माला-1273:क्या सभी कर्मों का हिसाब इसी जन्म में पूरा हो जाता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: क्या सभी कर्मों का हिसाब इसी जन्म में पूरा हो जाता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य के करोड़ों जन्मों के संचित कर्म होते हैं। उनमें से कुछ कर्मों का फल इस जन्म में भोगने के लिए मिलता है, जिससे शरीर की रचना होती है। लेकिन सभी कर्म एक ही जन्म में समाप्त नहीं हो जाते।

महाराज जी कहते हैं कि प्रारब्ध कर्म तो भोगने ही पड़ते हैं, लेकिन नाम-जप, भक्ति, सेवा और तपस्या द्वारा संचित कर्मों को नष्ट किया जा सकता है।

यदि साधक भगवान का भजन करते हुए दुख-सुख को सह ले, तो उसका कर्मबंध धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे न्यायालय में अपराध की पूरी सजा मिलती है, वैसे ही पापों का फल भी अवश्य मिलता है।

लेकिन भगवत भक्ति कर्मों को भस्म करने की शक्ति रखती है।

इसीलिए मनुष्य जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, बल्कि कर्मबंधन से मुक्त होकर भगवान की प्राप्ति करना है।


प्रश्न 2: प्रतिकूल परिस्थितियों में भक्ति टूटने लगे तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियाँ भक्ति की परीक्षा होती हैं। जब तक भक्ति का रंग गहरा नहीं होता, तब तक साधक दुख और विपत्ति में टूट जाता है।

इसलिए विपत्ति आने पर भजन छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि और बढ़ाना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम, भागवत पाठ, सत्संग और सेवा साधक को भीतर से मजबूत बनाते हैं।

उन्होंने द्रौपदी जी का उदाहरण दिया कि जब सभी सहारे समाप्त हो गए, तब उन्होंने श्रीकृष्ण को पुकारा और भगवान ने उनकी रक्षा की।

इसी प्रकार जब साधक पूरे भरोसे से भगवान को पुकारता है, तब भगवान उसे संभाल लेते हैं।

विपत्ति वास्तव में भगवान की ओर ले जाने वाली होती है।

यदि उस समय धैर्य और नाम-जप बना रहे, तो वही दुख साधक के लिए आध्यात्मिक संपत्ति बन जाता है।

इसलिए कठिन समय में टूटना नहीं, बल्कि भगवान का आश्रय और मजबूत करना चाहिए।


प्रश्न 3: विपत्ति में भगवान पर भरोसा कैसे मजबूत करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान पर भरोसा धीरे-धीरे सत्संग, नाम-जप और अनुभव से मजबूत होता है।

जब साधक बार-बार देखता है कि भगवान हर परिस्थिति में उसकी रक्षा कर रहे हैं, तब उसके भीतर निश्चिंतता आने लगती है।

उन्होंने कहा कि संसार में ऐसा कोई नहीं जिसके जीवन में दुख और विपत्ति न आई हो।

लेकिन वही व्यक्ति उनसे पार हो पाता है जिसका मन भगवान में स्थित होता है।

यदि भगवान पर भरोसा हो, तो मनुष्य कठिन परिस्थिति में भी टूटता नहीं।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे बच्चा अपने पिता पर भरोसा करके निश्चिंत रहता है, वैसे ही भक्त को भगवान पर विश्वास रखना चाहिए कि “मेरे प्रभु मेरी व्यवस्था अवश्य करेंगे।”

यह भरोसा भजन से बढ़ता है।

जितना नाम-जप बढ़ेगा, उतना भय और चिंता कम होती जाएगी।

भगवान का भरोसा ही साधक को विपत्ति में भी स्थिर रखता है।


प्रश्न 4: नाम-जप के बाद भी पाप आचरण क्यों हो जाते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल बाहर से नाम-जप करने से तुरंत मन शुद्ध नहीं हो जाता।

वर्षों से हृदय में काम, क्रोध, लोभ और भोगों की वासनाएँ भरी हुई हैं। इसलिए प्रारंभ में नाम-जप के साथ भी पाप आचरण होते रहते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नाम-जप व्यर्थ है।

महाराज जी कहते हैं कि नाम धीरे-धीरे हृदय की गुफा में प्रकाश करता है।

शुरुआत में नाम केवल जिह्वा तक रहता है, फिर गले में आता है और अंततः हृदय में उतरता है।

जब नाम हृदय में उतर जाता है, तब भीतर छिपी वासनाएँ कमजोर होने लगती हैं।

इसलिए गलती होने पर निराश होकर भजन छोड़ना नहीं चाहिए।

बल्कि नाम-जप को और बढ़ाना चाहिए।

धीरे-धीरे वही नाम साधक को पाप आचरणों से मुक्त कर देता है और जीवन को शुद्ध बना देता है।

प्रश्न 5: यदि भक्ति के साथ मन बार-बार गलत कार्यों की ओर जाए तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना के प्रारंभिक समय में मन का बार-बार विषयों और गलत कार्यों की ओर जाना सामान्य बात है।

मन वर्षों से संसार और भोगों में लगा हुआ है, इसलिए अचानक उसका पूर्णतः भगवान में लग जाना संभव नहीं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि साधक निराश हो जाए।

महाराज जी कहते हैं कि जब भी मन गलत दिशा में जाए, उसी समय भगवान का नाम पकड़ लेना चाहिए।

मन को बार-बार भगवत स्मरण की ओर मोड़ना ही साधना है।

यदि गिरने के बाद साधक उठकर फिर नाम-जप करने लगे, तो धीरे-धीरे उसका मन बदलने लगता है।

उन्होंने कहा कि जैसे गंदे कपड़े को बार-बार धोने से मैल निकलता है, वैसे ही निरंतर भजन से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं।

इसलिए गलती होने पर आत्मग्लानि में डूबना नहीं चाहिए, बल्कि अधिक सावधान होकर भजन बढ़ाना चाहिए।

भगवान का नाम ही मन को अंततः पवित्र बनाता है।


प्रश्न 6: सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण भक्ति को कैसे प्रभावित करते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रकृति के तीन गुण—सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण—मनुष्य के मन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

सतोगुण बढ़ने पर मन शांति, भजन, दया, सत्य और सेवा की ओर जाता है।

रजोगुण मनुष्य को अधिक इच्छाओं, महत्वाकांक्षा और भोगों की ओर ले जाता है।

तमोगुण आलस्य, क्रोध, प्रमाद और अज्ञान बढ़ाता है।

महाराज जी कहते हैं कि भक्ति के लिए सतोगुण आवश्यक है।

सात्विक भोजन, सत्संग, नाम-जप और शुद्ध आचरण से सतोगुण बढ़ता है।

जब सतोगुण मजबूत होता है, तब मन भगवान की ओर आसानी से लगने लगता है।

लेकिन रजोगुण और तमोगुण बढ़ने पर भजन में अरुचि आने लगती है।

इसलिए साधक को अपने भोजन, संग और दिनचर्या का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि अंततः भगवान का नाम तीनों गुणों से ऊपर उठाने की शक्ति रखता है।

नाम-जप करते-करते साधक गुणातीत अवस्था की ओर बढ़ने लगता है।


प्रश्न 7: क्या केवल ज्ञान होना पर्याप्त है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल ज्ञान सुन लेना या पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है।

यदि ज्ञान जीवन में उतरे नहीं, तो वह केवल शब्द बनकर रह जाता है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि कोई व्यक्ति दवा का पूरा गुण जानता हो लेकिन उसे खाए नहीं, तो रोग समाप्त नहीं होगा।

इसी प्रकार केवल शास्त्र पढ़ने से कल्याण नहीं होता, जब तक उनके अनुसार आचरण न किया जाए।

महाराज जी कहते हैं कि बहुत लोग जानते हैं कि क्रोध, लोभ और विषय भोग दुख का कारण हैं, फिर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते।

कारण यह है कि ज्ञान अभी व्यवहार में नहीं उतरा।

सच्चा ज्ञान वही है जो जीवन को बदल दे।

यदि किसी ने सुन लिया कि भगवान का नाम कल्याणकारी है, तो उसे नियमित नाम-जप भी करना चाहिए।

ज्ञान का फल आचरण में दिखाई देना चाहिए।

जब ज्ञान और साधना एक साथ चलते हैं, तभी वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति होती है।

इसलिए केवल जानना नहीं, बल्कि जीना आवश्यक है।


प्रश्न 8: माया वास्तव में क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि माया भगवान की शक्ति है, जो जीव को वास्तविक स्वरूप भूलाकर संसार में बांध देती है।

जब जीव शरीर, धन, संबंध और भोगों को ही सत्य मानने लगता है, वही माया है।

उन्होंने रस्सी और सांप का उदाहरण दिया। अंधेरे में रस्सी को सांप समझकर भय होता है, लेकिन ज्ञान होने पर भ्रम मिट जाता है।

इसी प्रकार संसार का आकर्षण भी अज्ञान के कारण वास्तविक लगता है।

माया का अर्थ केवल स्त्री, धन या परिवार नहीं है।

भगवान को भूल जाना ही माया है।

महाराज जी कहते हैं कि जब जीव अपने को शरीर मानता है, तब मोह, भय और दुख उत्पन्न होते हैं।

लेकिन जब वह नाम-जप और सत्संग से अपने आत्मस्वरूप को पहचानने लगता है, तब माया का प्रभाव कम होने लगता है।

भगवान का नाम ही माया से पार करने वाली नौका है।

प्रश्न 9: भोगों में सुख बुद्धि क्यों बनी रहती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जीव अनादि काल से संसार और विषयों में सुख खोजता आया है। बार-बार दुख मिलने के बाद भी उसकी बुद्धि भोगों में सुख मानती रहती है, क्योंकि माया ने उसकी दृष्टि ढक रखी है।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे ऊंट कांटेदार झाड़ी खाता है और उसके मुंह से खून निकलता है, फिर भी उसे स्वाद लगता है, वैसे ही मनुष्य विषय भोगों में दुख पाकर भी उन्हें नहीं छोड़ता।

संसार का सुख क्षणिक है।

भोग पूरा होते ही मन फिर खाली हो जाता है और नई इच्छा पैदा हो जाती है।

लेकिन अज्ञान के कारण मनुष्य सोचता है कि “अगली बार सुख मिल जाएगा।”

महाराज जी बताते हैं कि यह भ्रम सत्संग और भगवत नाम से टूटता है।

जब साधक भगवान के नाम में थोड़ा भी रस अनुभव करने लगता है, तब संसार के भोग फीके लगने लगते हैं।

इसीलिए संत लोग बार-बार नाम-जप और सत्संग पर जोर देते हैं।

भगवत आनंद मिलते ही विषयों की आसक्ति अपने आप कम होने लगती है।


प्रश्न 10: नाम-जप से आध्यात्मिक शक्ति कैसे जागृत होती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि चेतना और दिव्य शक्ति का स्वरूप है।

जब साधक श्रद्धा और नियमितता से नाम-जप करता है, तब वही नाम उसके भीतर छिपी आध्यात्मिक शक्ति को जागृत करने लगता है।

शुरुआत में साधक को केवल जिह्वा से नाम लेने का अभ्यास करना पड़ता है।

लेकिन धीरे-धीरे नाम हृदय में उतरने लगता है और मन को शुद्ध करता है।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे अग्नि में हाथ डालने पर हाथ अवश्य गर्म होगा, वैसे ही भगवान का नाम लेने से अंतःकरण अवश्य पवित्र होगा।

नाम-जप से मन की अशुद्धियाँ, भय और नकारात्मकता धीरे-धीरे कम होने लगती हैं।

फिर साधक के भीतर साहस, धैर्य, करुणा और भगवान पर भरोसा बढ़ता है।

यही आध्यात्मिक शक्ति है।

महाराज जी बताते हैं कि संकट के समय जो व्यक्ति भगवान का नाम पकड़ लेता है, उसे भीतर से अद्भुत शक्ति मिलने लगती है।

इसलिए नाम-जप साधारण क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने वाली दिव्य साधना है।


प्रश्न 11: क्या बिना सद्गुरु के आश्रय के माया से पार पाया जा सकता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि माया अत्यंत बलवान है। केवल अपने मन और बुद्धि के सहारे उससे पार पाना बहुत कठिन है।

इसीलिए शास्त्रों में सद्गुरु के आश्रय को अनिवार्य बताया गया है।

सद्गुरु साधक को सही मार्ग दिखाते हैं और यह समझाते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है।

महाराज जी कहते हैं कि जिस प्रकार अंधेरे जंगल में मार्गदर्शक के बिना रास्ता भटक जाता है, वैसे ही गुरु के बिना साधक भ्रमित हो सकता है।

गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि अपने अनुभव से साधक को संभालते हैं।

जब साधक गुरु आज्ञा में रहकर नाम-जप और साधना करता है, तब धीरे-धीरे माया का प्रभाव कम होने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि गुरु भगवान तक पहुंचाने वाले सेतु हैं।

जो साधक गुरु चरणों में श्रद्धा रखता है, उसका मार्ग सरल हो जाता है।

इसलिए सद्गुरु का आश्रय आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।


प्रश्न 12: पूजा करते समय मन में गलत विचार आएं तो क्या भगवान पूजा स्वीकार करते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि पूजा करते समय मन का भटकना साधना की प्रारंभिक अवस्था में सामान्य है।

मन वर्षों से संसार और विषयों में लगा रहा है, इसलिए पूजा के समय भी पुराने संस्कार उठते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान पूजा स्वीकार नहीं करते।

यदि साधक सच्चे मन से प्रयास कर रहा है और बार-बार मन को भगवान की ओर ला रहा है, तो भगवान उसकी भावना देखते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि मां छोटे बच्चे की टूटी-फूटी भाषा भी प्रेम से समझ लेती है।

इसी प्रकार भगवान भी साधक की सच्ची भावना स्वीकार करते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मन को खुली छूट दे दी जाए।

साधक को निरंतर प्रयास करना चाहिए कि मन अधिक समय तक भगवान में टिके।

नाम-जप, सत्संग और सात्विक जीवन से धीरे-धीरे मन की अशुद्धियाँ कम होती हैं।

फिर पूजा में एकाग्रता आने लगती है।

इसलिए गलत विचार आने पर निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि साधना जारी रखनी चाहिए।

प्रश्न 13: मन पूजा और भजन में स्थिर क्यों नहीं रहता?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मन का स्वभाव चंचल है। वर्षों से वह संसार, विषयों और भोगों में दौड़ता रहा है, इसलिए प्रारंभ में उसका भगवान में स्थिर न रहना स्वाभाविक है।

जब साधक पूजा करने बैठता है, तब पुराने संस्कार और विषय-वासनाएं मन को इधर-उधर खींचती हैं।

महाराज जी कहते हैं कि मन को एक दिन में नहीं बदला जा सकता।

जैसे बार-बार अभ्यास करने से कोई व्यक्ति विद्या सीखता है, वैसे ही नियमित पूजा और नाम-जप से मन धीरे-धीरे भगवान में लगने लगता है।

उन्होंने कहा कि यदि मन बार-बार भागे, तो निराश नहीं होना चाहिए।

बार-बार उसे वापस भगवान की ओर लाना ही साधना है।

जब साधक नियमपूर्वक प्रतिदिन पूजा करता है, तब उसके भीतर भगवत संस्कार बनने लगते हैं।

धीरे-धीरे वही मन जो पहले संसार में भागता था, भगवान के स्मरण में आनंद अनुभव करने लगता है।

इसलिए धैर्य, अभ्यास और निरंतरता अत्यंत आवश्यक हैं।

भगवान साधक के प्रयास और भाव दोनों को देखते हैं।


प्रश्न 14: क्या बिना मन लगे किया गया नाम-जप और पूजा भी फल देती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान भाव के भूखे हैं।

यदि साधक मन न लगने पर भी भगवान की पूजा और नाम-जप करता है, तो भी उसका फल अवश्य मिलता है।

शुरुआत में मन चंचल रहता है और संसार की ओर भागता है, लेकिन यदि साधक पूजा छोड़ दे तो मन कभी शुद्ध नहीं होगा।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे रस्सी के बार-बार पत्थर पर रगड़ने से निशान पड़ जाता है, वैसे ही नियमित भजन और पूजा से मन पर भगवत संस्कार बनने लगते हैं।

भगवान यह देखते हैं कि साधक उनके लिए समय निकाल रहा है, प्रयास कर रहा है और बार-बार उनकी ओर लौट रहा है।

यही भावना भगवान स्वीकार करते हैं।

उन्होंने कहा कि जैसे आग को छूने पर वह जलाती ही है, चाहे मन लगे या न लगे, वैसे ही भगवान का नाम भी अपना प्रभाव अवश्य देता है।

इसलिए कभी यह सोचकर पूजा बंद नहीं करनी चाहिए कि “मन नहीं लगता।”

निरंतर अभ्यास से एक दिन वही मन भगवान में स्थिर होने लगता है और भक्ति का रस प्रकट होता है।


प्रश्न 15: माता-पिता के प्रति संतान का कर्तव्य क्या होना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि माता-पिता केवल शरीर देने वाले नहीं, बल्कि भगवान के स्वरूप हैं।

शास्त्रों में कहा गया है—“मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।”

इसलिए संतान का कर्तव्य है कि वह माता-पिता का सम्मान करे, उनकी सेवा करे और उनके प्रति कृतज्ञ रहे।

महाराज जी कहते हैं कि सेवा केवल भोजन या धन देने तक सीमित नहीं है।

उनके प्रति विनम्र व्यवहार, आदर और प्रेम भी सेवा है।

यदि माता-पिता वृद्ध हो जाएं, क्रोधित हो जाएं या स्वभाव बदल जाए, तब भी संतान को अपने धर्म से पीछे नहीं हटना चाहिए।

जो संतान माता-पिता की सेवा भगवत भाव से करती है, उस पर भगवान की विशेष कृपा होती है।

महाराज जी कहते हैं कि दूसरों के व्यवहार को देखकर अपने कर्तव्य से हटना गलत है।

हमें यह देखना चाहिए कि “इस परिस्थिति में मेरा धर्म क्या है?”

यही दृष्टि जीवन को पवित्र बनाती है और साधक को भगवान के निकट ले जाती है।


प्रश्न 16: यदि परिवार या माता-पिता उचित व्यवहार न करें तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार में हर व्यक्ति हमारे मन के अनुसार व्यवहार करे, यह संभव नहीं है।

कई बार माता-पिता, पत्नी, पति या परिवार के लोग हमारी अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार नहीं करते।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने धर्म और कर्तव्य को छोड़ दें।

महाराज जी कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल दूसरों के व्यवहार को देखकर प्रतिक्रिया देता है, वह जल्दी दुखी हो जाता है।

सच्चा साधक वही है जो विपरीत परिस्थिति में भी अपने कर्तव्य पर स्थिर रहे।

यदि माता-पिता डांटें, समझ न पाएं या पक्षपात करें, तब भी उनके प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि “वे मेरे लिए क्या कर रहे हैं?”

बल्कि यह सोचना चाहिए कि “मुझे अपने धर्म के अनुसार क्या करना चाहिए?”

जब मनुष्य अपने कर्तव्य पर स्थिर रहता है, तब भीतर शांति बनी रहती है।

भगवान भी ऐसे व्यक्ति पर प्रसन्न होते हैं जो परिस्थितियों से टूटे बिना धर्म निभाता है।

प्रश्न 17: क्या हमें दूसरों के कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए या केवल अपने कर्तव्य पर?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार में अधिकांश दुख इसलिए पैदा होते हैं क्योंकि मनुष्य अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरों के दोष और कर्तव्यों को देखने लगता है।

हम बार-बार सोचते हैं—“उसने मेरे लिए क्या किया?”, “वह अपना धर्म क्यों नहीं निभा रहा?”—इसी से मन अशांत होता है।

महाराज जी कहते हैं कि साधक को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि “मेरा धर्म क्या है?”

यदि पुत्र है तो पुत्र धर्म निभाए, यदि माता है तो माता धर्म निभाए, यदि गृहस्थ है तो गृहस्थ धर्म निभाए।

दूसरे अपना कर्तव्य निभाएं या न निभाएं, यह उनके कर्म हैं।

लेकिन यदि हम भी अपना धर्म छोड़ देंगे, तो हमारा पतन होगा।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान हमारे कर्मों का हिसाब देखेंगे, दूसरों का नहीं।

इसलिए अपने आचरण को शुद्ध रखना ही सबसे बड़ा धर्म है।

जब मनुष्य केवल अपने कर्तव्य पर ध्यान देता है, तब उसका मन शांत रहने लगता है।

दूसरों के दोष देखने से केवल अशांति बढ़ती है, जबकि अपने धर्म पर स्थिर रहने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।


प्रश्न 18: गृहस्थ जीवन में “भगवत भाव” का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गृहस्थ जीवन में भगवत भाव का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है।

बल्कि परिवार, कार्य और संबंधों के बीच रहते हुए भी भगवान को न भूलना ही भगवत भाव है।

यदि गृहस्थ अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों और समाज की सेवा यह सोचकर करे कि “ये सब भगवान के दिए हुए हैं और इनकी सेवा भगवान की सेवा है”, तो वही भगवत भाव है।

महाराज जी कहते हैं कि समस्या गृहस्थ जीवन में नहीं, बल्कि मोह और स्वार्थ में है।

जब परिवार केवल “मेरा” बन जाता है, तब बंधन पैदा होता है।

लेकिन जब वही संबंध भगवान से जुड़े होते हैं, तब वे साधना का माध्यम बन जाते हैं।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ को कमाते समय भी धर्म का पालन करना चाहिए और समय निकालकर नाम-जप अवश्य करना चाहिए।

यदि दिनभर संसार में रहकर भी मन भगवान में जुड़ा रहे, तो वही श्रेष्ठ गृहस्थ जीवन है।

भगवत भाव का अर्थ है—हर कार्य को भगवान को समर्पित करके करना।

तब गृहस्थ जीवन भी भक्ति मार्ग बन जाता है।


प्रश्न 19: परिवार में मोह और भगवत भाव में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मोह और भगवत भाव बाहर से देखने पर समान लग सकते हैं, लेकिन भीतर से दोनों बिल्कुल अलग हैं।

मोह में “मेरा-तेरा” और स्वार्थ छिपा रहता है।

मनुष्य अपने परिवार को केवल शरीर और संबंध के आधार पर चाहता है। इसलिए उसमें भय, चिंता और दुख बने रहते हैं।

लेकिन भगवत भाव में वही परिवार भगवान का स्वरूप दिखाई देता है।

महाराज जी कहते हैं कि यदि माता-पिता, पत्नी या पुत्र में भगवान का अंश देखकर सेवा की जाए, तो वही मोह भक्ति में बदलने लगता है।

मोह मनुष्य को बांधता है, जबकि भगवत भाव मन को पवित्र करता है।

मोह में बिछड़ने का भय रहता है, लेकिन भगवत भाव में समर्पण और शांति रहती है।

जब साधक परिवार को भगवान की देन मानता है और भगवान को केंद्र में रखकर संबंध निभाता है, तब वह संसार में रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र रहने लगता है।

यही मोह और भगवत भाव का वास्तविक अंतर है।


प्रश्न 20: हर परिस्थिति में अपने धर्म और कर्तव्य पर स्थिर कैसे रहें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि धर्म पर स्थिर रहने के लिए सबसे पहले विवेक और भगवान का आश्रय आवश्यक है।

परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं रहेंगी। कभी लोग सम्मान करेंगे, कभी अपमान करेंगे; कभी लाभ होगा, कभी हानि।

यदि मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहेगा, तो वह कभी स्थिर नहीं रह पाएगा।

महाराज Ji कहते हैं कि सच्चा साधक वही है जो कठिन परिस्थिति में भी अपना धर्म न छोड़े।

यदि माता-पिता कठोर हों, परिवार साथ न दे या संसार विरोध करे, तब भी सत्य, सेवा और भगवान का नाम नहीं छोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भगवान हर परिस्थिति में हमारे कर्म और निष्ठा को देख रहे हैं।

यदि साधक अपने कर्तव्य पर स्थिर रहता है, तो धीरे-धीरे भीतर अद्भुत शक्ति आने लगती है।

नाम-जप और सत्संग से यह स्थिरता बढ़ती है।

जब मनुष्य भगवान को साक्षी मानकर जीवन जीता है, तब वह परिस्थितियों से डगमगाता नहीं।

यही धर्म में स्थिर रहने का वास्तविक रहस्य है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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