माला-1322: राजा अलर्क ने गृहस्थ आश्रम को विपत्तियों का वन क्यों कहा? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1. महाराज जी, राजा अलर्क ने गृहस्थ आश्रम को विपत्तियों का वन (दावाग्नि रूपी संसार) क्यों कहा?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि राजा अलर्क ने गृहस्थ आश्रम को दोषपूर्ण नहीं कहा, बल्कि उस अवस्था की ओर संकेत किया जिसमें जीव भगवान को भूलकर माया, देहाभिमान और अनंत इच्छाओं में उलझ जाता है। जब तक मनुष्य को भगवत् आनंद का अनुभव नहीं होता, तब तक उसे संसार ही सुखद दिखाई देता है। लेकिन जैसे स्वप्न से जागने पर पता चलता है कि जो कुछ दिखाई दे रहा था वह वास्तविक नहीं था, उसी प्रकार भगवान के वास्तविक आनंद का अनुभव होने पर यह संसार भी एक क्षणिक स्वप्न जैसा प्रतीत होने लगता है। इसलिए महापुरुष संसार को दुखद स्वप्न या दावाग्नि कहते हैं, क्योंकि इसमें जीव निरंतर राग, द्वेष, कामनाओं और वासनाओं में जलता रहता है।

महाराज जी बताते हैं कि संसार का सबसे बड़ा दुःख बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मन की अनंत इच्छाएँ हैं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। धन, परिवार, प्रतिष्ठा, संतान और भोग—इन सबकी चाह कभी समाप्त नहीं होती। जब तक चाह बनी रहती है, तब तक मन को शांति नहीं मिलती। वास्तविक आनंद उस समय आता है जब हृदय भगवान के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की इच्छा से मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि भगवान को प्राप्त करने वाले महापुरुष फिर संसार की ओर लौटना नहीं चाहते।

वे आगे समझाते हैं कि ब्रह्मानंद का अनुभव होने के बाद संसार के सभी भोग फीके लगने लगते हैं। जैसे किसी को उत्तम मिठाई मिल जाए तो वह गुड़ के झाग में रुचि नहीं लेता, उसी प्रकार भगवत् आनंद मिलने पर सांसारिक सुख आकर्षक नहीं रह जाते। तब काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार सब जलती हुई अग्नि के समान दिखाई देते हैं। महापुरुष इन्हीं अग्नियों से बचने के लिए भगवान की शरण चाहते हैं और संसार को दावाग्नि कहते हैं।

महाराज जी का निष्कर्ष है कि जब तक भजन नहीं होगा, तब तक संसार आकर्षक ही लगेगा। लेकिन भगवान के प्रेम का अनुभव होने पर मनुष्य समझ जाता है कि वास्तविक सुख केवल प्रभु के चिंतन और भक्ति में है। इसलिए महापुरुष संसार से घृणा नहीं करते, बल्कि भगवान के आनंद की तुलना में उसे तुच्छ समझते हैं और पुनः उसी मोह में नहीं पड़ना चाहते।


प्रश्न 2. नाम लिखते समय मन बार-बार भटकता है और देखे हुए दृश्य चित्त में बने रहते हैं। ऐसी चंचलता को कैसे दूर करें और एकाग्रता कैसे बढ़ाएँ?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि नाम लिखने या नाम-जप के समय मन का भटकना साधना के प्रारंभिक चरण में स्वाभाविक है। यदि कभी अक्षर टेढ़े-मेढ़े बन जाएँ, छोटे-बड़े हो जाएँ या मन बार-बार इधर-उधर चला जाए, तो इससे निराश नहीं होना चाहिए। साधना का उद्देश्य सुंदर लिखावट नहीं, बल्कि मन को भगवान के नाम में एकाग्र करना है। इसलिए धैर्य के साथ अभ्यास करते रहना ही सबसे महत्वपूर्ण है।

महाराज जी कहते हैं कि एकाग्रता धीरे-धीरे अभ्यास से विकसित होती है। साधक को बार-बार अपने चित्त को भगवान के नाम की ओर वापस लाना चाहिए। यदि बीच में कोई दृश्य, व्यक्ति या घटना मन में आ जाए, तो उसे पकड़कर बैठना नहीं चाहिए। यह समझना चाहिए कि वह दृश्य पहले भी नहीं था और कुछ समय बाद रहेगा भी नहीं। इसलिए उसे तुरंत छोड़कर फिर से भगवान के नाम में मन लगाना चाहिए। यही अभ्यास धीरे-धीरे चित्त को स्थिर बनाता है।

महाराज जी अपने अनुभव से बताते हैं कि संसार में रहते हुए भी असंख्य लोगों और घटनाओं से सामना होता है, लेकिन साधक को यह सीखना चाहिए कि आवश्यक कार्य पूरा होते ही उन चित्रों को मन से हटाकर फिर भगवान के स्मरण में लौट आए। वे बताते हैं कि भगवान की कृपा और निरंतर अभ्यास से मन में एक प्रकार की सजगता आ जाती है, जिससे अनावश्यक स्मृतियाँ टिक नहीं पातीं और चित्त फिर से भजन में लग जाता है।

अंत में महाराज जी साधक को उत्साह बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं कि थोड़े समय के अभ्यास से पूर्ण एकाग्रता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। प्रतिदिन नियमित अभ्यास करने से मन पहले की तुलना में अधिक स्थिर होता जाता है। इसलिए निराश होने के बजाय विश्वास रखना चाहिए कि निरंतर अभ्यास और भगवान की कृपा से एक दिन चित्त सहज ही नाम में स्थिर रहने लगेगा।

प्रश्न 3. जीवन के अलग-अलग पड़ाव (बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था) में मनुष्य की इच्छाएँ और आकांक्षाएँ क्यों बदलती रहती हैं?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य की इच्छाएँ उसकी आयु बदलने से नहीं, बल्कि उसके शरीर के साथ बने हुए तादात्म्य के कारण बदलती रहती हैं। बचपन में खिलौनों की चाह होती है, युवावस्था में धन, प्रतिष्ठा और भोग की आकांक्षाएँ बढ़ जाती हैं, जबकि वृद्धावस्था में भी मन किसी-न-किसी प्रकार की इच्छा से बँधा रहता है। बाहर से इच्छाओं का स्वरूप बदलता दिखाई देता है, लेकिन उनका मूल कारण एक ही है—अज्ञान। जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर मानता रहेगा, तब तक शरीर की प्रत्येक अवस्था के अनुसार नई-नई कामनाएँ जन्म लेती रहेंगी।

महाराज जी समझाते हैं कि जैसे बड़े होने पर बचपन के खिलौने महत्वहीन लगने लगते हैं, वैसे ही यदि मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त हो जाए, तो संसार की बड़ी-बड़ी इच्छाएँ भी तुच्छ प्रतीत होने लगती हैं। समस्या इच्छाओं के बदलने की नहीं है, बल्कि उस अज्ञान की है जिसके कारण मनुष्य हर अवस्था में स्वयं को शरीर ही मानता रहता है। वास्तव में जीव न तो बालक है, न युवा और न ही वृद्ध। ये परिवर्तन केवल शरीर में होते हैं, जबकि आत्मा इन सबकी साक्षी है। जब यह समझ दृढ़ हो जाती है, तब इच्छाओं का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है।

महाराज जी आगे कहते हैं कि यदि अज्ञान बना रहे, तो वृद्धावस्था आने पर भी इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं। शरीर कमजोर हो जाता है, इन्द्रियाँ पहले जैसी नहीं रहतीं, फिर भी भोग की वासनाएँ बनी रहती हैं। यही कारण है कि मनुष्य जीवन भर इच्छाओं के पीछे भागता रहता है और अंत समय तक भी उनसे मुक्त नहीं हो पाता। इसलिए केवल उम्र बढ़ जाने से वैराग्य नहीं आता, बल्कि भजन, सत्संग और गुरु की आज्ञा में रहकर साधना करने से मन की वासनाएँ धीरे-धीरे शांत होती हैं।

अंत में महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि साधक का लक्ष्य इच्छाओं को बदलना नहीं, बल्कि उन्हें समाप्त करना होना चाहिए। जब भगवान के नाम का आश्रय लेकर आत्मस्वरूप की पहचान होने लगती है, तब सांसारिक इच्छाएँ स्वतः कमजोर पड़ने लगती हैं। उस स्थिति में मनुष्य अपने सभी कर्तव्य निभाते हुए भी भीतर से निष्काम रहता है और वास्तविक शांति का अनुभव करता है। यही जीवन का सही मार्ग है।


प्रश्न 4. सकाम भक्ति से निष्काम भक्ति की ओर कैसे बढ़ें और भगवान से सच्चा प्रेम कैसे करें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान से सच्चा प्रेम करने का प्रयास भी अपने बल पर नहीं किया जा सकता। साधक का पहला कर्तव्य भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और शरणागति का भाव विकसित करना है। वे कहते हैं कि हमें यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि हमारे भीतर निष्काम प्रेम कब उत्पन्न होगा। हमारा कार्य केवल भगवान का स्मरण करना, उनका नाम जपना और उनके प्रति विश्वास बनाए रखना है। जब साधक पूरी निष्ठा से भगवान का आश्रय लेता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन का मार्ग संभाल लेते हैं और धीरे-धीरे उसके चित्त को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

महाराज जी आगे समझाते हैं कि भगवान का प्रेम ऐसा है जो साधक के भीतर संचित संसारिक संस्कारों को भी बदल देता है। वे भगवान को “चित्त चोर” कहते हैं, क्योंकि जब उनकी कृपा होती है, तब वे मनुष्य के चित्त को संसार से हटाकर अपने प्रेम में लगा देते हैं। इसलिए साधक को बार-बार केवल इतना भाव रखना चाहिए कि वह भगवान का है और भगवान उसके हैं। शरणागति की तैयारी साधक करता है, लेकिन उसे स्वीकार करना भगवान का कार्य है। यही निष्काम भक्ति की शुरुआत है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि भगवान ने स्वयं आश्वासन दिया है कि जो उनका अनन्य स्मरण करता है, उसके योग और क्षेम की जिम्मेदारी वे लेते हैं। इसलिए साधक को भविष्य की चिंता छोड़कर भगवान के वचनों पर विश्वास करना चाहिए। व्यापार, नौकरी, परिवार या अन्य सभी कार्य भी भगवान की सेवा मानकर करने चाहिए और हर परिस्थिति में नाम-जप जारी रखना चाहिए। जब ऐसा अभ्यास निरंतर चलता है, तब भगवान का स्मरण स्वाभाविक हो जाता है और मन बार-बार उन्हीं की ओर लौटने लगता है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि निष्काम भक्ति किसी बाहरी प्रयास से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा से प्रकट होती है। साधक का काम केवल अधीनता, विश्वास, निरंतर नाम-जप और समर्पण बनाए रखना है। जैसे-जैसे भगवान का आकर्षण बढ़ता है, वैसे-वैसे संसार की आसक्ति स्वतः कम होती जाती है और सच्चा प्रेम हृदय में विकसित होने लगता है। यही सकाम भक्ति से निष्काम भक्ति की वास्तविक यात्रा है।

प्रश्न 5. भक्ति-साधना में विनम्रता (दैन्य भाव) का क्या महत्व है और इसे अपने जीवन में कैसे उतारें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भक्ति का सबसे बड़ा आधार दैन्य भाव अर्थात सच्ची विनम्रता है। भगवान को अहंकार बिल्कुल प्रिय नहीं है। यदि कोई व्यक्ति बड़े-बड़े मंदिर बनवा दे, भव्य पूजा करे या अनेक धार्मिक कार्य कर ले, लेकिन उसके भीतर अहंकार बना रहे, तो वह भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता। महाराज जी दुर्योधन और विदुर का उदाहरण देकर समझाते हैं कि भगवान ने दुर्योधन के वैभवपूर्ण भोजन को स्वीकार नहीं किया, जबकि विदुर के घर प्रेम और विनम्रता से अर्पित साधारण सेवा को स्वीकार किया। इससे स्पष्ट होता है कि भगवान बाहरी वैभव से अधिक हृदय की नम्रता और प्रेम को देखते हैं।

महाराज जी आगे बताते हैं कि अहंकार साधक की सबसे बड़ी बाधा है। यदि किसी भक्त के भीतर यह भाव आ जाए कि उसने बहुत साधना कर ली है या वह दूसरों से श्रेष्ठ है, तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है। वे गरुड़ जी और नारद जी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए समझाते हैं कि भगवान अपने भक्त का भी अहंकार स्वीकार नहीं करते। इसलिए साधक को अपने भीतर दैन्य भाव विकसित करना चाहिए। यह बनावटी विनम्रता नहीं होनी चाहिए, बल्कि हृदय से यह अनुभव होना चाहिए कि जो कुछ भी मिला है, वह केवल भगवान की कृपा है।

महाराज जी कहते हैं कि दैन्य भाव का सबसे अच्छा अभ्यास यह है कि मनुष्य स्वयं को भगवान का सेवक और समस्त जगत को भगवान का स्वरूप माने। जैसे वृक्ष पत्थर खाने पर भी फल, फूल और छाया देना नहीं छोड़ता, वैसे ही भक्त को भी दूसरों के प्रति उपकार का भाव रखना चाहिए। स्वयं सम्मान की इच्छा न रखते हुए दूसरों को सम्मान देना, किसी की निंदा या अपमान न करना और निरंतर भगवान का नाम-स्मरण करना—यही वास्तविक भक्ति का स्वरूप है। अहंकार रहित व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में सेवा कर सकता है।

अंत में महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि केवल मंदिर में पूजा करना पर्याप्त नहीं है। यदि बाहर निकलकर हम दूसरों के साथ छल, कपट, द्वेष या अपमान का व्यवहार करते हैं, तो ऐसी पूजा भगवान स्वीकार नहीं करते। इसलिए सच्ची विनम्रता वही है जो व्यवहार में दिखाई दे। जब साधक सबमें भगवान का अंश देखकर प्रेम, सेवा और सम्मान का भाव रखता है, तब उसकी भक्ति सुरक्षित रहती है और वह भगवान के अधिक निकट पहुँचता है।


प्रश्न 6. यदि कोई मांस, मदिरा और व्यभिचार का त्याग करके निरंतर नाम-जप करता है, तो उसे कैसे पता चले कि भगवत् दर्शन का समय निकट है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जैसे भोजन करते समय मनुष्य को स्वयं अनुभव होने लगता है कि उसका पेट भर गया है, उसी प्रकार साधना में प्रगति होने पर भी साधक का अपना हृदय ही उसे संकेत देने लगता है। इसके लिए किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब भगवान की कृपा से भीतर परिवर्तन होने लगता है, तब साधक स्वयं अनुभव करता है कि उसका मन पहले जैसा नहीं रहा। यह परिवर्तन ही भगवत् प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत है।

महाराज जी बताते हैं कि भगवान के निकट पहुँचने वाले साधक के भीतर कुछ स्पष्ट लक्षण प्रकट होने लगते हैं। सबसे पहले अहंकार कम होने लगता है और सम्मान पाने की इच्छा समाप्त होने लगती है। वह स्वयं को बड़ा मानने के बजाय सबको सम्मान देने लगता है। उसके भीतर मोह भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। प्रेम सबके प्रति रहता है, लेकिन किसी के प्रति आसक्ति या स्वार्थ नहीं रहता। संसार के भोग सामने होने पर भी मन उनमें आकर्षित नहीं होता। सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान और निंदा-स्तुति जैसी परिस्थितियाँ भी उसके मन को पहले की तरह विचलित नहीं कर पातीं।

महाराज जी आगे कहते हैं कि यदि साधक का चरित्र पवित्र है, वह व्यसनों से दूर है और निरंतर भगवान का नाम-जप कर रहा है, तो ये दिव्य गुण धीरे-धीरे अपने आप विकसित होने लगते हैं। लेकिन इस अवस्था में भी साधक को अपने त्याग या साधना का अहंकार नहीं करना चाहिए। त्याग करने के बाद भी यदि मन बार-बार अपने त्याग को याद करता रहे, तो वह भी एक प्रकार का बंधन बन जाता है। सच्चा साधक अपने त्याग का भी स्मरण नहीं रखता, बल्कि उसे स्वाभाविक जीवन का हिस्सा बना लेता है।

अंत में महाराज जी बताते हैं कि भगवान की प्राप्ति के निकट पहुँचने का सबसे बड़ा लक्षण है—हृदय में गहरा दैन्य भाव, भगवान के लिए विरह, निरंतर नाम-जप और प्रभु-दर्शन की तीव्र लालसा। जब साधक एकांत में भगवान के लिए रोने लगता है और उसका मन केवल प्रभु के मिलन की चाह में व्याकुल रहता है, तब भगवान उसकी पुकार को अनसुना नहीं करते। इसलिए साधक को अहंकार से बचते हुए निरंतर नाम-जप, संत-संग और पवित्र आचरण में लगे रहना चाहिए। यही भगवत् प्राप्ति का वास्तविक मार्ग है।

प्रश्न 7. तन, मन और वाणी का पूर्ण समर्पण भगवान को कैसे करें? वास्तविक शरणागति की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि वास्तविक समर्पण केवल शब्दों से यह कह देने का नाम नहीं है कि “मैं भगवान की शरण में हूँ।” समर्पण का आरंभ वाणी से होता है, लेकिन उसकी पूर्णता तब होती है जब जीवन का प्रत्येक व्यवहार भगवान के अनुकूल बनने लगे। सबसे पहले साधक को अपनी वाणी भगवान को समर्पित करनी चाहिए। इसका अर्थ है कि वाणी से किसी का अहित न हो, कटु वचन न बोले जाएँ, गाली, अश्लीलता, छल या प्रपंच से बचा जाए। यदि बोलना हो तो भगवान के संबंध की बातें हों या आवश्यक कार्य भगवान का स्मरण करते हुए किए जाएँ। जहाँ अनावश्यक बोलना हो, वहाँ मौन ही श्रेष्ठ है। यही वाणी का वास्तविक समर्पण है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि शरीर का समर्पण तभी माना जाएगा जब शरीर से होने वाला प्रत्येक कार्य भगवान के अनुकूल हो। साधक को ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिए जो भगवान की इच्छा के विपरीत हो। भोजन भी पहले भगवान को अर्पित करके ही ग्रहण करना चाहिए। यदि कहीं मंदिर या विग्रह उपलब्ध न हो, तब भी भावपूर्वक भगवान का स्मरण करके भोजन को अर्पित करना चाहिए। शरीर को भगवान की धरोहर मानकर उसके द्वारा केवल पवित्र और धर्मयुक्त कर्म करना ही तन का समर्पण है।

महाराज जी मन के समर्पण को सबसे महत्वपूर्ण बताते हैं। जब मन बार-बार भगवान का ही चिंतन करे, उन्हीं के लिए संकल्प बनाए और संसार की अशुद्ध कल्पनाओं से दूर रहे, तब मन धीरे-धीरे भगवान में समर्पित होने लगता है। वे सावधान करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को शरणागत कहे, लेकिन गुप्त रूप से अशुद्ध दृश्य देखे, अनुचित कर्म करे या जानबूझकर भगवान के विपरीत आचरण करे, तो वह वास्तविक शरणागति नहीं, बल्कि दिखावा है। हाँ, यदि कमजोरीवश कभी भूल हो जाए और साधक तुरंत भगवान से क्षमा माँगकर पुनः संभलने का प्रयास करे, तो भगवान उसकी सहायता करते हैं और आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं।

अंत में महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि पूर्ण समर्पण तब होता है जब तन, मन और वाणी तीनों भगवान के हो जाते हैं। उस अवस्था में “मैं” और “मेरा” का भाव समाप्त होने लगता है और साधक का जीवन भगवान की इच्छा के अनुसार चलने लगता है। तब जानबूझकर पाप करने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है और भगवान की कृपा से ऐसा अंतःकरण विकसित होता है कि भूल से भी भगवान के विपरीत आचरण करने का मन नहीं करता। यही वास्तविक शरणागति और पूर्ण समर्पण की अवस्था है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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