माला-1275:यदि सब कुछ प्रारब्ध से होना है, तो डॉक्टर के पास क्यों जाएं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, यदि सब कुछ प्रारब्ध से होना है, तो डॉक्टर के पास क्यों जाएं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारब्ध को कोई टाल नहीं सकता। यदि शरीर में रोग आया है और डॉक्टर के पास जाना प्रारब्ध में लिखा है, तो मनुष्य चाहे न भी चाहे, परिस्थितियाँ उसे वहां तक ले जाएंगी।

महाराज जी कहते हैं कि केवल बीमारी ही नहीं, बल्कि अस्पतालों के चक्कर लगाना, पैसे खर्च होना, जांच करवाना और मानसिक चिंता भी प्रारब्ध भोग का हिस्सा हैं।

यदि कोई कहे कि “मैं डॉक्टर के पास नहीं जाऊंगा”, तब भी प्रारब्ध किसी न किसी प्रकार उसे वहां तक पहुंचा देगा।

उन्होंने समझाया कि मनुष्य को होशपूर्वक कर्म करना चाहिए और प्रारब्ध को भगवान का स्मरण करते हुए सहना चाहिए।

यदि दुख को नाम-जप के साथ सह लिया जाए, तो आगे का जीवन और अगला जन्म श्रेष्ठ बन सकता है।

इसलिए बीमारी में उपचार करना गलत नहीं है।

गलत यह है कि मनुष्य भगवान को भूल जाए और केवल दुख में डूबा रहे।

धैर्य, श्रद्धा और नाम-जप के साथ प्रारब्ध भोगने से कल्याण होता है।


प्रश्न 2: क्या दवाइयाँ, अस्पताल और आर्थिक कष्ट भी प्रारब्ध का भाग हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारब्ध केवल शरीर के रोग तक सीमित नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी हर परिस्थिति भी प्रारब्ध का ही भाग होती है।

डॉक्टरों के चक्कर लगाना, जांच करवाना, पैसे खर्च होना, दवाइयाँ लेना, इंतजार करना और मानसिक तनाव सहना—ये सब भी कर्मफल का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि आज का समय ऐसा हो गया है कि मनुष्य दवा से कम और जांचों में अधिक परेशान हो रहा है।

एमआरआई, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड और तरह-तरह की जांचों में मनुष्य थक जाता है।

लेकिन यह सब भी कर्मों का ही हिसाब है।

महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य को इन दुखों से घबराना नहीं चाहिए।

जो प्रारब्ध आया है, उसे भगवान का नाम लेते हुए सह लेना चाहिए।

यदि मनुष्य दुख में भी श्रद्धा बनाए रखे और नए पाप कर्म न करे, तो उसका भविष्य सुधर सकता है।

प्रारब्ध का भोग तो होगा, लेकिन नाम-जप उसे सहने की शक्ति देता है और आगे का मार्ग मंगलमय बनाता है।


प्रश्न 3: क्या नाम-जप से श्री राधा रानी के दर्शन की सामर्थ्य मिलती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति है।

जैसे-जैसे साधक श्रद्धा से “राधा-राधा” नाम का जप करता है, वैसे-वैसे उसके भीतर दिव्य सामर्थ्य जागृत होने लगती है।

उन्होंने कहा कि श्री राधा रानी का तेज अनंत सूर्य के समान है, लेकिन नाम-जप साधक को उस दिव्य प्रेम और तेज को सहने योग्य बना देता है।

जैसे प्रह्लाद जी नरसिंह भगवान के भयंकर स्वरूप से नहीं डरे क्योंकि वे उन्हें अपने प्रभु मानते थे, वैसे ही नाम-जप से भगवान के प्रति अपनापन जागृत हो जाता है।

महाराज जी कहते हैं कि नाम, गुरु और इष्ट की कृपा से साधक के भीतर ऐसी शक्ति आती है कि वह भगवान के दर्शन, सेवा और प्रेम को सहन कर सके।

नाम-जप धीरे-धीरे दिव्य दृष्टि देता है।

इसीलिए संत कहते हैं कि नाम में अपार सामर्थ्य है और वह कभी निष्फल नहीं जाता।


प्रश्न 4: क्या भगवान का नाम दिव्य दृष्टि प्रदान कर सकता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम केवल जपने के लिए शब्द नहीं है, बल्कि वह स्वयं भगवान की जीवित शक्ति है।

जब साधक निरंतर श्रद्धा और प्रेम से नाम-जप करता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे दिव्य दृष्टि जागृत होने लगती है।

उन्होंने कहा कि यह कोई अचानक मिलने वाली वस्तु नहीं है कि किसी ने हाथ रख दिया और दृष्टि मिल गई।

बल्कि नाम-जप से भीतर की चेतना शुद्ध होती है और साधक की सामर्थ्य अपने आप बढ़ने लगती है।

महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप से मनुष्य भगवान के प्रेम को सहन करने योग्य बनता है।

अन्यथा भगवान के आनंद और प्रेम का वेग साधारण मनुष्य सह नहीं सकता।

गुरु कृपा, नाम-जप और भजन साधक को धीरे-धीरे उस दिव्य स्थिति तक पहुंचाते हैं जहां वह भगवान के स्वरूप का अनुभव करने लगता है।

इसलिए नाम-जप को साधारण अभ्यास नहीं समझना चाहिए।

यह आत्मा को जागृत करने वाली दिव्य साधना है।

प्रश्न 5: राग और द्वेष से मन को कैसे मुक्त करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि राग और द्वेष ही जन्म-मरण के सबसे बड़े बंधन हैं।

जो वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति हमें अनुकूल लगती है उसमें राग हो जाता है, और जो प्रतिकूल लगती है उसमें द्वेष उत्पन्न हो जाता है।

महाराज जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य राग-द्वेष में फंसा रहेगा, तब तक उसका मन भगवान में स्थिर नहीं हो पाएगा।

इससे बाहर आने का उपाय है—सबमें भगवत भाव करना।

यदि कोई व्यक्ति हमारे साथ बुरा व्यवहार करे, तब भी उसके भीतर भगवान का अंश देखकर मंगल भावना रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि द्वेष का चिंतन करते रहने से मन जलता रहता है और भजन नष्ट होने लगता है।

लेकिन यदि साधक सोचने लगे कि “इसमें भी भगवान हैं”, तो उसका हृदय शांत होने लगता है।

राग और द्वेष छोड़कर सबमें भगवान को देखने से मन शीतल होता है और भगवान की प्राप्ति के योग्य बनता है।

यही वास्तविक अध्यात्म है।


प्रश्न 6: जो लोग हमारा अपमान करते हैं, उनके प्रति कैसा भाव रखें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जो लोग हमारा अपमान करते हैं या बुरा सोचते हैं, वे वास्तव में हमारे लिए हितकारी हो सकते हैं।

क्योंकि उनकी निंदा और विरोध हमारे पापों को जलाने का कार्य करते हैं।

कबीर दास जी का उदाहरण देते हुए महाराज जी कहते हैं—“निंदक नियरे राखिए।”

अर्थात जो हमारी आलोचना करता है, वह हमें सावधान और विनम्र बनाता है।

यदि हम विरोध करने वालों के प्रति द्वेष रखेंगे, तो हमारा मन अशांत हो जाएगा और भजन में बाधा आएगी।

लेकिन यदि उनके प्रति भी मंगल भावना रखें और सोचें कि “भगवान इनके माध्यम से मेरा कल्याण कर रहे हैं”, तो हमारा हृदय निर्मल होने लगेगा।

महाराज जी कहते हैं कि सच्चा संत वही है जो बुरा करने वाले का भी भला सोचे।

जब मनुष्य अपमान करने वालों में भी भगवान का अंश देखने लगता है, तब उसका मन द्वेष से मुक्त होकर आनंदित होने लगता है।

यही भक्ति की श्रेष्ठ अवस्था है।


प्रश्न 7: क्या सबमें भगवान को देखने से द्वेष समाप्त हो सकता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि द्वेष समाप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय है—सबमें भगवान को देखना।

जब मनुष्य केवल बाहरी व्यवहार को देखता है, तब उसे दूसरों में दोष दिखाई देते हैं।

लेकिन जब वह यह समझने लगता है कि प्रत्येक जीव में भगवान ही अंतर्यामी रूप से विराजमान हैं, तब उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि जो हमारे प्रति प्रतिकूल व्यवहार करते हैं, उनमें भी यदि हम भगवत भाव करें, तो हमारा हृदय शुद्ध होने लगता है।

द्वेष का चिंतन मन को जलाता है, जबकि भगवत भाव मन को शीतल करता है।

उन्होंने कहा कि यदि अपने संबंधियों में भी हम भगवान को नहीं देख पाए, तो मंदिर या वृंदावन जाने का भी पूर्ण लाभ नहीं मिलेगा।

क्योंकि राग-द्वेष बना रहेगा।

सबमें भगवान देखने से मनुष्य दोष दर्शन से बचता है और अपराधों से भी सुरक्षित रहता है।

यही दृष्टि साधक को वास्तविक आनंद और शांति प्रदान करती है।


प्रश्न 8: निंदा करने वालों को हितकारी क्यों कहा गया है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जो व्यक्ति हमारी निंदा करता है या हमारे दोष बताता है, वह वास्तव में हमारा हित कर सकता है।

क्योंकि उसकी बातों से हमारा अहंकार टूटता है और हम अपने दोषों को पहचानने लगते हैं।

यदि कोई व्यक्ति हमारी प्रशंसा ही करता रहे, तो धीरे-धीरे अहंकार बढ़ने लगता है।

लेकिन आलोचना मनुष्य को भीतर से जागरूक बनाती है।

महाराज जी कहते हैं कि जो लोग हमारी निंदा करते हैं, वे हमारे पापों को भी कम करने में सहायक बनते हैं।

इसलिए संत लोग निंदक से द्वेष नहीं करते।

वे उसे अपने सुधार का माध्यम मानते हैं।

यदि साधक आलोचना सुनकर क्रोध करने के बजाय आत्मचिंतन करे, तो उसका आध्यात्मिक विकास तेजी से होने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि संसार में हर किसी को प्रसन्न करना संभव नहीं है।

इसलिए निंदा से दुखी होने के बजाय उसे अपने सुधार का अवसर मानना चाहिए।

प्रश्न 9: अभिमान के सूक्ष्म रूपों को कैसे पहचाना जाए?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि अभिमान केवल धन, रूप या पद का ही नहीं होता, बल्कि आध्यात्मिक जीवन में भी सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर जाता है।

कई बार मनुष्य सोचता है—“मैं बहुत विनम्र हूं”, “मैं अधिक भजन करता हूं”, “मैं दूसरों से अधिक त्यागी हूं।” यही सूक्ष्म अभिमान है।

महाराज जी कहते हैं कि जब साधक दूसरों में दोष देखने लगे और स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगे, तब समझना चाहिए कि अभिमान भीतर प्रवेश कर चुका है।

उन्होंने कहा कि असली विनम्रता में व्यक्ति अपने गुणों का श्रेय भगवान की कृपा को देता है।

यदि मन में यह भावना आए कि “सब ठाकुर जी की कृपा है”, तो अभिमान टिक नहीं पाता।

महाराज जी बताते हैं कि अभिमान का सबसे बड़ा लक्षण है—दूसरों की निंदा और स्वयं की प्रशंसा अच्छा लगना।

इसलिए साधक को निरंतर आत्मचिंतन करना चाहिए और भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि “प्रभु, मुझे अहंकार से बचाइए।”

यही सावधानी साधक को सुरक्षित रखती है।


प्रश्न 10: “विनम्रता का अभिमान” भी अभिमान कैसे बन जाता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अभिमान बहुत सूक्ष्म होता है।

कई बार मनुष्य बाहरी रूप से विनम्र दिखाई देता है, लेकिन भीतर यह भाव चलता रहता है कि “मैं बहुत दीन हूं”, “मैं सबसे अधिक त्यागी हूं”, “मैं सबसे बड़ा भक्त हूं।”

यही विनम्रता का अभिमान है।

महाराज जी कहते हैं कि जब तक “मैं” बचा हुआ है, तब तक अभिमान किसी न किसी रूप में बना रह सकता है।

यदि साधक अपने त्याग, भजन या दैन्यता का प्रदर्शन करने लगे, तो वहां भी सूक्ष्म अहंकार प्रवेश कर जाता है।

उन्होंने कहा कि वास्तविक दैन्यता वही है जिसमें साधक अपने सभी गुणों को भगवान की कृपा माने।

जो यह समझ लेता है कि “मेरे पास जो भी भक्ति, ज्ञान या विनम्रता है, सब प्रभु की देन है”, उसका अभिमान धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है।

इसलिए साधक को हर समय सावधान रहना चाहिए।

अभिमान को पहचान लेना ही उसे मिटाने की शुरुआत है।


प्रश्न 11: क्या भगवान भक्त के अहंकार को तोड़ने के लिए परीक्षा लेते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब साधक के भीतर अहंकार बढ़ने लगता है, तब भगवान उसकी रक्षा के लिए कभी-कभी परीक्षा लेते हैं।

भगवान अपने भक्त को गिराना नहीं चाहते, बल्कि उसे अभिमान से बचाना चाहते हैं।

उन्होंने देवर्षि नारद जी का उदाहरण दिया।

जब नारद जी को काम विजय का सूक्ष्म गर्व हुआ, तब भगवान ने माया के माध्यम से उन्हें शिक्षा दी ताकि उनका अहंकार टूट जाए।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान की परीक्षा दंड नहीं, बल्कि कृपा होती है।

यदि साधक समय रहते सावधान हो जाए और अपने दोष पहचान ले, तो कठोर परीक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ती।

लेकिन जब अहंकार बढ़ जाता है और समझाने पर भी मनुष्य नहीं समझता, तब भगवान बड़ी लीला करके उसे विनम्र बनाते हैं।

इसलिए साधक को हमेशा डर और सावधानी रखनी चाहिए कि “मुझसे कोई गलती न हो जाए।”

यही भय उसे अभिमान से बचाता है और भगवान की कृपा में स्थिर रखता है।


प्रश्न 12: माया से डरना क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान की माया अत्यंत बलवान है।

यह बड़े-बड़े ज्ञानी और तपस्वियों को भी भ्रमित कर सकती है।

एक क्षण में मनुष्य की बुद्धि बदल सकती है और उसका मन संसार की ओर भाग सकता है।

इसलिए साधक को कभी यह अभिमान नहीं करना चाहिए कि “मैं अब सुरक्षित हूं, मुझे माया प्रभावित नहीं कर सकती।”

महाराज जी कहते हैं कि यही असावधानी पतन का कारण बनती है।

यदि मनुष्य माया से सावधान रहता है, भगवान का नाम जपता है और अपने को छोटा मानता है, तो वह सुरक्षित रहता है।

उन्होंने कहा कि जो अपने को बहुत बड़ा मानने लगता है, उसकी परीक्षा जल्दी होती है।

लेकिन जो तिनके से भी छोटा बनकर चलता है, भगवान उसकी रक्षा करते हैं।

इसलिए माया से डरना कमजोरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सावधानी है।

यह भय साधक को भगवान के चरणों में बनाए रखता है और पतन से बचाता है।

प्रश्न 13: यदि साधक को अपने भीतर दोष और विकार दिखाई दें तो क्या करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधक के भीतर जब काम, क्रोध, लोभ, मोह या अभिमान जैसे विकार दिखाई देने लगें, तो घबराना नहीं चाहिए।

बल्कि यह भगवान की कृपा समझनी चाहिए कि दोष अब दिखाई तो दे रहे हैं।

जो व्यक्ति अपने दोषों को पहचान ही नहीं पाता, उसका सुधार कठिन होता है।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे चोर को चोर समझ लिया जाए तो उससे बचाव संभव है, वैसे ही विकारों को पहचान लेने से साधक सावधान हो जाता है।

उन्होंने कहा कि साधक को अपने दोष संत, गुरु और भगवान के सामने सरलता से रख देने चाहिए।

जब मनुष्य अपनी गलतियों को छिपाने के बजाय स्वीकार करता है, तब उनके नष्ट होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

नाम-जप, सत्संग और भगवान से प्रार्थना करने से धीरे-धीरे भीतर की अशुद्धियां कम होने लगती हैं।

इसलिए दोष दिखना पतन नहीं, बल्कि जागृति का संकेत है।

सच्चा साधक वही है जो अपने दोष देखकर और अधिक विनम्र बन जाए।


प्रश्न 14: क्या भगवान की कृपा के बिना माया से पार पाया जा सकता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान की माया इतनी प्रबल है कि केवल अपनी बुद्धि और शक्ति के बल पर उससे पार पाना अत्यंत कठिन है।

शास्त्रों में भी कहा गया है—“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।”

अर्थात भगवान की माया को पार करना सरल नहीं है।

महाराज जी कहते हैं कि बड़े-बड़े ऋषि, तपस्वी और ज्ञानी भी माया में मोहित हो गए।

इसलिए साधक को कभी अपने साधन या ज्ञान का अभिमान नहीं करना चाहिए।

यदि भगवान की कृपा, गुरु का आश्रय और नाम-जप न हो, तो मनुष्य कभी भी भ्रमित हो सकता है।

उन्होंने कहा कि भगवान की शरण में रहकर, अपने को छोटा मानकर और निरंतर नाम-जप करते हुए ही माया से रक्षा संभव है।

जो व्यक्ति भगवान पर निर्भर रहता है, उसकी रक्षा भगवान स्वयं करते हैं।

लेकिन जो अपने बल पर चलना चाहता है, वह जल्दी भ्रमित हो सकता है।

इसलिए भगवत कृपा ही माया से पार होने का वास्तविक साधन है।


प्रश्न 15: क्या हम कभी पहले भगवान में लीन थे और फिर उनसे विमुख हो गए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यदि जीव वास्तव में भगवान में पूर्ण रूप से लीन हो गया होता, तो फिर उससे विमुख होकर संसार में नहीं आता।

उन्होंने कहा कि अनादि काल से जीव भगवान को भूलकर माया में भटक रहा है।

यदि पूर्व जन्मों में भजन पूर्ण हो गया होता, तो इस जन्म में भी बचपन से ही भगवान में पूर्ण तल्लीनता दिखाई देती।

महाराज जी कहते हैं कि जितना भजन साधक करता है, वह कभी नष्ट नहीं होता।

यदि भजन अधूरा रह जाए, तो अगले जन्म में वही संस्कार आगे बढ़ते हैं।

उन्होंने भरत जी का उदाहरण दिया, जो अगले जन्म में हिरण बने, लेकिन उनका पूर्व जन्म का भजन नष्ट नहीं हुआ।

अंततः वही संस्कार उन्हें जड़भरत जैसी महान स्थिति तक ले गए।

इसलिए साधक को समझना चाहिए कि भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता।

जो भी नाम-जप और साधना अभी हो रही है, वही आगे के जीवन और जन्मों का आधार बनेगी।


प्रश्न 16: क्या पूर्व जन्म का भजन अगले जन्म में भी साथ आता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम और भजन कभी नष्ट नहीं होता।

साधक जितना भी नाम-जप करता है, वह उसके संस्कारों में जुड़ता जाता है और अगले जन्मों में भी उसके साथ रहता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी ने इस जन्म में सौ बार भगवान का नाम लिया है, तो अगले जन्म में वही साधना आगे से शुरू होगी, शून्य से नहीं।

भरत जी का उदाहरण देते हुए महाराज जी बताते हैं कि हिरण शरीर मिलने पर भी उनके भीतर पूर्व जन्म की भक्ति बनी रही।

फिर अगले जन्म में वे जड़भरत जैसे महापुरुष बने।

इससे स्पष्ट होता है कि भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यदि इस जन्म में भगवत प्राप्ति न भी हो, तो भी नाम-जप अगले जन्म में उत्तम वातावरण, सत्संग और भक्ति संस्कार दिलाता है।

इसलिए साधक को कभी निराश नहीं होना चाहिए।

हर किया गया नाम-जप आत्मा की यात्रा को भगवान की ओर आगे बढ़ाता है।

next?

प्रश्न 17: यदि अंतिम समय में भगवान का नाम निकल जाए तो क्या भगवत प्राप्ति संभव है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य के जीवन का अंतिम क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

जिस भाव और स्मरण में अंतिम श्वास निकलती है, उसी के अनुसार आगे की गति होती है।

यदि अंतिम समय में भगवान का नाम निकल जाए—“राम”, “कृष्ण”, “राधा” या हरिनाम—तो भगवत प्राप्ति संभव हो जाती है।

इसीलिए संत लोग हर समय नाम-जप का अभ्यास करने को कहते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि किसी को नहीं पता कि कौन-सी श्वास अंतिम होगी।

इसलिए यदि जीवन भर हर श्वास में नाम का अभ्यास किया जाए, तो अंतिम समय में भी वही नाम सहज रूप से निकलता है।

उन्होंने कहा कि केवल मृत्यु के समय नाम लेने की इच्छा पर्याप्त नहीं है।

अंत समय में वही स्मरण आता है जिसका अभ्यास जीवन भर किया गया हो।

इसलिए अभी से निरंतर नाम-जप करना चाहिए।

जब मनुष्य हर परिस्थिति में भगवान का नाम पकड़ लेता है, तब मृत्यु भी उसके लिए भय का कारण नहीं रहती।

नाम ही जीव को भगवान तक पहुंचाने वाली नौका बन जाता है।

प्रश्न 17: यदि अंतिम समय में भगवान का नाम निकल जाए तो क्या भगवत प्राप्ति संभव है?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य के जीवन का अंतिम क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

जिस भाव और स्मरण में अंतिम श्वास निकलती है, उसी के अनुसार आगे की गति होती है।

यदि अंतिम समय में भगवान का नाम निकल जाए—“राम”, “कृष्ण”, “राधा” या हरिनाम—तो भगवत प्राप्ति संभव हो जाती है।

इसीलिए संत लोग हर समय नाम-जप का अभ्यास करने को कहते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि किसी को नहीं पता कि कौन-सी श्वास अंतिम होगी।

इसलिए यदि जीवन भर हर श्वास में नाम का अभ्यास किया जाए, तो अंतिम समय में भी वही नाम सहज रूप से निकलता है।

उन्होंने कहा कि केवल मृत्यु के समय नाम लेने की इच्छा पर्याप्त नहीं है।

अंत समय में वही स्मरण आता है जिसका अभ्यास जीवन भर किया गया हो।

इसलिए अभी से निरंतर नाम-जप करना चाहिए।

जब मनुष्य हर परिस्थिति में भगवान का नाम पकड़ लेता है, तब मृत्यु भी उसके लिए भय का कारण नहीं रहती।

नाम ही जीव को भगवान तक पहुंचाने वाली नौका बन जाता है।


प्रश्न 18: क्या केवल संतों के सत्संग में आनंद आना और मंदिर में मन न लगना अपराध है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी साधक को संतों के सत्संग, प्रवचन और भगवत चर्चा में अधिक आनंद आता है, तो यह कोई अपराध नहीं है।

क्योंकि जहां संत भगवान का गुणगान करते हैं, वहां स्वयं भगवान विराजमान रहते हैं।

सत्संग में भगवान की वाणी, नाम और कृपा का विशेष प्रभाव होता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मंदिर या अर्चाविग्रह की अवहेलना की जाए।

महाराज जी कहते हैं कि मंदिर में भगवान अर्चा अवतार के रूप में विराजमान हैं।

यदि किसी का भाव अभी वहां अधिक नहीं बनता, तो यह उसकी व्यक्तिगत स्थिति हो सकती है, लेकिन उसे मंदिर की निंदा नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि अपने भाव को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरे मार्गों की अवहेलना करना अपराध बन जाता है।

इसलिए संतों में प्रेम होना अच्छी बात है, लेकिन साथ ही मंदिर और भगवान के विग्रह के प्रति भी सम्मान बना रहना चाहिए।

यही संतुलित भक्ति है।


प्रश्न 19: क्या मंदिर और अर्चाविग्रह की अवहेलना करना अपराध है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मंदिर में भगवान केवल पत्थर की मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि अर्चा अवतार के रूप में विराजमान रहते हैं।

इसलिए मंदिर या विग्रह की अवहेलना करना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि कई महान मंदिरों में भगवान स्वयं प्रकट हुए हैं, वे केवल किसी मूर्तिकार की कल्पना नहीं हैं।

लेकिन मनुष्य अपनी अशुद्ध दृष्टि के कारण उस दिव्यता को अनुभव नहीं कर पाता।

महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी साधक का भाव संतों या नाम-जप में अधिक लगता हो, तो भी उसे मंदिर के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए।

अपने भाव को सिद्ध करने के लिए दूसरे मार्गों की निंदा करना अपराध बन जाता है।

भगवान भाव के अनुसार कृपा करते हैं।

कोई संतों में भगवान देखता है, कोई विग्रह में, कोई नाम में—लेकिन भगवान सभी में हैं।

इसलिए मंदिर की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।

जहां भगवान का स्मरण और श्रद्धा हो, वहां विनम्रता और सम्मान आवश्यक है।


प्रश्न 20: क्या अपने प्रिय संत की महिमा करते हुए दूसरे संतों की निंदा करना गलत है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अपने गुरु या प्रिय संत के प्रति विशेष प्रेम और श्रद्धा होना स्वाभाविक है।

लेकिन उस प्रेम के कारण अन्य संतों की निंदा करना बहुत बड़ा अपराध बन सकता है।

उन्होंने कहा कि संसार में अलग-अलग भाव और प्रकृति के लोग हैं।

जिस प्रकार बाजार में हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तु चुनता है, वैसे ही साधक भी अपने भाव के अनुसार संत और मार्ग चुनता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य मार्ग गलत हैं।

महाराज जी कहते हैं कि जहां हम अपने प्रिय संत की प्रशंसा करते-करते दूसरों की अवहेलना करने लगते हैं, वहीं से पतन शुरू हो जाता है।

संतों की निंदा से भक्ति का भाव नष्ट हो सकता है।

इसलिए वाणी को बहुत संभालकर उपयोग करना चाहिए।

अपने गुरु में प्रेम रखें, लेकिन अन्य संतों और भक्तों का भी सम्मान करें।

यही वास्तविक विनम्रता और भक्ति का लक्षण है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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