माला-1270:क्या आत्मा सच में होती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,क्या आत्मा सच में होती है? उसका वास्तविक स्वरूप क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि आत्मा केवल कल्पना नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का वास्तविक आधार है। मनुष्य सामान्यतः अपने शरीर को ही “मैं” मान लेता है, जबकि शरीर तो केवल एक ढांचा है।

महाराज जी समझाते हैं कि हम कहते हैं—“मेरा हाथ”, “मेरी आंख”, “मेरा शरीर”, “मेरा मन”, “मेरी बुद्धि”। जब हम “मेरा” कहते हैं, तो इसका अर्थ है कि वह वस्तु “मैं” नहीं है। शरीर, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार सब “मेरे” हैं, लेकिन “मैं” उनसे अलग हूं।

वही “मैं” आत्मा है।

महाराज जी बिजली का उदाहरण देते हैं। जैसे बिजली दिखाई नहीं देती, लेकिन उसी से पंखा चलता है, बल्ब जलता है और मशीनें कार्य करती हैं, वैसे ही आत्मा दिखाई नहीं देती, लेकिन उसी के कारण शरीर जीवित है।

जब आत्मा शरीर से निकल जाती है, तब वही शरीर मृत कहलाता है।

आत्मा शुद्ध, चेतन और आनंद स्वरूप है। वही ब्रह्म है, वही परमात्मा का अंश है।

लेकिन केवल सुन लेने से आत्मबोध नहीं होता। इसके लिए साधना, गुरु आश्रय और अनुभव आवश्यक है।

जब साधक वास्तव में अनुभव कर लेता है कि “मैं शरीर नहीं, आत्मा हूं”, तब जन्म-मरण का भय समाप्त होने लगता है और जीवन में शांति प्रकट होती है।


प्रश्न 2: क्या केवल सुन लेने से आत्मज्ञान हो जाता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल सुन लेना या पढ़ लेना वास्तविक ज्ञान नहीं है। यह प्रारंभिक जानकारी हो सकती है, लेकिन आत्मज्ञान तब तक नहीं होता जब तक उसका अनुभव न हो जाए।

उन्होंने हलवा बनाने का उदाहरण दिया। यदि कोई व्यक्ति हलवा बनाने की पूरी विधि कंठस्थ कर ले—कितना आटा, कितना घी और कितनी चीनी चाहिए—तो भी उसकी भूख नहीं मिटेगी। भूख तभी मिटेगी जब वह हलवा बनाकर खाएगा।

इसी प्रकार आत्मा के बारे में सुन लेना पर्याप्त नहीं है।

महाराज जी कहते हैं कि शास्त्र, प्रवचन और सत्संग मार्ग दिखाते हैं, लेकिन वास्तविक अनुभव साधना से आता है।

जब साधक गुरु के बताए मार्ग पर चलकर नाम-जप, ध्यान और भजन करता है, तब धीरे-धीरे आत्मबोध का अनुभव होने लगता है।

केवल बोल देने से कि “मैं आत्मा हूं” मुक्ति नहीं होती।

जब यह अनुभव भीतर स्थिर हो जाता है कि “मैं शरीर नहीं, शुद्ध चेतन आत्मा हूं”, तभी वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है।

इसलिए साधना के बिना ज्ञान अधूरा है।

महाराज जी कहते हैं कि अनुभवयुक्त ज्ञान ही मुक्ति देता है, केवल शब्दों का ज्ञान नहीं।


प्रश्न 3: साधना की शुरुआत कहाँ से होती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना की शुरुआत संत-संग और गुरु आश्रय से होती है। जब तक मनुष्य को किसी महापुरुष का मार्गदर्शन नहीं मिलता, तब तक वह आध्यात्मिक मार्ग में स्थिर नहीं हो पाता।

सत्संग मनुष्य के भीतर प्रश्न जगाता है—“मैं कौन हूं?”, “जीवन का उद्देश्य क्या है?”, “भगवान की प्राप्ति कैसे होगी?”

यही प्रश्न साधना की शुरुआत बनते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि गुरु केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि साधक के जीवन की दिशा बदल देते हैं।

जब साधक अपना जीवन गुरु के चरणों में समर्पित करके उनके बताए नियमों के अनुसार भजन करता है, तब धीरे-धीरे उसकी स्थिति बदलने लगती है।

साधना क्रमबद्ध प्रक्रिया है। पहले सत्संग, फिर नाम-जप, फिर मन की शुद्धि और अंत में आत्मबोध।

महाराज जी कहते हैं कि साधना में धैर्य आवश्यक है। तुरंत अनुभव पाने की जल्दी नहीं करनी चाहिए।

जैसे बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है, वैसे ही साधना को भी समय चाहिए।

यदि साधक निरंतरता और श्रद्धा बनाए रखे, तो अंततः उसे भगवान का अनुभव अवश्य होता है।


प्रश्न 4: क्या संत अपने भजन और तपस्या का फल दूसरों को दे सकते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सच्चे संत अपने भजन, तपस्या और पुण्य का उपयोग केवल अपने लिए नहीं करते। उनके हृदय में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना होती है।

वे चाहते हैं कि सबका मंगल हो, सब दुखों से मुक्त हों और भगवान की कृपा प्राप्त करें।

यदि कोई संत अपने भजन का फल किसी दुखी जीव के कल्याण के लिए समर्पित करते हैं, तो उनका पुण्य कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है।

क्योंकि भगवान उस करुणा से प्रसन्न होते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि जब साधक दूसरों के सुख के लिए भगवान से प्रार्थना करता है, तो वह सेवा भी भगवान को ही अर्पित होती है।

इसलिए संतों का भजन केवल व्यक्तिगत नहीं होता, बल्कि लोकमंगल का माध्यम बन जाता है।

लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वार्थ या राग-द्वेष से किसी को आशीर्वाद देता है, तो उसका प्रभाव अलग होता है।

सच्चे महापुरुष व्यक्तिगत पक्षपात नहीं करते। वे सार्वजनिक मंगल की भावना रखते हैं।

यही कारण है कि संतों की करुणा अनगिनत लोगों के जीवन को बदल देती है।


प्रश्न 5: आशीर्वाद और लोकमंगल हेतु किए गए भजन में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि आशीर्वाद और लोकमंगल के भाव में बहुत अंतर है।

यदि कोई व्यक्ति किसी खास व्यक्ति के प्रति राग या मोह के कारण आशीर्वाद देता है—जैसे “तुम्हें पुत्र होगा” या “तुम्हें धन मिलेगा”—तो वह व्यक्तिगत संबंध और भावना से जुड़ा होता है।

लेकिन लोकमंगल का भाव व्यापक होता है।

संत कहते हैं—“सब सुखी रहें, सब निरोग रहें, सबका कल्याण हो।”

इसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं होता।

महाराज जी कहते हैं कि जब संत अपना भजन और तपस्या भगवान को समर्पित करके समस्त जीवों के मंगल की भावना करते हैं, तब भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

ऐसा भजन साधक को भगवत प्राप्ति की ओर ले जाता है।

लेकिन यदि भजन का उपयोग केवल किसी व्यक्तिगत इच्छा पूर्ति के लिए किया जाए, तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव सीमित हो जाता है।

सच्चे संत न तो किसी को श्राप देते हैं और न व्यक्तिगत पक्षपात करते हैं।

वे केवल भगवान की प्रसन्नता चाहते हैं।

यही कारण है कि उनके हृदय में समता और करुणा बनी रहती है।

प्रश्न 6: मन हमारा मित्र है या शत्रु?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मन न तो पूर्ण रूप से मित्र है और न पूर्ण रूप से शत्रु। मन के दो विभाग हैं—“सत विभाग” और “असत विभाग”।

जब मन सतोगुण से प्रभावित होता है, तब वह साधक को भजन, सत्संग, दान, तीर्थ और शास्त्र स्वाध्याय के लिए प्रेरित करता है। उस समय वही मन मित्र बन जाता है।

लेकिन जब रजोगुण और तमोगुण बढ़ जाते हैं, तब वही मन आलस्य, प्रमाद, भोग, क्रोध, द्वेष और वासनाओं की ओर ले जाता है। उस समय वही मन शत्रु बन जाता है।

महाराज जी कहते हैं कि साधक को विवेक द्वारा यह पहचानना सीखना चाहिए कि कौन-सी प्रेरणा “सत” है और कौन-सी “असत”।

यह विवेक सत्संग, शास्त्र अध्ययन और सात्विक जीवन से जागृत होता है।

जब मन गलत दिशा में खींचे, तब उसकी असत प्रेरणाओं को नकारना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि मन को नकारने पर भीतर जलन होती है, क्योंकि वासनाएं तड़पती हैं। लेकिन जो उस जलन को सह लेता है, वही परमात्मा प्राप्ति के योग्य बनता है।

इसलिए मन को शत्रु मानकर दबाना नहीं, बल्कि सत्संग और नाम-जप से उसे शुद्ध करके मित्र बनाना चाहिए।


प्रश्न 7: मृत्यु के समय गुरुदेव या इष्ट—किसका स्मरण करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि वास्तविक भक्ति में गुरुदेव और इष्ट अलग नहीं रहते।

जब साधक की भक्ति परिपक्व हो जाती है, तब उसे अनुभव होने लगता है कि गुरुदेव ही साक्षात परमात्मा का स्वरूप हैं।

इसलिए मृत्यु के समय यह विचार ही नहीं रहना चाहिए कि “गुरु का स्मरण करें या भगवान का।”

यदि यह द्वैत बना हुआ है, तो अभी साधना अधूरी है।

महाराज जी कहते हैं—“गुरु साक्षात् परब्रह्म।” गुरु ही भगवान तक पहुंचाने वाले नहीं, बल्कि स्वयं भगवान के प्रकट स्वरूप हैं।

जब साधक गुरु मंत्र और गुरु चरणों में पूर्ण तादात्म्य कर लेता है, तब इष्ट का दर्शन भी गुरु में होने लगता है।

ऐसी स्थिति में मृत्यु के समय अलग-अलग स्मरण करने की आवश्यकता नहीं रहती।

जिसके हृदय में गुरुदेव के प्रति गाढ़ प्रेम है, वही प्रेम उसे परमात्मा तक पहुंचा देता है।

महाराज जी कहते हैं कि जहां गुरु और भगवान में भेद समाप्त हो जाए, वहीं जीवनमुक्ति की शुरुआत होती है।

इसलिए साधक को गुरु और इष्ट में भेद नहीं रखना चाहिए।


प्रश्न 8: क्या ऐशो-आराम और भोग-विलास गलत हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि समस्या धन या साधनों में नहीं, बल्कि भोग-विलास की आसक्ति में है।

जब मनुष्य ऐशो-आराम को ही जीवन का लक्ष्य बना लेता है, तब वह धीरे-धीरे धर्म से दूर होने लगता है।

भोग-विलास वासनाओं को बढ़ाते हैं और मनुष्य को व्यभिचार, नशा, झूठ, हिंसा और पाप की ओर ले जा सकते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि यदि धन और संसाधनों का उपयोग केवल स्वयं के सुख के लिए किया जाए, तो वह भव रोग को बढ़ाने वाला बन जाता है।

लेकिन यदि वही धन धर्म, गौसेवा, मंदिर निर्माण, गरीबों की सहायता और लोकमंगल में लगाया जाए, तो वही भगवान की प्राप्ति का साधन बन सकता है।

उन्होंने समझाया कि गृहस्थ को सादगी और धर्म से जीवन जीना चाहिए।

धन हो, लेकिन उसके कारण अहंकार और पापाचार न बढ़े।

महाराज जी कहते हैं कि भोग-विलास बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं।

इसलिए धन का सदुपयोग करना चाहिए, न कि उसमें डूब जाना चाहिए।

जब मनुष्य अपनी संपत्ति को भगवान की देन मानकर लोककल्याण में लगाता है, तब वही धन साधना का माध्यम बन जाता है।


प्रश्न 9: मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल खाना, कमाना, परिवार बनाना और भोग भोगना नहीं है।

यदि मनुष्य जीवन पाकर भी भगवान को नहीं भजा गया, तो यह सबसे बड़ी हानि है।

उन्होंने अपने बचपन का अनुभव बताया कि मृत्यु का विचार आते ही उनके भीतर प्रश्न उठा—“जो कभी नष्ट न हो, वह कौन है?”

उसी खोज ने उन्हें भगवान की ओर मोड़ दिया।

महाराज जी कहते हैं कि संसार में सब नश्वर है—शरीर, संबंध, धन और पद।

केवल भगवान ही अविनाशी हैं।

इसलिए मनुष्य को ऐसा संबंध भगवान से जोड़ना चाहिए जो कभी टूटे नहीं।

मनुष्य जन्म दुर्लभ है। अन्य योनियों में भोग तो हैं, लेकिन भजन और आत्मबोध का अवसर नहीं है।

यदि इस जीवन को केवल वासनाओं में खो दिया, तो फिर पुनर्जन्म और दुखों का चक्र चलता रहेगा।

इसलिए धर्मपूर्वक जीवन जीते हुए भगवान का नाम-जप करना ही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है।

यही जीवन को सार्थक बनाता है।


प्रश्न 10: क्या अलग-अलग देवी-देवताओं की भक्ति करना सही है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभिक अवस्था में साधक का मन अलग-अलग देवी-देवताओं की ओर आकर्षित होता है।

कोई शिव चालीसा पढ़ता है, कोई हनुमान चालीसा, कोई दुर्गा सप्तशती—यह सब प्रारंभिक भक्ति में स्वाभाविक है।

क्योंकि सभी रूपों में वही एक परमात्मा विद्यमान हैं।

महाराज जी कहते हैं कि वेद भी कहते हैं—“एकोऽहम बहुस्याम।”

एक ही परमात्मा अनेक रूपों में प्रकट हुए हैं।

लेकिन जब भक्ति में प्रेम का रंग गहरा होने लगता है, तब साधक का मन एक इष्ट में स्थिर होने लगता है।

प्रेम की गली संकरी होती है—उसमें दो नहीं समाते।

मीरा जी की तरह साधक कहता है—“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।”

इसलिए प्रारंभिक अवस्था में अनेक रूपों की भक्ति दोष नहीं है।

लेकिन अंततः अनन्य प्रेम एक ही इष्ट में स्थिर हो जाता है।

यही भक्ति की परिपक्व अवस्था है।

प्रश्न 11: गृहस्थ जीवन में व्यवहार और परमार्थ के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गृहस्थ जीवन कोई बाधा नहीं है। समस्या तब होती है जब मनुष्य धर्म छोड़कर केवल अर्थ और कामनाओं में फंस जाता है।

गृहस्थ धर्म बहुत महान है, क्योंकि इसी से संतों का पालन होता है और समाज चलता है।

लेकिन गृहस्थ जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

महाराज जी कहते हैं कि धर्मपूर्वक धन कमाना चाहिए और उस धन का उपयोग परिवार पालन के साथ-साथ परमार्थ में भी करना चाहिए।

यदि गृहस्थ केवल भोग-विलास, नशा, व्यभिचार और दिखावे में धन खर्च करता है, तो वह न व्यवहार निभा पाता है और न परमार्थ।

इसीलिए संत कहते हैं—“ना इत व्यवहार, ना उत परमार्थ।”

महाराज जी समझाते हैं कि गृहस्थ को अपने कर्तव्य निभाने चाहिए, लेकिन साथ ही भगवान का नाम-जप, सत्संग और सेवा भी करनी चाहिए।

जब धर्म के अनुसार अर्थ कमाया जाए और धर्मपूर्वक कामनाओं की पूर्ति हो, तब वही जीवन मोक्ष की ओर ले जाता है।

गृहस्थ धर्म में रहते हुए भी यदि मन भगवान में है, तो भगवत प्राप्ति संभव है।

इसलिए संतुलन का अर्थ है—कर्तव्य भी निभाना और भगवान को भी न भूलना।


प्रश्न 12: जीवन में आने वाले संशय और दुविधाओं का समाधान कैसे करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधक के जीवन में संशय सबसे बड़ा बाधक है।

यदि हर बात में शंका बनी रहे—“यह मंत्र सही है या नहीं?”, “इससे कल्याण होगा या नहीं?”—तो भक्ति में दृढ़ता नहीं आ पाती।

शास्त्र कहते हैं—“संशयात्मा विनश्यति।”

इसलिए संशय को समाप्त करना आवश्यक है।

महाराज जी कहते हैं कि इसका सबसे सरल उपाय है—गुरु आज्ञा।

यदि साधक अपने गुरुदेव से दिनचर्या और साधना का मार्ग निश्चित कर ले, तो उसके जीवन के अधिकांश भ्रम समाप्त हो जाते हैं।

गुरु आज्ञा में बार-बार तर्क नहीं करना चाहिए।

जब गुरु कहते हैं कि “ऐसा करो”, तो श्रद्धा से पालन करना चाहिए।

साथ ही, भगवान भीतर भी सद्गुरु रूप से संकेत देते हैं।

जब मनुष्य कोई गलत कार्य करने जाता है, तो भीतर से आवाज आती है—“यह गलत है।”

लेकिन मनुष्य वासना और प्रमाद के कारण उस आवाज को अनसुना कर देता है।

यदि साधक भजन और सत्संग करेगा, तो उसका विवेक जागृत होगा और सही मार्ग स्पष्ट होने लगेगा।

इसलिए संशय से बाहर आने के लिए गुरु आश्रय, श्रद्धा और सत्संग आवश्यक हैं।


प्रश्न 13: यदि सभी देवी-देवता एक ही परमात्मा के रूप हैं, तो एकनिष्ठ भक्ति की आवश्यकता क्यों है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभिक अवस्था में साधक अनेक देवी-देवताओं की उपासना करता है और यह गलत नहीं है।

क्योंकि सभी रूप उसी एक परमात्मा के हैं।

लेकिन जब साधना परिपक्व होने लगती है, तब प्रेम एक दिशा में स्थिर हो जाता है।

उन्होंने कहा—“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।”

अर्थात सच्चे प्रेम में मन एक ही में पूर्ण रूप से डूब जाता है।

प्रारंभिक अवस्था में साधक शिव जी, हनुमान जी, माता जी और श्रीकृष्ण—सभी की पूजा कर सकता है।

लेकिन जब हृदय में गाढ़ प्रेम जागता है, तब एक इष्ट के प्रति अनन्यता आ जाती है।

महाराज जी कहते हैं कि मीरा जी ने अंततः केवल श्रीकृष्ण को ही अपना सब कुछ माना।

इसी प्रकार साधक का मन भी अंततः एक में स्थिर हो जाता है।

यह किसी अन्य देवता का विरोध नहीं है, बल्कि प्रेम की परिपक्वता है।

जब प्रेम गहरा होता है, तब साधक अपने इष्ट में ही समस्त देवताओं का दर्शन करने लगता है।

यही एकनिष्ठ भक्ति की वास्तविक अवस्था है।


प्रश्न 14: भविष्य की चिंता और “कुछ बड़ा पाने” की बेचैनी से मन को कैसे शांत करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य का मन हमेशा भूत, भविष्य और व्यर्थ चिंतन में उलझा रहता है।

वह वर्तमान में नहीं जीता।

कभी भविष्य की चिंता करता है, कभी बीती बातों में दुखी होता है और कभी कल्पनाओं में खो जाता है।

इसी कारण अशांति बढ़ती है।

महाराज जी कहते हैं कि हर व्यक्ति बड़ा बनना चाहता है। इसका कारण यह है कि हम परमात्मा के अंश हैं और परमात्मा सबसे बड़े हैं।

लेकिन मनुष्य गलत दिशा में बड़ा बनने लगता है—धन, पद या अहंकार में।

वास्तविक महानता भगवान का भक्त बनने में है।

भगवान स्वयं अपने भक्तों का सम्मान करते हैं।

इसलिए यदि मनुष्य वर्तमान को संभाल ले—धर्मपूर्वक कर्म करे, भगवान का नाम-जप करे और पापाचार से बचे—तो उसका भविष्य अपने आप उज्ज्वल हो जाएगा।

महाराज जी कहते हैं कि वर्तमान ही सबसे महत्वपूर्ण है।

यदि आज का समय भगवान में लगा दिया जाए, तो भूत भी शुद्ध होगा और भविष्य भी मंगलमय होगा।

इसलिए मन को शांत करने का उपाय है—नाम-जप, वर्तमान में जीना और भगवान पर भरोसा रखना।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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