प्रश्न 1: महाराज जी,मेरे निर्णय हमेशा गलत क्यों हो जाते हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य केवल वर्तमान बुद्धि से निर्णय लेता है, लेकिन उसके पूर्व जन्मों के कर्म और प्रारब्ध भी परिणामों को प्रभावित करते हैं। कई बार मनुष्य बहुत सोच-समझकर कार्य करता है, फिर भी विपरीत फल मिलता है क्योंकि पूर्व कर्म बीच में बाधा बनते हैं। महाराज जी कहते हैं कि केवल बुद्धि, चालाकी या कर्मकुशलता से सुख नहीं मिलता, बल्कि भजन ही ऐसा साधन है जो कर्मबंधन को काट सकता है। धर्मपूर्वक चलने वाले व्यक्ति को प्रारंभ में कष्ट अवश्य मिलते हैं, पर अंत में वही उन्नति को प्राप्त होता है। जैसे किसान बीज बोकर धैर्य रखता है, वैसे ही भजन और सत्कर्म का फल समय आने पर अवश्य मिलता है। इसलिए परिस्थिति देखकर टूटना नहीं चाहिए, बल्कि भगवान के नाम का स्मरण करते हुए धैर्य रखना चाहिए। अंततः भगवान भक्त का मंगल निश्चित करते हैं।
प्रश्न 2: कलयुग में वैराग्य की वास्तविक परिभाषा क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि वैराग्य की परिभाषा किसी युग में नहीं बदलती। बदलता है केवल साधन का तरीका। सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा और कलयुग में नाम-संकीर्तन मुख्य साधन है, पर वैराग्य हर युग में आवश्यक है। वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि भोगों में आसक्ति समाप्त होना है। पहले त्याग आता है, जहाँ मन में इच्छा होती है पर साधक भगवान के लिए उसे रोकता है। उसके बाद वैराग्य आता है, जहाँ भोग सामने होने पर भी उनमें रुचि नहीं रहती। कलयुग में मनुष्य का मन अत्यंत चंचल है, खान-पान और वातावरण अशुद्ध हो चुके हैं, इसलिए ध्यान और यज्ञ कठिन हो गए हैं। ऐसे समय में भगवान का नाम जप ही श्रेष्ठ साधन है। लेकिन नाम जप में भी वैराग्य चाहिए, क्योंकि जो व्यक्ति पाप और विषयों में डूबा रहेगा उसका मन भजन में स्थिर नहीं हो सकता।
प्रश्न 3: भजन करते समय मन व्याकुल होकर रोने लगे तो क्या करना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि यदि भजन करते समय मन भगवान के लिए रोता है तो यह बहुत बड़ी कृपा का संकेत है। ऐसे आँसू हृदय की पवित्रता के प्रतीक होते हैं। उन्हें दिखावा बनाकर प्रकट नहीं करना चाहिए, बल्कि भीतर संजोकर रखना चाहिए। यदि मन विषयों की ओर भागे और व्याकुल हो तो भी घबराना नहीं चाहिए। मन को बार-बार भगवान के नाम में लगाते रहना चाहिए। महाराज जी कहते हैं कि जैसे अग्नि में सोना तपकर शुद्ध होता है, वैसे ही भजन में मन जलकर पवित्र होता है। साधक को मन के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि साक्षी भाव से उसे देखना चाहिए। नाम जप करते रहने से धीरे-धीरे मन शांत और निर्मल हो जाता है। भगवान के लिए रोना साधना की उच्च अवस्था है, क्योंकि उसमें संसार की वासनाएँ जलने लगती हैं और हृदय में भगवत प्रेम जाग्रत होने लगता है।
प्रश्न 4: मायिक इंद्रियों से भगवान का आश्रय कैसे लें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि इंद्रियाँ और मन मायिक अवश्य हैं, लेकिन उनका मूल स्वरूप भी भगवान ही हैं। जब मनुष्य इन इंद्रियों को संसार और भोगों में लगाता है तब वे बंधन का कारण बनती हैं, और जब इन्हें भगवान में लगाया जाता है तब यही इंद्रियाँ भगवत स्वरूप हो जाती हैं। जैसे लोहे को अग्नि में रखने पर वह अग्नि जैसा लाल और दहकता हुआ हो जाता है, वैसे ही मन और इंद्रियाँ भगवान के चिंतन में लगने पर दिव्य हो जाती हैं। साधक दो मार्ग अपना सकता है—ज्ञान मार्ग, जिसमें वह स्वयं को इंद्रियों का साक्षी मानता है; और भक्ति मार्ग, जिसमें सब कुछ भगवान को समर्पित कर देता है। जब मन, बुद्धि और चित्त भगवान में स्थिर हो जाते हैं तब गुणों का प्रभाव समाप्त हो जाता है और साधक भगवत स्वरूप का अनुभव करने लगता है। इसलिए समाधान बाहर नहीं, भगवान में मन लगाने में है।
प्रश्न 5: ईश्वर से प्रेम करना क्या स्वार्थ है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान से प्रेम करना कभी स्वार्थ नहीं हो सकता। जैसे माता अपने पुत्र को प्रेम से खिलाती-पिलाती है, उसकी सेवा करती है, तो उसमें कोई स्वार्थ नहीं होता; उसी प्रकार भगवान को अपना पुत्र, प्रियतम या परिवार मानकर प्रेम करना शुद्ध भक्ति है। प्रेम का स्वभाव देना है, लेना नहीं। जहाँ लेने की इच्छा हो वहाँ स्वार्थ होता है, लेकिन जहाँ केवल भगवान को सुख देने की भावना हो वहाँ प्रेम होता है। महाराज जी बताते हैं कि भक्त भगवान को अपने परिवार का सदस्य मानकर सेवा करता है—कोई उन्हें लाला मानता है, कोई पति, कोई सखा। भगवान भाव के भूखे हैं और जिस भाव से भक्त उन्हें भजता है, उसी भाव से वे कृपा करते हैं। सच्चा प्रेम वह है जिसमें भक्त भगवान से कुछ माँगता नहीं, बल्कि केवल उनके सुख और आनंद में प्रसन्न रहता है। यही निष्काम प्रेम भक्ति का सार है।
प्रश्न 6: भक्ति के साथ सकारात्मक कैसे रहें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सच्ची भक्ति स्वयं मनुष्य को सकारात्मक बना देती है। जो भगवान से विमुख होता है वही नकारात्मकता में गिरता है। भक्ति का अर्थ है धर्मपूर्वक जीवन जीना, पवित्र चिंतन करना और भगवान पर विश्वास रखना। जब मनुष्य भगवान के नाम में आनंद पाने लगता है तब उसका मन संसार की बुरी बातों में नहीं भटकता। नकारात्मक सोच इसलिए आती है क्योंकि मनुष्य बाहर सुख खोजता है। लेकिन जब भीतर भगवान का स्मरण जागता है तब मन स्थिर और आनंदमय हो जाता है। महाराज जी कहते हैं कि हर पाँच मिनट में एक बार भी “राधा” नाम लेने का नियम बना लो, तो धीरे-धीरे मन निरंतर भगवान में लगने लगेगा। खाली मन में संसार प्रवेश करता है, इसलिए मन को हमेशा नाम जप, सत्संग और शास्त्र चिंतन में लगाना चाहिए। यही सच्ची सकारात्मकता और वास्तविक भक्ति है।
प्रश्न 7: भगवान से माँगना चाहिए या सब उन पर छोड़ देना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि साधक के भीतर पूर्ण विश्वास और धैर्य है कि भगवान सर्वज्ञ हैं और वे हमारे लिए जो करेंगे वही श्रेष्ठ होगा, तो उसे सब भगवान पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन यदि मन में बेचैनी है और विश्वास अभी दृढ़ नहीं हुआ है, तो भगवान से माँगना भी उचित है। भगवान स्वयं गीता में चार प्रकार के भक्त बताते हैं—आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। किसी भी प्रकार से भगवान से जुड़ना लाभकारी है। परंतु महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि केवल माँगने से काम नहीं होता, उसके पीछे भजन, तपस्या और पवित्र आचरण भी होना चाहिए। जैसे बाज़ार से वस्तु खरीदने के लिए धन चाहिए, वैसे ही भगवान से कृपा पाने के लिए भजन रूपी धन चाहिए। इसलिए यदि माँगो तो केवल भगवान से माँगो, मनुष्यों से नहीं। धीरे-धीरे यही संबंध निष्काम प्रेम और पूर्ण समर्पण में बदल जाता है।
प्रश्न 8: अर्जुन को ही गीता का अधिकारी क्यों बनाया गया?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अर्जुन कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे भगवान श्री कृष्ण के नित्य सखा और महान भक्त थे। उनके रोम-रोम में श्री कृष्ण बसते थे। अर्जुन और श्री कृष्ण का संबंध केवल मित्रता का नहीं, बल्कि आत्मिक एकता का था। महाराज जी कहते हैं कि अर्जुन ने लीला करके भगवान से गीता का उपदेश प्रकट करवाया ताकि संसार का कल्याण हो सके। अर्जुन की तुलना सामान्य मनुष्य से नहीं करनी चाहिए। उन्होंने भगवान शंकर तक को युद्ध में संतुष्ट किया और उर्वशी जैसी अप्सरा के आकर्षण से भी विचलित नहीं हुए। इसलिए गीता का अधिकारी वही बन सकता था जिसका हृदय पूर्णतः भगवान में स्थित हो। आज के साधकों को अर्जुन बनने का अभिमान नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके चरणों की धूल मानकर विनम्रता से गीता और संतों के उपदेश का अनुसरण करना चाहिए। तभी धीरे-धीरे भगवान की कृपा प्राप्त होगी।
प्रश्न 9: श्रद्धा और तर्क में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवत प्राप्ति तर्क से नहीं, श्रद्धा और विश्वास से होती है। तर्क बुद्धि को उलझाता है, जबकि श्रद्धा साधक को भगवान के मार्ग पर आगे बढ़ाती है। संतों और शास्त्रों के वचनों को बिना संदेह स्वीकार करके जीवन में उतारना ही श्रद्धा है। जब मनुष्य हर बात में तर्क करता है तो धीरे-धीरे उसका मन नास्तिकता की ओर जा सकता है। लेकिन श्रद्धा से चलने वाला साधक अनुभव द्वारा सत्य को प्राप्त करता है। महाराज जी कहते हैं कि भगवान हृदय में ही विराजमान हैं, परंतु उनका अनुभव श्रद्धा से होता है। जैसे राख हटाने पर अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही नाम जप और सत्संग से हृदय की अशुद्धियाँ हटती हैं और भगवान का अनुभव होने लगता है। इसलिए साधक को विनम्र होकर संतों की शरण में रहना चाहिए और भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करना चाहिए।
प्रश्न 10: नकारात्मक विचार बार-बार आएँ तो उनसे कैसे बचें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि नकारात्मक विचारों से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे अलग होकर साक्षी भाव से उन्हें देखना चाहिए। जब मनुष्य उन विचारों को अपना मान लेता है, तभी वे उसे गिराते हैं। मन का स्वभाव नीचे गिरना है, जैसे पानी स्वतः नीचे बहता है। उसे ऊपर उठाने के लिए जैसे यंत्र चाहिए, वैसे ही मन को ऊपर उठाने के लिए मंत्र चाहिए। इसलिए निरंतर भगवान का नाम जप करना आवश्यक है। महाराज जी कहते हैं कि खाली मन में संसार और विकार प्रवेश कर जाते हैं, इसलिए मन को कभी खाली मत रहने दो। हर समय “राधा-राधा”, “कृष्ण-कृष्ण” या प्रिय भगवान का नाम लेते रहो। सत्संग, शास्त्र श्रवण और नाम जप से मन धीरे-धीरे पवित्र होने लगता है। जब भीतर भगवान का आनंद मिलने लगता है तब नकारात्मक सोच अपने आप समाप्त होने लगती है और हृदय में शांति स्थापित हो जाती है।
प्रश्न 11: क्या केवल मंदिर जाकर माँगने से कामनाएँ पूरी हो जाती हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि केवल मंदिर जाकर फूल-माला चढ़ा देने से कामनाएँ पूरी नहीं हो जातीं। भगवान से कृपा पाने के लिए भजन, तपस्या और पवित्र आचरण आवश्यक है। जैसे बाज़ार से वस्तु खरीदने के लिए धन चाहिए, वैसे ही भगवान से कृपा पाने के लिए भजन रूपी धन चाहिए। मनुष्य के पूर्व जन्मों के पाप पहले नष्ट होते हैं, उसके बाद सुख का विधान आता है। इसलिए कई लोग कहते हैं कि हम वर्षों से मंदिर जा रहे हैं फिर भी इच्छा पूरी नहीं हुई, पर वे यह नहीं समझते कि पहले कर्मों का शोधन हो रहा है। महाराज जी करदम ऋषि का उदाहरण देते हैं जिन्होंने योग्य पत्नी प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक भगवान नारायण का भजन किया, तब भगवान प्रकट हुए। इसलिए भगवान से माँगना गलत नहीं, पर उसके साथ तप, संयम, इंद्रियनिग्रह और नाम जप भी आवश्यक है। तभी कामना मंगलमय रूप से पूर्ण होती है।
प्रश्न 12: पूर्ण समर्पण (आत्मनिवेदन) की अवस्था क्या होती है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि आत्मसमर्पण भक्ति की अत्यंत ऊँची अवस्था है। इसमें भक्त भगवान से कुछ माँगता नहीं, बल्कि अपना तन, मन, प्राण सब भगवान को अर्पित कर देता है। वह सोचता है कि अब जो कुछ होगा वही भगवान की इच्छा से होगा और वही मेरे लिए श्रेष्ठ होगा। समर्पण का अर्थ है—“हे प्रभु! अब मैं आपका हूँ, आप जैसा उचित समझें वैसा करें।” ऐसी अवस्था में भक्त सुख और दुख दोनों को भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार करता है। महाराज जी कहते हैं कि समर्पण में बहुत आनंद है, क्योंकि वहाँ चिंता समाप्त हो जाती है। परंतु इस अवस्था में स्थिर रहना कठिन है, क्योंकि शरीर में कष्ट आते ही मन फिर माँग करने लगता है। इसलिए निरंतर भजन और भगवान का स्मरण आवश्यक है। जब भक्त को हर परिस्थिति में भगवान की कृपा दिखाई देने लगे और उसका विश्वास अटल हो जाए, तब सच्चा आत्मनिवेदन प्रकट होता है।
प्रश्न 13: क्या आज के समय में हम सब अर्जुन जैसी स्थिति में हैं?
उत्तर:
महाराज Ji कहते हैं कि सामान्य मनुष्य स्वयं को अर्जुन के समान नहीं मान सकता। अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के नित्य सखा, महान महाभागवत और नर-नारायण स्वरूप थे। उनके रोम-रोम में श्री कृष्ण बसते थे। आज मनुष्य थोड़ी परेशानी आने पर ही विचलित हो जाता है, जबकि अर्जुन ने भगवान शंकर तक को युद्ध में प्रसन्न किया और उर्वशी जैसी अप्सरा के आकर्षण को भी त्याग दिया। इसलिए अर्जुन की महानता को समझना चाहिए, न कि स्वयं को उनके समान मान लेना चाहिए। हाँ, यह अवश्य समझना चाहिए कि अर्जुन के माध्यम से भगवान ने संसार को गीता का अमूल्य ज्ञान दिया। इसलिए हमें अर्जुन की विनम्रता, श्रद्धा और भगवान पर विश्वास को अपने जीवन में लाने का प्रयास करना चाहिए। जब साधक अहंकार छोड़कर स्वयं को छोटा मानता है और संतों के चरणों में झुकता है, तभी भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
प्रश्न 14: जीवन रूपी रथ के सारथी श्री कृष्ण की प्राप्ति कैसे हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण बाहर नहीं, हमारे हृदय में ही विराजमान हैं। गीता में भी भगवान कहते हैं कि मैं सबके हृदय देश में स्थित हूँ। लेकिन मनुष्य की दृष्टि बाहर भोगों और संसार में लगी रहती है, इसलिए वह भगवान को अनुभव नहीं कर पाता। श्री कृष्ण को अपने जीवन का सारथी बनाने के लिए मन को अंतर्मुख करना होगा। इसके लिए नाम जप, सत्संग, शास्त्र श्रवण और पवित्र आचरण अत्यंत आवश्यक हैं। महाराज जी कहते हैं कि जब साधक संत में, गुरु में और गीता में भगवान का स्वरूप देखने लगता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर भी भगवान का अनुभव होने लगता है। श्री कृष्ण की प्राप्ति केवल बातों से नहीं होती, बल्कि उनके लिए सच्ची तड़प और प्रेम चाहिए। जब भोगों की इच्छा कम होकर भगवान से मिलने की चाह प्रबल हो जाती है, तब हृदय रूपी रथ में श्री कृष्ण स्वयं प्रकट हो जाते हैं।
प्रश्न 15: श्रद्धा से भगवान की प्राप्ति कैसे होती है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि श्रद्धा भगवान प्राप्ति का सबसे बड़ा आधार है। श्रद्धा का अर्थ है—संतों और शास्त्रों के वचनों को बिना तर्क के सत्य मानकर जीवन में उतारना। जब मनुष्य हर बात में तर्क करता है तो उसका मन भ्रमित हो जाता है और धीरे-धीरे भक्ति से दूर होने लगता है। लेकिन श्रद्धा साधक को सीधा भगवान के मार्ग पर आगे बढ़ाती है। महाराज जी कहते हैं कि भगवान को पाने के लिए हृदय में विश्वास होना चाहिए कि वे हमारे भीतर और चारों ओर उपस्थित हैं। जैसे राख हटाने पर अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही नाम जप और सत्संग से मन की अशुद्धियाँ हटती हैं और भीतर का दिव्य प्रकाश प्रकट होता है। श्रद्धा के बिना साधना केवल बाहरी क्रिया बन जाती है। इसलिए साधक को विनम्र होकर संतों की शरण लेनी चाहिए, भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करना चाहिए और पवित्र आचरण बनाए रखना चाहिए। तभी धीरे-धीरे भगवान का अनुभव होने लगता है।
प्रश्न 16: कलयुग में सबसे श्रेष्ठ साधन कौन-सा है?
उत्तर:
Guru Premanand Ji Maharaj महाराज जी कहते हैं कि कलयुग में भगवान का नाम जप और गुण कीर्तन ही सबसे श्रेष्ठ और सरल साधन है। सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में पूजा का महत्व था, लेकिन कलयुग में मनुष्य का मन अत्यंत चंचल और वातावरण अशुद्ध हो गया है। खान-पान, व्यवहार और वासनाएँ इतनी बढ़ गई हैं कि कठिन योग, ध्यान और यज्ञ करना अधिकांश लोगों के लिए संभव नहीं रहा। इसलिए संतों और शास्त्रों ने भी कहा है—“कलियुग केवल नाम अधारा।” भगवान का नाम ही ऐसा दिव्य साधन है जो पापों को नष्ट करता है, मन को पवित्र बनाता है और भक्त को भगवान से जोड़ देता है। महाराज जी कहते हैं कि नाम जप में पैसा नहीं लगता, केवल प्रेम और निरंतरता चाहिए। जो व्यक्ति हर समय भगवान का स्मरण करता है, उसका मन धीरे-धीरे संसार से हटकर भगवान में रमने लगता है। यही कलयुग की सबसे बड़ी साधना है।
प्रश्न 17: क्या केवल नाम जप से पाप और नकारात्मकता दूर हो सकती है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भगवान का नाम जप मनुष्य के भीतर की नकारात्मकता, पाप और अशांति को समाप्त करने की शक्ति रखता है। जब मनुष्य खाली बैठता है तो उसका मन संसार, काम, क्रोध, लोभ और भय की ओर भागता है। लेकिन जब वही मन भगवान के नाम में लग जाता है, तब भीतर की अशुद्धियाँ धीरे-धीरे जलने लगती हैं। महाराज जी कहते हैं कि नाम जप अग्नि की तरह है जो हृदय के विकारों को भस्म कर देता है। जैसे गंदा जल लगातार बहते रहने पर साफ हो जाता है, वैसे ही निरंतर नाम जप से मन शुद्ध होने लगता है। वे बताते हैं कि हर पाँच मिनट में एक बार भी “राधा” नाम लेने का नियम बना लो, तो धीरे-धीरे पूरा दिन भगवान के स्मरण में बीतने लगेगा। सत्संग, शास्त्र श्रवण और नाम जप मिलकर मन को इतना पवित्र बना देते हैं कि नकारात्मक सोच टिक ही नहीं पाती। यही भजन का वास्तविक फल है।
प्रश्न 18: भगवान के लिए रोना और तड़पना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान की प्राप्ति केवल शब्दों या बाहरी दिखावे से नहीं होती, बल्कि सच्ची तड़प और प्रेम से होती है। जब साधक के हृदय में भगवान के दर्शन की तीव्र इच्छा जागती है, तब उसके भीतर से आँसू निकलते हैं और वही आँसू हृदय को पवित्र करते हैं। संसार के लिए रोना बंधन बढ़ाता है, लेकिन भगवान के लिए रोना मुक्ति का मार्ग खोल देता है। महाराज जी बताते हैं कि जब मनुष्य भीतर से पुकारता है—“हा कृष्ण! हा राधे!” तब भगवान उस पुकार को अवश्य सुनते हैं। लेकिन इसके लिए मन को भोगों से हटाना पड़ता है। जब तक संसार की इच्छाएँ प्रबल रहेंगी, तब तक भगवान मिलने की चाह दबती रहेगी। इसलिए नाम जप, सत्संग और वैराग्य के द्वारा उस तड़प को बढ़ाना चाहिए। भगवान उसी हृदय में प्रकट होते हैं जहाँ सच्चा प्रेम, विनम्रता और मिलन की प्यास होती है।
प्रश्न 19: संत और गुरु का महत्व क्यों बताया गया है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि संत और गुरु भगवान के ही स्वरूप होते हैं। भगवान तक पहुँचने का मार्ग संतों की शरण से ही सरल होता है। गीता, शास्त्र और भगवान का ज्ञान तभी सही रूप में समझ आता है जब कोई संत या गुरु उसका अर्थ समझाए। महाराज जी बताते हैं कि भगवान हर हृदय में हैं, परंतु अज्ञान के कारण मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाता। संत वही हैं जो हमारे भीतर भगवान की ओर दृष्टि मोड़ते हैं। इसलिए संतों की वाणी को श्रद्धा से सुनना और उनके बताए मार्ग पर चलना अत्यंत आवश्यक है। महाराज जी कहते हैं कि जो व्यक्ति गुरु में ब्रह्म बुद्धि कर लेता है, उसके लिए धीरे-धीरे पूरा संसार भगवानमय होने लगता है। संतों के चरणों में विनम्र होकर बैठने से ज्ञान प्रकट होता है और मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं। इसलिए साधक को अहंकार छोड़कर संतों की शरण ग्रहण करनी चाहिए।
प्रश्न 20: भोगों की इच्छा और भगवान प्राप्ति में संघर्ष क्यों होता है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि हर जीव के भीतर भगवान को पाने की चाह होती है, लेकिन संसार के भोग उस चाह को ढक देते हैं। मनुष्य कहता तो है कि उसे भगवान चाहिए, परंतु उसकी वास्तविक आसक्ति भोगों और विषयों में अधिक होती है। जब भोग सामने आते हैं तो मन तुरंत उनकी ओर दौड़ पड़ता है और भगवान की स्मृति पीछे छूट जाती है। महाराज जी इस स्थिति को राख से ढकी अग्नि के समान बताते हैं। अग्नि भीतर मौजूद है, लेकिन राख के कारण उसका प्रकाश दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार आत्मा में ज्ञान और भगवत प्रेम पहले से विद्यमान है, पर वासनाएँ उसे ढक देती हैं। जब साधक नाम जप, सत्संग और वैराग्य का अभ्यास करता है तो धीरे-धीरे भोगों की आसक्ति कम होने लगती है और भगवान प्राप्ति की चाह प्रबल हो जाती है। तब हृदय में भगवत प्रेम प्रकट होता है और साधक वास्तविक आनंद का अनुभव करता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”