प्रश्न 1: महाराज जी,मेरे गुरु देहत्याग कर चुके हैं और उन्होंने कोई गुरु मंत्र नहीं दिया था। अब मुझे कौन-सा जाप करना चाहिए और गुरु के विषय में मेरा भाव कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि गुरु केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि गुरु एक दिव्य तत्व हैं। यदि किसी साधक के गुरु देहत्याग कर चुके हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु का संबंध समाप्त हो गया। गुरु का शरीर भले ही दिखाई न दे, लेकिन उनका कृपा स्वरूप और गुरु तत्व सदैव शिष्य के साथ रहता है। महाराज जी ने समझाया कि यदि गुरु ने कोई विशिष्ट मंत्र दिया हो तो उसे अत्यंत गोपनीय रखकर जपना चाहिए। गुरु मंत्र का सार्वजनिक उच्चारण नहीं किया जाता, क्योंकि उसकी शक्ति श्रद्धा और गोपनीयता में सुरक्षित रहती है।
उन्होंने यह भी कहा कि साधक को अपने गुरु के प्रति अटल श्रद्धा रखनी चाहिए। बार-बार नए गुरु खोजने या भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है। जिस गुरु को हृदय ने स्वीकार कर लिया, वही जीवनभर के लिए मार्गदर्शक हैं। साधक को यह भाव रखना चाहिए कि गुरु मेरे हृदय में विराजमान हैं और वही मुझे भीतर से दिशा दे रहे हैं।
महाराज जी ने विशेष रूप से वृद्धावस्था में घर छोड़कर भटकने की अपेक्षा घर में रहकर भजन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भगवान सर्वत्र हैं। यदि श्रद्धा से नाम जप किया जाए, शिव जी की आराधना की जाए और सत्संग का स्मरण रखा जाए, तो घर बैठे भी भगवत प्राप्ति का मार्ग खुल सकता है। सच्चा गुरु अपने शिष्य का कल्याण किए बिना नहीं छोड़ता।
प्रश्न 2: कुछ लोग गुरु से दीक्षा और नामदान लेने के बाद भी गलत कार्य करते हैं तथा लोगों का दिल दुखाते हैं। ऐसे लोगों को वास्तविक शिष्य माना जा सकता है या नहीं?
उत्तर:
महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि केवल कंठी पहन लेने, तिलक लगा लेने या कान में मंत्र ले लेने से कोई व्यक्ति सच्चा शिष्य नहीं बन जाता। वास्तविक शिष्य वह है जो मन, वचन और कर्म से गुरु की आज्ञा का पालन करे। यदि कोई व्यक्ति गुरु का नाम तो लेता है, लेकिन उसका व्यवहार लोगों को दुख देने वाला है, तो वह अभी शिष्यत्व के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाया है।
महाराज जी ने कहा कि सच्चा चेला वही है जो गुरु की निंदा न होने दे, अपने आचरण से समाज को प्रेरणा दे और गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चले। यदि कोई व्यक्ति गुरु बनाकर भी पाप कर्म करता है, तो उसका अपराध और भी गंभीर हो जाता है। क्योंकि उसके गलत आचरण से केवल उसका ही नहीं, बल्कि गुरु और संपूर्ण परंपरा का अपमान होता है।
उन्होंने समझाया कि गुरु बनाना कोई फैशन नहीं है। जब तक मनुष्य यह निश्चय न कर ले कि उसे वास्तव में गुरु की आज्ञा के अनुसार जीवन जीना है, तब तक केवल बाहरी दीक्षा का कोई विशेष लाभ नहीं होगा। महाराज जी ने चेतावनी दी कि गुरु बनाने के बाद भी मनमानी करने वाले लोग आध्यात्मिक लाभ से वंचित रह जाते हैं।
सच्चा शिष्य वही है जो अपने व्यवहार से गुरु का गौरव बढ़ाए। गुरु का सम्मान शब्दों से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से होता है।
प्रश्न 3: गीता में आत्मा को निर्विकार बताया गया है, फिर कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नरक कौन भोगता है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस गूढ़ विषय को समझाते हुए कहा कि आत्मा वास्तव में कभी दुखी नहीं होती, न उसे कोई विकार छू सकता है। आत्मा शुद्ध, चैतन्य और आनंदस्वरूप है। लेकिन जीव जब शरीर, मन और अहंकार से अपनी पहचान जोड़ लेता है, तब वह कर्मों के बंधन में फँस जाता है।
महाराज जी ने स्वप्न का उदाहरण दिया। स्वप्न में मनुष्य कभी राजा बनता है, कभी दुखी होता है, कभी मार खाता है और कभी सुख भोगता है। जबकि वास्तविक शरीर तो बिस्तर पर सुरक्षित पड़ा रहता है। उसी प्रकार आत्मा वास्तव में न स्वर्ग जाती है, न नरक। सूक्ष्म शरीर और अंतःकरण में आसक्त जीव ही कर्मों के फल का अनुभव करता है।
उन्होंने बताया कि आत्मा तो सूर्य की तरह सदा प्रकाशमान है। समस्या आत्मा में नहीं, बल्कि अज्ञान में है। जब मनुष्य स्वयं को शरीर मान लेता है, तभी सुख-दुख, पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का अनुभव शुरू होता है। यही बंधन है।
महाराज जी ने कहा कि संसार एक स्वप्न की भाँति है। जब तक ज्ञान नहीं होता, तब तक यह सब वास्तविक लगता है। लेकिन जब आत्मबोध हो जाता है, तब समझ में आता है कि आत्मा कभी बंधी ही नहीं थी। इसलिए नाम जप, सत्संग और शास्त्र चिंतन के द्वारा मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है और कर्म बंधनों से मुक्त हो सकता है।
प्रश्न 4: शारीरिक अस्वस्थता और आध्यात्मिक स्थिति में अंतर कैसे पहचाना जाए?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि शारीरिक बीमारी और भगवत प्रेम की अवस्था में बहुत बड़ा अंतर होता है। बाहरी रूप से दोनों में कुछ समान लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जैसे भोजन में रुचि कम होना, नींद कम होना या शरीर का कमजोर होना। लेकिन दोनों के भीतर की अनुभूति बिल्कुल अलग होती है।
जब शरीर रोगग्रस्त होता है, तब मनुष्य को पीड़ा, बेचैनी और असंतोष अनुभव होता है। जबकि भगवत प्रेम में डूबे हुए साधक को भीतर से अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। उसे संसार की वस्तुएँ फीकी लगने लगती हैं, लेकिन उसके भीतर भगवान के स्मरण का मधुर रस बढ़ता जाता है।
महाराज जी ने मीरा बाई का उदाहरण दिया। मीरा जी कई-कई दिन भोजन नहीं करती थीं, शरीर क्षीण हो जाता था, लेकिन उनके भीतर भगवत प्रेम का ऐसा आनंद था जिसे कोई वैद्य समझ नहीं सकता था। इसलिए आध्यात्मिक स्थिति को किसी मशीन या चिकित्सा परीक्षण से नहीं मापा जा सकता।
उन्होंने कहा कि साधक स्वयं अनुभव कर सकता है कि उसे रोग की पीड़ा है या भगवान के प्रेम का आकर्षण। भगवत प्रेम में मनुष्य के चेहरे पर प्रसन्नता, तेज और संतोष दिखाई देता है। जबकि रोग में मन व्याकुल रहता है। इसलिए अंतर का निर्णय बाहरी लक्षणों से नहीं, बल्कि भीतर की अनुभूति से करना चाहिए।
प्रश्न 5: यदि हम किसी की धन या अन्य प्रकार से सहायता करें, फिर भी वह हमारी कद्र न करे, तो ऐसा क्यों होता है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि दुख का कारण सामने वाले का व्यवहार नहीं, बल्कि हमारी अपेक्षा होती है। जब हम किसी की सहायता करते हैं और बदले में सम्मान, धन्यवाद या कृतज्ञता की आशा रखते हैं, तब दुख का जन्म होता है। यदि सामने वाला हमारी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार नहीं करता, तो मन में पीड़ा, क्रोध और शिकायत उत्पन्न हो जाती है।
महाराज जी ने समझाया कि वास्तव में इस संसार में कोई किसी का दाता नहीं है। देने वाला केवल भगवान है। भगवान ने हमें धन, बुद्धि, शक्ति और अवसर दिया, फिर उसी के माध्यम से किसी दूसरे की सहायता करवा दी। इसलिए यदि हमने किसी की मदद की है, तो हमें यह भाव रखना चाहिए कि भगवान ने अपने ही धन को अपने ही किसी दूसरे जीव तक पहुँचा दिया। इसमें हमारा कोई विशेष अहसान नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हमारी सहायता को याद नहीं रखता, तो भी दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। संभव है कि यह किसी पुराने जन्म का हिसाब-किताब रहा हो जो भगवान ने हमारे माध्यम से पूरा करवा दिया। यदि हम सहायता करके बार-बार यह सोचें कि उसने धन्यवाद क्यों नहीं कहा, तो हमारी सेवा का पुण्य भी कम हो जाता है।
महाराज जी ने रहीम दास जी का उदाहरण देते हुए कहा कि सच्चा दानी स्वयं को दाता नहीं मानता। वह जानता है कि देने वाला तो भगवान है। इसलिए सेवा करके भूल जाना और फल की अपेक्षा न रखना ही आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ है। ऐसा करने वाला व्यक्ति संसार में भी शांत रहता है और भगवान की कृपा का पात्र भी बनता है।
प्रश्न 6: अहंकार का नाश शीघ्र कैसे हो सकता है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि अहंकार मनुष्य का सबसे सूक्ष्म और सबसे बड़ा शत्रु है। यह केवल धन, पद और प्रतिष्ठा में ही नहीं आता, बल्कि साधना, त्याग, ज्ञान और भक्ति में भी प्रवेश कर जाता है। कोई व्यक्ति सोचता है कि मैं बड़ा ज्ञानी हूँ, मैं बड़ा त्यागी हूँ, मैं बहुत भजन करता हूँ—यह सब भी अहंकार के ही रूप हैं।
महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि अहंकार का पूर्ण नाश केवल भगवत प्रेमी संत और सद्गुरु की कृपा से होता है। मनुष्य अपने प्रयास से अहंकार को दबा तो सकता है, लेकिन जड़ से समाप्त नहीं कर सकता। क्योंकि अहंकार बहुत सूक्ष्म रूप धारण कर लेता है। यदि कोई व्यक्ति सबसे नीचे बैठ जाए, तब भी उसके मन में यह अहंकार आ सकता है कि देखो, मैं कितना विनम्र हूँ।
उन्होंने बताया कि जब साधक संतों के चरणों में बैठता है और उनके जीवन को देखता है, तब उसे अनुभव होता है कि उसके पास जो कुछ भी है, वह भगवान और गुरु की कृपा से है। यह भाव आते ही अहंकार टूटने लगता है। भक्त चरित्र पढ़ना, संतों का संग करना, गुरु की सेवा करना और नाम जप करना अहंकार नाश के प्रमुख साधन हैं।
महाराज जी ने कहा कि जब तक “मैंने किया”, “मैं कर रहा हूँ”, “मैं कर सकता हूँ” जैसी भावना बनी रहती है, तब तक अहंकार जीवित रहता है। लेकिन जब यह भाव आ जाता है कि “सब भगवान की कृपा से हो रहा है”, तब अहंकार गलने लगता है। इसलिए गुरु कृपा और संत संग ही अहंकार नाश का सबसे बड़ा उपाय है।
प्रश्न 7: आत्मा से मन का बोध होता है या मन से आत्मा का बोध होता है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि मन आत्मा को नहीं जानता, बल्कि आत्मा के प्रकाश से ही मन कार्य करता है। आत्मा वह तत्व है जो मन, बुद्धि और शरीर को प्रकाशित करता है। मन संसार की वस्तुओं को जान सकता है, शरीर की स्थिति को जान सकता है, लेकिन आत्मा को नहीं जान सकता। आत्मा तो स्वयं प्रकाशस्वरूप है।
महाराज जी ने समझाया कि जब हम कहते हैं कि “आज मेरा मन प्रसन्न है” या “आज मेरा मन अशांत है”, तो मन को जानने वाला कौन है? मन स्वयं को नहीं जान रहा, बल्कि कोई और तत्व मन की स्थिति को देख रहा है। वही आत्मा है। आत्मा मन की साक्षी है।
उन्होंने शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर का उदाहरण देकर समझाया कि जैसे कोई व्यक्ति बनियान, शर्ट और कोट पहनता है, लेकिन वह इन तीनों वस्त्रों से अलग होता है, वैसे ही आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से अलग है। मन सूक्ष्म शरीर का एक भाग है, जबकि आत्मा उससे भी परे है।
महाराज जी ने कहा कि जब मन संसार के चिंतन से हटकर भगवान के चिंतन में स्थिर हो जाता है, तब आत्मा का अनुभव होने लगता है। आत्मा को मन के द्वारा नहीं जाना जाता, बल्कि मन शांत होने पर आत्मा स्वयं प्रकाशित होती है। इसलिए नाम जप, सत्संग, शास्त्र अध्ययन और पवित्र आचरण आवश्यक हैं। इनसे मन निर्मल और शांत होता है तथा आत्मबोध का मार्ग खुलता है।
प्रश्न 8: ईश्वर या परम संत अपने पास आने वाले भक्तों के भाव देखते हैं या स्वभाव देखते हैं?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि संत और भगवान की दृष्टि सामान्य मनुष्यों जैसी नहीं होती। वे किसी व्यक्ति का बाहरी स्वभाव देखकर कृपा नहीं करते, बल्कि समदर्शी भाव रखते हैं। जैसे सूर्य सभी को समान प्रकाश देता है और वृक्ष अपनी छाया सबको समान रूप से प्रदान करता है, वैसे ही संत भी सभी जीवों पर समान कृपा बरसाते हैं।
उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति सात्विक स्वभाव का हो, कोई राजसिक हो या कोई तमसिक—संत के हृदय में सबके लिए करुणा होती है। यहाँ तक कि जो व्यक्ति संतों की निंदा करता है या बुरे भाव से उनके पास आता है, उसके प्रति भी संत के मन में द्वेष नहीं होता। संत सबमें भगवान का ही स्वरूप देखते हैं।
लेकिन महाराज जी ने यह भी स्पष्ट किया कि कृपा तो सब पर समान होती है, पर उसका लाभ हर व्यक्ति अपनी पात्रता के अनुसार प्राप्त करता है। जैसे वर्षा का जल सब पर समान रूप से गिरता है, लेकिन कोई पात्र उसे भर लेता है और कोई उल्टा पात्र होने के कारण खाली रह जाता है। उसी प्रकार दीनता, श्रद्धा और समर्पण वाला भक्त संतों की कृपा का अधिक लाभ प्राप्त करता है।
महाराज जी ने कहा कि जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर, भगवत भाव से और दीनता के साथ संतों के पास जाता है, उसके जीवन में शीघ्र परिवर्तन आता है। संतों की कृपा में कोई भेद नहीं होता, भेद केवल ग्रहण करने वाले की पात्रता में होता है। इसलिए श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण ही संत कृपा प्राप्त करने की वास्तविक कुंजी हैं।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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