माला-1280:आत्मा का निवास शरीर में कहाँ है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,यदि मृत्यु के समय मुख से “राधा” नाम न निकले, लेकिन मन में भगवान का स्मरण हो, तो क्या भगवत प्राप्ति होगी?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि भगवत प्राप्ति केवल अंतिम क्षण में मुख से नाम निकलने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस समय चित्त की स्थिति क्या है, यह अधिक महत्वपूर्ण है। यदि कोई साधक नियमित रूप से नाम जप करता रहा है और किसी कारणवश अंतिम समय में नाम मुख से नहीं निकल पाया, लेकिन उसका मन भगवान में लगा हुआ है तथा उस अवधि में उसने कोई पापकर्म भी नहीं किया, तो उसे भगवत कृपा अवश्य प्राप्त होगी। महाराज जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति “राधा” बोलकर बेहोश हो जाए और फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो बीच में कोई पापकर्म न होने के कारण उसका चित्त भगवान से जुड़ा रहेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को इस विषय में लापरवाह नहीं होना चाहिए। इसलिए बीच-बीच में नाम स्मरण करते रहना चाहिए। उन्होंने पाँच मिनट में एक बार “राधा” बोलने का नियम लेने की प्रेरणा दी। ऐसा करने से धीरे-धीरे पूरा दिन भगवान के स्मरण में बीतने लगता है। मृत्यु कब आएगी, यह किसी को ज्ञात नहीं है, इसलिए हर समय भगवान का स्मरण और नाम जप ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। भय और प्रेम, दोनों ही भगवान की ओर ले जाने वाले साधन हैं। यदि प्रेम न हो तो कम से कम यह भय बना रहे कि कहीं भगवान का स्मरण किए बिना जीवन समाप्त न हो जाए।


प्रश्न 2: आत्मा का निवास शरीर में कहाँ है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि आत्मा का विषय केवल बुद्धि और तर्क से समझने का नहीं है, बल्कि यह अनुभव का विषय है। लोग पूछते हैं कि आत्मा शरीर में कहाँ रहती है, लेकिन जिस प्रकार मन, बुद्धि और चित्त दिखाई नहीं देते, उसी प्रकार आत्मा भी किसी भौतिक स्थान पर दिखाई देने वाली वस्तु नहीं है। यदि शरीर को चीरकर देखा जाए तो मन नहीं मिलेगा, बुद्धि नहीं मिलेगी, फिर आत्मा कैसे दिखाई दे सकती है?

महाराज जी ने समझाया कि आत्मा सर्वव्यापक चेतना का अंश है। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं कि वे हृदय देश में स्थित हैं। आत्मा का संबंध भी उसी दिव्य चेतना से है। यह किसी अंग विशेष में सीमित नहीं है। आत्मा वही तत्व है जो शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार को प्रकाशित करता है। जैसे बिजली के बिना बल्ब प्रकाश नहीं दे सकता, वैसे ही आत्मा के बिना शरीर कार्य नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि आत्मा को केवल शास्त्र पढ़कर नहीं जाना जा सकता। उसके लिए भजन, नाम जप, सत्संग और भगवान की कृपा आवश्यक है। जब भगवान स्वयं कृपा करते हैं, तब साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है। इसलिए आत्मा को जानने की जिज्ञासा अच्छी है, पर उसका उत्तर केवल अनुभव में मिलता है। जितना अधिक नाम जप होगा, उतनी ही आत्म तत्व की अनुभूति प्रकट होगी।


प्रश्न 3: मोक्ष क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि मोक्ष का अर्थ केवल जन्म-मरण से छुटकारा नहीं है। वास्तविक मोक्ष वह अवस्था है जहाँ जीव संसार के राग-द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर से मुक्त होकर अपने शुद्ध आत्म स्वरूप में स्थित हो जाता है। जब मनुष्य को सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान और मित्र-शत्रु समान दिखाई देने लगें, तब वह मोक्ष के निकट पहुँच जाता है।

महाराज जी ने कहा कि मोक्ष का आनंद शब्दों में नहीं बताया जा सकता। जैसे किसी व्यक्ति को रसगुल्ले का स्वाद केवल सुनकर नहीं समझाया जा सकता, उसे स्वयं खाकर अनुभव करना पड़ता है; वैसे ही मोक्ष का आनंद भी अनुभव का विषय है। उसे केवल सुनकर या पढ़कर नहीं जाना जा सकता।

मोक्ष में जीव को ऐसा आनंद प्राप्त होता है जिसमें किसी प्रकार का दुख नहीं होता। संसार के सारे बंधन समाप्त हो जाते हैं। जैसे कोई व्यक्ति आजीवन कारावास से मुक्त हो जाए तो उसे कितना आनंद होगा, वैसे ही जीव जब संसार के बंधनों से मुक्त होता है तो उसे अनंत आनंद प्राप्त होता है। यह आनंद भगवान के स्वरूप में स्थित होने से मिलता है। इसलिए मोक्ष कोई काल्पनिक स्थिति नहीं, बल्कि परम स्वतंत्रता और परम आनंद की अवस्था है।


प्रश्न 4: मोक्ष कैसे प्राप्त होता है?

उत्तर:

महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि मोक्ष केवल चर्चा करने, प्रवचन सुनने या तर्क-वितर्क करने से प्राप्त नहीं होता। मोक्ष का मार्ग भजन, नाम जप और भगवान की कृपा से खुलता है। जब मनुष्य संसार के प्रति अपने राग को छोड़कर भगवान की ओर मुड़ता है, तब उसकी आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ होती है।

उन्होंने बताया कि संसार के विषयों में फँसा हुआ मन मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। इसके लिए निरंतर भगवान का नाम जपना आवश्यक है। नाम जप से मन शुद्ध होता है, वासनाएँ नष्ट होती हैं और भगवान के प्रति प्रेम जागता है। धीरे-धीरे साधक के भीतर आत्मज्ञान प्रकट होने लगता है। तब उसे अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव होता है।

महाराज जी ने कहा कि मोक्ष प्राप्ति के लिए साधक को भगवान की कथा सुननी चाहिए, संतों का संग करना चाहिए और अपने जीवन को धर्ममय बनाना चाहिए। केवल जानकारी एकत्रित करना पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार धन कमाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है, उसी प्रकार भगवान को प्राप्त करने के लिए भजन का परिश्रम करना पड़ता है। जितना अधिक नाम जप होगा, उतनी ही अधिक योग्यता उत्पन्न होगी और उतना ही शीघ्र मोक्ष का अनुभव होगा।


प्रश्न 5: मोक्ष प्राप्त होने के बाद पुनर्जन्म होता है या नहीं?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि वास्तविक मोक्ष प्राप्त होने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता। पुनर्जन्म का कारण कामना, वासना और देहाभिमान है। जब तक जीव संसार में किसी वस्तु से बँधा हुआ है, तब तक उसे बार-बार जन्म लेना पड़ता है। लेकिन जब भगवान की कृपा से जीव अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है और उसके समस्त बंधन समाप्त हो जाते हैं, तब जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।

महाराज जी ने गीता के लक्षणों का उल्लेख करते हुए बताया कि जब मनुष्य अहंकार, मोह, आसक्ति और द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है, तब वह मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है। ऐसी स्थिति आने पर साधक के भीतर स्वयं अनुभव होने लगता है कि अब संसार का कार्य समाप्त हो रहा है। उसे भगवान की प्राप्ति का आंतरिक संकेत मिलने लगता है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस व्यक्ति को आजीवन कारावास मिला हो और अचानक उसे मुक्त कर दिया जाए, उसकी प्रसन्नता का कोई वर्णन नहीं कर सकता। उसी प्रकार जीव जब जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होता है तो वह परम आनंद को प्राप्त करता है। तब उसे पुनः संसार में आने की आवश्यकता नहीं रहती। यही कारण है कि संत और महापुरुष भगवत प्राप्ति को जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बताते हैं और निरंतर नाम जप करने की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 6: क्या वेश (तिलक, कंठी आदि) और भाव का समन्वय आवश्यक है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि भक्ति का मूल आधार भाव है, लेकिन जब साधक किसी गुरु परंपरा से जुड़ जाता है, तब उस परंपरा के चिह्नों का सम्मानपूर्वक धारण करना भी उचित है। तिलक और कंठी कोई दिखावा नहीं हैं, बल्कि भगवान से अपने संबंध की घोषणा हैं। जैसे विवाह के बाद स्त्री मंगलसूत्र और सिंदूर धारण करने में संकोच नहीं करती क्योंकि वह अपने प्रिय से जुड़ चुकी होती है, उसी प्रकार भक्त को भी भगवान से अपने संबंध को लेकर शर्म नहीं करनी चाहिए।

महाराज जी ने कहा कि लोग चाहे कुछ भी कहें, संसार तो हर स्थिति में कुछ न कुछ कहेगा ही। यदि कोई तिलक लगाएगा तो लोग उसे बड़ा भक्त कहेंगे, और यदि नहीं लगाएगा तो किसी अन्य कारण से आलोचना करेंगे। इसलिए संसार की चिंता करने के बजाय भगवान की प्रसन्नता को महत्व देना चाहिए।

हालाँकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बाहरी वेश से भगवत प्राप्ति नहीं होती। यदि भीतर भक्ति नहीं है, तो केवल तिलक और कंठी पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन यदि गुरु ने तिलक और कंठी प्रदान की है, तो उसे सौभाग्य समझकर धारण करना चाहिए। बाहरी चिह्न और आंतरिक भाव दोनों मिलकर साधना को दृढ़ बनाते हैं।


प्रश्न 7: यदि भजन और भाव अच्छे हों तो क्या सामान्य वेश में रहकर भी साधना की जा सकती है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि भगवान को प्राप्त करने का मुख्य साधन नाम जप और शुद्ध भाव है। यदि किसी व्यक्ति का मन भगवान में लगा हुआ है और वह निरंतर नाम स्मरण करता है, तो सामान्य वेश में रहकर भी साधना संभव है। भगवान बाहरी वस्त्रों से अधिक हृदय की भावना को देखते हैं।

फिर भी महाराज जी ने समझाया कि जब कोई व्यक्ति गुरु परंपरा को स्वीकार कर लेता है, तब उसे उस परंपरा के प्रति सम्मान रखना चाहिए। तिलक और कंठी धारण करना कोई पाखंड नहीं है, बल्कि यह अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। इससे भक्त का मन भी बार-बार भगवान की ओर जाता है।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में बनावटीपन नहीं होना चाहिए। साधक को स्वाभाविक रहना चाहिए, लेकिन लोकलज्जा के कारण भगवान से जुड़े चिह्नों को छिपाना भी उचित नहीं है। यदि लोग किसी को भगवान का भक्त कहकर पुकारते हैं, तो यह अपमान नहीं बल्कि गौरव की बात है।

अंततः महाराज जी का संदेश था कि वेश से अधिक महत्वपूर्ण नाम जप और भगवान का स्मरण है। बाहरी रूप तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की भक्ति जुड़ी हो।


प्रश्न 8: सत्संग और शास्त्र सुनने के बाद भी उन्हें जीवन में पूरी तरह उतार नहीं पाता, क्या यह प्रारब्ध या पाप कर्मों का फल है?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का अत्यंत स्पष्ट उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि अपनी कमजोरी का दोष प्रारब्ध, भाग्य या भगवान पर डालना उचित नहीं है। वास्तविक कारण यह है कि मनुष्य ने अभी तक पर्याप्त भजन बल एकत्रित नहीं किया है। ज्ञान सुन लेने से जानकारी तो मिल जाती है, लेकिन उस ज्ञान को जीवन में उतारने की शक्ति नाम जप और साधना से आती है।

महाराज जी ने कहा कि बहुत लोग जानते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, फिर भी गलतियाँ करते हैं। इसका कारण ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक बल का अभाव है। जब मन विषय-विकारों से भरा होता है, तब वह सही बात जानते हुए भी गलत दिशा में चला जाता है।

उन्होंने समझाया कि यदि साधक नियमित नाम जप करे, सात्विक भोजन करे, संतों का सत्संग करे और दृढ़ निश्चय रखे, तो धीरे-धीरे उसकी कमजोरी समाप्त हो जाएगी। बार-बार गिरने का कारण भगवान नहीं, बल्कि अपनी ढिलाई और वासनाएँ हैं।

इसलिए महाराज जी ने कहा कि “प्रारब्ध ने ऐसा करा दिया” या “भगवान की इच्छा नहीं थी” जैसी बातें केवल बहाने हैं। वास्तविक उपाय है – अधिक से अधिक नाम जप और दृढ़ संकल्प।


प्रश्न 9: क्या वास्तव में प्रारब्ध मनुष्य को गलत कार्य करने के लिए मजबूर करता है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि मनुष्य अक्सर अपनी गलतियों का दोष प्रारब्ध, काल या ईश्वर पर डाल देता है, जबकि वास्तविक कारण उसकी अपनी वासनाएँ और दुर्बलताएँ होती हैं। यदि मनुष्य भीतर से किसी बुरी आदत को छोड़ना ही नहीं चाहता, तो वह बार-बार उसी में गिरता रहेगा।

उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि किसी व्यक्ति को शराब से घृणा हो, तो लाख लोग उसे पिलाने का प्रयास करें, वह नहीं पिएगा। लेकिन यदि भीतर रुचि है, तो वह स्वयं अवसर ढूँढ़ लेगा। इसी प्रकार पाप और विषय-विकार भी भीतर की स्वीकृति से चलते हैं।

महाराज जी ने कहा कि मनुष्य को भगवान ने विवेक और स्वतंत्रता दी है। वह अच्छा या बुरा, दोनों मार्ग चुन सकता है। यदि वह गलत मार्ग चुनता है, तो उसका परिणाम भी उसे ही भोगना पड़ता है। प्रारब्ध को दोष देना केवल आत्म-धोखा है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि नाम जप से मनुष्य के भीतर इतनी शक्ति आ जाती है कि वह बुराई का विरोध कर सके। जब तक यह शक्ति नहीं आती, तब तक मनुष्य अपनी कमजोरी को भाग्य का नाम देता रहता है। इसलिए समाधान प्रारब्ध को कोसना नहीं, बल्कि भजन में वृद्धि करना है।


प्रश्न 10: आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी भक्तों में ज्ञानी श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि गीता में भगवान ने चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है – आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। आर्त वह है जो संकट से मुक्ति चाहता है। अर्थार्थी वह है जो धन, सफलता या अन्य सांसारिक वस्तुएँ चाहता है। जिज्ञासु भगवान को जानना चाहता है। लेकिन ज्ञानी वह है जिसने भगवान को जान लिया है और उनके स्वरूप में स्थित हो गया है।

इसी कारण भगवान ने ज्ञानी को अपना आत्मस्वरूप कहा है। ज्ञानी के पास कोई सांसारिक कामना नहीं बचती। वह न धन चाहता है, न संकट से मुक्ति, न किसी अन्य वस्तु की प्राप्ति। उसका एकमात्र लक्ष्य भगवान हैं और वह उसी में स्थित हो चुका है।

महाराज जी ने समझाया कि आर्त और अर्थार्थी की यात्रा भी अच्छी है, क्योंकि वे भी भगवान की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन उनकी भक्ति अभी किसी इच्छा से प्रेरित है। जिज्ञासु उससे आगे बढ़ चुका है, क्योंकि वह भगवान को जानना चाहता है। और ज्ञानी सबसे ऊँची अवस्था है, क्योंकि वहाँ जानने वाला और भगवान – दोनों में भेद नहीं रह जाता।

इसलिए ज्ञानी श्रेष्ठ कहा गया है। फिर भी इन सभी अवस्थाओं तक पहुँचने का मुख्य साधन नाम जप ही है। नाम जप करते-करते अज्ञान दूर होता है और साधक अंततः ज्ञान की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न 11: ध्यान करते समय मन बार-बार इधर-उधर क्यों भटकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि मन वहीं भटकता है जहाँ हमने अपना संबंध बना रखा है। यह संबंध दो प्रकार का होता है—रागात्मक और द्वेषात्मक। जिस वस्तु, व्यक्ति या स्थान के प्रति हमारे मन में आकर्षण या विरोध होता है, मन बार-बार उसी की ओर दौड़ता है। इसलिए ध्यान के समय संसार की अनेक बातें याद आने लगती हैं। इसका कारण यह नहीं कि ध्यान गलत हो रहा है, बल्कि यह है कि मन अभी संसार से पूरी तरह हटकर भगवान में स्थिर नहीं हुआ है।

महाराज जी ने समझाया कि साधक की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह वस्तु, व्यक्ति और परिस्थितियों को भगवान से अलग मानता है। जब तक यह भेद रहेगा, मन भटकेगा। यदि साधक हर वस्तु में भगवान का दर्शन करने लगे, तो मन का भटकना कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जहाँ-जहाँ मन जाए, वहाँ-वहाँ भगवान को देखने की चेष्टा करो। संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह नश्वर है, लेकिन उसके भीतर विराजमान परम तत्व भगवान हैं।

मन का भटकना वास्तव में हमारी पुरानी आसक्तियों का परिणाम है। इसलिए साधक को निराश नहीं होना चाहिए। जितना अधिक नाम जप और भगवान का चिंतन होगा, उतना ही मन संसार से हटकर भगवान में स्थिर होने लगेगा।


प्रश्न 12: ध्यान को स्थिर करने का उपाय क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि ध्यान को स्थिर करने का सबसे बड़ा उपाय नाम जप है। बहुत लोग सीधे ध्यान में बैठना चाहते हैं, लेकिन नाम के बिना ध्यान स्थिर नहीं होता। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पहले नाम जप में मन लगाओ, फिर भगवान का रूप अपने आप प्रकट होगा। नाम और रूप का गहरा संबंध है। नाम के अधीन ही रूप का अनुभव होता है।

उन्होंने गीता के आधार पर बताया कि मन को बार-बार संसार से हटाकर भगवान में लगाना ही अभ्यास और वैराग्य है। जहाँ मन भागे, वहाँ से उसे प्रेमपूर्वक वापस भगवान के नाम में लगा दो। यही साधना है। ध्यान कोई जबरदस्ती की जाने वाली क्रिया नहीं है, बल्कि भगवान के प्रति बढ़ती हुई प्रीति का परिणाम है।

महाराज जी ने कहा कि सच्चा ध्यान वही है जिसमें साधक हर वस्तु में भगवान का दर्शन करने लगे। जब वह समझ लेता है कि समस्त जगत भगवान का ही स्वरूप है, तब मन के भटकने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सहज समाधि सबसे उच्च अवस्था है, जहाँ उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते भी भगवान का स्मरण बना रहता है।

इसलिए ध्यान की सफलता का रहस्य है—निरंतर नाम जप, अभ्यास, वैराग्य और भगवान के प्रति प्रेम। नाम जप से ही ध्यान स्थिर होता है और अंततः भगवान का साक्षात्कार भी होता है।


प्रश्न 13: यदि पहले जीवन में बहुत पाप किए हों तो क्या भगवान का नाम जप करने से वे नष्ट हो सकते हैं?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का अत्यंत आश्वस्त करने वाला उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि चाहे मनुष्य ने कितने ही बड़े पाप क्यों न किए हों, भगवान का नाम उन सबका नाश करने की सामर्थ्य रखता है। नाम कोई साधारण शब्द नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान का स्वरूप है। जिस प्रकार अत्यंत गंदे वस्त्र को शक्तिशाली साबुन साफ कर देता है, उसी प्रकार भगवान का नाम हृदय पर लगे पापों के दाग मिटा देता है।

महाराज जी ने अनेक महापुरुषों और संतों का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास में ऐसे अनेक लोग हुए जो पहले घोर पापी थे, लेकिन नाम जप के प्रभाव से महात्मा बन गए। यदि नाम में यह शक्ति न होती तो उनका परिवर्तन संभव ही नहीं था।

उन्होंने कहा कि पापों का विचार करके निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान का नाम जपने की। जितना अधिक नाम जपा जाएगा, उतना ही हृदय शुद्ध होगा और पापों का प्रभाव समाप्त होगा। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं कि उनकी शरण में आने वाले को वे समस्त पापों से मुक्त कर देते हैं।

इसलिए साधक को अपने अतीत से डरना नहीं चाहिए, बल्कि वर्तमान में नाम जप की शक्ति को अपनाना चाहिए। भगवान की कृपा असीम है और उनका नाम हर प्रकार के पाप का नाश करने वाला है।


प्रश्न 14: क्या भगवान का नाम वास्तव में बड़े-बड़े पापों का भी नाश कर सकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि भगवान का नाम वज्र के समान है। जैसे वज्र पर्वत को चूर-चूर कर सकता है, वैसे ही भगवान का नाम पर्वत के समान बड़े पापों को भी नष्ट कर सकता है। नाम की महिमा का पूर्ण वर्णन स्वयं भगवान भी नहीं कर सकते, क्योंकि नाम की शक्ति अनंत है।

उन्होंने कहा कि बहुत लोग नाम जप को साधारण समझते हैं क्योंकि उन्होंने उसका अनुभव नहीं किया। जैसे बीमार व्यक्ति को मिठाई का स्वाद कड़वा लग सकता है, वैसे ही संसार की वासनाओं में डूबे हुए मनुष्य को नाम का रस तुरंत अनुभव नहीं होता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नाम में शक्ति नहीं है। निरंतर जप करने से धीरे-धीरे हृदय शुद्ध होता है और फिर वही नाम अमृत से भी अधिक मधुर लगने लगता है।

महाराज जी ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि भगवान का नाम ऐसा आनंद देता है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। संसार के सुख सीमित हैं, लेकिन नाम का आनंद असीम है। यही कारण है कि संत और महापुरुष जीवनभर नाम जप में लगे रहते हैं।

उन्होंने अंत में कहा कि अतीत की गलतियों की चिंता छोड़कर आगे सावधानी रखनी चाहिए। भगवान अत्यंत कृपालु हैं। यदि साधक सच्चे मन से उनकी शरण में आकर नाम जप करता है, तो भगवान स्वयं उसके पापों का नाश करके उसे अपने चरणों में स्थान देते हैं।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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