माला-1262: दूसरों से तुलना करना कैसे छोड़ें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, दूसरों से तुलना करना कैसे छोड़ें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि दूसरों से तुलना करने की आदत मनुष्य को कभी संतोष नहीं लेने देती। जब हम किसी के पास गाड़ी, पैसा, पद या प्रतिष्ठा देखते हैं, तो हमें लगता है कि हम पीछे रह गए हैं। लेकिन यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है।

महाराज जी ने उदाहरण दिया कि एक लड़के ने पहले साइकिल देखी, फिर मोटरसाइकिल, फिर कार और अंत में हेलीकॉप्टर की इच्छा करने लगा। यही संसार का स्वभाव है—तुलना और असंतोष।

महाराज जी कहते हैं कि ऊपर देखने से कभी शांति नहीं मिलेगी। अपने से नीचे देखने पर समझ आता है कि भगवान ने हम पर कितनी कृपा की है। हमें भोजन मिलता है, शरीर स्वस्थ है, देखने-सुनने की शक्ति मिली है—यह भी बहुत बड़ी कृपा है।

साथ ही, तुलना करनी ही है तो अध्यात्म में करो। यह देखो कि कौन भगवान के नाम में आगे बढ़ रहा है।

महाराज जी कहते हैं कि संतोष सबसे बड़ा धन है। जब साधक भगवान का नाम पकड़ लेता है, तब संसार की दौड़ धीरे-धीरे महत्वहीन लगने लगती है।

इसलिए समाधान है—संतोष, नाम-जप और भगवान की कृपा को पहचानना।


प्रश्न 2: मन निर्मल हो रहा है, यह कैसे पहचानें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब मन निर्मल होने लगता है, तो उसका अनुभव साधक को स्वयं होने लगता है। जैसे पेट भरने पर किसी दूसरे से पूछने की जरूरत नहीं होती कि “हमारा पेट भर गया या नहीं”, वैसे ही अंतःकरण की शुद्धि का अनुभव भीतर से होने लगता है।

मन निर्मल होने का पहला लक्षण है—भगवान का स्मरण सहज और निरंतर होने लगना। पहले मन बार-बार संसार की ओर भागता था, लेकिन अब नाम-जप और भगवान का चिंतन प्रिय लगने लगता है।

दूसरा लक्षण है—भोगों में अरुचि। जब तक शरीर और इंद्रियों के सुखों में आनंद लगता है, तब तक मन मलिन है। लेकिन जैसे-जैसे मन शुद्ध होता है, वैसे-वैसे सांसारिक भोग फीके लगने लगते हैं।

तीसरा लक्षण है—संतों और भगवत चर्चा में प्रेम बढ़ना।

महाराज जी कहते हैं कि जब जरा-सा भगवत विस्मरण होने पर भीतर बेचैनी होने लगे और भगवान के नाम में आनंद आने लगे, तब समझना चाहिए कि मन निर्मल हो रहा है।

इसलिए नाम-जप, सत्संग और भगवत स्मरण ही मन की शुद्धि का मार्ग है।


प्रश्न 3: संसार में रहकर भगवान की प्राप्ति कैसे करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान की प्राप्ति केवल जंगल, आश्रम या संन्यास में ही नहीं होती। यदि कोई गृहस्थ धर्मपूर्वक जीवन जीते हुए भगवान का नाम-जप करे, तो वह भी भगवत प्राप्ति कर सकता है।

उन्होंने महाभारत का प्रसंग सुनाया कि एक पतिव्रता स्त्री और एक कसाई भी अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भगवत तत्व को प्राप्त हो गए। इसका अर्थ है कि स्थान नहीं, बल्कि आचरण और भाव महत्वपूर्ण हैं।

महाराज जी कहते हैं कि गृहस्थ को अपने माता-पिता, गुरु, परिवार और समाज की सेवा करनी चाहिए। साथ ही, अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करते हुए नाम-जप करना चाहिए।

यदि गृहस्थ जीवन में रहते हुए व्यक्ति सत्य, सेवा और भक्ति को अपनाता है, तो उसका घर ही साधना का स्थान बन जाता है।

संसार “आग” तभी बनता है जब उसमें आसक्ति हो। यदि उसी संसार में रहकर भगवान को केंद्र बना लिया जाए, तो वही संसार भगवत मार्ग बन जाता है।

इसलिए गृहस्थ जीवन कोई बाधा नहीं है—गलत आचरण बाधा है। सही जीवन और नाम-जप से गृहस्थ भी भगवान को प्राप्त कर सकता है।


प्रश्न 4: क्या गृहस्थ जीवन में रहकर भगवत प्राप्ति संभव है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि शास्त्रों में दो मार्ग बताए गए हैं—निवृत्ति मार्ग (वैराग्य/संन्यास) और प्रवृत्ति मार्ग (गृहस्थ जीवन)। दोनों मार्गों से भगवान की प्राप्ति संभव है, यदि साधक धर्मपूर्वक चले।

उन्होंने राजा जनक और महाराज अंबरीष का उदाहरण दिया, जो राजकार्य करते हुए भी महान भक्त और ज्ञानी थे। इसका अर्थ है कि भगवत प्राप्ति केवल त्यागियों के लिए सीमित नहीं है।

गृहस्थ व्यक्ति यदि धर्मपूर्वक धन कमाए, परिवार का पालन करे, संत सेवा करे, अतिथि सेवा करे और निरंतर भगवान का नाम जपे, तो उसे भी मोक्ष और भगवत प्रेम प्राप्त हो सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि त्याग बाहरी वस्तुओं का नहीं, बल्कि “राग” का होना चाहिए। यदि कोई संन्यासी होकर भी अपने कमंडल या कुटिया से आसक्त है, तो वह भी बंधन में है।

इसलिए गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि मन भगवान में है और कर्म समर्पित हैं, तो वही सच्ची साधना है।

भगवान भाव देखते हैं, वेश नहीं।


प्रश्न 5: बुढ़ापे में भजन कैसे शुरू करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि युवावस्था में भजन करना आसान होता है, क्योंकि शरीर और मन में शक्ति होती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वृद्धावस्था में भजन संभव नहीं है।

यदि व्यक्ति में अभी भी चेतना है, बुद्धि काम कर रही है और भगवान की ओर मुड़ने की इच्छा है, तो भजन शुरू किया जा सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि समस्या तब होती है जब पूरा जीवन संसार में बीत जाता है और बुढ़ापे में भी मन केवल परिवार, शिकायत और चिंता में उलझा रहता है।

लेकिन यदि वृद्धावस्था में भी कोई सच्चे भाव से नाम-जप शुरू कर दे, तो उसका कल्याण निश्चित है।

उन्होंने अजामिल का उदाहरण दिया, जिसने अंतिम समय में “नारायण” नाम लिया और उसका उद्धार हो गया।

इसलिए निराश नहीं होना चाहिए। अभी से नाम-जप शुरू कर देना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम किसी भी अवस्था में मंगल करने वाला है। यदि श्रद्धा से नाम पकड़ लिया जाए, तो जीवन के अंतिम समय में भी भगवत कृपा प्राप्त हो सकती है।


प्रश्न 6: संत के इशारे से तत्वज्ञान कैसे समझें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल संत का “इशारा” तभी समझ में आता है जब साधक का हृदय शुद्ध और तैयार हो।

उन्होंने राजा जनक और अष्टावक्र जी का उदाहरण दिया। अष्टावक्र जी ने जनक को क्षण भर में ब्रह्मज्ञान दिया, क्योंकि जनक पहले से तैयार साधक थे।

लेकिन सामान्य मनुष्य अभी देहाभिमान, भोग और इच्छाओं में फंसा हुआ है। उसका मन संसार में आसक्त है, इसलिए वह सूक्ष्म संकेत नहीं समझ पाता।

महाराज जी कहते हैं कि जब तक अंतःकरण पवित्र नहीं होगा, तब तक ब्रह्मज्ञान केवल शब्द बनकर रह जाएगा।

इसलिए पहले नाम-जप, सत्संग और साधना से मन को शुद्ध करना आवश्यक है।

जब साधक की वासनाएं कम होती हैं और मन भगवान में लगने लगता है, तब संत का छोटा-सा संकेत भी भीतर गहराई तक उतर जाता है।

इसलिए इशारा समझने से पहले पात्रता बनानी पड़ती है।


प्रश्न 7: ब्रजवासी अपने स्वरूप को कैसे पहचानें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि ब्रजवासी का वास्तविक स्वरूप तभी प्रकट होता है जब उसके भीतर श्रीकृष्ण के प्रति “अपनापन” जागृत हो जाता है।

ब्रज का भाव केवल भगवान को दूर बैठा ईश्वर मानना नहीं है। ब्रजवासी श्रीकृष्ण को अपना मित्र, पुत्र, प्रियतम या घर का सदस्य मानते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि ब्रजभाव में औपचारिकता नहीं होती—वह आत्मीयता होती है। जैसे ब्रज की गोपियां श्रीकृष्ण को “लाला” कहकर बुलाती थीं।

जब साधक के भीतर यह भाव आ जाता है कि “श्रीकृष्ण मेरे हैं”, तभी उसका वास्तविक ब्रजस्वरूप जागता है।

भगवान को केवल “भगवान” मानने में दूरी है, लेकिन “अपना” मानने में प्रेम है।

इसलिए ब्रजवासी को अपने संबंध का अनुभव करना चाहिए—क्या कृष्ण मेरे मित्र हैं, स्वामी हैं, प्रियतम हैं या पुत्र हैं?

यही संबंध साधक को उसके वास्तविक स्वरूप का अनुभव कराता है।


प्रश्न 8: पापों का प्रायश्चित क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि इस जन्म में किए गए पापों का सबसे बड़ा प्रायश्चित है—भगवान का नाम-संकीर्तन।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि “नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम्”—भगवान का नाम समस्त पापों का नाश कर देता है।

लेकिन केवल नाम लेना ही नहीं, साथ में यह दृढ़ निश्चय भी करना चाहिए कि अब वही पाप दोबारा नहीं करेंगे।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान का नाम अग्नि के समान है। जैसे अग्नि सब कुछ जला देती है, वैसे ही नाम पाप और पाप प्रवृत्ति दोनों को नष्ट कर देता है।

चाहे पाप वर्तमान के हों, भूतकाल के हों या भविष्य में हो जाएं—नाम-जप सबका शुद्धिकरण करता है।

इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है।

यदि साधक सच्चे भाव से “राधा”, “कृष्ण”, “राम” या हरिनाम का जप करे, तो उसका अंतःकरण शुद्ध होने लगता है और धीरे-धीरे जीवन बदलने लगता है।


प्रश्न 9: क्या भोग और मोक्ष साथ संभव हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि समस्या “भोग” नहीं, बल्कि “राग” है। यदि व्यक्ति भोगों में आसक्त हो जाए, तो वही बंधन बन जाते हैं।

लेकिन यदि गृहस्थ अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करे, धर्मपूर्वक धन कमाए और सेवा भाव रखे, तो वही जीवन मोक्ष का साधन बन सकता है।

उन्होंने राजा जनक और अंबरीष का उदाहरण दिया, जो राजमहलों में रहते हुए भी भगवान में स्थित थे।

महाराज जी कहते हैं कि गृहस्थ व्यक्ति को अपने धन और साधनों का उपयोग संत सेवा, समाज सेवा और भगवान की सेवा में करना चाहिए।

यदि मन भगवान में है और कर्म समर्पित हैं, तो भोग भी बंधन नहीं बनते।

लेकिन यदि केवल विषय भोग और स्वार्थ में जीवन बीते, तो पतन निश्चित है।

इसलिए भोगों के बीच रहते हुए भी “राग” का त्याग करना आवश्यक है।

तभी गृहस्थ जीवन मोक्ष का मार्ग बन सकता है।


प्रश्न 10: क्या ज्ञान और प्रेम विरोधी हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि ज्ञान और प्रेम विरोधी नहीं हैं, लेकिन प्रेम ज्ञान से ऊंची अवस्था है।

ज्ञान से साधक भगवान को समझता है, लेकिन प्रेम में वह भगवान में खो जाता है।

उन्होंने उद्धव और गोपियों का उदाहरण दिया। उद्धव महान ज्ञानी थे, लेकिन जब वे ब्रज पहुंचे और गोपियों का प्रेम देखा, तब उन्हें अनुभव हुआ कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है।

गोपियों के प्रेम में ऐसी तन्मयता थी कि उन्हें अपने शरीर, मान या संसार की सुध नहीं रहती थी। यही प्रेम की चरम अवस्था है।

महाराज जी कहते हैं कि ज्ञान बिना प्रेम के सूखा है। यदि भगवान के चरणों में भाव नहीं जागा, तो ज्ञान अधूरा है।

इसलिए कबीरदास जी ने कहा—“ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।”

अंततः साधक को प्रेम तक पहुंचना ही होता है। ज्ञान साधन हो सकता है, लेकिन साध्य प्रेम है।


प्रश्न 11: नाम-जप से जीवन क्यों बदलने लगता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम स्वयं भगवान से भी अधिक प्रभावशाली माना गया है। नाम में इतनी शक्ति है कि वह मनुष्य के भीतर की पाप प्रवृत्तियों को नष्ट करके उसे भगवत आनंद से भर देता है।

नाम-जप का प्रभाव धीरे-धीरे जीवन में दिखाई देने लगता है। पहले मन अशांत रहता है, लेकिन निरंतर जप से भीतर स्थिरता आने लगती है।

महाराज जी कहते हैं कि नाम केवल शब्द नहीं है—वह साक्षात दिव्य शक्ति है।

जब साधक श्रद्धा से नाम जपता है, तो उसका प्रारब्ध भी सहज लगने लगता है। पहले जो दुख असहनीय लगते थे, वही भगवान की कृपा जैसे अनुभव होने लगते हैं।

नाम मन को शुद्ध करता है, बुद्धि को स्थिर करता है और भगवान से संबंध जोड़ता है।

इसलिए महाराज जी बार-बार कहते हैं—“मन लगे या न लगे, नाम-जप करते रहो।”

धीरे-धीरे वही नाम साधक के जीवन को बदल देता है और उसे भीतर से आनंदमय बना देता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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