माला-1284: कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: हम सबका जन्म हरि नाम जपने के लिए हुआ है, लेकिन हमें लगता है कि जीवन का कोई और भी उद्देश्य होगा। मेरी जिंदगी का वास्तविक उद्देश्य (Purpose of Life) क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य संसार में केवल कर्तव्य निभाना, धन कमाना, परिवार बनाना या प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं है। ये सब जीवन के मंच पर निभाए जाने वाले पात्र हैं। वास्तविक उद्देश्य स्वयं को जानना, स्वयं को पाना और भगवान को प्राप्त करना है। महाराज जी ने संसार की तुलना एक स्वप्न से की। जैसे स्वप्न में हम अनेक संबंध, कर्तव्य, सुख और दुख अनुभव करते हैं, लेकिन जागने पर पता चलता है कि वह सब अस्थायी था, वैसे ही यह संसार भी एक प्रकार का नश्वर अभिनय है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य स्वयं को शरीर, मन, संबंध और धन समझकर भ्रम में जी रहा है। जबकि उसका वास्तविक स्वरूप सच्चिदानंद आत्मा है। हमें पिता, पुत्र, माता, पत्नी, गुरु, शिष्य आदि जो भी भूमिका मिली है, उसे पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए, लेकिन यह स्मरण भी रखना चाहिए कि हम केवल भूमिका निभा रहे हैं, वही हमारा अंतिम स्वरूप नहीं है।

महाराज जी ने समझाया कि यदि मनुष्य केवल संसार में उलझकर रह गया तो अगला जन्म भी उसी प्रकार के बंधनों में बीतेगा। लेकिन यदि वह अपने वास्तविक स्वरूप को जान ले और भगवान के नाम में लग जाए, तो जीवन सफल हो जाता है। इसलिए मनुष्य जन्म का उद्देश्य है—अपने स्वरूप का बोध, भगवान की प्राप्ति और नाम जप के द्वारा आत्मजागरण।


प्रश्न 2: महाराज जी,कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि कर्म का विषय अत्यंत सूक्ष्म है। सामान्य रूप से जो क्रियाएं मनुष्य अपनी वासनाओं, इच्छाओं, राग-द्वेष और स्वार्थ से प्रेरित होकर करता है, वे कर्म कहलाती हैं। यदि वे शास्त्र-विरुद्ध हों तो अशुभ कर्म बन जाते हैं और यदि शास्त्रानुकूल हों तो शुभ कर्म कहलाते हैं। लेकिन शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म जीव को जन्म-मरण के बंधन में रखते हैं।

विकर्म वे कर्म हैं जो शास्त्रों द्वारा निषिद्ध हैं और जो पाप तथा अधर्म की ओर ले जाते हैं। झूठ, छल, हिंसा, लोभ, अन्याय और विषय-विकारों में डूबकर किए गए कर्म विकर्म की श्रेणी में आते हैं।

अकर्म की स्थिति सबसे ऊँची है। महाराज जी ने बताया कि जब मनुष्य कर्तापन का त्याग कर देता है और यह अनुभव करता है कि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार कार्य कर रही है तथा मैं केवल साक्षी हूँ, तब कर्म होते हुए भी अकर्म हो जाते हैं। इसी प्रकार जब कोई कर्म भगवान को समर्पित करके निष्काम भाव से किया जाता है, तब वह भी बंधनकारक नहीं रहता।

अर्थात कर्म बंधन देता है, विकर्म पतन देता है और अकर्म मुक्ति की ओर ले जाता है। इसलिए साधक का लक्ष्य केवल शुभ कर्म करना नहीं, बल्कि निष्काम और भगवत समर्पित कर्म की स्थिति प्राप्त करना होना चाहिए।


प्रश्न 3: कर्म को अकर्म और कर्मयोग में कैसे बदला जा सकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि कर्म को अकर्म और कर्मयोग में बदलने का उपाय केवल बाहरी क्रिया बदलना नहीं है, बल्कि अपने भाव को बदलना है। संसार में रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करना ही पड़ता है। कोई भी एक क्षण भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। प्रश्न यह नहीं है कि कर्म करें या न करें, बल्कि यह है कि कर्म किस भाव से करें।

यदि मनुष्य कर्म करते समय यह सोचता है कि “मैं कर रहा हूँ”, “मुझे इसका फल चाहिए”, “मेरे लिए यह लाभदायक होना चाहिए”, तो वही कर्म बंधन का कारण बनता है। लेकिन यदि वही कार्य भगवान की प्रसन्नता के लिए किया जाए और उसका फल भगवान को अर्पित कर दिया जाए, तो वह कर्मयोग बन जाता है।

महाराज जी ने कहा कि परिवार की सेवा, नौकरी, व्यापार, समाज सेवा, दान, पूजा—सब कुछ भगवान को समर्पित किया जा सकता है। जब साधक यह समझ लेता है कि शरीर, मन, बुद्धि और संसार सब भगवान का है, तब उसके भीतर कर्तापन कम होने लगता है।

ऐसे कर्म भुने हुए बीज के समान हो जाते हैं। जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही भगवान को समर्पित कर्म भविष्य में बंधन उत्पन्न नहीं करते। इसलिए हर कार्य के साथ नाम जप और समर्पण जोड़ देना चाहिए। यही कर्मयोग का रहस्य है।


प्रश्न 4: क्या अकर्म को कर्मयोग भी कहा जा सकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने समझाया कि कर्मयोग और अकर्म का संबंध बहुत गहरा है। जब मनुष्य निष्काम भाव से भगवान के लिए कर्म करता है और अपने आपको कर्ता नहीं मानता, तब धीरे-धीरे उसके कर्म अकर्म की स्थिति में पहुँच जाते हैं। इसलिए उच्च दृष्टि से देखा जाए तो कर्मयोग अकर्म की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

उन्होंने कहा कि कर्मयोग का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि कर्म में रहते हुए बंधन से मुक्त होना है। एक गृहस्थ व्यक्ति भी कर्मयोगी हो सकता है यदि वह अपने कर्तव्यों को भगवान की सेवा मानकर निभाए। वहीं कोई व्यक्ति बाहरी रूप से त्यागी दिखाई दे, लेकिन भीतर फल की इच्छा रखता हो, तो वह कर्मयोगी नहीं कहलाएगा।

महाराज जी ने गीता के भाव को समझाते हुए कहा कि जो व्यक्ति सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव रखता है तथा अपने कर्मों का फल भगवान को अर्पित करता है, वही कर्मयोगी है। उसकी स्थिति धीरे-धीरे अकर्म के समान हो जाती है।

इसलिए अकर्म और कर्मयोग विरोधी नहीं हैं। कर्मयोग साधना की प्रक्रिया है और अकर्म उसकी परिपक्व अवस्था है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—जीव को कर्मबंधन से मुक्त करके भगवान की प्राप्ति कराना।


प्रश्न 5: हम कर्म की गति (कर्मणा गहनो गति) को कैसे समझ सकते हैं?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि कर्म की गति अत्यंत गहन और सूक्ष्म है। साधारण बुद्धि से कर्मों के संपूर्ण परिणाम को समझना संभव नहीं है। कई बार जो कर्म बाहर से पुण्य दिखाई देता है, वह विशेष परिस्थिति में पाप का कारण बन सकता है। और जो कर्म बाहर से कठोर या अनुचित दिखाई देता है, वह धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक भी हो सकता है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि कभी-कभी सत्य बोलना भी हानि का कारण बन सकता है और किसी की रक्षा के लिए असत्य बोलना भी पुण्य बन सकता है। इसलिए कर्म का मूल्यांकन केवल बाहरी रूप देखकर नहीं किया जा सकता।

महाराज जी ने कहा कि जब तक मनुष्य की बुद्धि शुद्ध नहीं होती, तब तक वह कर्मों की सूक्ष्मता को नहीं समझ सकता। यही कारण है कि गीता में भगवान ने बार-बार बुद्धियोग और भगवत शरणागति पर बल दिया है। नाम जप से बुद्धि शुद्ध होती है और भगवान स्वयं साधक को सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करते हैं।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि कलियुग में केवल तर्क के सहारे कर्म की गति को समझना संभव नहीं है। इसके लिए नाम जप, सत्संग, गुरु कृपा और भगवत समर्पण आवश्यक है। जब भगवान हृदय में मार्गदर्शक बन जाते हैं, तब साधक धीरे-धीरे कर्म के रहस्य को समझने लगता है।

प्रश्न 6: भक्तमाल के भक्तों जैसा भगवत प्रेम और भगवत शरणागति हमारे हृदय में कैसे जागृत हो सकती है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि भक्तमाल में वर्णित भक्तों का जीवन पढ़कर हमें आश्चर्य होता है कि उन्होंने भगवान के लिए अपना सर्वस्व कैसे समर्पित कर दिया। लेकिन यह स्थिति एक दिन में प्राप्त नहीं हुई। उसके पीछे अनगिनत जन्मों की साधना, नाम जप, सेवा, सत्संग और भगवान की कृपा कार्य कर रही थी। भगवत शरणागति का अर्थ केवल मुख से यह कहना नहीं कि “मैं भगवान का हूँ”, बल्कि वास्तव में अपने जीवन का भार भगवान को सौंप देना है।

महाराज जी ने कहा कि आज हम भगवान को भी चाहते हैं और संसार को भी नहीं छोड़ना चाहते। इसी कारण पूर्ण शरणागति नहीं आ पाती। जब तक मनुष्य को धन, मान, परिवार, प्रतिष्ठा और विषय भोगों में सुरक्षा दिखाई देती रहेगी, तब तक वह भगवान पर पूर्ण आश्रित नहीं हो सकता। शरणागति तब आती है जब साधक को अनुभव हो जाता है कि संसार में कोई भी स्थायी सहारा नहीं है।

उन्होंने बताया कि भगवत प्रेम और शरणागति का सबसे सरल साधन नाम जप है। नाम जप से हृदय शुद्ध होता है और भगवान के प्रति विश्वास बढ़ता है। सत्संग में रहने से भक्तों के जीवन से प्रेरणा मिलती है। धीरे-धीरे साधक के भीतर यह भाव जागता है कि “भगवान जो करेंगे, वही मेरे लिए सर्वोत्तम होगा।”

भक्तमाल के भक्तों का प्रेम पढ़ने के लिए नहीं, अपनाने के लिए है। यदि हम नियमित नाम जप, सेवा और समर्पण का अभ्यास करें, तो वही प्रेम और वही शरणागति हमारे हृदय में भी प्रकट हो सकती है।


प्रश्न 7: प्रेम क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि संसार में लोग जिसे प्रेम कहते हैं, वह अधिकांशतः स्वार्थ, आकर्षण या आवश्यकता पर आधारित होता है। वास्तविक प्रेम वह है जिसमें अपने सुख की नहीं, बल्कि प्रिय के सुख की चिंता हो। जहाँ लेने की इच्छा समाप्त हो जाए और केवल देने की भावना रह जाए, वहीं प्रेम प्रारंभ होता है।

उन्होंने बताया कि माता-पिता का प्रेम, मित्रता और पारिवारिक संबंध भी कई बार स्वार्थ से प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन भगवान का प्रेम और सच्चे भक्तों का प्रेम निष्काम होता है। उसमें कोई व्यापार नहीं होता। प्रेम का अर्थ है—अपने प्रिय को हर स्थिति में स्वीकार करना।

महाराज जी ने समझाया कि भगवान से प्रेम करना केवल भजन गाने या पूजा करने का नाम नहीं है। यदि भगवान हमारी इच्छा के अनुसार कार्य करें तो हम प्रसन्न रहें और यदि हमारी इच्छा पूरी न हो तो शिकायत करने लगें, तो यह प्रेम नहीं है। प्रेम का अर्थ है कि भगवान की इच्छा को अपनी इच्छा मान लिया जाए।

उन्होंने कहा कि प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण ब्रज की गोपियाँ हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण से कभी कुछ माँगा नहीं। उनका एकमात्र उद्देश्य था—कृष्ण प्रसन्न रहें। यही प्रेम की पराकाष्ठा है।

जब मनुष्य अपने सुख को भूलकर भगवान के सुख में सुख अनुभव करने लगे, तब समझना चाहिए कि प्रेम का उदय हो गया है। यही प्रेम आगे चलकर भगवत प्राप्ति का कारण बनता है।


प्रश्न 8: भगवत प्रेम की प्राप्ति कैसे होती है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि भगवत प्रेम कोई साधारण वस्तु नहीं है जिसे धन, बुद्धि या प्रयास से खरीदा जा सके। यह भगवान की कृपा से प्राप्त होने वाला दिव्य धन है। लेकिन भगवान की कृपा प्राप्त करने के कुछ साधन अवश्य हैं—नाम जप, सत्संग, सेवा और संतों की कृपा।

उन्होंने कहा कि प्रेम का बीज प्रत्येक जीव के हृदय में पहले से मौजूद है, लेकिन वह संसार की वासनाओं और इच्छाओं के नीचे दबा हुआ है। जब साधक नाम जप करता है, तो यह बीज धीरे-धीरे अंकुरित होने लगता है। जितना अधिक भगवान का स्मरण होगा, उतना ही संसार का आकर्षण कम होगा।

महाराज जी ने समझाया कि भगवत प्रेम की पहचान यह है कि साधक को भगवान के अतिरिक्त कोई वस्तु आकर्षित न करे। उसे भगवान का नाम, कथा, कीर्तन और संत संग ही सबसे प्रिय लगने लगे। यह स्थिति धीरे-धीरे आती है।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रेम प्राप्त करने के लिए प्रेमियों की संगति आवश्यक है। जैसे अग्नि के पास बैठने से गर्मी मिलती है, वैसे ही भगवत प्रेमियों के पास रहने से प्रेम का संचार होता है। इसलिए संत संग को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है।

भगवत प्रेम की प्राप्ति का रहस्य यही है—निरंतर नाम जप, संतों की सेवा, भगवान के गुणों का चिंतन और उनके प्रति निष्कपट समर्पण।


प्रश्न 9: एक संत के प्रति मुझसे दोष-दर्शन हो गया था और अब वे इस संसार में नहीं हैं। इस अपराध से मैं कैसे मुक्त हो सकता हूँ?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि संत अपराध अत्यंत गंभीर माना गया है, क्योंकि संत भगवान के प्रिय होते हैं। लेकिन यदि किसी से अज्ञानवश दोष-दर्शन हो गया हो और उसके हृदय में वास्तविक पश्चाताप हो, तो भगवान की कृपा से उसका प्रायश्चित संभव है।

उन्होंने बताया कि सबसे पहले उस अपराध को स्वीकार करना चाहिए। अपने मन में यह नहीं सोचना चाहिए कि मैंने कुछ गलत नहीं किया। विनम्रता के साथ भगवान से क्षमा माँगनी चाहिए और उस संत को हृदय से प्रणाम करना चाहिए। यदि संत इस संसार में नहीं हैं, तब भी उनका स्मरण करके क्षमा याचना की जा सकती है।

महाराज जी ने कहा कि संतों के गुणों का चिंतन करना चाहिए, उनकी निंदा नहीं। यदि पहले दोष देखा था, तो अब उनके सद्गुणों को याद करना चाहिए। नाम जप और भगवान की शरण ग्रहण करने से हृदय शुद्ध होता है और अपराध का प्रभाव कम होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में कभी किसी संत, भक्त या साधक की निंदा न करने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। संतों के विषय में सावधानी रखना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। भगवान करुणामय हैं। सच्चे पश्चाताप और नाम जप से वे साधक को अवश्य क्षमा कर देते हैं।


प्रश्न 10: दुनिया में बुराई क्यों है? भगवान ने बुराई की रचना क्यों की?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि भगवान ने संसार की रचना जीवों को कर्म करने और अनुभव प्राप्त करने के लिए की है। इस संसार में प्रकाश भी है और अंधकार भी, सत्य भी है और असत्य भी, पुण्य भी है और पाप भी। यदि केवल एक ही पक्ष होता, तो मनुष्य के पास चयन की स्वतंत्रता नहीं रहती।

उन्होंने कहा कि भगवान ने जीव को विवेक दिया है। अब यह जीव पर निर्भर है कि वह भगवान की ओर चलता है या संसार की ओर। बुराई का अस्तित्व इसलिए दिखाई देता है क्योंकि जीव अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करता है। भगवान किसी को पाप करने के लिए मजबूर नहीं करते।

महाराज जी ने समझाया कि अंधकार का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। वह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है। उसी प्रकार बुराई भी भगवान से दूर होने की स्थिति है। जैसे ही मनुष्य भगवान की ओर बढ़ता है, बुराई का प्रभाव कम होने लगता है।

उन्होंने कहा कि यदि संसार में बुराई न होती, तो अच्छाई का मूल्य भी समझ में नहीं आता। कठिनाइयाँ और चुनौतियाँ ही मनुष्य को भगवान की ओर मोड़ती हैं। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति बुराई को देखकर निराश नहीं होता, बल्कि उसे सीख के रूप में ग्रहण करता है।

अंततः महाराज जी ने कहा कि इस संसार का उद्देश्य बुराई से लड़ना भर नहीं, बल्कि भगवान को प्राप्त करना है। जो भगवान का आश्रय ले लेता है, उसके लिए संसार की बुराइयाँ भी आध्यात्मिक उन्नति का साधन बन जाती हैं।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें: माला-1281: अहंकार का नाश शीघ्र कैसे हो सकता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply