माला-1310: गुरु पादुका का इतना विशेष महत्व क्यों माना गया है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, गुरु पादुका का इतना विशेष महत्व क्यों माना गया है, जबकि गुरुदेव की माला, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ भी पूजनीय हैं?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु पूजनीय और आदरणीय होती है, क्योंकि वह गुरु के स्पर्श और कृपा से पवित्र हो जाती है। किंतु गुरु पादुका का महत्व सबसे अधिक माना गया है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष रूप से गुरुचरणों का स्पर्श प्राप्त करती रहती है। महापुरुषों के चरणों में दिव्य शक्ति, भगवती कृपा और ज्ञान का निवास होता है, इसलिए उनकी चरण रज और चरण पादुका साधक के लिए अत्यंत कल्याणकारी मानी गई है।

महाराज जी ने कहा कि प्रेम, ज्ञान और भगवत भावना की प्राप्ति बड़े-बड़े तप, यज्ञ और साधनाओं से भी कठिन है, लेकिन संतों की चरण रज के प्रभाव से यह सहज हो सकती है। इसी कारण गुरु पादुका को सिर पर धारण करना, उसका पूजन करना और उसके प्रति श्रद्धा रखना साधक के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का कारण बनता है।

उन्होंने भरत जी द्वारा श्रीराम की पादुका का राज्य सिंहासन पर स्थापित करने का उदाहरण भी दिया और कहा कि गुरु पादुका का आश्रय लेने वाला साधक बाहरी बाधाओं तथा आंतरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—पर विजय प्राप्त कर सकता है। इसलिए गुरु पादुका को साधारण वस्तु नहीं, बल्कि गुरु कृपा और दिव्य ज्ञान का प्रत्यक्ष स्वरूप समझना चाहिए।


प्रश्न 2: गुरु पादुका को गुरुदेव से भी अधिक महत्व देने का क्या आध्यात्मिक आधार है?

उत्तर:

महाराज जी ने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में कहा कि गुरु और गुरु की प्रत्येक वस्तु अमूल्य होती है, लेकिन गुरु पादुका के प्रति विशेष श्रद्धा इसलिए रखी जाती है क्योंकि उसमें गुरुचरणों की निरंतर उपस्थिति और शक्ति विद्यमान रहती है। साधक हर समय गुरुदेव के साथ तो नहीं रह सकता, लेकिन उनकी पादुका को अपने पास रखकर निरंतर उनके आश्रय का अनुभव कर सकता है।

महाराज जी ने समझाया कि जैसे भगवान से भी बढ़कर भक्त के लिए भगवान का नाम प्रिय हो सकता है, उसी प्रकार गुरुदेव के प्रति प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक उनकी चरण पादुका है। उन्होंने कहा कि गुरु पादुका में गुरु की कृपा, ज्ञान और आध्यात्मिक सामर्थ्य निवास करती है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक उसका सेवन करता है, उसकी बुद्धि भगवत मार्ग से विमुख नहीं होती।

महाराज जी ने अमीर खुसरो और उनके गुरु की पादुका का प्रसंग सुनाकर बताया कि गुरु पादुका का मूल्य सांसारिक संपत्ति से कहीं अधिक है। यदि प्राण देकर भी ऐसी पादुका प्राप्त हो जाए तो वह भी सस्ता सौदा है, क्योंकि उससे जीवन में भगवत प्रेम, विनम्रता और अहंकार का नाश होता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि अहंकार को नष्ट करने का सबसे प्रभावी साधन गुरुचरणों का आश्रय है, और गुरु पादुका उसी आश्रय का मूर्त स्वरूप है। यही कारण है कि संतों ने गुरु पादुका को अत्यंत आदर और प्रेम के साथ पूजनीय माना है।


प्रश्न 3: जड़-चेतन की गाँठ (चिद्-जड़ ग्रंथि) से मुक्त होने और शरणागत भाव में स्थिर रहने का उपाय क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि जड़ और चेतन के बीच जो भ्रम उत्पन्न हो गया है, वही जीव के बंधन का कारण है। इस गाँठ को केवल तर्क, अध्ययन या बाहरी प्रयासों से नहीं खोला जा सकता। इसका समाधान भगवान की शरणागति और गुरु प्रदत्त नाम के जप में निहित है।

उन्होंने कहा कि साधक को बार-बार यह स्मरण रखना चाहिए कि वह स्वयं समर्थ नहीं है, बल्कि भगवान ही उसके जीवन के वास्तविक संचालक हैं। जब मनुष्य अपनी असमर्थता स्वीकार करके प्रभु की शरण ग्रहण करता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर विश्वास जागृत होता है और विकारों की शक्ति कम होने लगती है।

महाराज जी ने समझाया कि शरणागत का मुख्य कर्तव्य केवल नाम जप करना, भगवान के आश्रय में रहना और गलत आचरण से बचने का प्रयास करना है। विकारों को बलपूर्वक हटाने की चिंता स्वयं भगवान पर छोड़ देनी चाहिए। वही उचित समय पर जीव की आंतरिक गाँठ खोलते हैं और ऐसा दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं जो पुस्तकीय ज्ञान से कहीं ऊँचा होता है।

उन्होंने कहा कि शरणागति की सर्वोत्तम अवस्था वह है, जहाँ साधक एक छोटे पक्षी के बच्चे की भाँति केवल प्रभु की प्रतीक्षा करता है और पूर्ण विश्वास रखता है कि वही उसकी रक्षा और उन्नति करेंगे। इसी विश्वास से जड़-चेतन की गाँठ खुलती है और आत्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है।


प्रश्न 4: शरणागत साधक अपने मन में उठने वाले विकारों, विचारों और भावनाओं के साथ कैसा व्यवहार करे?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि शरणागत साधक को अपने मन में आने वाले प्रत्येक विचार का विवेकपूर्वक परीक्षण करना चाहिए। उसे यह देखना चाहिए कि कौन-सा विचार भगवान के अनुकूल है और कौन-सा भगवान से विमुख करने वाला है। जो विचार शास्त्रसम्मत और भगवत भाव को बढ़ाने वाले हों, उन्हें स्वीकार करना चाहिए, और जो विचार सांसारिक आसक्ति, अहंकार या विकारों को बढ़ाते हों, उनसे उदासीन रहना चाहिए।

उन्होंने बताया कि उदासीनता का अर्थ विचारों से संघर्ष करना नहीं है, बल्कि उन्हें महत्व न देना है। जब साधक नाम जप में स्थित रहता है, तब प्रतिकूल विचार धीरे-धीरे स्वयं ही क्षीण होने लगते हैं। यदि मनुष्य अपने बल से विकारों को हटाने का प्रयास करेगा, तो अनेक बार असफलता हाथ लगेगी, लेकिन यदि वह प्रभु के सामने अपनी असमर्थता प्रकट करेगा, तो भगवान स्वयं उसकी सहायता करेंगे।

महाराज जी ने कहा कि शरणागत का भाव होना चाहिए—“हे प्रभु! मैं इस दलदल से स्वयं नहीं निकल सकता, आप ही मेरी रक्षा करें।” यही भावना धीरे-धीरे मन को शुद्ध करती है और साधक के भीतर विनम्रता तथा निर्भरता का भाव जगाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि परिणाम तुरंत दिखाई न दें, तब भी निराश नहीं होना चाहिए। निरंतर नाम जप, प्रभु पर भरोसा और शरणागति ही अंततः विकारों से मुक्ति का मार्ग है।

Next लिखें, तो मैं प्रश्न 5 से 8 के उत्तर भी इसी शैली में लगभग 200 शब्दों में प्रस्तुत करूँगा।

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प्रश्न 5: क्या भगवान की शरण में जाने मात्र से काम, क्रोध, लोभ और अन्य विकार समाप्त हो सकते हैं?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि भगवान की शरण ग्रहण करना ही विकारों से मुक्ति की दिशा में सबसे बड़ा कदम है, किंतु केवल मुख से शरणागत होने का दावा कर लेने से विकार तुरंत समाप्त नहीं हो जाते। वास्तविक शरणागति का अर्थ है अपने जीवन, मन, बुद्धि और अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना।

उन्होंने बताया कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकार बहुत पुराने संस्कारों के कारण जीव के भीतर जमे रहते हैं। इन्हें केवल मनुष्य के प्रयास से पूर्णतः समाप्त करना कठिन है। इसलिए साधक को निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि भगवान पर विश्वास रखकर निरंतर नाम जप और भजन करते रहना चाहिए। भगवान की कृपा से धीरे-धीरे ये विकार अपनी शक्ति खोने लगते हैं।

महाराज जी ने कहा कि शरणागत का कार्य विकारों से लड़ना नहीं, बल्कि भगवान का आश्रय लेना है। जब जीव अपनी असहायता स्वीकार करके कहता है—“हे प्रभु! मैं स्वयं इन दोषों से मुक्त नहीं हो सकता, आप ही मेरी रक्षा करें”—तब भगवान उसकी सहायता करते हैं। शरणागति के साथ निरंतर साधना जुड़ जाए, तो मन शुद्ध होने लगता है और विकारों का प्रभाव कम होता जाता है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि भगवान की शरण साधक को विकारों से लड़ने की शक्ति ही नहीं देती, बल्कि अंततः भगवान की कृपा से उनसे मुक्त भी कर देती है। इसलिए शरणागति, नाम जप और विश्वास को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।


प्रश्न 6: शिक्षक, गुरु या जिम्मेदार पद पर रहते हुए विद्यार्थियों अथवा सहकर्मियों को समझाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोग करना उचित है या नहीं?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर बहुत संतुलित दृष्टिकोण से दिया। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सुधारने, शिक्षित करने या उसके कल्याण के उद्देश्य से कोई उपाय अपनाया जाता है, तो वह धर्म के विरुद्ध नहीं माना जा सकता। शास्त्रों में भी साम, दाम, दंड और भेद की नीति का उल्लेख समाज और व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए किया गया है।

उन्होंने समझाया कि सबसे पहले प्रेम, समझाइश और सद्भावना के माध्यम से व्यक्ति को सही मार्ग पर लाने का प्रयास करना चाहिए। यदि वह इससे न माने, तो परिस्थितियों के अनुसार अन्य उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। किंतु इन उपायों के पीछे व्यक्तिगत क्रोध, द्वेष, अहंकार या प्रतिशोध की भावना नहीं होनी चाहिए।

महाराज जी ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को, गुरु अपने शिष्यों को और शिक्षक अपने विद्यार्थियों को कभी-कभी कठोर शब्द भी कहते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल सुधार होता है। यदि किसी को सही मार्ग पर लाने के लिए कठोरता दिखाई जाए और उसके पीछे निष्काम कल्याण की भावना हो, तो वह उचित है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दंड अहंकार, क्रोध या स्वार्थ से प्रेरित हो, तो वह अधर्म बन जाता है। इसलिए साधक को सदैव अपने अंतःकरण की जांच करते रहना चाहिए कि उसके व्यवहार के पीछे कल्याण की भावना है या व्यक्तिगत प्रतिक्रिया।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोग तभी उचित है, जब उसका उद्देश्य किसी जीव का वास्तविक हित और उन्नति हो।


प्रश्न 7: क्या किसी के कल्याण और सुधार के लिए कठोरता, डाँट या दंड देना धर्मसंगत माना जा सकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि कठोरता अपने आप में न तो अच्छी है और न ही बुरी; उसका मूल्यांकन उसके उद्देश्य के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि किसी को अपमानित करने, नीचा दिखाने या अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए कठोरता अपनाई जाए, तो वह अनुचित है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति के कल्याण, उसके जीवन के सुधार और उसके भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कठोरता दिखाई जाए, तो वह धर्मसम्मत मानी जा सकती है।

उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि एक चिकित्सक रोगी को कड़वी दवा देता है या कभी-कभी शल्य चिकित्सा भी करता है, लेकिन उसका उद्देश्य रोगी को कष्ट देना नहीं, बल्कि उसे स्वस्थ बनाना होता है। इसी प्रकार गुरु, माता-पिता या शिक्षक भी कभी-कभी कठोर व्यवहार करते हैं, परंतु उसके पीछे प्रेम और हित की भावना छिपी होती है।

महाराज जी ने समझाया कि वास्तविक संत और गुरु कभी भी किसी को क्रोधवश नहीं डाँटते। उनकी डाँट में भी करुणा होती है। वे जीव को पतन से बचाने और भगवान की ओर अग्रसर करने के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि साधक को यह देखना चाहिए कि कठोरता के पीछे भावना क्या है। यदि उसके पीछे प्रेम और कल्याण का उद्देश्य है, तो उसे स्वीकार करना चाहिए। ऐसी डाँट जीवन बदल सकती है और व्यक्ति को भगवत मार्ग पर दृढ़ बना सकती है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि प्रेम से प्रेरित कठोरता भी करुणा का ही रूप है और यदि उससे किसी का जीवन सुधरता है, तो वह धर्म के अनुरूप है।


प्रश्न 8: गृहस्थ जीवन और व्यापार में रहते हुए भी भगवत प्राप्ति कैसे संभव है?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि भगवत प्राप्ति केवल जंगल, आश्रम या संन्यासियों के लिए सीमित नहीं है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मनुष्य भगवान को प्राप्त कर सकता है। आवश्यकता केवल दृष्टिकोण बदलने और जीवन को भगवान के प्रति समर्पित करने की है।

उन्होंने समझाया कि गृहस्थ जीवन स्वयं में बंधन नहीं है, बल्कि आसक्ति बंधन का कारण है। यदि मनुष्य अपने परिवार, व्यापार और कर्तव्यों का पालन भगवान की सेवा समझकर करे, तो वही कार्य साधना बन जाते हैं। गृहस्थ को अपने दायित्वों से भागने की नहीं, बल्कि उन्हें भगवान को अर्पित भाव से निभाने की आवश्यकता है।

महाराज जी ने कहा कि व्यापार करते समय ईमानदारी, सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए। परिवार के बीच रहते हुए नाम जप, सत्संग और भगवान का स्मरण बनाए रखना चाहिए। यदि मन भगवान से जुड़ा रहे, तो संसार साधना में बाधा नहीं बनता।

उन्होंने बताया कि इतिहास में अनेक महापुरुष गृहस्थ होते हुए भी परमात्मा को प्राप्त हुए हैं। इसलिए यह मान लेना कि केवल संसार छोड़ने से ही भगवान मिलेंगे, उचित नहीं है। भगवान हृदय की भावना देखते हैं, बाहरी स्थिति नहीं।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि मनुष्य नाम जप, भजन और भगवान की शरण में स्थिर रहता है, तो उसके लिए भी भगवत प्राप्ति पूर्णतः संभव है। संसार में रहकर भगवान को याद रखना ही सच्ची साधना है।

प्रश्न 9: क्या भगवान की प्राप्ति के लिए संसार और परिवार का त्याग करना आवश्यक है?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत स्पष्ट शब्दों में दिया कि भगवान की प्राप्ति के लिए संसार, परिवार या अपने कर्तव्यों का त्याग करना आवश्यक नहीं है। त्याग करने योग्य वस्तु संसार नहीं, बल्कि उसके प्रति आसक्ति है। यदि मनुष्य अपने कर्तव्यों को भगवान की सेवा समझकर निभाता है, तो वही कर्म साधना का रूप ले लेते हैं।

महाराज जी ने अम्बरीष महाराज का उदाहरण देते हुए बताया कि वे चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी भगवान के परम भक्त थे। उन्होंने राजपाट नहीं छोड़ा, बल्कि अपने समस्त कार्यों को भगवान को समर्पित कर दिया। इसी प्रकार अर्जुन भी युद्ध छोड़कर संन्यास लेना चाहते थे, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने कर्तव्य पालन का उपदेश दिया।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ का धर्म है कि वह परिवार, समाज और अपने दायित्वों का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करे। यदि मन में नाम जप चलता रहे और कर्म भगवान को समर्पित भाव से किए जाएँ, तो वही भगवत प्राप्ति का मार्ग बन जाता है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि संसार से भागना समाधान नहीं है। वास्तविक साधना यह है कि मन भगवान में रहे और हाथ अपने कर्तव्यों में लगे रहें। नाम जप करते हुए जीवन जीना ही गृहस्थ के लिए श्रेष्ठ साधना है।


प्रश्न 10: भगवद्गीता के भक्ति योग में वर्णित ‘सर्वारंभ परित्यागी’ का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि ‘सर्वारंभ परित्यागी’ शब्द अत्यंत उच्च आध्यात्मिक अवस्था का सूचक है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य सभी कार्यों का त्याग कर दे, बल्कि इसका वास्तविक आशय है कर्ताभाव और संकल्प के त्याग से। जब तक मनुष्य यह मानता है कि “मैं कर रहा हूँ”, तब तक वह अहंकार के क्षेत्र में है।

उन्होंने समझाया कि सामान्य व्यक्ति हर समय संकल्प और विकल्प में जीता है—यह करना है, यह पाना है, ऐसा बनना है। लेकिन जो भगवान में स्थित हो जाता है, वह समझता है कि समस्त क्रियाएँ भगवान की प्रेरणा से या प्रकृति के गुणों से संपन्न हो रही हैं। वह स्वयं को केवल साक्षी रूप में अनुभव करता है।

महाराज जी ने कहा कि यह अवस्था साधक की प्रारंभिक स्थिति नहीं, बल्कि सिद्ध पुरुषों की अवस्था है। साधक को पहले शुभ कर्मों का संकल्प लेना चाहिए, असत्कर्मों का त्याग करना चाहिए और नाम जप के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करना चाहिए। जब अंतःकरण निर्मल हो जाता है, तब धीरे-धीरे कर्ताभाव समाप्त होने लगता है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि सर्वारंभ परित्यागी वही है जिसके भीतर कर्तापन समाप्त हो चुका हो और जो भगवान की इच्छा में पूर्ण रूप से स्थित होकर जीवन व्यतीत कर रहा हो।


प्रश्न 11: गीता में बताए गए ‘उदासीन’ भक्त के गुणों का क्या भावार्थ है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि ‘उदासीन’ शब्द का अर्थ संसार से विमुख या निष्क्रिय हो जाना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है राग और द्वेष से ऊपर उठ जाना। उदासीन वह है जो किसी के प्रति विशेष आसक्ति भी नहीं रखता और किसी से वैर भी नहीं करता। वह सबमें समान रूप से परमात्मा का दर्शन करता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अवस्था साधारण साधकों की नहीं, बल्कि सिद्ध महापुरुषों की होती है। जब तक मनुष्य अनुकूल परिस्थितियों में प्रसन्न और प्रतिकूल परिस्थितियों में दुखी होता है, तब तक वह उदासीन नहीं कहलाता। उदासीनता का अर्थ है मन का समभाव में स्थित होना।

महाराज जी ने समझाया कि इस अवस्था तक पहुँचने के लिए पहले नाम जप, सत्संग और शास्त्र अध्ययन आवश्यक है। धीरे-धीरे मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और साधक यह अनुभव करने लगता है कि सब कुछ भगवान की व्यवस्था से हो रहा है। तब मित्र और शत्रु का भेद भी कम होने लगता है।

उन्होंने कहा कि उदासीन महात्मा किसी के प्रति पक्षपात नहीं करता। उसका हृदय करुणा से भरा होता है, लेकिन उसमें आसक्ति नहीं होती। वह सबको भगवान का अंश मानकर देखता है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि उदासीनता विरक्ति नहीं, बल्कि परमात्मा में स्थित समभाव की अवस्था है, जो निरंतर साधना और भगवत कृपा से प्राप्त होती है।


प्रश्न 12: क्या अपनी इच्छा को भगवान की इच्छा में समर्पित कर देना ही वास्तविक समर्पण है?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि वास्तविक समर्पण का अर्थ केवल यह कहना नहीं है कि “सब भगवान की इच्छा से हो रहा है”, बल्कि अपने जीवन को शास्त्र और भगवान की आज्ञा के अनुरूप ढाल देना ही सच्चा समर्पण है। जब तक मनुष्य अपनी इच्छाओं और वासनाओं के अधीन है, तब तक वह पूर्ण समर्पित नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने कहा कि साधक को अपने मन में उठने वाले विचारों और इच्छाओं का परीक्षण करना चाहिए। जो बातें शास्त्र सम्मत हैं, जो भगवान के अनुकूल हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए। और जो बातें अहंकार, कामना या स्वार्थ से प्रेरित हैं, उन्हें त्याग देना चाहिए।

महाराज जी ने समझाया कि जब मनुष्य धीरे-धीरे अपनी इच्छा को भगवान की इच्छा में मिला देता है, तब उसके जीवन में विरोध, तनाव और असंतोष कम होने लगता है। वह यह अनुभव करने लगता है कि भगवान ही उसके जीवन के वास्तविक संचालक हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि जब तक अहंकार है, तब तक काम, क्रोध, लोभ और मोह बने रहते हैं। लेकिन भगवान के प्रति समर्पण बढ़ने पर शास्त्रविरुद्ध आचरण स्वतः समाप्त होने लगता है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि वास्तविक समर्पण का अर्थ है—अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छा के अधीन कर देना और विश्वास रखना कि भगवान जो करेंगे, वही हमारे लिए सर्वोत्तम होगा।


प्रश्न 13: महाराज जी जब भगवत प्राप्ति के मार्ग पर चले, तब उनके मन में सबसे बड़ा प्रश्न कौन-सा था?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि बाल्यकाल से ही उनके भीतर एक प्रश्न बहुत गहराई से उठता था—“मेरा है कौन?” यही प्रश्न उनके जीवन की आध्यात्मिक यात्रा का आधार बना। वे अपनी माता को बीमारी में देखकर सोचते थे कि यदि एक दिन माता-पिता भी साथ छोड़ देंगे, तो फिर वास्तव में अपना कौन है?

उन्होंने कहा कि यह प्रश्न उन्हें भीतर से विचलित करता रहता था। पढ़ाई, संसार, धन और भोग—सब उन्हें क्षणभंगुर प्रतीत होने लगे। उनके मन में बार-बार यही विचार आता था कि यदि अंत में मृत्यु ही सत्य है, तो जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

धीरे-धीरे इसी चिंतन ने उन्हें भगवान की ओर अग्रसर किया। उन्होंने अनुभव किया कि संसार के सभी संबंध नश्वर हैं, लेकिन भगवान ही ऐसे मित्र हैं जो कभी साथ नहीं छोड़ते। तब उनके जीवन का लक्ष्य केवल भगवत प्राप्ति बन गया।

महाराज जी ने कहा कि जब यह प्रश्न सुलझ गया कि भगवान ही मेरे वास्तविक आश्रय हैं, तब जीवन की सारी उलझनें समाप्त हो गईं। उसके बाद उनके लिए केवल भगवान की प्राप्ति ही सर्वोच्च लक्ष्य रह गया।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि जीवन में सही प्रश्न उठना ही आध्यात्मिक जागरण की शुरुआत है, और “मेरा वास्तविक अपना कौन है?” यह प्रश्न साधक को भगवान तक पहुँचा सकता है।


प्रश्न 14: भगवान सबसे पहले किस प्रकार के जीवों पर कृपा करते हैं?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत मार्मिक ढंग से दिया। उन्होंने कहा कि भगवान की कृपा सबसे पहले उन जीवों पर बरसती है, जिनके भीतर दीनता, विनम्रता और शरणागति का भाव होता है। जो स्वयं को असहाय मानकर भगवान के सामने झुक जाता है, वही उनकी कृपा का वास्तविक पात्र बनता है।

उन्होंने समझाया कि भगवान की कृपा वर्षा की तरह निरंतर बरस रही है, लेकिन हमारे अहंकार की छतरी हमें उस कृपा से वंचित कर देती है। जब तक मनुष्य अपने ज्ञान, सामर्थ्य, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार में डूबा रहता है, तब तक वह भगवान की कृपा का अनुभव नहीं कर पाता।

महाराज जी ने कहा कि जिनका संसार में कोई सहारा नहीं होता, जो भीतर से टूट चुके होते हैं और जो केवल भगवान को अपना मानते हैं, उन पर भगवान विशेष कृपा करते हैं। यही कारण है कि बरसाने वाली श्रीजी को करुणामयी कहा गया है, क्योंकि वे दीनों और शरणागतों पर सहज कृपा बरसाती हैं।

उन्होंने बताया कि आध्यात्मिक साधना का मुख्य उद्देश्य अहंकार को गलाना है। जब अहंकार समाप्त होता है, तब भगवान का प्रेम और कृपा स्वतः हृदय में प्रकट होने लगती है।

महाराज जी का निष्कर्ष था कि भगवान की कृपा पाने के लिए बड़ा बनने की नहीं, बल्कि छोटा बनने की आवश्यकता है। दीनता, शरणागति और अहंकार का त्याग ही भगवत कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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