प्रश्न 1:महाराज जी, क्या भक्त के अंदर अवगुण या दोष हो सकते हैं, अथवा सच्चे भक्त में कोई अवगुण नहीं होता?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि भक्त दो प्रकार के होते हैं—एक साधक अवस्था में और दूसरे सिद्ध अवस्था में। जो साधक है, अर्थात जिसने भगवान की ओर चलना प्रारंभ किया है, उसमें दोष हो सकते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार पूरी तरह समाप्त न हुए हों, फिर भी वह भगवान का भक्त हो सकता है। क्योंकि साधना का अर्थ ही है कि मनुष्य अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास कर रहा है। भगवान गीता में कहते हैं कि यदि कोई अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से उनका भजन करने लगे तो उसे साधु मानना चाहिए, क्योंकि उसने सही दिशा पकड़ ली है।
महाराज जी ने समझाया कि यदि किसी व्यक्ति में पहले की अपेक्षा 2% भी सुधार हुआ है, तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। हजारों जन्मों से संचित विकार एक दिन में समाप्त नहीं होते। इसलिए साधक को अपने दोषों से निराश नहीं होना चाहिए। भगवान हमारे गुण-दोष नहीं देखते, बल्कि यह देखते हैं कि हमारा भाव क्या है। यदि भक्त सच्चे मन से कहता है कि “मेरे प्रभु मेरे हैं और मैं प्रभु का हूँ”, तो भगवान उसे स्वीकार कर लेते हैं। सिद्ध पुरुष में दोष नहीं रहते, लेकिन साधक में दोष होना स्वाभाविक है। इसलिए निराश न होकर नाम जप और समर्पण में लगे रहना चाहिए।
प्रश्न 2: गृहस्थ जीवन में जब कोई अपना छोड़ जाता है, धोखा देता है या बिछड़ जाता है, तब मन को कैसे समझाएं और भजन में कैसे लगाएं?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि संसार का वास्तविक स्वरूप समझ लेने पर हर्ष और शोक दोनों कम होने लगते हैं। यह संसार मृत्यु लोक है, यहाँ जो आया है उसे एक दिन जाना ही है। माता-पिता, भाई, बहन, पति, पत्नी, पुत्र—सभी का शरीर नश्वर है। फिर भी अज्ञान और मोह के कारण मनुष्य इन्हें स्थायी मान लेता है और बिछड़ने पर अत्यधिक दुखी होता है।
उन्होंने कहा कि जब तक शुद्ध ज्ञान नहीं होगा, तब तक मनुष्य हर्ष-शोक में फँसा रहेगा। किसी के मिलने पर अत्यधिक प्रसन्नता और किसी के जाने पर अत्यधिक दुख—यह मोह का परिणाम है। भगवान का नाम जप और सत्संग ही वह साधन है जिससे यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि संसार एक स्वप्न के समान है। जैसे जागने पर स्वप्न का महत्व समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर संसार के द्वंद्व कम हो जाते हैं।
महाराज जी ने समझाया कि हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यहाँ सब कुछ छूटने वाला है। इसलिए लोगों से प्रेम करें, सेवा करें, लेकिन उन्हें भगवान से बढ़कर न मानें। जब मन भगवान में लगने लगता है, तब मिलने में हर्ष और बिछड़ने में शोक कम होने लगता है। यही भजन का प्रभाव है।
प्रश्न 3: गुरु प्राप्त हुए कई वर्ष हो गए, फिर भी श्रीजी (भगवान) के लिए विकलता, तड़पन और रोना क्यों नहीं आता?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि भगवान के लिए तड़पन न आने का मुख्य कारण यह है कि हमारे भीतर अभी भी भोगों का आकर्षण बना हुआ है। हम भगवान को भी चाहते हैं और संसार को भी छोड़ना नहीं चाहते। यही द्वंद्व भगवान के लिए वास्तविक विरह उत्पन्न नहीं होने देता।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तव में भगवान के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा न लगे, तभी उसके भीतर तड़पन उत्पन्न होती है। जब तक स्वादिष्ट भोजन, सम्मान, संसारिक सुख, मित्रता और विषय भोग प्रिय लगते रहेंगे, तब तक भगवान के लिए रुदन नहीं आएगा। विरह कोई अभिनय नहीं है। यह तब उत्पन्न होता है जब साधक को अनुभव होने लगता है कि भगवान के बिना जीवन अधूरा है।
महाराज जी ने पारस मणि का उदाहरण देकर समझाया कि मनुष्य सोचता रहता है कि अभी संसार के कार्य कर लूँ, बाद में भजन करूँगा। इसी प्रकार पूरा जीवन निकल जाता है। जबकि बुद्धिमान वही है जो वर्तमान समय को भगवान के नाम में लगाता है। निरंतर नाम जप, सत्संग और भक्ति से धीरे-धीरे संसार के भोग फीके पड़ने लगते हैं। तब भगवान के प्रति प्रेम और तड़पन जागृत होती है। यही वास्तविक विरह की शुरुआत है।
प्रश्न 4: यदि परिवार का कोई सदस्य बीमार हो जाए और पूरा परिवार उसके कारण दुख भोगे, तो यह केवल उस व्यक्ति का प्रारब्ध है या पूरे परिवार का भी कर्मफल है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि परिवार में होने वाले सुख और दुख केवल एक व्यक्ति के कर्मों का परिणाम नहीं होते, बल्कि यह कर्म-संयोग का परिणाम होते हैं। पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री और रिश्तेदार सभी पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसलिए एक व्यक्ति का कर्म कई लोगों को प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने समझाया कि यदि कोई पुत्र पुण्यवान है तो उसका व्यवहार पूरे परिवार को सुख देता है। यदि कोई रोगी या कष्टदायक स्वभाव वाला है, तो उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। यह सब कर्मों का जाल है। संसार में मिलने वाले रिश्ते संयोग मात्र नहीं हैं, बल्कि पूर्व कर्मों के आधार पर बने हुए हैं।
महाराज जी ने कहा कि शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। लेकिन भगवान का भजन करने से बुद्धि शुद्ध होती है, विवेक आता है और कठिन परिस्थितियों को सहने की शक्ति मिलती है। भजन केवल कर्मों को काटता ही नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा भी देता है। इसलिए गृहस्थ जीवन में भी भगवान का आश्रय लेना आवश्यक है। जब भगवान का सहारा मिलता है, तब दुखों को सहना सरल हो जाता है और जीवन में धैर्य तथा संतुलन आता है।
प्रश्न 5: जब माया भगवान की ही शक्ति है, तो भगवान को पाने के लिए साधना करने वाले साधक को माया अधिक परेशान क्यों करती है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि माया वास्तव में साधक को परेशान नहीं करती, बल्कि उसकी परीक्षा लेती है। जैसे विद्यालय में शिक्षक पढ़ाता भी है और परीक्षा भी लेता है, वैसे ही भगवान साधक को भक्ति का मार्ग भी दिखाते हैं और माया के माध्यम से उसकी पात्रता भी परखते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हम अक्सर अपनी इच्छाओं और आसक्तियों को माया का नाम दे देते हैं। वास्तव में मन संसार की ओर भागता है क्योंकि हमारी रुचि अभी भी संसार में है। यदि हमारी रुचि पूर्ण रूप से भगवान में हो जाए, तो माया का प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाएगा। समस्या माया में नहीं, हमारी आसक्ति में है।
महाराज जी ने कहा कि नाम जप और सत्संग से बुद्धि निर्मल होती है। तब साधक समझने लगता है कि संसार की वस्तुएँ नश्वर हैं और भगवान ही शाश्वत हैं। इस समझ के साथ माया की शक्ति कम होती जाती है। इसलिए माया को दोष देने के बजाय अपने मन को भगवान में लगाने का प्रयास करना चाहिए। यही साधना की सफलता का मार्ग है।
प्रश्न 6: क्या माया वास्तव में जीव को बाँधती है, या जीव स्वयं माया को पकड़े रहता है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस प्रश्न का अत्यंत सुंदर उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि माया जीव को नहीं पकड़ती, बल्कि जीव स्वयं माया को पकड़कर बैठा है। लोग अक्सर कहते हैं कि “माया ने हमें बाँध रखा है”, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। महाराज जी ने उदाहरण दिया कि जैसे कोई व्यक्ति स्वयं पेड़ को पकड़ ले और फिर कहे कि पेड़ मुझे छोड़ नहीं रहा, तो यह हास्यास्पद लगेगा। ठीक इसी प्रकार जीव अपनी इच्छाओं, वासनाओं, आसक्तियों और भोगों को पकड़कर बैठा है और दोष माया पर डाल देता है।
उन्होंने कहा कि शरीर, धन, पद, प्रतिष्ठा, परिवार और विषय भोग—इन सबको हमने “मेरा” मान लिया है। यही माया है। वस्तुएँ स्वयं हमें नहीं पकड़तीं। तंबाकू, शराब, धन या कोई भी विषय अपने आप किसी को नहीं पकड़ता, मनुष्य स्वयं उसमें रुचि लेकर उसे पकड़ता है। जब तक यह आसक्ति बनी रहती है, तब तक बंधन बना रहता है।
महाराज जी ने समझाया कि नाम जप, सत्संग और शास्त्र अध्ययन से ज्ञान उत्पन्न होता है। तब धीरे-धीरे मनुष्य समझने लगता है कि संसार की हर वस्तु नश्वर है। जब यह समझ दृढ़ हो जाती है, तब आसक्ति छूटने लगती है। इसलिए माया को दोष देने की अपेक्षा स्वयं को सुधारना चाहिए। जो छोड़ देता है वह मुक्त हो जाता है, और जो पकड़कर बैठा रहता है वही बंधन में रहता है।
प्रश्न 7: क्या भगवान के विरह (भगवत-वियोग) की भावना झूठी भी हो सकती है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि वास्तविक भगवत विरह कभी झूठा नहीं होता। यदि किसी साधक के हृदय में भगवान के लिए सच्ची तड़पन जाग गई है, तो वह अभिनय नहीं हो सकता। विरह का अर्थ है—भगवान के बिना जीवन अधूरा लगना। जब तक संसार के विषय आकर्षक लगते हैं, तब तक विरह की अवस्था नहीं आती।
उन्होंने बताया कि विरह की पहचान यह है कि विषय भोग, अधिक निद्रा, निरर्थक हँसी-मज़ाक और संसार की बातें अच्छी लगनी बंद हो जाएँ। मन बार-बार भगवान की ओर जाए और उनके दर्शन की चाह में व्याकुल हो। यदि अभी भी संसार के सुखों में रस आ रहा है, तो समझना चाहिए कि विरह की प्रारंभिक तैयारी चल रही है, पर पूर्ण विरह नहीं आया।
महाराज जी ने कहा कि भगवान के लिए रोना कोई नाटक नहीं है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने प्रियजन के बिछड़ने पर स्वाभाविक रूप से रोता है, उसी प्रकार जब साधक को भगवान के बिना रहना असहनीय लगने लगता है, तब उसकी आँखों से आँसू निकलते हैं। यही वास्तविक विरह है।
उन्होंने यह भी कहा कि विरह भगवान की विशेष कृपा से आता है। यह केवल भावुकता नहीं, बल्कि हृदय की गहरी आध्यात्मिक अवस्था है। इसलिए जो भगवान के लिए रोता है, उसकी स्थिति अत्यंत महान मानी जाती है।
प्रश्न 8: एक नए साधक के विरह और महापुरुषों के विरह में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि विरह का स्वरूप एक ही है, लेकिन उसकी गहराई अलग-अलग हो सकती है। जैसे अग्नि की ज्वाला छोटी भी हो सकती है और बहुत बड़ी भी, लेकिन उसकी दाहक शक्ति समान होती है। उसी प्रकार नए साधक के भीतर जो भगवान के लिए तड़पन उत्पन्न होती है, वह भी वास्तविक होती है, और महापुरुषों का विरह भी वास्तविक होता है।
अंतर केवल परिपक्वता का है। नए साधक का मन अभी संसार और भगवान दोनों के बीच डोलता रहता है। कभी भक्ति में रस आता है, कभी संसार आकर्षित करने लगता है। इसलिए उसका विरह स्थिर नहीं होता। लेकिन महापुरुषों का मन पूरी तरह भगवान में स्थित हो चुका होता है। उन्हें संसार की कोई वस्तु आकर्षित नहीं करती।
महाराज जी ने कहा कि महापुरुषों की स्थिति ऐसी होती है कि वे दिन-रात भगवान के चिंतन में डूबे रहते हैं। कभी रोते हैं, कभी गाते हैं, कभी नृत्य करते हैं और कभी समाधि में लीन हो जाते हैं। उनका प्रत्येक क्षण भगवान के प्रेम में व्यतीत होता है।
साधक को महापुरुषों की स्थिति देखकर निराश नहीं होना चाहिए। उसे अपने वर्तमान स्तर से आगे बढ़ना चाहिए। निरंतर नाम जप, सत्संग और भगवान का चिंतन करते रहने से वही विरह धीरे-धीरे प्रगाढ़ होता जाता है और एक दिन महापुरुषों जैसी अवस्था का मार्ग प्रशस्त करता है।
प्रश्न 9: भगवान के प्रति वास्तविक विरह और तड़पन कैसे उत्पन्न होती है?
उत्तर:
महाराज जी ने कहा कि भगवान के प्रति वास्तविक विरह तब उत्पन्न होता है जब मनुष्य संसार से निराश नहीं, बल्कि भगवान में आश्रित हो जाता है। विरह केवल दुख का नाम नहीं है, बल्कि भगवान को पाने की तीव्र चाह का नाम है। जब साधक के हृदय में यह भावना जागती है कि “भगवान के बिना मैं अधूरा हूँ”, तब विरह प्रारंभ होता है।
उन्होंने कहा कि यह अवस्था अचानक नहीं आती। इसके लिए निरंतर नाम जप, सत्संग, सेवा और शुद्ध जीवन आवश्यक है। धीरे-धीरे संसार के विषय फीके लगने लगते हैं और भगवान का स्मरण मधुर लगने लगता है। तब साधक को हर समय भगवान की याद आने लगती है।
महाराज जी ने गोपियों का उदाहरण दिया, जो श्रीकृष्ण के विरह में रोती थीं। उनका रोना संसार के किसी लाभ के लिए नहीं था, बल्कि केवल भगवान के दर्शन की लालसा में था। यही वास्तविक विरह है।
जब मनुष्य भगवान के अतिरिक्त किसी और वस्तु में सुख नहीं खोजता, तब उसके भीतर तड़पन बढ़ती है। यह तड़पन ही अंततः भगवान के साक्षात्कार का कारण बनती है। इसलिए विरह प्राप्त करने का उपाय है—नाम जप, भक्ति और भगवान के प्रति निष्कपट प्रेम।
प्रश्न 10: भगवत प्राप्ति के लिए रोना, व्याकुल होना और विरह अनुभव करना कब संभव होता है?
उत्तर:
महाराज जी ने बताया कि भगवत प्राप्ति के लिए वास्तविक रुदन और व्याकुलता तब संभव होती है जब भगवान मनुष्य के जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाएँ। जब तक मनुष्य भगवान के साथ-साथ संसार से भी सुख चाहता है, तब तक उसकी तड़पन पूर्ण नहीं होती।
उन्होंने कहा कि अधिकांश लोग भगवान से भगवान को नहीं, बल्कि संसार की वस्तुएँ माँगते हैं—धन, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, सफलता आदि। लेकिन जो केवल भगवान को चाहता है, उसी के भीतर वास्तविक विरह उत्पन्न होता है। वह सोचता है कि जीवन बीत रहा है, लेकिन अभी तक भगवान के दर्शन नहीं हुए। यही भावना उसे रुलाती है।
महाराज जी ने मीरा बाई, गोपियों और महान संतों का उदाहरण दिया, जिन्होंने भगवान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उनके लिए भोजन, निद्रा, सम्मान और संसार का आकर्षण गौण हो गया था। केवल भगवान ही उनके जीवन का केंद्र थे।
उन्होंने कहा कि नाम जप और सेवा से हृदय शुद्ध होता है। जब हृदय शुद्ध हो जाता है, तब भगवान के प्रति प्रेम जागता है। प्रेम बढ़ने पर विरह आता है, और विरह बढ़ने पर भगवान का अनुभव होने लगता है। इसलिए साधक को अभी से नाम जप, सेवा, परोपकार और सत्संग में लग जाना चाहिए। यही वह मार्ग है जो अंततः भगवत प्राप्ति तक पहुँचाता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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