प्रश्न 1: क्या मांसाहारी व्यक्ति को मंदिर का प्रसाद देने से पाप लगता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का प्रसाद और चरणामृत अत्यंत पवित्र होता है। यदि कोई व्यक्ति अभी मांसाहार या अभक्ष पदार्थों का सेवन करता है, तब भी उसे श्रद्धा से प्रसाद देना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि भगवत प्रसाद बुद्धि को शुद्ध करने वाला होता है। जब कोई व्यक्ति श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे सात्विकता आने लगती है। उसी सात्विकता के प्रभाव से एक दिन वह गलत आचरण छोड़ सकता है।
इसलिए प्रसाद बांटने वाले को पाप नहीं लगता, बल्कि पुण्य प्राप्त होता है। क्योंकि प्रसाद के माध्यम से किसी जीव का कल्याण हो रहा है।
लेकिन एक बात का ध्यान रखना चाहिए—यदि कोई व्यक्ति प्रसाद का अनादर करता हो, उसका अपमान करता हो या उसे सामान्य भोजन समझकर फेंक देता हो, तो ऐसे व्यक्ति को प्रसाद देने में सावधानी रखनी चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का प्रसाद केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि अंतःकरण को पवित्र करने के लिए होता है।
इसलिए हमें प्रसाद वितरण में भेदभाव नहीं करना चाहिए। प्रेम और श्रद्धा से सभी को प्रसाद देना चाहिए। भगवान की कृपा कब किसके जीवन को बदल दे, यह कोई नहीं जानता।
प्रश्न 2: जिन्होंने हमारा मन दुखाया, उनके प्रति गलत भाव कैसे रोकें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जिन्होंने हमारा मन दुखाया, वास्तव में उन्होंने हमारे पाप कर्मों को नष्ट करने का कार्य किया। इसलिए उनके प्रति द्वेष रखने के बजाय हमें यह भावना रखनी चाहिए कि “भगवान उनका मंगल करें।”
महाराज जी कहते हैं कि जो व्यक्ति हमें दुख देता है, वह केवल निमित्त होता है। वास्तव में हमारे ही पूर्व कर्म उसकी बुद्धि में बैठकर हमें दुख भोगवाते हैं।
यदि हम उसके प्रति क्रोध, बदला या कटु भावना रखते हैं, तो नया कर्म बन जाता है और वही आगे फिर दुख देता है।
इसलिए अध्यात्म कहता है—सहन करो और भगवत भाव रखो।
महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी से द्वेष हो रहा हो, तो उसके प्रति मन में बार-बार प्रणाम करो और भगवान से उसके मंगल की प्रार्थना करो। धीरे-धीरे द्वेष समाप्त हो जाएगा।
उन्होंने अपने अनुभव से कहा कि जो साधक ऐसा करता है, उसके पाप भी कटते हैं और मन भी शांत हो जाता है।
सच्ची साधना केवल माला जपना नहीं, बल्कि अपने भीतर द्वेष और बदले की भावना को समाप्त करना भी है।
जब सबमें भगवान का अंश दिखाई देने लगे, तब मन वास्तव में निर्मल होने लगता है।
प्रश्न 3: बार-बार अपमान करने वाले के प्रति व्यवहार कैसा रखें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति बार-बार अपमान या कष्ट देता है, तो उसके प्रति न अत्यधिक मित्रता रखनी चाहिए और न शत्रुता। इसे ही “उदासीन भाव” कहते हैं।
अच्छा व्यवहार करके भी यदि सामने वाला दुख दे रहा है, तो अत्यधिक निकटता उचित नहीं। लेकिन बदले की भावना रखना भी गलत है।
महाराज जी कहते हैं कि साधक को भीतर से यह समझना चाहिए कि सामने वाला केवल हमारे कर्मों का माध्यम है।
यदि हम प्रतिशोध लेने लगेंगे, तो हमारा भजन नष्ट होगा, तपस्या नष्ट होगी और मन अशांत हो जाएगा।
इसलिए सहनशीलता और भगवान का स्मरण आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई माला जप रहा हो, तो उसके भजन में विघ्न नहीं डालना चाहिए। बल्कि उसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान उसे अपने में और लगाएं।
सच्चा साधक वही है जो दूसरों को दुख नहीं देता और स्वयं आने वाले दुख को सह लेता है।
यही भजन की शैली है।
जब साधक इस मार्ग पर स्थिर हो जाता है, तब उसका मन बदले की भावना से मुक्त होकर भगवान में लगने लगता है।
प्रश्न 4: गुस्से में गलत बोल देने के बाद क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि काम, क्रोध और लोभ नरक के मार्ग हैं। गुस्से में गलत बोल देना साधारण बात नहीं, बल्कि यह मन की अशुद्धि का संकेत है।
यदि क्रोध में किसी के प्रति कटु शब्द निकल जाएं, तो उसके बाद होने वाला सच्चा पश्चाताप सुधार का कारण बन सकता है।
महाराज जी कहते हैं कि उस समय स्वयं को सावधान करना चाहिए और भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसका प्रयास करना चाहिए।
यदि मन में भीतर-ही-भीतर क्रोध उठ रहा हो, तो उसी समय नाम-जप शुरू कर देना चाहिए—“राधा राधा”, “कृष्ण कृष्ण” या गुरु मंत्र का स्मरण।
नाम-जप मन की उग्रता को शांत करता है।
महाराज जी कहते हैं कि असली साधना यही है कि मन में उठते हुए नकारात्मक विचारों को वहीं रोक दिया जाए।
यदि साधक तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय भगवान का स्मरण करे, तो धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगता है।
क्रोध को उचित ठहराना नहीं चाहिए।
जो व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध को पहचानकर उसे रोकने का प्रयास करता है, वही वास्तविक साधक है।
प्रश्न 5: क्या किसी के अहित के लिए चौपाइयों या मंत्रों का प्रयोग करना उचित है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान के नाम, मंत्र, चौपाइयाँ और शास्त्र लोकमंगल के लिए हैं, किसी के अहित या विनाश के लिए नहीं।
यदि कोई व्यक्ति मंत्रों या चौपाइयों का उपयोग किसी को हानि पहुंचाने, श्राप देने या बदला लेने के लिए करता है, तो वह अध्यात्म के मार्ग से गिर जाता है।
महाराज जी कहते हैं कि भजन का उद्देश्य मन को निर्मल करना है, न कि द्वेष को बढ़ाना।
जो व्यक्ति भगवान के नाम का उपयोग किसी के द्रोह के लिए करता है, उसका अंतःकरण और अधिक अशांत हो जाता है।
सच्चे संत कभी किसी के लिए बुरा नहीं सोचते।
वे यहां तक प्रार्थना करते हैं कि जिन्होंने उन्हें दुख दिया, उनका भी कल्याण हो।
महाराज जी कहते हैं कि यदि साधक भगवान के नाम को हथियार बना लेगा, तो उसका भजन निष्फल हो जाएगा।
इसलिए चौपाइयों और मंत्रों का उपयोग केवल आत्मशुद्धि, भगवान की प्राप्ति और लोकमंगल के लिए करना चाहिए।
जो साधक दूसरों के लिए मंगल भाव रखता है, भगवान स्वयं उसके जीवन का भार संभाल लेते हैं।
अध्यात्म का मार्ग प्रेम, क्षमा और दया का मार्ग है—प्रतिशोध का नहीं।
प्रश्न 6: जब मन बार-बार बुराई और विषयों की ओर भागे तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं that मन का स्वभाव बाहर की ओर भागना है। वर्षों से मन विषयों, भोगों और वासनाओं में लगा हुआ है, इसलिए साधना शुरू करते ही उसका तुरंत शांत हो जाना संभव नहीं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भगवत प्राप्ति असंभव है।
महाराज जी कहते हैं कि जैसे गंदा पानी लगातार स्वच्छ जल मिलने पर धीरे-धीरे साफ होने लगता है, वैसे ही नाम-जप और सत्संग से मन भी शुद्ध होने लगता है।
यदि मन बार-बार बुराई की ओर जाए, तो निराश नहीं होना चाहिए।
बल्कि उसी समय भगवान का नाम पकड़ लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मन को जबरदस्ती दबाने के बजाय उसे बार-बार भगवान की ओर मोड़ना चाहिए।
यह अभ्यास धीरे-धीरे सफल होता है।
महाराज जी कहते हैं कि गलत संग, अशुद्ध आहार और अश्लील दृश्य मन को और चंचल बनाते हैं। इसलिए साधक को अपने वातावरण को भी शुद्ध करना चाहिए।
जब नाम-जप नियमित हो जाता है, तब वही मन जो पहले शत्रु था, धीरे-धीरे भगवान में लगने लगता है।
इसलिए धैर्य, सत्संग और निरंतर नाम-स्मरण ही उपाय हैं।
प्रश्न 7: नाम-जप करते समय मन गंदी बातों में जाए तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना की शुरुआत में मन का भटकना सामान्य बात है।
कई बार साधक नाम-जप करता है, लेकिन मन संसार, वासनाओं या गंदी बातों में चला जाता है। इससे घबराना नहीं चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि यह मन की पुरानी आदतें हैं। वर्षों से मन विषयों में डूबा हुआ था, इसलिए प्रारंभ में वही संस्कार उठते हैं।
लेकिन यदि साधक जप छोड़ देगा, तो मन और अधिक नीचे गिर जाएगा।
इसलिए उपाय है—जप को जारी रखना।
मन भागे तो भी नाम मत छोड़ो।
बार-बार उसे वापस नाम में लगाओ।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम अग्नि की तरह है। जैसे अग्नि गंदगी को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही नाम धीरे-धीरे मन की वासनाओं को नष्ट कर देता है।
यदि साधक निरंतरता रखे, तो एक समय ऐसा आता है जब वही मन भगवान के नाम में आनंद अनुभव करने लगता है।
इसलिए निराश होकर जप बंद नहीं करना चाहिए।
मन का भटकना बीमारी है और नाम-जप उसकी औषधि है।
प्रश्न 8: “नाम नामी अभेद” का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान और उनका नाम अलग नहीं हैं।
जैसे अग्नि का स्मरण करते ही अग्नि की शक्ति का विचार आता है, वैसे ही भगवान का नाम लेने पर भगवान की शक्ति सक्रिय हो जाती है।
शास्त्र कहते हैं—“नाम और नामी अभिन्न हैं।”
अर्थात “राधा”, “कृष्ण”, “राम” या “हरि” नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि स्वयं भगवान का साक्षात स्वरूप हैं।
महाराज जी कहते हैं कि यदि कोई श्रद्धा से नाम जपे, तो भगवान उसी नाम में प्रकट होने लगते हैं।
इसीलिए संत लोग नाम को भगवान से भी अधिक दयालु बताते हैं।
क्योंकि भगवान तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग नाम ही है।
महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप से धीरे-धीरे साधक का हृदय शुद्ध होता है और उसे अनुभव होने लगता है कि नाम केवल ध्वनि नहीं, बल्कि चेतना है।
जब यह अनुभव जागृत हो जाता है, तब साधक नाम लेते-लेते भगवान की उपस्थिति अनुभव करने लगता है।
यही “नाम नामी अभेद” का वास्तविक रहस्य है।
प्रश्न 9: यदि पहले नाम-जप में आनंद आता था लेकिन बाद में बंद हो गया, तो इसका कारण क्या है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभ में भगवान साधक को नाम-जप में थोड़ा रस और आनंद देते हैं ताकि उसका मन भजन की ओर आकर्षित हो जाए।
लेकिन बाद में वही आनंद कम हो जाता है, क्योंकि भगवान साधक की परीक्षा लेते हैं कि वह नाम को “आनंद” के लिए जप रहा था या “भगवान” के लिए।
यदि साधक केवल सुख अनुभव करने के लिए जप कर रहा था, तो रस कम होते ही उसका मन ढीला पड़ जाता है।
महाराज जी कहते हैं कि यही समय वास्तविक साधना का होता है।
जब आनंद न आए, मन न लगे, फिर भी नाम-जप चलता रहे—तभी साधक की निष्ठा सिद्ध होती है।
उन्होंने कहा कि किसान केवल बारिश के दिनों में खेती नहीं करता। वह कठिन समय में भी खेत नहीं छोड़ता।
इसी प्रकार साधक को भी नाम नहीं छोड़ना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि कई बार कुसंग, अपराध, अशुद्ध आहार या अहंकार के कारण भी नाम का रस छिप जाता है।
इसलिए आत्मचिंतन, सत्संग और विनम्रता आवश्यक हैं।
जब साधक धैर्य रखता है, तब भगवान पुनः उसे नाम में गहरा रस प्रदान करते हैं—लेकिन इस बार वह रस पहले से कहीं अधिक स्थायी होता है।
प्रश्न 10: यदि श्रीजी और सद्गुरु एक ही तत्व हैं, तो वे बाहर से उदासीन क्यों दिखते हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सच्चे संत और सद्गुरु भीतर से अत्यंत करुणामय होते हैं, लेकिन बाहर से कई बार उदासीन दिखाई देते हैं।
इसका कारण यह है कि वे संसार के मोह और भावुकता से परे होते हैं।
उनका प्रेम सांसारिक प्रेम जैसा नहीं होता, जिसमें आसक्ति और अपेक्षा हो।
महाराज जी कहते हैं कि सद्गुरु का उद्देश्य साधक को भगवान तक पहुंचाना है, न कि उसे अपने व्यक्तित्व में बांध लेना।
यदि गुरु हर समय बाहरी स्नेह और लाड़ दिखाते रहें, तो साधक गुरु के शरीर में ही अटक सकता है।
इसलिए महापुरुष कई बार बाहर से कठोर या उदासीन दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से वे साधक के कल्याण के लिए निरंतर कार्य कर रहे होते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान की कृपा हमेशा शोर नहीं करती।
जैसे मां कभी बच्चे को कड़वी दवा भी देती है, वैसे ही गुरु कई बार दूरी बनाकर साधक को भीतर से मजबूत करते हैं।
सच्चे गुरु का प्रेम मौन और गहरा होता है।
जो साधक इस रहस्य को समझ लेता है, वह बाहरी व्यवहार देखकर भ्रमित नहीं होता और गुरु चरणों में स्थिर बना रहता है।
प्रश्न 11: वास्तविक भगवत-विरह क्या होता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि वास्तविक भगवत-विरह कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं है।
विरह वह अग्नि है जिसमें साधक भीतर-ही-भीतर भगवान के लिए तड़पता रहता है।
जब भगवान का स्मरण टूटता है, तब हृदय बेचैन हो उठता है—यही वास्तविक विरह है।
महाराज जी कहते हैं कि आजकल कई लोग विरह का अभिनय करते हैं। सार्वजनिक रूप से रोना, चिल्लाना या भाव दिखाना आसान है, लेकिन वास्तविक विरह बहुत गहरा और मौन होता है।
गोपियों का विरह ऐसा था कि उन्हें संसार का कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। उनका प्रत्येक श्वास श्रीकृष्ण के लिए था।
वास्तविक विरह में मनुष्य का मन संसार से हटकर केवल भगवान में लग जाता है।
उसकी रातें स्मरण में बीतती हैं और हृदय में निरंतर पुकार चलती रहती है।
महाराज जी कहते हैं कि यदि विरह वास्तविक हो, तो वह साधक को पवित्र बना देता है।
लेकिन यदि विरह का प्रदर्शन अहंकार या प्रसिद्धि के लिए हो, तो वह भक्ति नहीं, अभिनय है।
इसलिए सच्चा विरह भीतर की साधना है, बाहरी प्रदर्शन नहीं।
प्रश्न 12: संध्या काल में भोजन और कुछ कार्य निषिद्ध क्यों माने गए हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संध्या काल अत्यंत सूक्ष्म और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समय होता है।
यह दिन और रात के मिलन का समय है, इसलिए इस समय वातावरण में विशेष प्रकार की ऊर्जा सक्रिय होती है।
शास्त्रों में संध्या के समय भगवान का स्मरण, दीपदान, जप और प्रार्थना करने का निर्देश दिया गया है।
महाराज जी कहते हैं कि इस समय यदि मनुष्य भोजन, झगड़ा, आलस्य या विषय भोगों में लग जाता है, तो उसका मन भारी और अशांत होने लगता है।
संध्या का समय आत्मचिंतन और भगवान से जुड़ने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।
पुराने समय में लोग संध्या के समय तुलसी के पास दीपक जलाकर भगवान का नाम लेते थे। इससे घर और मन दोनों पवित्र होते थे।
महाराज जी कहते हैं कि आधुनिक जीवन में लोग इस समय मोबाइल, टीवी और व्यर्थ की बातों में खो जाते हैं, इसलिए मानसिक अशांति बढ़ रही है।
यदि साधक प्रतिदिन संध्या समय थोड़ी देर भी नाम-जप करे, तो उसका मन अत्यंत शांत और सात्विक होने लगता है।
प्रश्न 13: जब भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता, तब भगवान उसे क्या देते हैं?
उत्तर:
Premanand Ji Maharaj बताते हैं कि निष्काम भक्ति सबसे ऊँची भक्ति है।
जब भक्त भगवान की सेवा केवल प्रेम से करता है और बदले में कुछ नहीं चाहता, तब भगवान स्वयं उसके अधीन हो जाते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि संसार में यदि हम किसी की सेवा करें और बदले में कुछ न लें, तो सामने वाला व्यक्ति भीतर से हमारे प्रति समर्पित होने लगता है।
इसी प्रकार जब भक्त भगवान से केवल प्रेम करता है और कुछ नहीं मांगता, तब भगवान सोचते हैं—“मैं इसे क्या दूँ?”
अंततः भगवान अपने आपको ही भक्त को समर्पित कर देते हैं।
महाराज जी ने श्रीराम और हनुमान जी का उदाहरण दिया। भगवान श्रीराम ने कहा—“हे हनुमान, मैं तुम्हारे उपकारों से कभी उऋण नहीं हो सकता।”
यही निष्काम भक्ति की महिमा है।
जो भक्त केवल भगवान को चाहता है, भगवान उसके पीछे-पीछे चलते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि मांगने वाली भक्ति कमजोर होती है।
यदि भगवान इच्छा पूरी न करें तो श्रद्धा टूट जाती है। लेकिन निष्काम प्रेम कभी नहीं टूटता।
सच्चा भक्त वही है जो कहे—“भगवान, आपकी इच्छा में ही मेरा मंगल है।”
ऐसे भक्त को अंततः भगवान स्वयं मिल जाते हैं।
प्रश्न 14: कठिन परिस्थितियों और चारों ओर अंधकार होने पर भजन कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब संसार के सभी सहारे टूटने लगते हैं, तभी भगवान का वास्तविक आश्रय प्रकट होता है।
कठिन परिस्थितियाँ साधक को भगवान के और निकट लाने का माध्यम बन सकती हैं।
जब चारों ओर अंधकार हो, कोई सहायता न दिखाई दे और मनुष्य असहाय महसूस करे, तब उसे पूरे हृदय से भगवान को पुकारना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि वही समय सच्ची शरणागति का होता है।
संसार में लोग संकट आने पर इधर-उधर भागते हैं, लेकिन जिसने भजन किया होता है, उसका मन तुरंत भगवान की ओर मुड़ जाता है।
वह कहता है—“हे प्रभु, अब आपके सिवा मेरा कोई नहीं।”
ऐसी पुकार बहुत शक्तिशाली होती है।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान की स्मृति समस्त विपत्तियों का नाश करने वाली है।
यदि संकट के समय नाम-जप शुरू कर दिया जाए, तो भीतर अद्भुत साहस और शांति आने लगती है।
संकट तुरंत समाप्त हो या न हो, लेकिन भगवान साधक को उसे सहने की शक्ति अवश्य दे देते हैं।
इसलिए कठिन समय में निराश नहीं होना चाहिए।
वही समय भगवान के सबसे निकट आने का अवसर होता है।
प्रश्न 15: यदि जीवन में सब ठीक हो लेकिन भीतर साधना अधूरी लगे तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल संसार में सफल हो जाना ही जीवन की पूर्णता नहीं है।
धन, पद, परिवार और सम्मान होने पर भी यदि भगवान का भजन नहीं हुआ, तो भीतर खालीपन बना रहता है।
मनुष्य शरीर केवल भोगों के लिए नहीं, बल्कि भगवान की प्राप्ति के लिए मिला है।
महाराज जी कहते हैं कि शरीर छूटने के बाद धन, मकान और पद साथ नहीं जाएंगे। केवल भगवान का नाम और शुभ कर्म ही साथ जाएंगे।
इसलिए यदि भीतर यह भावना उठ रही है कि “साधना अभी अधूरी है”, तो यह भगवान की कृपा है।
यह संकेत है कि आत्मा केवल संसार से संतुष्ट नहीं होना चाहती।
महाराज जी कहते हैं कि चाहे नौकरी, व्यापार या परिवार कितना भी व्यस्त हो, भगवान के नाम के लिए समय निकालना ही चाहिए।
यदि रोज थोड़ा-सा भी नाम-जप नियमित हो जाए, तो धीरे-धीरे जीवन का संतुलन बनने लगता है।
उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी सफलता भगवान का स्मरण है।
यदि मृत्यु के समय भगवान का नाम चल रहा हो, तो जीवन सफल हो जाता है।
इसलिए अभी से नाम-जप शुरू कर देना चाहिए।
प्रश्न 16: क्या अधर्म से कमाया गया धन दुख और अशांति लाता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अधर्म और बेईमानी से कमाया गया धन बाहर से सुखद दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से वह विष के समान होता है।
ऐसा धन मनुष्य की बुद्धि को दूषित कर देता है।
महाराज जी ने उदाहरण दिया कि जैसे विष का स्वभाव मारना है, वैसे ही अधर्म का धन अंततः दुख और विनाश का कारण बनता है।
उन्होंने एक कथा सुनाई जिसमें कुछ लोगों को रास्ते में अशर्फियों की थैली मिली। लालच बढ़ा और अंत में वे एक-दूसरे को मार बैठे।
धन वहीं पड़ा रह गया, लेकिन उनका जीवन समाप्त हो गया।
महाराज जी कहते हैं कि बेईमानी का धन परिवार में अशांति, तनाव, रोग और मानसिक विक्षेप पैदा करता है।
बाहर से सब ठीक दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर चैन समाप्त हो जाता है।
इसलिए साधक को धर्मपूर्वक कमाना चाहिए, चाहे कम ही क्यों न हो।
सादा जीवन और शांत नींद अधर्म के ऐश्वर्य से कहीं श्रेष्ठ है।
यदि पहले कभी गलत धन आ गया हो, तो उसका उपयोग गौसेवा, गरीबों की सहायता और लोकमंगल में कर देना चाहिए।
धर्म की कमाई ही स्थायी सुख और भगवान की कृपा दिलाती है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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