माला-1321: भजन का आनंद भी भगवान से दूर कर सकता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1. महाराज जी,भजन करने के बाद जो प्रसन्नता और आनंद अनुभव होता है, उससे अहंकार आने लगे तो क्या करें? उत्तर: श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भजन के बाद मिलने वाली प्रसन्नता साधक के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं है। यदि भजन के बाद मन में यह विचार आने लगे कि “मेरा भजन

माला-1312: क्या भगवत आनंद भी बंधन बन सकता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, क्या भक्ति, नाम जप और भगवत आनंद में मिलने वाला सुख भी बंधनकारी हो सकता है, या यह भगवत प्राप्ति में सहायक है? उत्तर: महाराज जी ने बताया कि भक्ति, नाम जप, भगवान के रूप, गुण, लीला और धाम में जो आनंद प्राप्त होता है, वह साधारण सात्त्विक सुख नहीं है,

माला-1311: आखिर संत ईश्वर प्राप्ति को कठिन क्यों बताते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1:महाराज जी, क्या ईश्वर प्राप्ति वास्तव में कठिन है या सरल? संत-महापुरुष इसे कठिन क्यों बताते हैं? उत्तर: महाराज जी ने बताया कि वास्तव में ईश्वर प्राप्ति जितनी सरल है, उतना सरल संसार में और कोई कार्य नहीं है। कठिनाई भगवान में नहीं, बल्कि हमारे मन की आसक्तियों में है। जब तक मनुष्य अपने

माला-1310: गुरु पादुका का इतना विशेष महत्व क्यों माना गया है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, गुरु पादुका का इतना विशेष महत्व क्यों माना गया है, जबकि गुरुदेव की माला, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ भी पूजनीय हैं? उत्तर: महाराज जी ने बताया कि गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु पूजनीय और आदरणीय होती है, क्योंकि वह गुरु के स्पर्श और कृपा से पवित्र हो जाती है। किंतु गुरु पादुका

माला-1307: बरसाना में श्रीजी को “लाडली महाराज” क्यों कहा जाता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, श्रीजी को “लाडली महाराज” क्यों कहा जाता है? क्या श्री राधा और श्रीकृष्ण वास्तव में एक ही परम तत्व हैं? उत्तर: महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत प्रेमपूर्ण और सरल शब्दों में दिया। उन्होंने बताया कि श्री राधा और श्रीकृष्ण दो अलग-अलग सत्ता नहीं हैं, बल्कि एक ही परम

माला-1304: क्या मृत्यु के बाद अपने स्वजनों या पितरों से संपर्क किया जा सकता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,क्या मृत्यु के बाद अपने स्वजनों या पितरों से संपर्क करके उनकी मुक्ति या स्थिति के बारे में जाना जा सकता है? उत्तर: महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से दिया कि मृत्यु के बाद किसी स्वजन, पितर या मृत व्यक्ति से सीधे संपर्क करके उसकी स्थिति जानना

माला-1303: क्या संतान न पैदा करने का संकल्प लेना उचित है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, क्या संतान न पैदा करने का संकल्प लेना उचित है, या इसे भगवान की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए? उत्तर: महाराज जी के अनुसार संतान के विषय में अपनी ओर से कठोर संकल्प लेना उचित नहीं है। उन्होंने समझाया कि यदि भगवान किसी जीव को हमारे घर जन्म देना चाहते हैं,

माला-1302: क्या सिर्फ ईमानदारी से परिवार चलाने से मोक्ष मिल सकता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, क्या केवल ईमानदारी से परिवार का पालन-पोषण करने से मोक्ष मिल सकता है, या भगवान का नाम जप भी आवश्यक है? उत्तर: महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से दिया। उन्होंने कहा कि केवल परिवार का पालन-पोषण करना, मेहमानों की सेवा करना, माता-पिता का आदर करना और

माला-1300: आत्मा शरीर में कहाँ रहती है, और परमात्मा का अनुभव कैसे किया जा सकता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,आत्मा शरीर में कहाँ रहती है, और परमात्मा का अनुभव कैसे किया जा सकता है? उत्तर: महाराज जी के अनुसार आत्मा और परमात्मा किसी विशेष अंग में सीमित होकर नहीं रहते, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व में व्याप्त हैं। जैसे दूध में घी सर्वत्र उपस्थित रहता है, लेकिन बिना उचित प्रक्रिया के दिखाई नहीं

माला-1298: “श्रीजी, मेरी ये इच्छा पूरी मत करना…” भक्त के मन में ऐसा भाव क्यों आता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, श्रीजी से कुछ मांगने का मन बनता है, लेकिन मांगने के बाद उसे वापस लेने का भाव क्यों आता है? उत्तर: महाराज जी के अनुसार यह स्थिति साधक के भीतर एक साथ चल रहे दो भावों का परिणाम है। एक ओर देहभाव है, जिसके कारण मनुष्य अपनी आवश्यकताओं, दुखों और इच्छाओं