृतज्ञता का भाव बनाए रखें।

प्रश्न 6: क्या भगवद्-प्राप्ति होने पर इक्कीस पीढ़ियाँ तर जाती हैं?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस विषय में बताते हैं कि किसी व्यक्ति का सामान्य कल्याण होना और भगवद्-प्राप्ति होना अलग-अलग बातें हैं। वे समझाते हैं कि वास्तविक भगवद्-प्राप्ति अत्यंत कठिन और उच्च आध्यात्मिक अवस्था है। केवल कुछ माला जप लेने या साधना की शुरुआत कर देने से किसी को भगवत्प्राप्त महापुरुष नहीं कहा जा सकता।

महाराज जी के अनुसार, जब किसी कुल में वास्तव में भगवान को प्राप्त करने वाला भक्त उत्पन्न होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसके निजी जीवन तक सीमित नहीं माना जाता। वे शास्त्रीय मान्यता का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि ऐसे भक्त के कुल की चौदह पीढ़ियाँ आगे की और सात पीढ़ियाँ पीछे की—कुल इक्कीस पीढ़ियाँ—तर जाती हैं।

वे इस बात को समझाने के लिए परिवार को मिलने वाली विशेष सुविधाओं का उदाहरण देते हैं। जब संसार की व्यवस्था में किसी व्यक्ति के पद या उपलब्धि का लाभ उसके परिवार को मिल सकता है, तो भगवान की कृपा से भगवत्प्राप्त भक्त के कुल का कल्याण होना भी धार्मिक परंपरा में बताया गया है।

लेकिन महाराज जी यहाँ विशेष सावधानी बताते हैं कि यह बात वास्तविक भगवद्-प्राप्ति के संदर्भ में कही गई है। इसे केवल नामजप की संख्या पूरी कर लेने या अपने आपको भक्त घोषित कर देने के समान नहीं समझना चाहिए।

वे भगवान के नाम की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे भाव से भगवान के नाम में लगा रहता है, उसका जीवन और कुल धन्य माना जाता है।

महाराज जी की सीख है कि इक्कीस पीढ़ियों के कल्याण की मान्यता वास्तविक भगवद्-प्राप्ति से जुड़ी है। इसलिए केवल इस फल की इच्छा न रखें, बल्कि स्वयं नामजप, भक्ति और पवित्र आचरण में आगे बढ़ने का प्रयास करें।

प्रश्न 7: अगर अखंड सुहाग की कामना करते हुए नामजप करूँ, तो क्या भगवद्-प्राप्ति हो जाएगी?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहते हैं कि पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए अखंड सुहाग की कामना से नामजप और पूजा-पाठ करना उचित है। वे बताते हैं कि भजन, तपस्या और संयम में बहुत बल होता है। इसलिए भगवान का नाम श्रद्धापूर्वक जपना और अपने धर्म का पालन करना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार, भक्ति करने से जीवन में आध्यात्मिक बल आता है। यदि कोई स्त्री अपने पति की दीर्घायु और परिवार के मंगल की कामना से भगवान की आराधना करती है, तो वह भी भक्ति का एक भाव है। लेकिन साधना को केवल किसी एक सांसारिक इच्छा की पूर्ति तक सीमित न रखें।

नामजप करते-करते भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाने का प्रयास भी करना चाहिए। भगवान का स्मरण केवल कठिन समय में नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में नियमित रूप से बना रहना चाहिए। अपने आचरण में पवित्रता और संयम बनाए रखना भी आवश्यक है।

महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में नामजप और तपस्या की सामर्थ्य पर जोर देते हैं। उनका मार्गदर्शन है कि श्रद्धा के साथ भजन करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और साधक को अपने जीवन में भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का बल मिलता है।

महाराज जी की सीख है कि पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए भगवान का नामजप और पूजा-पाठ करें। अखंड सुहाग की कामना के साथ-साथ भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण बढ़ाने का प्रयास करें, ताकि भक्ति केवल इच्छा-पूर्ति तक सीमित न रह जाए।

प्रश्न 8: मेरी पत्नी और माता जी में नहीं बनती। दोनों में तालमेल कैसे होगा?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि गृहस्थ जीवन में माता-पिता और पत्नी, दोनों के प्रति जिम्मेदारियाँ होती हैं। पत्नी जीवनसंगिनी है, लेकिन माता-पिता ने जन्म देकर पालन-पोषण किया है। इसलिए पत्नी के कहने पर माता-पिता को छोड़ देना या उनकी सेवा से विमुख हो जाना उचित नहीं है।

महाराज जी बताते हैं कि पति को अपनी पत्नी के साथ प्रेम और सम्मान का व्यवहार करना चाहिए, लेकिन उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि माता-पिता की सेवा करना उसका कर्तव्य है। पत्नी को अपनी सुविधा के अनुसार जीवन जीने का सम्मान मिलना चाहिए, परंतु उसे पति को माता-पिता की सेवा करने से रोकना नहीं चाहिए।

वे यह भी समझाते हैं कि माता-पिता यदि वृद्धावस्था में असहाय हो जाएँ और अपनी देखभाल स्वयं न कर सकें, तो उनकी सेवा करना विशेष रूप से आवश्यक है। ऐसी स्थिति में उनके कठोर शब्दों या व्यवहार के कारण उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

हालाँकि, यदि माता-पिता स्वस्थ हैं, अपनी देखभाल स्वयं कर सकते हैं और बहू-बेटे के साथ रहने से अनावश्यक तनाव पैदा होता है, तो उनके प्रति सम्मान बनाए रखते हुए उचित दूरी रखना भी संभव है। महाराज जी यह भी कहते हैं कि माता-पिता को बहू-बेटे के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

परिवार में तालमेल बढ़ाने के लिए सभी को एक-दूसरे की परिस्थितियों और भावनाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए। विवाद बढ़ाने के बजाय शांतिपूर्वक बात करना और सेवा की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना उपयोगी हो सकता है।

महाराज जी की सीख है कि पत्नी के प्रति प्रेम बनाए रखते हुए माता-पिता की सेवा का कर्तव्य न छोड़ें। परिवार के सभी सदस्यों के साथ सम्मान और धैर्य से व्यवहार करें तथा घर में प्रेमपूर्ण वातावरण बनाने का प्रयास करें।

प्रश्न 9: पुलिस में रहते हुए भक्ति और भजन कैसे करें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की नौकरी, जिम्मेदारियाँ और परिस्थितियाँ अलग होती हैं। इसलिए हर व्यक्ति के लिए भक्ति का स्वरूप भी एक जैसा नहीं हो सकता। पुलिस में कार्य करने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं कि वह रोज कई घंटे बैठकर पूजा ही करे। वह अपनी ड्यूटी निभाते हुए भी भगवान का नाम स्मरण कर सकता है।

महाराज जी के अनुसार, पुलिसकर्मी का सबसे महत्त्वपूर्ण कर्तव्य कानून के अनुसार काम करना, दोषियों को दंड देना और निर्दोषों की रक्षा करना है। यदि कोई अधिकारी दबाव डालकर गलत काम करवाना चाहे या कोई व्यक्ति रिश्वत देकर अनुचित लाभ लेना चाहे, तो ऐसे प्रलोभन और भय से बचना चाहिए।

वे स्पष्ट करते हैं कि किसी निर्दोष को दंड देना और दोषी को धन के लालच में छोड़ देना अनुचित है। अपने पद और अधिकारों का उपयोग धर्म तथा कानून के अनुसार करना चाहिए। यही अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाने का मार्ग है।

महाराज जी बताते हैं कि अपनी जिम्मेदारियों को सही ढंग से निभाते हुए नामजप करना भी भक्ति है। ड्यूटी के दौरान हर समय माला लेकर बैठना संभव नहीं होता, लेकिन मन में भगवान का नाम स्मरण किया जा सकता है।

वे गलत आचरणों से बचने और जीवन को पवित्र रखने पर भी जोर देते हैं। मांस, मदिरा और दूसरे अनुचित व्यवहारों से दूरी बनाए रखते हुए अपने कर्तव्य को ईमानदारी से करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि पुलिस की ड्यूटी को भी सेवा और कर्तव्य की भावना से निभाएँ। रिश्वत, दबाव और भय के कारण गलत काम न करें, निर्दोषों की रक्षा करें और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भगवान का नाम स्मरण करते रहें।

प्रश्न 10: अगर जन्म-मृत्यु पहले से तय है, तो फिर अकाल मृत्यु का क्या रहस्य है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस विषय में समझाते हैं कि जीवन में जन्म और मृत्यु की अवधि के संबंध में धार्मिक मान्यता है, लेकिन उनके अनुसार अत्यंत गंभीर पाप कर्म आयु को क्षीण करने का कारण बन सकते हैं। वे बताते हैं कि अकाल मृत्यु को ऐसे कर्मों के परिणाम से भी जोड़कर देखा जाता है, जिनका प्रभाव बहुत गंभीर माना गया है।

महाराज जी गर्भहत्या, भ्रूणहत्या और हत्या जैसे गंभीर पापों का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार, मनुष्य को अपने कर्मों के परिणामों के प्रति सावधान रहना चाहिए और ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे स्वयं या दूसरों के जीवन का अहित हो।

वे भगवान के चरणामृत की महिमा का भी उल्लेख करते हैं। महाराज जी की धार्मिक शिक्षा के अनुसार, श्रद्धापूर्वक चरणामृत ग्रहण करना और भगवान का स्मरण करना शुभ माना गया है। वे प्रतिदिन भगवान का चरणामृत ग्रहण करने की सलाह देते हैं और इसे आध्यात्मिक कल्याण से जोड़ते हैं।

इस प्रसंग का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने जीवन को पवित्र बनाए रखने, गलत कर्मों से बचने और भगवान की शरण में रहने का प्रयास करना चाहिए। जीवन की अनिश्चितता को देखते हुए हर दिन भगवान के स्मरण में बिताना महत्त्वपूर्ण है।

यहाँ चरणामृत संबंधी बात को महाराज जी की धार्मिक मान्यता और श्रद्धा के संदर्भ में समझना चाहिए; इसे अकाल मृत्यु या बीमारी से बचाव की चिकित्सकीय गारंटी नहीं मानना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि गंभीर पाप कर्मों से बचें, अच्छे आचरण अपनाएँ और भगवान का नाम निरंतर स्मरण करें। जीवन की अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए अपने कर्मों को शुद्ध रखें और भगवान की शरण में रहें।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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