प्रश्न 1: महाराज जी, क्या संतान न पैदा करने का संकल्प लेना उचित है, या इसे भगवान की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार संतान के विषय में अपनी ओर से कठोर संकल्प लेना उचित नहीं है। उन्होंने समझाया कि यदि भगवान किसी जीव को हमारे घर जन्म देना चाहते हैं, तो हमें उसे रोकने का अधिकार नहीं है। और यदि संतान का योग ही नहीं है, तो लाख प्रयास करने पर भी संतान नहीं होगी। इसलिए इस विषय को भगवान की इच्छा पर छोड़ देना ही सबसे उत्तम है।
महाराज जी कहते हैं कि कई बार युवा अवस्था में वैराग्य का भाव आता है और मनुष्य सोचता है कि वह संतान नहीं करेगा। लेकिन यह स्थायी आध्यात्मिक निर्णय नहीं, बल्कि क्षणिक भाव भी हो सकता है। गृहस्थ धर्म भी भगवान द्वारा बनाया गया मार्ग है और उसके माध्यम से भी भगवत प्राप्ति संभव है।
उन्होंने बड़ी सुंदर बात कही कि यदि कोई श्रेष्ठ आत्मा, देशभक्त या भगवान का भक्त हमारे घर जन्म लेना चाहता हो, तो उसे रोकना क्यों चाहिए? साधक का भाव होना चाहिए—“प्रभु, जो आपको प्रिय हो वही मुझे भी स्वीकार है।” यदि संतान हो तो भी भगवान की कृपा और न हो तो भी भगवान की कृपा। यही सच्ची शरणागति है। इसलिए अपनी इच्छा से अधिक भगवान की इच्छा को महत्व देना ही आध्यात्मिक दृष्टि से सही मार्ग है।
प्रश्न 2: अध्यात्म मार्ग में रहते हुए धन, वैभव और समृद्धि की इच्छा रखना उचित है या नहीं?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार आदर्श भक्त वह है जो केवल भगवान को चाहता है, भगवान से कुछ नहीं चाहता। लेकिन सामान्य साधकों के लिए अपनी आवश्यकताओं के अनुसार भगवान से प्रार्थना करना गलत नहीं है। यदि किसी के मन में माता-पिता की सेवा, ठाकुर जी की सेवा, अतिथि सत्कार या धर्मकार्य के लिए धन की इच्छा हो, तो वह भगवान से प्रार्थना कर सकता है।
महाराज जी बताते हैं कि शास्त्रों में अर्थार्थी भक्त को भी भक्त कहा गया है। इसलिए धन की आवश्यकता होने पर भगवान से मांगना कोई दोष नहीं है। दोष तब है जब धन ही जीवन का लक्ष्य बन जाए और भगवान पीछे छूट जाएँ।
उन्होंने समझाया कि यदि भगवान हमारी मांग पूरी न करें, तो हमें यह मानना चाहिए कि शायद उसमें हमारा हित नहीं था। जैसे डॉक्टर रोगी की हर इच्छा पूरी नहीं करता क्योंकि उसे रोगी के स्वास्थ्य की चिंता होती है, वैसे ही भगवान भी वही देते हैं जो हमारे लिए कल्याणकारी हो।
इसलिए धन की इच्छा रखने से पहले यह देखना चाहिए कि उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए होगा। यदि धन भगवान की सेवा, परिवार की आवश्यकता और अच्छे कार्यों के लिए चाहिए, तो भगवान से प्रार्थना की जा सकती है। लेकिन अंतिम निर्णय भगवान पर छोड़ देना ही भक्त का धर्म है।
प्रश्न 3: यदि भगवान हमारी मांगी हुई वस्तु न दें, तो क्या हमें उनसे नाराज़ होना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान से कुछ मांगना उतना बड़ा विषय नहीं है, जितना मांग पूरी न होने पर उनकी इच्छा को स्वीकार करना। कई बार मनुष्य को लगता है कि जो वह मांग रहा है, वही उसके लिए सबसे अच्छा है। लेकिन भगवान हमसे अधिक जानते हैं कि हमारे लिए वास्तव में क्या हितकारी है।
उन्होंने नारद जी का प्रसंग सुनाकर समझाया कि नारद जी ने भी भगवान से सुंदर रूप और विवाह की इच्छा की थी। लेकिन भगवान ने उनकी मांग पूरी नहीं की, क्योंकि उसमें उनका हित नहीं था। उस समय नारद जी को बुरा लगा, लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि भगवान ने उन्हें बड़े संकट से बचा लिया।
महाराज जी का संदेश है कि यदि भगवान हमारी प्रार्थना स्वीकार न करें, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे हमसे प्रेम नहीं करते। बल्कि कई बार उनका “ना” कहना भी हमारी रक्षा के लिए होता है। इसलिए भक्त को मांगने के बाद परिणाम भगवान पर छोड़ देना चाहिए।
सच्चा भक्त वही है जो कह सके—“प्रभु, यदि यह मेरे लिए उचित है तो दीजिए, और यदि नहीं है तो मत दीजिए।” ऐसी भावना से मन में शिकायत नहीं आती और भगवान के प्रति श्रद्धा बनी रहती है। यही समर्पण की वास्तविक शुरुआत है।
प्रश्न 4: अशुद्ध विचारों और नकारात्मक व्यवहार वाले लोगों में भगवान का दर्शन कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार जब हम किसी व्यक्ति को देखते हैं, तो सामान्यतः उसकी क्रियाओं को देखते हैं। कोई अच्छा व्यवहार करता है तो हमें अच्छा लगता है, और कोई बुरा व्यवहार करता है तो उससे घृणा होने लगती है। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि इससे आगे की बात है। महाराज जी समझाते हैं कि जैसे हीटर, पंखा, फ्रिज और बल्ब अलग-अलग कार्य करते हैं, फिर भी उनमें चलने वाली शक्ति एक ही बिजली होती है, उसी प्रकार संसार के सभी जीवों में कार्य करने वाली सत्ता एक ही परमात्मा है।
समस्या यह है कि हमारी दृष्टि क्रिया पर अटक जाती है, कारण पर नहीं जाती। हम व्यक्ति के स्वभाव, दोष और व्यवहार को देखते हैं, लेकिन उसके भीतर स्थित परमात्मा को नहीं देख पाते। महाराज जी कहते हैं कि यह दृष्टि केवल तर्क से नहीं आती, बल्कि नाम जप, सत्संग और भगवान की कृपा से विकसित होती है।
जब साधक निरंतर भजन करता है, तब धीरे-धीरे उसकी दृष्टि बदलने लगती है। वह समझने लगता है कि सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी—तीनों प्रकार की लीलाओं में भी वही परमात्मा कार्य कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बुरे कर्मों को अच्छा मान लिया जाए, बल्कि यह समझना है कि परमात्मा की सत्ता सबमें समान रूप से विद्यमान है। यही दृष्टि राग-द्वेष से मुक्त करती है और साधक को भगवत भाव के निकट ले जाती है।
प्रश्न 5: सभी प्राणियों में भगवान को देखने की दृष्टि कैसे विकसित हो सकती है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सभी में भगवान को देखना केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभूति है। जब तक मनुष्य माया के प्रभाव में रहता है, तब तक उसे कोई अपना और कोई पराया दिखाई देता है। किसी से प्रेम और किसी से द्वेष होता है। लेकिन जब भगवान की कृपा और भजन का प्रभाव बढ़ता है, तब दृष्टि बदलने लगती है।
उन्होंने बताया कि महापुरुष संसार को केवल शरीर और व्यवहार के स्तर पर नहीं देखते। वे उस परम सत्ता को देखते हैं जो सभी के भीतर समान रूप से विद्यमान है। जैसे चलचित्र के पर्दे पर अनेक दृश्य दिखाई देते हैं, लेकिन उनके पीछे एक ही प्रकाश काम कर रहा होता है, वैसे ही संसार के असंख्य रूपों के पीछे एक ही परमात्मा कार्य कर रहे हैं।
महाराज जी बार-बार कहते हैं कि यह दृष्टि केवल चर्चा करने से नहीं आएगी। इसके लिए नाम जप आवश्यक है। भगवान का नाम जपते-जपते अंतःकरण शुद्ध होता है और फिर भगवान स्वयं साधक को यह अनुभव कराते हैं कि वास्तव में सबमें वही हैं। जब यह अनुभव होने लगता है, तब व्यक्ति किसी से घृणा नहीं करता, किसी से द्वेष नहीं करता और हर जीव में भगवान का अंश देखने लगता है।
यही अवस्था महापुरुषों की दृष्टि है और यही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति का चिन्ह है।
प्रश्न 6: संतान या प्रियजनों की मृत्यु के दुःख से कैसे बाहर निकला जाए?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार प्रियजनों की मृत्यु का दुःख मनुष्य जीवन के सबसे बड़े दुःखों में से एक है, लेकिन इसका मूल कारण मोह और अज्ञान है। हम शरीर और संबंधों को स्थायी मान लेते हैं, जबकि वास्तव में यह संसार एक यात्री निवास की तरह है, जहाँ सभी जीव कुछ समय के लिए मिलते हैं और फिर अपने-अपने मार्ग पर चले जाते हैं।
महाराज जी ने भागवत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए समझाया कि जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न संबंधों में आता और जाता रहता है। जिस पुत्र को हम अपना समझते हैं, वह भी एक स्वतंत्र जीवात्मा है, जो कुछ समय के लिए हमारे जीवन में आया और फिर अपने कर्मानुसार चला गया। इसलिए अत्यधिक शोक करना वास्तविकता को न समझ पाने का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि रोने से न तो जाने वाला वापस आएगा और न ही मन को शांति मिलेगी। शांति का मार्ग भगवान का नाम, सत्संग और भगवत कथा है। जब मन भगवान की ओर मुड़ता है, तब धीरे-धीरे मोह कम होता है और हृदय में वैराग्य जागता है।
महाराज जी का संदेश है कि मनुष्य को अपने प्रियजनों से भी अधिक भगवान को अपना मानना चाहिए। जब भगवान से संबंध मजबूत हो जाता है, तब वियोग का दुःख भी सहन करने योग्य बन जाता है। इसलिए शोक में डूबने के बजाय नाम जप का सहारा लेना ही वास्तविक समाधान है।
प्रश्न 7: पुत्र, परिवार और सांसारिक संबंधों का मोह कैसे समाप्त हो सकता है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार संसार के सभी संबंध अस्थायी हैं, लेकिन अज्ञान के कारण हम उन्हें स्थायी मान बैठते हैं। यही मोह का कारण बनता है। मनुष्य बार-बार “मेरा पुत्र”, “मेरा परिवार”, “मेरा घर” जैसी भावनाओं में बंध जाता है और जब इनमें से कोई छूटता है, तो अत्यधिक दुःख अनुभव करता है।
महाराज जी समझाते हैं कि वास्तव में कोई भी जीव किसी का स्थायी नहीं है। सभी जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार कुछ समय के लिए एकत्रित होते हैं और फिर अलग हो जाते हैं। जैसे रेलवे स्टेशन पर यात्री थोड़ी देर साथ रहते हैं और फिर अपनी-अपनी गाड़ी में बैठकर चले जाते हैं, वैसे ही संसार के संबंध हैं।
मोह समाप्त करने का उपाय संबंधों को तोड़ना नहीं, बल्कि उनकी वास्तविकता को समझना है। भगवान श्रीराम के वचनों का स्मरण करते हुए महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य को अपनी सारी ममता भगवान के चरणों में जोड़नी चाहिए। जब मन भगवान से जुड़ता है, तब संसार के संबंध अपना उचित स्थान ग्रहण कर लेते हैं।
नाम जप, सत्संग और भगवत कथा के माध्यम से धीरे-धीरे यह समझ विकसित होती है कि सब कुछ भगवान का है। तब मोह कम होता है और हृदय में शांति आने लगती है। यही मोह से मुक्ति का वास्तविक मार्ग है।
प्रश्न 8: गृहस्थ जीवन में रहते हुए वैराग्य और भक्ति का संतुलन कैसे बनाया जाए?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार वैराग्य का अर्थ घर छोड़ना नहीं है। बहुत से लोग सोचते हैं कि भक्ति के लिए परिवार, धन और जिम्मेदारियों का त्याग करना आवश्यक है, लेकिन यह सही समझ नहीं है। यदि मन भगवान से जुड़ा नहीं है, तो जंगल में जाकर भी संसार साथ रहेगा। और यदि मन भगवान में लग गया है, तो गृहस्थी में रहकर भी व्यक्ति संत बन सकता है।
महाराज जी बताते हैं कि वास्तविक समस्या घर नहीं, बल्कि “मेरा” का भाव है। जब व्यक्ति पत्नी, पुत्र, धन और घर को अपना मानता है, तब बंधन पैदा होता है। लेकिन जब वही सब भगवान की देन मानकर उनकी सेवा समझकर किया जाता है, तब वही गृहस्थ जीवन साधना बन जाता है।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भगवान से प्रेम करना, परिवार की सेवा करना और हर परिस्थिति में भगवान की इच्छा को स्वीकार करना ही सच्चा वैराग्य है। छोटी-छोटी परेशानियों से घबराना या जिम्मेदारियों से भागना वैराग्य नहीं है।
सच्चा भक्त वही है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि और अनुकूलता-प्रतिकूलता में भी भगवान की जय बोलता रहे। यही गृहस्थ जीवन में भक्ति और वैराग्य का सुंदर संतुलन है।
प्रश्न 9: क्या भगवान की प्राप्ति के लिए घर-परिवार छोड़ना आवश्यक है?
उत्तर:
महाराज जी ने इस विषय पर बहुत स्पष्ट उत्तर दिया है कि भगवान की प्राप्ति के लिए घर-परिवार छोड़ना आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि भगवान को कपड़े बदलने, स्थान बदलने या बाहरी रूप बदलने से नहीं पाया जा सकता। भगवान प्रेम से मिलते हैं।
कई लोग सोचते हैं कि यदि वे घर छोड़ देंगे तो जल्दी भगवान को प्राप्त कर लेंगे, लेकिन महाराज जी के अनुसार यदि मन में अहंकार, ममता और विषयासक्ति बनी हुई है, तो स्थान बदलने से कुछ नहीं होगा। दूसरी ओर, यदि कोई गृहस्थ भगवान को अपना सर्वस्व मानकर जीवन जीता है, तो वह भी भगवान का प्रिय हो सकता है।
महाराज जी ने विभीषण जी का उदाहरण दिया, जो राजसी जीवन में रहते हुए भी भगवान के अत्यंत प्रिय भक्त थे। उनका वेश साधु जैसा नहीं था, लेकिन उनका हृदय भगवान के चरणों में समर्पित था। इसलिए भगवान ने उन्हें संतों के समान सम्मान दिया।
उन्होंने समझाया कि वास्तविक त्याग बाहर का नहीं, भीतर का होता है। “यह मेरा है” इस भावना का त्याग करना ही सबसे बड़ा संन्यास है। जब साधक अपने परिवार, धन और स्वयं को भी भगवान का मान लेता है, तब वह गृहस्थ होकर भी भगवत मार्ग में आगे बढ़ सकता है। इसलिए भगवान की प्राप्ति का आधार स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन है।
प्रश्न 10: भजन में पहले रुचि थी लेकिन अब कम हो गई है, तो उसका कारण और उपाय क्या है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार यदि किसी साधक के जीवन में पहले भजन की रुचि बहुत थी और धीरे-धीरे वह कम हो गई, तो इसके पीछे सामान्यतः दो प्रमुख कारण होते हैं। पहला, किसी संत, वैष्णव या महापुरुष के प्रति अपराध या दोष-दृष्टि। दूसरा, ऐसा आचरण या भोजन जो साधना के अनुकूल न हो।
महाराज जी बताते हैं कि कई बार हम अनजाने में किसी संत के प्रति लघु भाव, आलोचना या अवमानना कर बैठते हैं। उस समय हमें इसका प्रभाव समझ में नहीं आता, लेकिन धीरे-धीरे भजन का रस कम होने लगता है। मन पहले की तरह नाम जप में नहीं लगता और साधना बोझ जैसी लगने लगती है।
इस स्थिति का उपाय भी उन्होंने सरल बताया। जिन महापुरुषों के प्रति भूल हुई हो, उन्हें मन ही मन प्रणाम करें, क्षमा मांगें और पुनः विनम्रता के साथ भजन में लग जाएँ। साथ ही अपने आचरण और भोजन की भी समीक्षा करें कि कहीं कोई ऐसी बात तो नहीं जो अंतःकरण को अशुद्ध कर रही हो।
महाराज जी का विश्वास दिलाने वाला संदेश है कि यदि साधक ईमानदारी से अपनी भूल सुधार ले और पुनः नाम जप में लग जाए, तो भगवान की कृपा से भजन का रस वापस आ सकता है। इसलिए निराश होने की आवश्यकता नहीं, बल्कि पुनः श्रद्धा और विनम्रता के साथ साधना में जुट जाना चाहिए।
प्रश्न 11: भगवान ने जन्म-मरण और संसार का यह माया रूपी खेल क्यों बनाया है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार यह संपूर्ण सृष्टि भगवान की एक अद्भुत लीला है। जन्म, मृत्यु, सुख, दुःख, मित्र, शत्रु, लाभ और हानि—ये सब उसी विराट खेल के विभिन्न दृश्य हैं। मनुष्य जब तक स्वयं को केवल शरीर मानता है, तब तक यह संसार उसे बिल्कुल वास्तविक लगता है। लेकिन जब ज्ञान का प्रकाश होता है, तब समझ में आता है कि यह सब एक स्वप्न के समान है।
महाराज जी ने समझाया कि जैसे स्वप्न में हम अनेक घटनाओं का अनुभव करते हैं और जागने पर पता चलता है कि वे वास्तविक नहीं थीं, वैसे ही यह संसार भी परम सत्य नहीं है। जीव भगवान का अंश होते हुए भी माया के प्रभाव से अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है और इसी भूल के कारण जन्म-मरण के चक्र में घूम रहा है।
उन्होंने कहा कि भगवान ने किसी को बाँधा नहीं है। जीव अपनी इच्छाओं, वासनाओं और आसक्तियों के कारण स्वयं बंध जाता है। जब वही जीव भगवान की शरण में जाकर नाम जप करता है, तब धीरे-धीरे उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होने लगता है।
इसलिए इस खेल का उद्देश्य दुःख देना नहीं, बल्कि अंततः जीव को उसके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचाना है। जो इस रहस्य को समझ लेता है, उसके लिए संसार बदल जाता है और भगवान ही जीवन का केंद्र बन जाते हैं।
प्रश्न 12: जीव इस माया रूपी संसार से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप को कैसे पहचान सकता है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार जीव का वास्तविक स्वरूप भगवान का अंश, शुद्ध चेतन और आनंदमय है। लेकिन माया के प्रभाव से उसने स्वयं को शरीर मान लिया है। यही देहाभिमान जन्म, मृत्यु, सुख और दुःख का कारण बनता है। जब तक यह भ्रम बना रहेगा, तब तक जीव संसार में उलझा रहेगा।
महाराज जी कहते हैं कि मुक्ति का मार्ग केवल बौद्धिक चर्चा नहीं है। इसके लिए नाम जप, सत्संग, शास्त्र श्रवण और शुद्ध आचरण आवश्यक हैं। जब साधक नियमित रूप से भगवान का नाम जपता है, तब उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। जैसे अंधेरे में पड़ी रस्सी को सांप समझने का भ्रम प्रकाश आने पर समाप्त हो जाता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से देहाभिमान का भ्रम मिटने लगता है।
उन्होंने समझाया कि हम वास्तव में शरीर नहीं हैं, बल्कि शरीर के उपयोगकर्ता हैं। शरीर एक वाहन की तरह है, जिसका उपयोग भगवत प्राप्ति के लिए करना है। जब यह अनुभव दृढ़ होने लगता है कि “मैं भगवान का अंश हूँ”, तब भय, शोक और चिंता कम होने लगते हैं।
महाराज जी का निष्कर्ष स्पष्ट है—अधिक से अधिक नाम जप करो, सत्संग सुनो और जीवन को भगवान के अनुसार ढालो। भगवान की कृपा से वही ज्ञान प्रकट होगा जो जीव को माया से मुक्त करके उसके वास्तविक स्वरूप का अनुभव करा देगा।
प्रश्न 13: क्या भगवान को प्राप्त महापुरुषों को भी प्रारब्ध के सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार भगवत प्राप्ति हो जाने के बाद भी शरीर का प्रारब्ध समाप्त नहीं होता। जिस समय शरीर की रचना होती है, उसी समय उसके साथ जुड़े हुए सुख-दुःख, रोग-शोक और जीवन की परिस्थितियाँ भी निश्चित हो जाती हैं। इसलिए भगवान को प्राप्त महापुरुषों के शरीर में भी रोग, पीड़ा या अन्य कष्ट दिखाई दे सकते हैं।
लेकिन अंतर यह है कि सामान्य व्यक्ति स्वयं को शरीर मानकर उन कष्टों को भोगता है, जबकि भगवत प्राप्त महापुरुष स्वयं को शरीर नहीं मानते। इसलिए शरीर में कष्ट होने पर भी उनके भीतर दुःख का अनुभव नहीं होता। महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि शरीर का प्रारब्ध चलता रहता है, पर आत्मा उससे प्रभावित नहीं होती।
उन्होंने अनेक महापुरुषों के उदाहरण देकर समझाया कि भगवत प्राप्त संतों के जीवन में भी बाहरी कष्ट दिखाई दिए, लेकिन उनके मन में कोई विकार नहीं आया। वे हर परिस्थिति में भगवान की इच्छा मानकर प्रसन्न रहे। यही भगवत प्राप्ति की पहचान है।
इसलिए साधक को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान को प्राप्त होते ही शरीर के सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे। वास्तविक उपलब्धि यह है कि कष्टों के बीच भी मन भगवान में स्थित रहे और भीतर की शांति कभी न टूटे। यही महापुरुषों की अवस्था होती है।
प्रश्न 14: भगवत प्राप्ति के बाद भी पाप और पुण्य का प्रभाव शरीर पर क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब मनुष्य शरीर बनता है, तब उसके निर्माण में पूर्व जन्मों के पाप और पुण्य दोनों का योगदान होता है। यही कारण है कि शरीर विशेष प्रकार के सुख-दुःख, परिस्थितियों और अनुभवों को प्राप्त करता है। भगवत प्राप्ति के बाद जीव तो देहाभिमान से मुक्त हो जाता है, लेकिन शरीर का प्रारब्ध तब तक चलता रहता है जब तक उसका निर्धारित समय पूरा नहीं हो जाता।
उन्होंने प्रह्लाद जी का उदाहरण देकर समझाया कि भगवान का साक्षात्कार हो जाने के बाद भी उनके शरीर का जीवन चलता रहा। उन्होंने राज्य किया, अनेक घटनाओं का सामना किया और शरीर से जुड़े प्रारब्धों का अनुभव भी हुआ। लेकिन उनका मन भगवान में स्थित था, इसलिए वे उन परिस्थितियों से बंधे नहीं।
महाराज जी कहते हैं कि पाप और पुण्य का प्रभाव शरीर पर दिखाई देना और आत्मा का उनसे प्रभावित होना—दो अलग बातें हैं। भगवत प्राप्त महापुरुष शरीर की घटनाओं को देखते हैं, लेकिन उनसे जुड़ते नहीं। जैसे कोई व्यक्ति वाहन में बैठकर यात्रा कर रहा हो, तो रास्ते की धूल, धूप या वर्षा वाहन पर पड़ती है, यात्री पर नहीं।
इसलिए भगवत प्राप्ति का अर्थ यह नहीं कि शरीर का प्रारब्ध रुक जाएगा। उसका अर्थ यह है कि जीव प्रारब्ध के बंधन से ऊपर उठ जाएगा और भगवान में स्थित होकर सब कुछ देखेगा। यही सच्ची मुक्ति है।
प्रश्न 15: देहाभिमान कैसे समाप्त हो और यह अनुभव कैसे हो कि हम शरीर नहीं, बल्कि भगवान के अंश हैं?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह स्वयं को शरीर मान बैठा है। इसी देहाभिमान से जन्म, मृत्यु, सुख, दुःख, भय, मोह और चिंता पैदा होती है। जब तक यह भ्रम बना रहेगा, तब तक जीव संसार के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता।
महाराज जी ने रस्सी और साँप का उदाहरण देकर समझाया कि अंधेरे में पड़ी रस्सी को देखकर यदि कोई उसे साँप समझ ले, तो भय उत्पन्न हो जाता है। लेकिन जैसे ही प्रकाश होता है, भ्रम मिट जाता है। उसी प्रकार ज्ञान का प्रकाश होने पर जीव समझता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि भगवान का अंश है।
यह ज्ञान केवल बौद्धिक विचारों से नहीं आता। इसके लिए निरंतर नाम जप, सत्संग, शास्त्र श्रवण और शुद्ध आचरण आवश्यक हैं। महाराज जी बार-बार कहते हैं कि भगवान का नाम ही वह प्रकाश है जो अंतःकरण के अज्ञान को दूर करता है। जब नाम जप के प्रभाव से हृदय शुद्ध होता है, तब भगवान की कृपा से वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है।
तब साधक अनुभव करने लगता है कि शरीर अलग है और मैं अलग हूँ। शरीर जन्म लेता है, वृद्ध होता है और नष्ट होता है, लेकिन आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। यही अनुभव देहाभिमान को समाप्त करता है और जीव को भगवत स्वरूप की ओर ले जाता है। इसलिए महाराज जी का निष्कर्ष है—अधिक से अधिक नाम जप करो, क्योंकि वही अज्ञान को मिटाकर आत्मज्ञान का द्वार खोलता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”