प्रश्न 1. महाराज जी,आलस्य और मोबाइल के अधिक उपयोग पर जीत कैसे पाई जाए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि आलस्य और मोबाइल की आदत पर विजय पाने के लिए सबसे पहले अपने अभ्यास को बदलना पड़ेगा। जैसे हम अपनी नींद, भोजन और बोलने की आदत को अभ्यास से कम या ज्यादा कर सकते हैं, वैसे ही मोबाइल के उपयोग और आलस्य को भी धीरे-धीरे नियंत्रित किया जा सकता है।
महाराज जी का सरल उपाय है—कम बोलो, कम सोओ, कम खाओ और भजन करो। जब जीवन में भजन के प्रति रुचि बढ़ेगी तो मोबाइल पर बेकार की चीजें देखने की इच्छा अपने आप कम होने लगेगी। मोबाइल में बहुत अच्छी चीजें भी हैं और बहुत समय खराब करने वाली चीजें भी। इसलिए मोबाइल को पूरी तरह बुरा नहीं कहा गया है, बल्कि उसमें से अच्छी चीज ग्रहण करने और बुरी चीज छोड़ने के लिए विवेक का प्रयोग करने की बात कही गई है।
आलस्य दूर करने के लिए सुबह समय पर उठने का अभ्यास भी जरूरी बताया गया है। महाराज जी कहते हैं कि अलार्म बजते ही तुरंत उठ जाओ। रजाई में पड़े-पड़े घड़ी देखने से काम नहीं चलेगा। रजाई फेंको, बिस्तर से बाहर आओ और यदि नींद आ रही हो तो खड़े हो जाओ, थोड़ा टहलो, पानी पियो, फिर स्नान आदि करके अपनी साधना में लग जाओ।
महाराज जी यह भी कहते हैं कि सोने से पहले संकल्प करके सोने से धीरे-धीरे शरीर को उसी समय जागने का अभ्यास हो जाता है।
इसलिए मोबाइल छोड़ने का सबसे अच्छा उपाय केवल मोबाइल को दूर रखना नहीं, बल्कि अपने जीवन में भजन और अच्छे अभ्यास को बढ़ाना है। जब नाम-जप और सत्संग में आनंद मिलने लगेगा, तब मोबाइल पर व्यर्थ समय बिताना अपने आप कम होने लगेगा।
प्रश्न 2. क्या मेरे कर्मों का फल मेरे जीवनसाथी को भी भोगना पड़ेगा?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि पति-पत्नी का मिलना भी पूर्वजन्म के कर्मों और संस्कारों के संयोग से होता है। जब दो व्यक्ति जीवनसाथी बनते हैं तो उनके कर्मों का आपस में प्रभाव पड़ता है। महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि तुम्हारा शुभ कर्म उसके लिए सुख का कारण बन सकता है और उसका शुभ कर्म तुम्हारे लिए सुख का कारण बन सकता है। इसी प्रकार अशुभ कर्म भी एक-दूसरे के जीवन में दुख का कारण बन सकते हैं।
इसी संदर्भ में एक भक्त ने अपनी पत्नी की बीमारी को लेकर पूछा कि यदि पत्नी को कैंसर हुआ है और उसके कारण पति भी दुखी हो रहा है, तो क्या पति के भी कोई ऐसे कर्म थे जिनके कारण पत्नी को यह कष्ट मिला?
महाराज जी इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि पत्नी के शरीर में बीमारी होने के कारण पति भी दुख भोग रहा है। बीमारी का खर्च, बार-बार मृत्यु का चिंतन, चिंता और कहीं बिछड़ने का शोक—ये सब उसके लिए भी कष्ट का कारण बन रहे हैं। इसलिए कर्म का संबंध केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता जिसे बीमारी हुई है; उसके साथ जुड़े लोगों को भी उसके परिणामों से कष्ट हो सकता है।
लेकिन महाराज जी साथ ही यह भी बताते हैं कि ऐसी परिस्थिति में भगवान की इच्छा को स्वीकार करते हुए नाम-जप करते रहना चाहिए। उन्होंने अपने संदर्भ में भी शरीर के कष्ट को लेकर यही भाव बताया कि शरीर अपने कर्मों का भोग भोग रहा है, लेकिन हमें भगवान का चिंतन नहीं छोड़ना चाहिए।
इसलिए जीवनसाथी के दुख को देखकर स्वयं को दोषी मानकर टूटना नहीं चाहिए। जो परिस्थिति सामने आई है, उसमें अपना कर्तव्य निभाएँ, सेवा करें और भगवान का नाम लेते रहें। महाराज जी के अनुसार, हम भगवान के हैं और अंततः अपने जीवन की परिस्थितियों को उन्हीं के चरणों में छोड़ देना चाहिए।
प्रश्न 3. क्या इस जन्म की भक्ति से अगले जन्म में मनुष्य जन्म मिल सकता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति इस जन्म में भक्ति करता है तो अगले जन्म में मनुष्य जन्म मिलने की संभावना उसके भीतर की अंतिम भावना और चिंतन पर निर्भर करती है। लेकिन यदि साधक की भक्ति इतनी गहरी हो जाए कि उसके हृदय में भगवान के अलावा किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु या स्थान का चिंतन ही न रहे, तो फिर अगले जन्म की आवश्यकता ही नहीं रहती।
महाराज जी भरत जी का उदाहरण देते हैं। भरत जी ने राज्य छोड़कर एकांत में भगवान का चिंतन और पूजन करना शुरू किया था। एक दिन उन्होंने एक हिरन के बच्चे को बचाया और धीरे-धीरे उस हिरन के प्रति उनका इतना मोह हो गया कि भगवान के चिंतन की जगह उसी हिरन का चिंतन अधिक होने लगा। परिणाम यह हुआ कि अगले जन्म में उन्हें हिरन का शरीर मिला।
महाराज जी इसी से समझाते हैं कि मृत्यु के समय जिस वस्तु, व्यक्ति या स्थान का चिंतन प्रमुख होगा, उसी के अनुसार आगे की गति बनती है। इसलिए यदि भगवान के अलावा किसी और का चिंतन हृदय में बना हुआ है तो जन्म की संभावना रहती है। लेकिन यदि निरंतर भगवान का चिंतन है तो साधक इसी जीवन में मुक्त हो सकता है और आगे आवागमन नहीं रहता।
इसलिए केवल यह इच्छा करना कि अगले जन्म में मनुष्य शरीर मिल जाए, भक्ति का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। महाराज जी तो इससे आगे की बात बताते हैं—भगवान को इतना याद करो कि अगला जन्म ही न लेना पड़े।
इसके लिए वे राधा नाम और गुरु-मंत्र के जप की बात कहते हैं। कुछ समय गुरु-मंत्र की माला का जप करें और फिर हर समय नाम-जप का अभ्यास करें। साथ ही निंदा से बचने और भजन को निरंतर रखने की प्रेरणा देते हैं।
अर्थात भक्ति का उद्देश्य केवल अच्छा अगला जन्म नहीं, बल्कि भगवान का निरंतर चिंतन करके इसी जीवन में आवागमन से मुक्त होना है।
प्रश्न 4. विभीषण जी अपने अंदर किस वासना की बात कर रहे हैं?
उत्तर:
महाराज जी सुंदरकांड की चौपाई “उर कछु प्रथम वासना रही, प्रभुपद प्रीति सरित सो बही” का अर्थ समझाते हुए बताते हैं कि विभीषण जी जब भगवान श्रीराम की शरण में गए, तब उनके मन में एक इच्छा थी। उन्होंने भगवान की शरण तो ली थी, लेकिन उनके मन में यह भाव भी था कि भगवान की शक्ति से रावण का नाश होगा और वे लंका के राजा बनेंगे।
विभीषण जी ने पहले अपने भाई रावण को बहुत समझाया। जब रावण नहीं माना, तब उन्होंने भगवान श्रीराम की शरण लेने का निश्चय किया। उस समय उनके मन में यह संकल्प था कि वे श्रीराम के बल से रावण का नाश कराएँगे और उसी सिंहासन पर बैठेंगे। इसलिए उनकी शरणागति में प्रारंभ में राज्य प्राप्त करने की इच्छा भी जुड़ी हुई थी।
लेकिन जब विभीषण जी ने भगवान श्रीराम के दर्शन किए और भगवान ने उन्हें “लंकेश” कहकर संबोधित किया, तब उनके हृदय में पश्चाताप हुआ। उन्हें लगा कि इतने प्रेममय भगवान के पास मैं राज्य पाने की इच्छा लेकर आया था। भगवान के दर्शन मात्र से उनके भीतर की वह वासना समाप्त हो गई और उन्होंने भगवान से केवल अविचल भक्ति माँगी।
महाराज जी आगे बताते हैं कि विभीषण जी हमेशा राम नाम में डूबे रहते थे। इसी कारण हनुमान जी ने उन्हें पहचाना और उनसे प्रभावित हुए। महाराज जी नाम की शक्ति को बहुत बड़ा बताते हैं। उनके अनुसार लगातार नाम-जप करने से हृदय की वासनाएँ धीरे-धीरे समाप्त होती हैं और भगवद्गुण प्रकट होने लगते हैं।
इसलिए विभीषण जी की पहली वासना लंका का राज्य पाने की इच्छा थी। लेकिन भगवान के दर्शन और चरणों के प्रेम से वह इच्छा बह गई और उनके हृदय में केवल अविचल भक्ति की चाह रह गई। यही बात महाराज जी इस प्रसंग से समझाते हैं।
प्रश्न 5. क्या आत्मा को यमलोक के मार्ग में कष्ट सहने पड़ते हैं?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि वास्तव में आत्मा को कोई कष्ट नहीं होता। आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में कष्ट से परे है। जो दुख और सुख दिखाई देते हैं, वे देहाभिमान के कारण अनुभव होते हैं। महाराज जी समझाते हैं कि सूक्ष्म शरीर और अंतःकरण में जो “मैं” का प्रतिबिंब पड़ रहा है, उसी के कारण व्यक्ति स्वयं को शरीर मानकर सुख-दुख भोगता है।
महाराज जी इसके लिए स्वप्न का बहुत सरल उदाहरण देते हैं। मान लीजिए कोई व्यक्ति सो रहा है और सपने में उसका सिर काटा जा रहा है। सपने में उसे बहुत कष्ट हो रहा है। उस समय बाहर से कोई उसे बचाने की कितनी भी कोशिश करे, जब तक वह जागेगा नहीं, सपने का दुख समाप्त नहीं होगा। जागते ही उसे पता चल जाएगा कि वास्तव में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।
इसी प्रकार महाराज जी कहते हैं कि यह संसार भी एक लंबे स्वप्न के समान है। जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक जन्म-मरण और सुख-दुख का अनुभव होता रहता है। जागने का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप को जानना। तब यह समझ आती है कि “मैं स्त्री नहीं, पुरुष नहीं, मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ।”
इसके लिए महाराज जी सद्गुरु की शरण, भगवान का नाम-जप, मंत्र-जप और शास्त्रों के स्वाध्याय की बात बताते हैं। वे कहते हैं कि नाम-जप करते रहें, सत्संग सुनें और परोपकार करें। इससे इस भ्रम से बाहर निकलने में सहायता मिलेगी।
महाराज जी के अनुसार, भक्त का शरीर छूटना भी सहज हो सकता है और ज्ञानी तो देहाभिमान को पहले ही छोड़ चुका होता है। इसलिए वास्तविक उपाय यमलोक के मार्ग के कष्ट से बचने की चिंता करना नहीं, बल्कि अभी से भगवान के चरणों का आश्रय लेकर अपने वास्तविक स्वरूप को जानना है। यही परम विश्राम का मार्ग है।
प्रश्न 6. इस सृष्टि में किसी का भला करने के बाद पछताना क्यों पड़ता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि किसी का भला करने के बाद पछतावा इसलिए होता है क्योंकि हमारी भलाई के पीछे कहीं न कहीं स्वार्थ की भावना जुड़ी होती है। हम किसी की सहायता करते हैं, लेकिन मन के अंदर चाहते हैं कि सामने वाला हमें धन्यवाद दे, सम्मान करे या हमारे प्रति कृतज्ञता दिखाए। जब ऐसा नहीं होता, तब हमें लगता है कि हमने उसके लिए इतना किया और उसने हमें कुछ दिया ही नहीं।
महाराज जी कहते हैं कि सच्चा परमार्थ वह है जिसमें हमने किसी का हित कर दिया और बदले में कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रखी। उन्होंने “नेकी कर दरिया में डाल” का भाव समझाया। यानी भलाई करके उसे वहीं छोड़ दो। सामने वाला धन्यवाद करे या न करे, हमें उससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए।
महाराज जी एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। यदि कोई भूखा व्यक्ति घूम रहा है और आपके पास भोजन है, तो उसे भोजन करा दीजिए। इससे हृदय में जो शीतलता और आनंद मिलेगा, वह बहुत बड़ा होगा। लेकिन यदि भोजन कराने के पीछे यह इच्छा हो कि वह आपके पैर छुए या आपको धन्यवाद दे, तो वह आनंद वैसा नहीं रहेगा।
इसलिए किसी की सहायता करते समय भाव यह होना चाहिए कि “मेरे भगवान आज इस रूप में मेरे सामने आए हैं और मुझे उनकी सेवा का अवसर मिला है।” जब ऐसा भाव होगा तो बदले में सम्मान या धन्यवाद की इच्छा नहीं रहेगी।
महाराज जी बताते हैं कि सम्मान पाने की इच्छा भी देहभाव से उत्पन्न होती है। जब मनुष्य भगवान में स्थित होता है, तब इच्छाएँ धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। इच्छाएँ पूरी होने से समाप्त नहीं होतीं; एक इच्छा पूरी होने के बाद दूसरी पैदा होती है।
इसलिए भलाई करने के बाद पछताना बंद करना है तो भलाई को सौदा मत बनाइए। किसी की सहायता करें, भगवान की सेवा समझें और बदले में कुछ भी पाने की अपेक्षा न रखें।
प्रश्न 7. मन में अपने लोगों के लिए जो प्रेम है, वह प्रेम है या मोह?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब तक हमारी दृष्टि शरीर और स्वार्थ तक सीमित है, तब तक जिसे हम प्रेम कहते हैं, वह वास्तव में राग, आसक्ति, मोह या लगाव हो सकता है। सच्चा प्रेम तब जागता है जब हमारे भीतर परमात्मा की दृष्टि आती है।
महाराज जी समझाते हैं कि परिवार से प्रेम करना गलत नहीं है। माता-पिता से प्रेम करो, पत्नी से प्रेम करो, बच्चों से प्रेम करो, लेकिन उनमें भगवान का स्वरूप देखकर प्रेम करो। यदि पत्नी को केवल “मेरी पत्नी” मानकर प्रेम करेंगे तो उससे बंधन पैदा होगा। लेकिन उसमें भगवान का अंश देखकर प्रेम करेंगे तो वही संबंध भक्ति का माध्यम बन सकता है।
महाराज जी बिजली का उदाहरण देते हैं। अलग-अलग मशीनें अलग काम करती हैं—कोई ठंडा करती है, कोई गर्म करती है—लेकिन उनमें शक्ति एक ही बिजली की होती है। उसी प्रकार माता, पत्नी, पुत्र और अन्य सभी में भगवान की शक्ति समान रूप से है, भले ही उनके साथ हमारा व्यवहार अलग-अलग हो।
वे आगे बताते हैं कि संसार में हम अक्सर शरीर से प्रेम करते हैं, परमात्मा से नहीं। इसका प्रमाण यह है कि जब किसी प्रिय व्यक्ति का शरीर छोड़कर परमात्मा अंतर्धान हो जाता है, तब उसी शरीर को हम अपने पास रखना भी नहीं चाहते। शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है, लेकिन हम कहते हैं कि “वह चला गया।” वास्तव में जो चला गया, वही प्रेम करने योग्य था—परमात्मा।
इसलिए महाराज जी के अनुसार, परिवार से प्रेम को छोड़ना नहीं है, बल्कि उसकी दिशा बदलनी है। ममता सबमें रखो, लेकिन भगवान मानकर रखो। पत्नी में भगवान, पुत्र में गोपाल जी, माता-पिता में भगवान का स्वरूप देखो। तब वही संबंध बंधन के बजाय भगवान की ओर ले जाने वाला बन सकता है। सच्चे प्रेम में लेने की इच्छा नहीं होती, बल्कि सामने वाले के सुख और हित की भावना होती है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”