प्रश्न 1: महाराज जी,जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और हम कहते हैं कि “वह चला गया”, तो वह जो चला गया उसे कैसे पहचाना जाए? अपने भीतर स्थित वास्तविक आत्मस्वरूप को कैसे जाना जाए?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि जिस तत्व को हम “मैं” कहते हैं, वही वास्तविक आत्मस्वरूप है। शरीर तो जन्म से पहले नहीं था और मृत्यु के बाद भी नहीं रहेगा, फिर भी हम कहते हैं कि “वह चला गया।” इसका अर्थ है कि जाने वाला शरीर नहीं, बल्कि वह चेतन सत्ता है जो शरीर को जीवित रखती थी। लेकिन उस आत्मतत्व को केवल तर्क, अध्ययन या इंद्रियों के द्वारा नहीं जाना जा सकता।
महाराज जी ने कहा कि भगवान स्वयं जिस पर कृपा करते हैं, वही अपने स्वरूप को जान पाता है। इसलिए आत्मज्ञान का मार्ग भगवान की शरण, नाम जप, सत्संग और पवित्र आचरण से होकर जाता है। जब तक मनुष्य शरीर, मन, स्वभाव और संसार से राग रखता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान सकता।
उन्होंने समझाया कि स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर—इन तीनों से ऊपर जो शुद्ध चेतना है, वही आत्मा है। जब साधक का मन पवित्र होता है, बुद्धि निर्मल होती है और भगवान का नाम उसके जीवन का आधार बन जाता है, तब धीरे-धीरे भीतर आत्मबोध का प्रकाश होने लगता है।
महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि आत्मा को जानने का उपाय केवल एक है—निरंतर भगवान का नाम जपना, सत्संग सुनना और जीवन को पवित्र बनाना। तब भगवान स्वयं हृदय में ज्ञान का प्रकाश करते हैं और साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव होने लगता है।
प्रश्न 2: जो लोग एक तरफ पाप कर्म करते हैं और दूसरी तरफ दान-पुण्य भी करते हैं, उनकी गति क्या होती है? क्या पुण्य करने से पाप नष्ट हो जाते हैं?
उत्तर:
महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि पुण्य करने से पाप नष्ट नहीं होते। पाप और पुण्य दोनों का अलग-अलग लेखा रहता है। यदि कोई व्यक्ति एक ओर दान करता है, मंदिर बनवाता है या धार्मिक कार्य करता है, लेकिन दूसरी ओर छल, कपट, अन्याय और पापाचार भी करता है, तो उसे दोनों कर्मों का फल अलग-अलग भोगना पड़ेगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रावण अत्यंत शक्तिशाली था और उसने बहुत तप भी किया था, लेकिन उसके पापों ने अंततः उसका विनाश कर दिया। इसी प्रकार कई लोग दिखाई देते हैं जो वर्तमान में पाप करते हुए भी सुखी लगते हैं। इसका कारण उनका पूर्व जन्म का पुण्य हो सकता है। लेकिन जब वह पुण्य समाप्त हो जाता है, तब पापों का परिणाम सामने आता है।
महाराज जी ने विशेष रूप से कहा कि पाप के धन से किया गया दान भी वास्तविक पुण्य नहीं बनता। यदि किसी ने अधर्म से धन कमाया और फिर उसका कुछ भाग धार्मिक कार्यों में लगा दिया, तो उससे पाप की भरपाई नहीं होती। भगवान न्यायकारी हैं और प्रत्येक कर्म का अलग फल देते हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म की आड़ में पाखंड करना सबसे खतरनाक स्थिति है। ऐसे व्यक्ति को सद्गति नहीं मिलती। लेकिन यदि किसी को अपने पापों का वास्तविक पश्चाताप हो जाए और वह भगवान की शरण में आ जाए, तब उसका कल्याण संभव है। इसलिए मनुष्य को पाप छोड़कर सच्चे धर्म और नाम जप का आश्रय लेना चाहिए।
प्रश्न 3: यदि किसी व्यक्ति ने पहले बहुत पाप किए हों, लेकिन अब सत्संग, संत सेवा और भजन के मार्ग पर आ गया हो, तो क्या उसके पाप नष्ट हो सकते हैं और क्या उसे भगवत प्राप्ति हो सकती है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि भगवान की करुणा असीम है। यदि किसी व्यक्ति ने पूर्व में कितने ही पाप क्यों न किए हों, लेकिन अब उसके हृदय में वास्तविक पश्चाताप जाग गया है और उसने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि आगे पाप नहीं करेगा, तो उसका कल्याण निश्चित है।
उन्होंने गीता के आधार पर बताया कि यदि अत्यंत दुराचारी व्यक्ति भी अनन्य भाव से भगवान का भजन करने लगे, तो उसे साधु मानना चाहिए क्योंकि उसने सही दिशा पकड़ ली है। भगवान ऐसे व्यक्ति को धीरे-धीरे शुद्ध करके अपने निकट ले आते हैं।
महाराज जी ने कहा कि केवल यह सोच लेना पर्याप्त नहीं है कि “नाम जप से पाप नष्ट हो जाएंगे, इसलिए पाप करते रहो।” ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति की दुर्गति होती है। लेकिन जो सचमुच अपनी गलतियों पर दुखी है, भगवान की शरण में आ गया है और भजन के मार्ग पर चलना चाहता है, उसके करोड़ों पाप भी नष्ट हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि संत सेवा, सत्संग, मंदिर सेवा और नाम जप से बुद्धि पवित्र होती है। जब बुद्धि पवित्र होती है, तब मनुष्य का जीवन बदलने लगता है। भगवान केवल वर्तमान देखते हैं। यदि साधक सच्चे हृदय से भगवान की ओर मुड़ गया है, तो उसके लिए भगवत प्राप्ति का मार्ग खुल जाता है।
प्रश्न 4: गृहस्थ आश्रम में रहते हुए सेवा, पारिवारिक दायित्व और भगवत ज्ञान को एक साथ कैसे साधा जा सकता है?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि गृहस्थ जीवन भगवत प्राप्ति में बाधा नहीं है। बाधा केवल आसक्ति और कर्तापन का भाव है। गृहस्थ को सबसे पहले नाम जप का अभ्यास करना चाहिए। उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते भगवान का नाम स्मरण करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पति, पत्नी, पुत्र, माता-पिता और समाज के प्रति जो कर्तव्य हैं, उन्हें अवश्य निभाना चाहिए। लेकिन यह भाव रखना चाहिए कि यह सब भगवान की सेवा है। जब मनुष्य अपने कर्मों को भगवान को समर्पित कर देता है, तब वही कर्म कर्मयोग बन जाते हैं।
महाराज जी ने समझाया कि समस्या तब आती है जब हम सोचते हैं कि “यह मेरा परिवार है, मेरे लिए क्या करेगा?” धर्म तब बनता है जब हम सोचते हैं कि “मेरा कर्तव्य इनके प्रति क्या है?” यह दृष्टिकोण बदलते ही जीवन बदल जाता है।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ को अपनी भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन भीतर यह ज्ञान रखना चाहिए कि सभी के हृदय में भगवान विराजमान हैं। परिवार के सदस्यों को भगवान का अंश मानकर सेवा करनी चाहिए। नाम जप, सत्संग और भगवान को कर्म समर्पण करने से गृहस्थ भी सहज रूप से भगवत प्राप्ति कर सकता है।
प्रश्न 5: मेरा मन बहुत चंचल रहता है, किसी एक चीज़ में टिकता नहीं। मन को स्थिर कैसे किया जाए?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि चंचल मन केवल आपकी समस्या नहीं है, बल्कि संसार के लगभग प्रत्येक मनुष्य की स्थिति यही है। मन का स्वभाव ही एक विषय से दूसरे विषय की ओर भागना है। इसलिए साधक को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने बताया कि मन को बलपूर्वक रोकना संभव नहीं है। जब मन कहीं भागे, तब उसे प्रेमपूर्वक भगवान के नाम में वापस लाना चाहिए। बार-बार ऐसा करने से धीरे-धीरे अभ्यास बन जाता है। यही योग की वास्तविक प्रक्रिया है।
महाराज जी ने दो उपाय बताए। पहला, जहाँ-जहाँ मन जाए, वहाँ-वहाँ भगवान की भावना करो। दूसरा, यदि यह कठिन लगे तो केवल नाम जप करते रहो और जब मन भटके, तब उसे पुनः नाम में लगा दो।
उन्होंने कहा कि मन का भटकना साधना की असफलता नहीं है। वास्तव में हर बार मन को वापस लाना ही साधना है। जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक वर्षों तक यह अभ्यास करता है, उसका मन धीरे-धीरे स्थिर हो जाता है।
महाराज जी ने आश्वासन दिया कि यदि साधक नाम जप में लगा रहे और शरीर छूटने तक भगवान का स्मरण करता रहे, तो उसका भविष्य मंगलमय है। इसलिए मन की चंचलता से घबराना नहीं, बल्कि नाम जप में दृढ़ बने रहना चाहिए।
प्रश्न 6: निष्काम भक्ति क्या है? संसार में रहते हुए अपने इष्टदेव या गुरु से कुछ माँगना चाहिए या नहीं?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि निष्काम भक्ति का अर्थ है—भगवान से कुछ भी न माँगना, बल्कि स्वयं को पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित कर देना। सामान्यतः मनुष्य भगवान के पास किसी न किसी अभाव की पूर्ति के लिए जाता है। कोई धन माँगता है, कोई स्वास्थ्य, कोई संतान, कोई सम्मान और कोई संकट से मुक्ति चाहता है। लेकिन निष्काम भक्त भगवान से भगवान को ही चाहता है।
महाराज जी ने कहा कि जब तक मनुष्य देहभाव में है, तब तक किसी न किसी प्रकार की कामना बनी रहती है। इसलिए यदि कोई भक्त भगवान से कुछ माँगता है, तो उसे दोष नहीं दिया जा सकता। गीता में भगवान ने आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी—चारों प्रकार के भक्तों को अपना भक्त कहा है। लेकिन ज्ञानी भक्त सर्वोच्च है, क्योंकि वह भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता।
उन्होंने समझाया कि भगवान सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और हमारे वास्तविक हितैषी हैं। उन्हें हमारी आवश्यकता बताने की आवश्यकता नहीं है। वे हमसे अधिक जानते हैं कि हमारे लिए क्या उचित है। इसलिए उच्च अवस्था की भक्ति में भक्त कहता है—“प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए, आप जैसी व्यवस्था करें, वही मेरे लिए मंगलमय है।”
महाराज जी ने यह भी कहा कि यदि अभी इतनी दृढ़ श्रद्धा नहीं है और मन कुछ माँगता है, तो केवल भगवान से माँगो, संसार से नहीं। लेकिन साथ में यह भाव भी रखो कि यदि भगवान वह वस्तु दें तो भी उनकी कृपा, और न दें तो भी उनकी कृपा। क्योंकि भगवान वही देते हैं जो अंततः हमारे कल्याण के लिए उचित होता है।
निष्काम भक्ति की चरम अवस्था वह है जहाँ तन, मन, प्राण और जीवन सब भगवान को अर्पित हो जाएँ। तब भक्त के पास माँगने के लिए कुछ बचता ही नहीं। उसका एकमात्र उद्देश्य भगवान की प्रसन्नता और निरंतर भगवत स्मरण रह जाता है।
प्रश्न 7: क्या मनुष्य अपने जीवनकाल में काम, क्रोध, लोभ और मोह से पूर्णतः मुक्त हो सकता है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस प्रश्न का अत्यंत स्पष्ट उत्तर दिया कि हाँ, मनुष्य अपने जीवनकाल में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे सभी विकारों से मुक्त हो सकता है। यदि ऐसा संभव न होता, तो इतिहास में हुए महात्मा, ऋषि, मुनि और भगवान के भक्त कभी भगवत प्राप्ति नहीं कर पाते।
महाराज जी ने समझाया कि वास्तव में काम, क्रोध और लोभ ने हमें नहीं पकड़ा है, बल्कि हमने उन्हें पकड़ रखा है। जैसे कोई बंदर सुराही में हाथ डालकर चने पकड़ ले और फिर हाथ बाहर न निकाल पाए, तो बंधन चनों में नहीं बल्कि उसकी पकड़ में है। उसी प्रकार जीव ने देहाभिमान को पकड़ रखा है। जब वह स्वयं को शरीर मानता है, तभी काम, क्रोध और मोह उत्पन्न होते हैं।
उन्होंने कहा कि हमारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध, चैतन्य और आनंदमय है। आत्मा में कोई विकार नहीं है। विकार शरीर और देहाभिमान से जुड़े हुए हैं। जब साधक नाम जप करता है, सत्संग सुनता है, शास्त्रों का अध्ययन करता है और परोपकार की भावना से जीवन जीता है, तब उसका हृदय धीरे-धीरे शुद्ध होने लगता है।
महाराज जी ने विशेष रूप से चेतावनी दी कि काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं। विशेषकर पराई स्त्रियों को भोग दृष्टि से देखना आध्यात्मिक पतन का कारण बनता है। इसलिए साधक को अपनी दृष्टि, विचार और आचरण को पवित्र रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि निस्वार्थ सेवा काम विजय का अत्यंत प्रभावी साधन है। जब मनुष्य दूसरों से सुख लेने के बजाय दूसरों को सुख देने की भावना रखता है, तब उसका हृदय शीतल होने लगता है। नाम जप, सत्संग, गुरु कृपा और परोपकार के माध्यम से मनुष्य निश्चित रूप से काम, क्रोध, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त कर सकता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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