माला-1421: महाराज जी,मुझे मान, सम्मान, विलासिता और यश चाहिए अपने परिवार के लिए! श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,मुझे मान, सम्मान, विलासिता और यश चाहिए अपने परिवार के लिए!

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि परिवार के लिए सुख-सुविधाएँ जुटाने की इच्छा होना एक बात है, लेकिन जीवन का वास्तविक सुख केवल धन, सम्मान और विलासिता में खोजना दूसरी बात है। यदि सच्चा और स्थायी सुख चाहिए, तो भगवान से जुड़ना आवश्यक है।

महाराज जी बताते हैं कि संसार का सुख स्थायी नहीं है। दिन के बाद रात आती है, उसी प्रकार सुख के साथ दुःख भी आता है। धन, पद, प्रतिष्ठा और विलासिता कितनी भी मिल जाएँ, शरीर स्वयं नश्वर है। मृत्यु के समय न धन साथ जाता है, न पद, न गाड़ी और न ही सांसारिक प्रतिष्ठा। इसलिए केवल इन्हें प्राप्त करने में पूरा जीवन लगा देना बुद्धिमानी नहीं है।

वे ध्रुव जी और सुदामा जी के उदाहरणों से समझाते हैं कि भगवान की कृपा से सांसारिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार के कल्याण का मार्ग खुल सकता है। इसलिए जीवन में उन्नति करने के साथ-साथ भगवान का भजन भी करना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि यदि धन और वैभव भगवान से विमुख कर दें, तो वे वास्तविक सुख देने के बजाय पतन का कारण बन सकते हैं। इसलिए सांसारिक उपलब्धियों को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए।

इसके लिए खूब नामजप करें, सत्संग सुनें, शास्त्रों का स्वाध्याय करें और अपने आचरण को पवित्र रखें। मांस, मदिरा, व्यभिचार और अनुचित व्यवहार से बचने का प्रयास करें।

महाराज जी की सीख है कि परिवार का पालन-पोषण करते हुए भगवान का भजन भी करें। धन और सम्मान के पीछे ही जीवन न बिताएँ, बल्कि अपने वर्तमान जीवन और आने वाले परलोक के कल्याण का भी ध्यान रखें।

प्रश्न 2: क्या हमारे जीवन में जो कुछ भी होता है, वह हमारे पूर्वजन्म के कर्मों द्वारा निर्धारित होता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, जीवन में मिलने वाले सुख-दुःख, सफलता-असफलता और जय-पराजय पर प्रारब्ध का प्रभाव पड़ता है। प्रारब्ध का संबंध पूर्व में किए गए शुभ और अशुभ कर्मों से है, जिनका फल मनुष्य को अपने जीवन में भोगना पड़ता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य केवल अपने पुराने कर्मों के अधीन है और वर्तमान में कुछ बदल नहीं सकता। महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य जन्म में नए कर्म करने का अवसर भी प्राप्त होता है। वर्तमान में किए जाने वाले पवित्र कर्मों से व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदलने का प्रयास कर सकता है।

वे भगवान की भक्ति, धार्मिक अनुष्ठान, शास्त्रों का स्वाध्याय, परोपकार और तीर्थों से जुड़े पुण्यकर्मों का उल्लेख करते हैं। इन साधनों के माध्यम से मनुष्य अपने प्रारब्ध का सामना करने की सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है और आने वाले जीवन को भी बेहतर बना सकता है।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि जब सफलता मिलती है, तो व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है और असफलता मिलने पर दुःखी हो जाता है। लेकिन सांसारिक सफलता हमेशा स्थायी नहीं रहती। इसलिए केवल वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार अपना जीवन नहीं चलाना चाहिए, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी प्रयास करना चाहिए।

यदि व्यक्ति पुराने कर्मों के परिणामों से जूझ रहा है, तो उसे निराश होकर बैठने के बजाय अपने वर्तमान आचरण को सुधारना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि प्रारब्ध का प्रभाव होने पर भी वर्तमान के पवित्र कर्म, भगवान की भक्ति, नामजप और सत्संग को नहीं छोड़ना चाहिए। आध्यात्मिक साधना से कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है और जीवन को सही दिशा दी जा सकती है।

प्रश्न 3: मैं एक मनोचिकित्सक हूँ। दूसरों को आत्महत्या जैसे विचारों से रोक लेती हूँ, परंतु स्वयं अंदर से दुःखी हो जाती हूँ। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में समझाते हैं कि दूसरों के दुःख को दूर करने का प्रयास करना बहुत अच्छा कार्य है। यदि किसी व्यक्ति को आपकी बातों से जीवन जीने का साहस मिलता है और वह नकारात्मक विचारों से बाहर आने लगता है, तो यह परोपकार का महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसलिए अपने पेशे को छोड़ने के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि स्वयं को और अधिक मजबूत बनाना चाहिए।

महाराज जी एक उदाहरण देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा हो, तो उसे बचाने के लिए जाने वाले व्यक्ति को स्वयं भी तैरना आना चाहिए। यदि बचाने वाला व्यक्ति सक्षम नहीं है, तो डूबता हुआ व्यक्ति उसे भी संकट में डाल सकता है। इसी प्रकार दूसरों को दुःख से बाहर निकालने का प्रयास करते समय उनके दुःख में स्वयं पूरी तरह डूब जाना उचित नहीं है।

महाराज जी बताते हैं कि प्रतिदिन अनेक दुःखी लोगों की बातें सुनने से मन पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए दूसरों की बातों को संवेदनशीलता से सुनते हुए भी मन को संतुलित रखना आवश्यक है। उनकी सहायता करें, उन्हें अच्छी बातें समझाएँ और अपनी वाणी से उनका मनोबल बढ़ाएँ, लेकिन उनके दुःख को अपने ऊपर हावी न होने दें।

इसके लिए महाराज जी भगवान के नामजप, सत्संग और आध्यात्मिक चिंतन का सहारा लेने की सलाह देते हैं। नामजप से हृदय को बल मिलता है और व्यक्ति दूसरों की सहायता करते हुए स्वयं को भी संभाल सकता है।

वे यह भी कहते हैं कि अपनी ओर से उचित प्रयास करें। यदि सामने वाला व्यक्ति सुधार की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह अच्छी बात है; लेकिन हर परिणाम को अपने नियंत्रण में मानकर स्वयं को दुःख देना उचित नहीं है।

महाराज जी की सीख है कि दूसरों की सेवा करना बंद न करें। भगवान का नामजप करके अपने आत्मबल को बढ़ाएँ, करुणा के साथ दूसरों की सहायता करें और उनके दुःख में पूरी तरह लिप्त होने के बजाय संतुलित बने रहें।

प्रश्न 4: मन जड़ है या चैतन्य? यदि यह जड़ है, तो फिर हमारे नियंत्रण में क्यों नहीं आता?

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि मन को पूरी तरह जड़ या पूरी तरह चैतन्य कहना उचित नहीं है। उसका व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस दिशा में लगा हुआ है। जब मन संसार के भोगों और गलत प्रवृत्तियों में लगा रहता है, तो वह जड़ता की ओर जाता है। जब वही मन भगवान के चिंतन और भक्ति में लगता है, तो वह साधक को चैतन्य की ओर ले जाता है।

महाराज जी समझाते हैं कि मन को नियंत्रित करना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। यदि मन को वश में करना असंभव होता, तो कोई भी व्यक्ति भगवान की प्राप्ति नहीं कर सकता था। इसके लिए निरंतर अभ्यास और साधना आवश्यक है।

वे नामजप, शास्त्रों के स्वाध्याय, पवित्र आहार, पवित्र विचार और संयमित जीवन पर विशेष जोर देते हैं। गलत दृश्य देखना, अनुचित संगति रखना और गलत आचरण करना मन को और अधिक चंचल बना सकता है। इसलिए केवल मन को नियंत्रित करने की इच्छा करना पर्याप्त नहीं है; अपनी दिनचर्या और आदतों को भी सुधारना होगा।

महाराज जी ब्रह्मचर्य और अल्पाहार को भी मन को संयमित करने में सहायक बताते हैं। जब जीवन में पवित्रता और नियमित अभ्यास बढ़ता है, तो मन को भगवान की ओर लगाने में सहायता मिलती है।

वे यह भी सुझाव देते हैं कि आरंभ में माला या काउंटर से नामजप की गिनती रखी जा सकती है। इससे साधक को पता चलता है कि वह कितना जप कर रहा है और अभ्यास में नियमितता बनी रहती है। कुछ समय आसन में बैठकर ध्यान करने का अभ्यास भी धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि मन पर नियंत्रण पाने के लिए निरंतर नामजप करें, शुद्ध आहार रखें, गलत आदतों से बचें और नियमित साधना करें। अभ्यास से मन को वश में करना संभव है।

प्रश्न 5: जेल में बहुत नकारात्मक वातावरण होता है। ऐसे में अपराधियों में भगवान कैसे देखें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि सभी जीवों में भगवान की सत्ता को देखना और उनके आचरण के अनुसार उचित व्यवहार करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति में भगवान को देखने का अर्थ यह नहीं है कि उसके गलत कार्यों को भी सही मान लिया जाए या उसके अपराधों को अनदेखा कर दिया जाए।

महाराज जी फिल्म में नायक और खलनायक का उदाहरण देते हैं। फिल्म में नकारात्मक भूमिका निभाने वाला व्यक्ति वास्तव में वैसा व्यक्ति हो, यह आवश्यक नहीं है। वह केवल अपना किरदार निभा रहा होता है। इसी प्रकार संसार में अच्छाई और बुराई के अलग-अलग व्यवहार दिखाई देते हैं, लेकिन उनके पीछे जो जीवन की सत्ता है, उसे भगवान की देन के रूप में समझना चाहिए।

वे समझाते हैं कि जेल में काम करने वाले व्यक्ति का अपना एक कर्तव्य है। यदि किसी अपराधी को अनुशासन में रखना या उसके गलत आचरण को रोकना आवश्यक है, तो ऐसा करना कर्तव्य का हिस्सा है। सभी के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना उचित नहीं होगा। अच्छे आचरण वाले व्यक्ति और अनुशासन तोड़ने वाले व्यक्ति के साथ व्यवहार में अंतर होना चाहिए।

महाराज जी बताते हैं कि किसी अपराधी को उसके कर्मों के अनुसार दंड देना और उसके भीतर भगवान की सत्ता को स्वीकार करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि अधिकारी अपराधी के गलत व्यवहार को रोकने के बजाय केवल यह सोचकर अपना कर्तव्य छोड़ दे कि उसमें भी भगवान हैं, तो व्यवस्था ठीक से नहीं चल सकेगी।

इसलिए व्यक्ति के गलत आचरण को पहचानते हुए भी मन में द्वेष रखने के बजाय अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि सबमें भगवान को देखें, लेकिन व्यवहार में उचित-अनुचित का विवेक बनाए रखें। अपराधी के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करें और भीतर भगवान की भावना रखते हुए अनुशासन बनाए रखें।

प्रश्न 6: नाम से प्रेम कैसे होगा? अभी तो धन और पदार्थों की प्राप्ति के लिए ही नामजप करते हैं!

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान के नाम से वास्तविक प्रेम तब बढ़ता है, जब साधक भगवान को सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का साधन मानने के बजाय अपने जीवन का आधार स्वीकार करता है।

महाराज जी बताते हैं कि यदि हम भगवान का नाम लेते समय भी धन, भोजन, सुख-सुविधाओं और दूसरी इच्छाओं में ही उलझे रहते हैं, तो हमारी प्राथमिकता भगवान के नाम से ऊपर संसार बना रहता है। उदाहरण के लिए, यदि नामजप करते समय मन भोजन की ओर चला जाए या धन कमाने की चिंता में नामजप छूट जाए, तो यह विचार करना चाहिए कि हमारे लिए अधिक महत्त्वपूर्ण क्या है।

वे समझाते हैं कि भगवान जिस परिस्थिति में रखें, उसमें संतुष्ट रहने का अभ्यास करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि अपनी हर इच्छा पूरी करवाने के लिए बेचैन रहने के बजाय भगवान की व्यवस्था पर विश्वास रखना चाहिए। अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी नामजप को जीवन का मुख्य आधार बनाए रखना चाहिए।

महाराज जी गीता के संदेश का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि जो भक्त अनन्य भाव से भगवान का चिंतन करते हैं, उनके योगक्षेम का भार भगवान लेते हैं। इसलिए साधक का कर्तव्य है कि वह भगवान का नाम ले और अपनी ओर से उचित कर्म करता रहे।

जब नामजप निरंतर किया जाता है, तो धीरे-धीरे नाम हृदय में उतरने लगता है। फिर नाम का स्मरण केवल किसी निश्चित समय की क्रिया नहीं रहता, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनने लगता है।

महाराज जी की सीख है कि भगवान का नाम केवल धन या सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए न लें। अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भगवान पर भरोसा रखें, उनकी व्यवस्था में संतुष्ट रहें और निरंतर नामजप करते रहें। इससे नाम के प्रति प्रेम और समर्पण बढ़ सकता है।

प्रश्न 7: जब हाईकोर्ट के वकीलों की मंडली ने बताया कि सत्संग ने उनका जीवन कैसे बदल दिया, तो महाराज जी ने क्या समझाया?

उत्तर: पूज्य महाराज जी ने वकीलों की मंडली के उदाहरण से समझाया कि सत्संग का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब मनुष्य की सोच, आचरण और जीवन का उद्देश्य बदलने लगता है।

महाराज जी बताते हैं कि वकील बनना या किसी बड़े पद पर पहुँचना अपने आप में जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं है। ये जीवन के कर्तव्य हैं। वकालत से प्राप्त धन परिवार के पालन-पोषण और जीवन चलाने के लिए उपयोगी है, लेकिन मनुष्य को यह भी समझना चाहिए कि वह जीवन किस उद्देश्य से जी रहा है।

जब व्यक्ति भगवान को अपने जीवन का उद्देश्य बना लेता है, तब उसके कर्मों की दिशा बदलने लगती है। वह अपने पेशे का पालन करते हुए भी भगवान का नामजप कर सकता है और अधार्मिक कार्यों से बच सकता है। यदि कोई अनुचित कार्य करवाने के लिए बहुत धन देने का प्रस्ताव भी रखे, तो वह धर्म के विरुद्ध होने पर उसे अस्वीकार कर सकता है।

महाराज जी ने बताया कि वकीलों की मंडली सत्संग से प्रेरित होकर मिलकर नाम-संकीर्तन करती थी। वे इसके बदले धन नहीं लेते थे, जिससे समाज के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत होता था। उनके व्यवहार और सत्संग के प्रभाव से उनके आसपास का वातावरण भी बदलने लगा था। लोग उनसे मिलने पर राधे-राधे कहते और आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करते थे।

वे भोजन को भगवान को अर्पित करने की भावना का भी उदाहरण देते हैं। यदि कोई खाने की वस्तु आती है, तो पहले मानसिक रूप से श्रीजी को भोग लगाकर फिर उसे ग्रहण करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि सत्संग तभी सार्थक होता है, जब वह जीवन में बदलाव लाए। अपने पेशे को कर्तव्य समझकर निभाएँ, धन का सदुपयोग करें, अनुचित कार्यों से बचें और भगवान का नामजप करते हुए जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवत्प्राप्ति बनाए रखें।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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