माला-2005:चित्त और विषयों को अलग कैसे किया जाए? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: गुणों और विषयों में डूबा हुआ चित्त संसार से पार होकर मुक्ति कैसे प्राप्त करे? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि चित्त का स्वभाव स्वयं में शुद्ध और वासुदेव स्वरूप है, परंतु जब वह विषयों का चिंतन करने लगता है तब वह विषयाकार प्रतीत होने लगता है। वास्तव में विषय चित्त में प्रवेश नहीं

माला-2004:क्या शरीर की बाहरी चमक ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रमाण है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: क्या शरीर की बाहरी चमक ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रमाण है? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि शरीर की बाहरी चमक को देखकर आध्यात्मिक उन्नति का निर्णय नहीं किया जा सकता। यह शरीर मिट्टी से बना है और कुछ समय बाद फिर मिट्टी में ही मिल जाने वाला है। इसलिए शरीर की चमक में

माला-2001:संत किसे कहते हैं? सच्चे संत के लक्षण क्या हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: संत किसे कहते हैं? सच्चे संत के लक्षण क्या हैं? उत्तर:महाराज जी कहते हैं — संत को वेश से मत पहचानो। वेश वैष्णव का हो सकता है, सन्यासी का हो सकता है, गृहस्थ का भी हो सकता है। भगवान ने कहीं भी वेश को संत की पहचान नहीं बताया। संत की पहचान भीतर

माला-2000:ब्रह्म ज्ञानी और प्रेमी भक्त की स्थिति में क्या अंतर है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी पहली बार कब सच्ची शरणागति का अनुभव हुआ? क्या शरणागति भी धीरे-धीरे पुष्ट होती है? उत्तर:श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि सच्ची शरणागति तब प्रकट होती है जब मनुष्य का अहंकार पूरी तरह टूट जाता है और उसे चारों ओर से निराशा ही दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवन की

माला-1199:क्या इस कलयुग में भगवान अवतार लेंगे? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: क्या इस कलयुग में भगवान अवतार लेंगे? उत्तर:श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि शास्त्रों में स्पष्ट वर्णन है कि कलयुग के अंत में भगवान कल्कि अवतार लेकर प्रकट होंगे। लेकिन अभी जो समय चल रहा है, वह कलयुग की प्रारंभिक अवस्था है। कलयुग की आयु 4,32,000 वर्ष बताई गई है और अभी

माला-1197:क्या भक्ति केवल विपत्ति में आती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: महाराज जी, क्या हमारा भी चरित्र गाया जाए — यह भावना उचित है? उत्तर: महाराज जी इस भावना को बहुत सूक्ष्मता से पकड़ते हैं। जब हम मीरा, शबरी, कर्माबाई जैसे भक्तों की कथा सुनते हैं तो भीतर एक चाह उठती है कि “कभी हमारा भी चरित्र गाया जाए।” पर महाराज जी कहते हैं

माला-1196:गुरु निष्ठा और गुरु कृपा कैसे प्राप्त होती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: महाराज जी, गुरु निष्ठा और गुरु कृपा कैसे प्राप्त होती है? जब गुरु कठोर व्यवहार करें तब क्या करें? उत्तर: महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — गुरु निष्ठा अपने आप नहीं आती, गुरु कृपा से आती है। और गुरु कृपा तब मिलती है जब शिष्य अपने अहंकार को मिट्टी में मिलाने के लिए

माला-1195:क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: गुरु की अंग सेवा की इच्छा — स्वार्थ या विशुद्ध प्रीति? उत्तर:महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि संसार की प्रीति और गुरु-इष्ट की प्रीति में अंतर है। संसार में जो प्रेम है, उसमें राग, आसक्ति और स्वार्थ मिला होता है। लेकिन गुरु और इष्ट के प्रति जो भाव है, वह परमार्थ स्वरूप है।

माला-1194:क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है? फिर उसे करना क्या है? उत्तर:महाराज जी बहुत स्पष्ट कहते हैं — आत्मा को कुछ पाना नहीं है। आत्मा स्वयं पूर्ण है, निर्विकार है, आनंद का समुद्र है। वह चैतन्य घन है। उसे किसी क्रिया, किसी फल, किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं। समस्या

माला-1193:क्या जन्म वास्तविक है या सब स्वप्न मात्र है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: आपका जन्म क्यों हुआ है? उत्तर:महाराज जी बड़ी सरलता से कहते हैं — “मेरा जन्म हुआ ही नहीं।” जन्म तो स्वप्न है। जैसे स्वप्न में हम शरीर मान लेते हैं और सुख-दुख भोगते हैं, वैसे ही यह जागृत जीवन भी एक स्वप्न के समान है। वास्तविकता में आत्मा अजन्मा है, निर्विकार है। जो