माला-1330: बचपन में बाबाजी बनना चाहता था, पर नहीं बन पाया। क्या यह मेरा प्रारब्ध था? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1. महाराज जी,बचपन में बाबाजी बनना चाहता था, पर नहीं बन पाया। क्या यह मेरा प्रारब्ध था?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट कहते हैं कि भगवत्प्राप्ति प्रारब्ध पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प पर निर्भर करती है। वे बताते हैं कि यह नहीं सोचना चाहिए कि यदि भाग्य में लिखा होगा तभी भगवान मिलेंगे। भगवान की प्राप्ति किसी के प्रारब्ध में लिखी हुई नहीं होती। इसके लिए स्वयं प्रयास करना पड़ता है और उसी प्रयास से जीवन सफल बनता है।

महाराज जी अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बचपन से ही उनके मन में भगवान की प्राप्ति और संन्यास लेने की तीव्र इच्छा थी। जब वे घर छोड़कर निकले, तब परिवार ने उन्हें वापस ले जाने का पूरा प्रयास किया। पहले उनके पिताजी आए। उन्होंने समझाया और घर चलने के लिए कहा। लेकिन महाराज जी ने स्पष्ट कह दिया कि उन्हें केवल भगवान चाहिए। जब उनके पिताजी ने उनके भीतर का दृढ़ निश्चय देखा, तो उन्होंने उन्हें आशीर्वाद देकर भगवान के मार्ग पर आगे बढ़ने की अनुमति दे दी। इसके बाद उनकी माताजी भी आईं। माँ का स्नेह और आँसू किसी भी साधक की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं। फिर भी महाराज जी ने उन्हें समझाया कि यदि वे घर लौट गए, तो भगवान का निरंतर भजन संभव नहीं होगा। अंत में माताजी ने भी भारी मन से उन्हें आशीर्वाद देकर भगवान के मार्ग पर आगे बढ़ने दिया।

महाराज जी बताते हैं कि भगवान के मार्ग पर चलना कभी आसान नहीं होता। इसमें परिवार, समाज और परिस्थितियों की अनेक परीक्षाएँ आती हैं। यदि साधक हर कठिनाई को प्रारब्ध मानकर रुक जाए, तो वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएगा। भगवान की प्राप्ति के लिए दृढ़ता, त्याग और निरंतर पुरुषार्थ आवश्यक है। जब साधक अपने लक्ष्य पर अटल रहता है, तब भगवान स्वयं उसके मार्ग की बाधाओं को दूर करने लगते हैं।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी कारण से जीवन में संन्यास न मिल पाए या परिस्थितियाँ अनुकूल न हों, तो उसे केवल प्रारब्ध मानकर बैठना उचित नहीं है। मनुष्य जन्म भगवान की प्राप्ति के लिए मिला है। इसलिए जहाँ हैं, वहीं से भगवान का भजन, नाम-जप और पुरुषार्थ शुरू करना चाहिए। दृढ़ निश्चय के साथ किया गया प्रयास ही अंततः साधक को भगवान तक पहुँचाता है। यही इस प्रश्न का वास्तविक उत्तर है।


प्रश्न 2. यह संसार स्वप्न-सा लग रहा है। क्या यह मन का खेल है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी साधक को संसार स्वप्न जैसा अनुभव होने लगे, तो केवल इसी अनुभव के आधार पर यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसे आत्मबोध हो गया है। सबसे पहले उसे अपने जीवन को देखना चाहिए कि उसके भीतर वास्तव में कितना परिवर्तन आया है। यदि मन में अभी भी भोगों की इच्छा, मान-सम्मान की चाह, पद, धन या अन्य प्रकार की कामनाएँ बनी हुई हैं, तो यह अनुभव अभी पूर्ण नहीं माना जा सकता। केवल कुछ समय के लिए संसार स्वप्न जैसा लगना अंतिम आध्यात्मिक अवस्था नहीं है।

महाराज जी प्रश्नकर्ता से पूछते हैं कि वह भगवान का नाम कितनी देर जपता है। जब उत्तर मिलता है कि समय-समय पर नाम-जप होता है, तब महाराज जी अभ्यास बढ़ाने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि निरंतर नाम-जप और सत्संग से साधक का मन धीरे-धीरे भगवान में स्थिर होने लगता है। उसी समय संसार का वास्तविक स्वरूप समझ में आने लगता है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि साधना से प्राप्त होने वाला अनुभव है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि ज्ञानी और भक्त दोनों ही अपने को कर्ता नहीं मानते। ज्ञानी यह अनुभव करता है कि प्रकृति के गुण अपना कार्य कर रहे हैं, जबकि भक्त यह मानता है कि भगवान की इच्छा से सब कुछ हो रहा है। लेकिन यह अवस्था तभी आती है, जब मन की कामनाएँ समाप्त हो जाएँ और साधक का चित्त भगवान में स्थिर हो जाए। यदि मन अभी भी विषयों में आकर्षित हो रहा है, तो साधना को और गहरा करने की आवश्यकता है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य जन्म का उद्देश्य इसी सत्य को अनुभव करना है। इसके लिए केवल विचार करना पर्याप्त नहीं है। निरंतर नाम-जप, सत्संग और भगवान का स्मरण करते हुए साधना करते रहना चाहिए। जब भगवान की स्मृति दृढ़ हो जाती है, तब मन की वृत्तियाँ भगवान में स्थिर होने लगती हैं और संसार वास्तव में स्वप्नवत अनुभव होने लगता है। यही साधना की परिपक्व अवस्था है।

प्रश्न 3. मृत्यु को महोत्सव में कैसे बदला जा सकता है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि मृत्यु से वही व्यक्ति डरता है, जिसने अपने जीवन का आधार शरीर, परिवार, धन और सांसारिक सुखों को बना लिया है। जब मनुष्य का प्रेम केवल शरीर और उससे जुड़े संबंधों में होता है, तब मृत्यु उसे सब कुछ छिन जाने जैसी प्रतीत होती है। लेकिन जिसने अपना जीवन भगवान को समर्पित कर दिया है और भगवान को ही अपना सबसे प्रिय मान लिया है, उसके लिए मृत्यु भय का कारण नहीं रहती। वह उसे अपने प्रभु से मिलने का अवसर समझता है।

महाराज जी एक सुंदर उदाहरण देकर समझाते हैं कि यदि किसी व्यक्ति का अपना प्रिय किसी कठोर रूप में भी सामने आए, तो वह उससे नहीं डरता, क्योंकि वह जानता है कि यह मेरा अपना है। ठीक इसी प्रकार जब साधक भगवान को अपना सर्वस्व मान लेता है, तब मृत्यु भी उसे भगवान का ही एक स्वरूप दिखाई देती है। वह यह नहीं सोचता कि अब सब समाप्त हो जाएगा, बल्कि यह अनुभव करता है कि अब अपने प्रभु से मिलने का समय आ गया है। यही भाव मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि वास्तव में मृत्यु किसी की नहीं होती। केवल यह पंचभौतिक शरीर नष्ट होता है। आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। शरीर अपने तत्वों में मिल जाता है और जीव अपने संस्कारों के अनुसार आगे की यात्रा करता है। इसलिए जिस व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है, वह मृत्यु को अंत नहीं मानता। उसके लिए यह केवल एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश है। यही समझ मृत्यु के भय को समाप्त कर देती है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि केवल प्रवचन सुन लेने से मृत्यु का भय समाप्त नहीं होता। जब तक भगवान के प्रति सच्चा प्रेम और निरंतर स्मरण नहीं होगा, तब तक मन के भीतर कहीं न कहीं डर बना रहेगा। इसलिए जीवन भर भगवान का नाम जपना, उनका चिंतन करना और उन्हें अपना सबसे प्रिय बनाना चाहिए। जब यह प्रेम दृढ़ हो जाता है, तब मृत्यु वास्तव में महोत्सव बन जाती है, क्योंकि उस समय साधक के मन में भय नहीं, बल्कि भगवान से मिलने का आनंद होता है। यही मृत्यु को महोत्सव बनाने का वास्तविक मार्ग है।


प्रश्न 4. श्रीमद्भगवद्गीता के इस एक श्लोक से भगवत्-प्राप्ति निश्चित है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि साधक भगवान के उस उपदेश को अपने जीवन में उतार ले, जिसमें भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति निरंतर उनका चिंतन करता है, उसका योग-क्षेम स्वयं भगवान संभालते हैं, तो उसके जीवन की दिशा बदल सकती है। महाराज जी समझाते हैं कि भगवान सर्वज्ञ हैं। इसलिए उनसे बार-बार सांसारिक वस्तुएँ माँगने की आवश्यकता नहीं है। यदि मनुष्य पूरे विश्वास के साथ भगवान का आश्रय ले ले, तो भगवान उसकी आवश्यकताओं की स्वयं व्यवस्था करते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि इस श्लोक का सार केवल पढ़ लेना नहीं, बल्कि उसे जीवन का अभ्यास बनाना है। अनन्य चिंतन का अर्थ है कि मन बार-बार भगवान की ओर लौटे। इसके लिए निरंतर नाम-जप सबसे सरल और प्रभावी साधन है। जब साधक श्वास-प्रश्वास के साथ भगवान का नाम जोड़ देता है, तब धीरे-धीरे भगवान का स्मरण स्वाभाविक बनने लगता है। जैसे-जैसे स्मरण बढ़ता है, वैसे-वैसे भगवान के प्रति प्रेम और उनसे मिलने की व्याकुलता भी बढ़ने लगती है। यही तीव्र भक्ति का वास्तविक स्वरूप है।

महाराज जी आगे समझाते हैं कि केवल बाहरी पूजा-पाठ या धार्मिक क्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं। यदि मन संसार की इच्छाओं, राग-द्वेष और अहंकार में उलझा रहे, तो लंबे समय तक साधना करने पर भी भगवान का आनंद अनुभव नहीं होता। इसलिए बाहरी साधना के साथ मन को भी भगवान की ओर लगाना आवश्यक है। अपने प्रत्येक कर्तव्य को भगवान की पूजा समझकर करना, अधर्म से दूर रहना और हर परिस्थिति में भगवान का स्मरण बनाए रखना ही इस श्लोक का वास्तविक पालन है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम, सत्संग और महापुरुषों का संग साधना को स्थिर बनाते हैं। जब साधक कुसंग से बचते हुए भगवान के स्मरण में जीवन बिताता है, तब उसका मन धीरे-धीरे भगवान में ही स्थित हो जाता है। ऐसी अवस्था में भगवान की प्राप्ति किसी दूर की बात नहीं रह जाती, बल्कि साधक के जीवन का स्वाभाविक परिणाम बन जाती है। इसलिए केवल श्लोक का ज्ञान नहीं, बल्कि उसके अनुसार जीवन जीना ही भगवत्प्राप्ति का वास्तविक मार्ग है।

प्रश्न 5. अगर प्राण वृंदावन में छूटें, तो क्या कल्याण हो जाएगा?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि वृंदावन कोई साधारण स्थान नहीं, बल्कि भगवान का दिव्य धाम है। इसका अपना आध्यात्मिक प्रभाव है। जिस प्रकार पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है, उसी प्रकार वृंदावन धाम भी अपने प्रभाव से जीव का कल्याण करने की सामर्थ्य रखता है। इसलिए यदि किसी का अंतिम समय वृंदावन में आता है और वहीं उसके प्राण निकलते हैं, तो यह अत्यंत सौभाग्य की बात मानी जाती है।

महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति से अंतिम समय में भगवान का नाम भी न लिया जाए, तब भी वृंदावन धाम की महिमा ऐसी है कि वहाँ की अधिष्ठात्री श्री वृंदा सखी जीव पर कृपा करती हैं। उनके प्रभाव से जीव को भगवान का स्मरण प्राप्त होता है और उसका मंगल होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि केवल अंतिम समय में वृंदावन पहुँच जाना ही पर्याप्त है। महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि वहाँ रहना भी आसान नहीं है। वृंदावन में रहते हुए भी मन बार-बार परिवार, पुराने संबंधों और संसार की ओर खींचता है। इसलिए धामवास तभी सफल होता है, जब साधक वहाँ रहते हुए निरंतर भगवान का नाम जपे और अपने मन को संसार से हटाकर भगवान में लगाए।

महाराज जी आगे समझाते हैं कि यदि किसी को वृंदावन में रहने का अवसर मिला है, तो उसे इस अवसर का सम्मान करना चाहिए। छोटी-छोटी कठिनाइयों या मोह के कारण धाम छोड़कर नहीं जाना चाहिए। जीवन में कितना भी कष्ट आए, फिर भी भगवान के धाम का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि यह अवसर बार-बार नहीं मिलता। यदि कोई वृंदावन में नहीं रह सकता, तो भी उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। वह जहाँ भी रहे, भगवान का नाम कभी नहीं छोड़े। भगवान का नाम, भगवान का स्वरूप, उनकी लीलाएँ और उनका धाम—इनमें से किसी एक का भी सच्चे मन से आश्रय लेने वाला अंततः भगवान तक पहुँच जाता है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि वृंदावन में शरीर छोड़ना निश्चित ही महान सौभाग्य है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि जीवन भर भगवान का नाम, स्मरण और भजन चलता रहे। यदि नाम और भजन जीवन का आधार बन जाएँ, तो भगवान स्वयं साधक का कल्याण कर देते हैं। यही वृंदावन धाम की वास्तविक महिमा है।


प्रश्न 6. क्या प्रारब्ध के क्षय होने के बाद ही श्रद्धा में वृद्धि होती है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट शब्दों में देते हैं कि श्रद्धा का प्रारब्ध से कोई संबंध नहीं है। प्रारब्ध केवल हमारे पूर्व जन्मों के पाप और पुण्य के अनुसार मिलने वाले सुख-दुःख से जुड़ा होता है। लेकिन भगवान में श्रद्धा, विश्वास, भजन, वैराग्य और भगवत्प्राप्ति जैसी बातें प्रारब्ध से नहीं मिलतीं। इन्हें मनुष्य अपने वर्तमान जीवन में सत्संग, भगवान की कृपा और स्वयं के पुरुषार्थ से प्राप्त करता है।

महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य जन्म मिलना और संतों का सत्संग प्राप्त होना भगवान की विशेष कृपा है। अब यह साधक पर निर्भर करता है कि वह उस अवसर का कितना लाभ उठाता है। यदि वह श्रद्धा के साथ सत्संग सुनता है, भगवान का नाम जपता है और अपने आचरण को पवित्र रखता है, तो उसकी श्रद्धा और विश्वास लगातार बढ़ते जाते हैं। इसके विपरीत यदि मनुष्य कुसंग में पड़ जाए या गलत आचरण अपनाए, तो श्रद्धा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। इसलिए श्रद्धा को सुरक्षित रखना और उसे निरंतर बढ़ाना साधक की जिम्मेदारी है।

महाराज जी आगे समझाते हैं कि श्रद्धा बढ़ने पर विश्वास उत्पन्न होता है और विश्वास से भगवान का अनुभव होने लगता है। यदि विश्वास दृढ़ हो जाए कि भगवान हर जगह हैं, हर समय हमारी रक्षा कर रहे हैं और उनका नाम सब कुछ करने में समर्थ है, तो साधक का मन भटकना बंद हो जाता है। फिर वह इधर-उधर ज्ञान खोजने के बजाय एक मार्ग पर स्थिर होकर आगे बढ़ता है। यही स्थिर विश्वास उसे भगवान की ओर ले जाता है।

अंत में महाराज जी एक प्रसंग सुनाकर बताते हैं कि निष्कपट श्रद्धा कितनी बड़ी शक्ति होती है। वे समझाते हैं कि जहाँ तर्क की सीमा समाप्त हो जाती है, वहाँ श्रद्धा भगवान तक पहुँचा देती है। इसलिए साधक को अधिक तर्क-वितर्क में उलझने के बजाय भगवान, गुरु और संतों के वचनों पर विश्वास रखते हुए भजन करना चाहिए। ऐसी श्रद्धा ही अंततः भगवान के साक्षात्कार का मार्ग बनती है।

प्रश्न 7. कभी-कभी सेवा के नाम पर प्रपंच में फँस जाते हैं; तो कैसे जानें कि यह सही है या नहीं?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि सेवा का उद्देश्य केवल भगवान को प्रसन्न करना होना चाहिए, न कि दिखावा, प्रतिष्ठा या किसी प्रकार का सांसारिक प्रपंच। यदि सेवा करते समय मन में अहंकार, लोगों से प्रशंसा पाने की इच्छा या धन जुटाने की चिंता अधिक होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि सेवा की पवित्रता कम होने लगी है। सच्ची सेवा वह है, जिसमें मन भगवान के स्मरण में रहे और कर्तव्य भगवान की पूजा समझकर किया जाए।

महाराज जी विशेष रूप से मंदिर निर्माण के विषय में कहते हैं कि यदि अपनी सामर्थ्य के अनुसार मंदिर बनाया जाए या लोग स्वयं श्रद्धा से सहयोग करें, तो उसमें कोई दोष नहीं है। लेकिन लोगों से बार-बार आग्रह करके, दबाव डालकर या भावनात्मक रूप से विवश करके धन एकत्र करना उचित नहीं है। भगवान को भव्य भवनों की आवश्यकता नहीं है। भगवान तो भक्त का प्रेम और निर्मल हृदय चाहते हैं। यदि मनुष्य अपने हृदय को भगवान का मंदिर बना ले, तो वही सबसे बड़ा मंदिर है। इसलिए बाहरी मंदिर से पहले अपने भीतर भगवान के लिए स्थान बनाना आवश्यक है।

महाराज जी आगे समझाते हैं कि परिवार की सेवा, माता-पिता की सेवा, पति-पत्नी और अन्य संबंधों का कर्तव्य निभाना भी भगवान की सेवा ही है। यदि इन कर्तव्यों से भागकर केवल पूजा-पाठ में लग जाएँ, तो यह भक्ति नहीं बल्कि कर्तव्य से पलायन होगा। भगवान चाहते हैं कि मनुष्य अपने सभी उत्तरदायित्वों का ईमानदारी से पालन करे और साथ ही उनका नाम जपता रहे। जब प्रत्येक कार्य भगवान को समर्पित भाव से किया जाता है, तब वही सेवा बन जाती है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि आज कई स्थानों पर भगवान से अधिक धन का महत्व दिखाई देने लगा है। इसलिए साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए कि कहीं उसकी भक्ति भी केवल बाहरी गतिविधियों तक सीमित न रह जाए। यदि हृदय में भगवान का स्मरण, नाम-जप और निष्काम भाव बना रहे, तो सेवा कभी प्रपंच नहीं बनती। लेकिन जहाँ भगवान पीछे और दिखावा या धन आगे आ जाए, वहाँ समझ लेना चाहिए कि सेवा का उद्देश्य बदल गया है। इसलिए पहले हृदय को भगवान का मंदिर बनाइए, फिर जो भी सेवा करें, वह अपने आप पवित्र और सफल हो जाएगी।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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