माला-1352: सांसारिक सुख और सुखी होने में क्या अंतर है?,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1. महाराज जी,आपको अपने सद्गुरुदेव कैसे मिलें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि सद्गुरुदेव की प्राप्ति केवल अपनी बुद्धि और प्रयास से नहीं होती, बल्कि भगवान की कृपा से होती है। महाराज जी अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बचपन से ही उनके मन में भगवान को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा थी। उस समय उन्हें गुरु बनाने की विशेष जानकारी भी नहीं थी। बस इतना भाव था कि जीवन भगवान की प्राप्ति के लिए है और इसके लिए भजन करना है।

महाराज जी बताते हैं कि उन्होंने श्रीजी से प्रार्थना की थी कि उनके कठोर और शुष्क ज्ञान के हृदय को प्रेम से भरने के लिए वे स्वयं गुरु के रूप में मिलें। उन्होंने यह भी भाव रखा कि मैं स्वयं यह पहचान नहीं सकता कि मेरे गुरु कौन हैं, इसलिए यदि आप ही मेरे गुरु हैं तो आप स्वयं मुझे अपने पास पहुँचा दीजिए। इसके बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि वे अपने गुरुदेव के पास पहुँचे और प्रथम दर्शन में ही उनके भीतर गहरा भाव जाग गया।

महाराज जी के अनुसार, साधक को गुरु की खोज में केवल इधर-उधर भटकने के बजाय पहले भगवान की शरण लेनी चाहिए। भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु! आप ही मेरे गुरु को मेरे पास भेज दीजिए या मुझे उनके पास पहुँचा दीजिए। जब हृदय में दैन्यता, श्रद्धा और सच्ची गुरु-शरणागति की इच्छा होती है, तब भगवान स्वयं मार्ग बनाते हैं।

इसलिए सद्गुरु पाने के लिए सबसे पहले भगवान की प्राप्ति की सच्ची इच्छा, नाम-जप, भजन और दीन भाव आवश्यक है। महाराज जी समझाते हैं कि गुरु की योग्यता केवल हमारी खोज से नहीं बनती; गुरु-कृपा और भगवान की कृपा ही साधक को उस शरण तक पहुँचाती है।


प्रश्न 2. क्या बिना भाव के नाम-जप करने से भी फल मिलेगा?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी इस प्रश्न का बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं कि हाँ, बिना भाव के किया गया नाम-जप भी अपना फल देता है। महाराज जी समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति भोजन करते समय मन कहीं और लगाए हुए है, तब भी भोजन उसके पेट को भरता है। उसी प्रकार यदि मन अभी भगवान में पूरी तरह नहीं लगा है, फिर भी जीभ से भगवान का नाम लिया जा रहा है, तो नाम अपना प्रभाव अवश्य दिखाएगा।

महाराज जी इसके लिए अग्नि और विष का उदाहरण देते हैं। अग्नि को छूने वाला व्यक्ति श्रद्धा से छुए या बिना श्रद्धा के, अग्नि अपना जलाने का स्वभाव नहीं छोड़ती। इसी प्रकार विष में मारने की शक्ति होती है। कोई उसे जानकर पीए या अनजाने में, उसका प्रभाव होगा ही। उसी तरह भगवान के नाम में अपार शक्ति है। इसलिए साधक को यह सोचकर नाम-जप नहीं छोड़ना चाहिए कि अभी मेरे अंदर भाव नहीं है।

महाराज जी कहते हैं कि मन लगे या न लगे, भाव बने या न बने, जीभ से भगवान का नाम लेते रहना चाहिए। धीरे-धीरे नाम का प्रभाव मन पर पड़ता है और भीतर की स्थितियाँ अपने आप बदलने लगती हैं। जैसे दो लकड़ियों के लगातार घर्षण से अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही लगातार राम, कृष्ण या राधा नाम का उच्चारण करते रहने से भीतर दिव्य शक्ति और भक्ति की वृत्तियाँ जागृत होती हैं।

इसलिए नाम-जप के लिए पहले भाव आने की प्रतीक्षा मत कीजिए। नाम लेते-लेते ही भाव आएगा। शुरुआत चाहे मन लगाकर हो या मन को जबरदस्ती लगाकर, नाम का अभ्यास बंद नहीं होना चाहिए। यही निरंतरता धीरे-धीरे साधक के जीवन को बदल देती है।


प्रश्न 3. कोई ऐसा मंत्र बता दीजिए कि मेरी दिनचर्या सुधर जाए।

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में केवल कोई मंत्र बताकर बात समाप्त नहीं करते, बल्कि एक पूरी नियमित दिनचर्या बताते हैं। महाराज जी कहते हैं कि यदि जीवन को संयमित और व्यवस्थित करना है तो सबसे पहले सुबह 4 बजे उठने का अभ्यास करना चाहिए। उठने के बाद हल्का गर्म पानी पीने, कुछ देर चलने, स्नान करने और लगभग 20 मिनट व्यायाम करने की बात बताते हैं। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दो-तीन किलोमीटर चलना या दौड़ना चाहिए और इस दौरान राधा नाम का जप करते रहना चाहिए।

इसके बाद महाराज जी कहते हैं कि अपनी सामान्य सांसारिक दिनचर्या और काम-काज करें। जब समय मिले तो सत्संग सुनें और श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करें। काम करते समय भी राधा-राधा का स्मरण बनाए रखें और अपने कार्यों को भगवान के चरणों में समर्पित करते रहें। दिन में किए गए कार्य और नाम-जप को भी भगवान को समर्पित करने का अभ्यास करना चाहिए।

महाराज जी विशेष रूप से समय पर सोने और उठने की बात भी कहते हैं। देर रात तक जागना और सुबह देर से उठना शरीर और जीवन दोनों के लिए ठीक नहीं है। यदि किसी की नौकरी रात में होती है तो वह दिन में कुछ समय आराम कर सकता है, लेकिन 4 बजे उठने के अभ्यास को प्राथमिकता देने की बात महाराज जी करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि शरीर स्वस्थ रहेगा तो धर्म, अध्यात्म और संसार के आवश्यक कार्य भी ठीक प्रकार से किए जा सकेंगे।

इसके साथ ही महाराज जी संयमित आचरण, व्यभिचार से बचने, नशे से दूर रहने और गलत दृष्टि से बचने की बात कहते हैं। इस प्रकार राधा नाम, नियमित दिनचर्या, व्यायाम, सत्संग, गीता-पाठ और संयमित जीवन—यही उनके बताए हुए मार्ग हैं।


प्रश्न 4. क्या जीवन में बिना दुख के भगवान नहीं मिलते?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि मनुष्य जिस चीज को संसार में सुख समझ रहा है, वास्तव में वही उसके लिए सबसे बड़ा दुख बन सकती है। अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े, बड़ा पद, बैंक बैलेंस या महंगी गाड़ी—इन सबको हम सुख मानते हैं, लेकिन महाराज जी पूछते हैं कि इनमें से मृत्यु के समय हमारे साथ क्या जाएगा? शरीर भी नहीं जाएगा, धन भी नहीं जाएगा, पद-प्रतिष्ठा भी नहीं जाएगी और कोई सांसारिक वस्तु भी साथ नहीं जाएगी।

महाराज जी समझाते हैं कि सबसे बड़ा दुख यह है कि हम भगवान को भूलकर भोगों में सुख खोज रहे हैं। संसार का सुख स्थायी नहीं है। जो वस्तु आज सुख देती हुई दिखाई दे रही है, कल उससे वियोग निश्चित है। इसलिए उसे वास्तविक सुख मानना भ्रम है। महाराज जी कहते हैं कि जो भगवान का विस्मरण करा दे, उसे सुख कहना ही गलत है।

इसलिए भगवान को पाने के लिए दुख माँगने की आवश्यकता नहीं है। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि दुख तो इस संसार में पहले से ही है। हमें दुख माँगने के बजाय यह समझना चाहिए कि वास्तविक सुख कहाँ है। यदि मनुष्य भगवान के नाम में सुख खोजने लगे और संसार के नाशवान सुखों के पीछे भागना कम कर दे, तो उसके जीवन की दिशा बदलने लगती है।

महाराज जी बार-बार नाम-जप को ही मुख्य साधन बताते हैं। राधा, कृष्ण, राम या अपने प्रिय भगवान का नाम निरंतर लेते रहिए। संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य निभाइए, लेकिन यह समझते रहिए कि यहाँ की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। भगवान के नाम में लगाया गया समय ही वास्तविक आध्यात्मिक संपत्ति है। इसी दृष्टि से जीवन जीने पर बिना दुख माँगे भी भगवान की ओर मन बढ़ सकता है।


प्रश्न 5. क्या केवल जीवित संत को ही गुरु बनाया जा सकता है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी के अनुसार साधक के लिए प्रकट महापुरुष का सानिध्य अत्यंत आवश्यक है। महाराज जी बताते हैं कि किसी दिवंगत या अप्रकट संत के वचनों का सम्मान किया जा सकता है, उनके ग्रंथ पढ़े जा सकते हैं, लेकिन प्रकट गुरु का विशेष लाभ यह है कि वे सामने रहकर साधक को समझा सकते हैं, डाँट सकते हैं, दुलार सकते हैं और उसके आचरण को सुधार सकते हैं।

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी संदीपनि जी को गुरु बनाया और श्रीराम ने वशिष्ठ तथा विश्वामित्र जैसे महापुरुषों का आश्रय लिया। इससे वे प्रकट गुरु की आवश्यकता और महिमा समझाते हैं। गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह साधक का हाथ पकड़कर उसे आगे बढ़ाने वाला होता है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि गुरु परंपरा इसी कारण बनी है। जिस आचार्य की परंपरा में आपका मन लगे और जिसके वचनों पर आपका विश्वास हो, उस परंपरा से जुड़ना चाहिए। गुरु द्वारा दिया गया मंत्र भी उसी गुरु-परंपरा से चला हुआ होता है। इसलिए साधक को किसी महापुरुष के आश्रय में जाकर उनके वचनों के अनुसार जीवन बदलने का प्रयास करना चाहिए।

हालाँकि महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि गुरु की प्राप्ति केवल अपनी योग्यता के बल पर नहीं होती। साधक को सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे उसे सद्गुरु से मिला दें। हृदय में दैन्यता, प्रपत्ति और गुरु की शरण में जाने की सच्ची इच्छा होनी चाहिए। कभी-कभी सद्गुरु स्वयं योग्य शिष्य को स्वीकार करने पहुँच जाते हैं। इसलिए भगवान से प्रार्थना करते हुए प्रकट महापुरुषों के सानिध्य का लाभ लेना ही उचित मार्ग है।


प्रश्न 6. राम जी को प्रसन्न करने के लिए क्या करूँ?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि भगवान श्रीराम को प्रसन्न करना है तो माता सीता यानी जानकी जी के चरणों का आश्रय लेना बहुत महत्वपूर्ण है। महाराज जी बताते हैं कि जिस प्रकार श्रीजी के चिंतन और नाम से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम जी के लिए जानकी जी अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए यदि साधक सियाजी के चरणों का आश्रय लेता है और उनके प्रति श्रद्धा रखता है, तो उसकी भक्ति आगे बढ़ने में सहायता मिलती है।

महाराज जी बताते हैं कि हनुमान जी को भगवान श्रीराम की जो विशेष कृपा मिली, उसमें भी जानकी जी की कृपा का बड़ा स्थान है। वे रामायण के भाव के माध्यम से बताते हैं कि जानकी जी की कृपा से हनुमान जी भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय बने। इसलिए साधक को सियाजी के चरणों में प्रेम और आश्रय का भाव रखना चाहिए।

इसके साथ महाराज जी भगवान को प्रसन्न करने के लिए निर्मल मन की बात करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान को कपट, छल और छिद्र पसंद नहीं है। इसलिए केवल बाहरी पूजा या दिखावा पर्याप्त नहीं है। मन को सरल, निष्कपट और भगवान की ओर लगाने का प्रयास करना चाहिए।

अर्थात भगवान श्रीराम को प्रसन्न करने के लिए कोई जटिल उपाय आवश्यक नहीं बताया गया है। सियाजी के चरणों का आश्रय, निर्मल मन, भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति—इन्हीं भावों को अपने जीवन में बढ़ाना है। यदि साधक का मन छल-कपट से दूर होकर भगवान और उनके प्रिय भक्तों की ओर लगने लगे, तो उसकी साधना सही दिशा में आगे बढ़ती है।

महाराज जी की बात का सार यही है कि श्रीराम को पाने के लिए जानकी जी के चरणों का आश्रय और निर्मल हृदय बहुत महत्वपूर्ण है।


प्रश्न 7. क्या हज़ार बार भगवान का नाम और एक बार भक्त का नाम लेना बराबर है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान के प्रेमी भक्त का स्मरण और उनके नाम का उच्चारण अत्यंत प्रभावशाली है। महाराज जी उस भाव को बताते हैं कि भगवान अपने भक्तों के यश को भी बहुत प्रेम से स्वीकार करते हैं। इसी संदर्भ में वे बताते हैं कि भगवान के किसी प्रेमी भक्त को एक बार सच्चे भाव से पुकारना भी अत्यंत प्रभावशाली हो सकता है।

महाराज जी का विशेष जोर दासानुदास बनने पर है। अर्थात भगवान के भक्तों का भक्त बन जाना। यदि हम किसी प्रेमी भक्त का स्मरण करते हैं, उसके चरित्र को पढ़ते हैं और संतों की संगति करते हैं, तो हमारे भीतर भी भक्ति का भाव बढ़ता है। महाराज जी बताते हैं कि संतों के दर्शन, स्मरण और उनके सानिध्य से मनुष्य के भीतर बड़ा परिवर्तन हो सकता है।

वे संतों के सानिध्य की तुलना चलते-फिरते तीर्थ से करते हैं। संत का दर्शन, उनका स्पर्श और उनके साथ बातचीत तक साधक के भीतर मंगलमय आनंद और भगवद्भाव पैदा कर सकती है। यहाँ तक कि संत की डाँट या फटकार भी सत्संग का ही रूप बन सकती है, क्योंकि वह साधक को सुधारने के लिए होती है।

लेकिन महाराज जी की बात का अर्थ यह नहीं है कि भगवान के नाम-जप को छोड़कर केवल भक्तों का नाम लिया जाए। वे तो लगातार नाम-जप की महिमा बताते हैं। साथ ही वे यह समझाते हैं कि भगवान के प्रेमी भक्तों के चरित्र का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा साधक की भक्ति को बहुत तेजी से बढ़ा सकती है। इसलिए भगवान का नाम लेते हुए उनके भक्तों का भी स्मरण करें, उनके चरित्र पढ़ें और उनके चरणों में दीन भाव रखें।

यही भाव साधक को धीरे-धीरे भगवान की कृपा के योग्य बनाता है।


प्रश्न 8. जीवन में बहुत चुनौतियाँ आ रही हैं, इनका सामना करने के लिए बल कहाँ से लाऊँ?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए सबसे बड़ा बल भगवान के नाम में है। जब मनुष्य ऐसी परिस्थिति में फँस जाता है जहाँ वह गलत काम करना नहीं चाहता, लेकिन फिर भी कर बैठता है, या अच्छा करना चाहता है लेकिन कर नहीं पाता, तब केवल अपनी इच्छा के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए नाम का बल आवश्यक है।

महाराज जी कहते हैं कि जितना अधिक नाम-जप किया जाएगा, उतना ही भीतर बल बढ़ेगा। इसलिए कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय भगवान का नाम लेना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसी वृत्तियों पर विजय पाने के लिए भी नाम-जप को वे अत्यंत प्रभावशाली साधन बताते हैं।

महाराज जी नाम की शक्ति समझाने के लिए हरिदास जी महाराज का प्रसंग बताते हैं। एक महिला उन्हें भक्ति से हटाने के उद्देश्य से उनके पास गई, लेकिन महात्मा लगातार भगवान का नाम लेते रहे। कुछ दिनों तक नाम सुनते-सुनते उस महिला के भीतर ही परिवर्तन आ गया और उसे अपने कर्मों पर पश्चाताप होने लगा। अंततः उसने भगवान के नाम का आश्रय लिया और उसका जीवन बदल गया। इससे महाराज जी नाम की शक्ति को समझाते हैं।

इसी प्रकार वे केवल राम जी का प्रसंग भी बताते हैं, जिनका जीवन संकट में फँसने के बाद भी भगवान के नाम से जुड़ा रहा। महाराज जी इस प्रसंग के माध्यम से बताते हैं कि अत्यंत कठिन परिस्थिति में भी नाम-जप मनुष्य को भीतर से टूटने नहीं देता।

इसलिए चुनौतियों से लड़ने के लिए सबसे पहले नाम-जप को जीवन का आधार बनाइए। जितना नाम बढ़ेगा, उतना ही मन में संयम और शक्ति आएगी और जो काम नहीं करना चाहिए उसे छोड़ने तथा जो करना चाहिए उसे करने का बल प्राप्त होगा।


प्रश्न 9. भगवान हमसे प्रसन्न हैं, यह कैसे पता चलेगा?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान हमसे प्रसन्न हैं या नहीं, इसका पता केवल इस बात से नहीं चलता कि हमारे जीवन में धन, नौकरी, पद, सुविधा या सांसारिक सुख बढ़ रहे हैं। भगवान की प्रसन्नता का वास्तविक संकेत यह है कि हमें संतों का सानिध्य मिले, भगवान का नाम सुनने और लेने का अवसर मिले और हमारा मन धीरे-धीरे भगवान की ओर लगने लगे।

महाराज जी कहते हैं कि यदि भगवान प्रसन्न होते हैं तो वे साधक को साधु-संगति देते हैं। संसार में धन, पुत्र, परिवार और लक्ष्मी ऐसे लोगों के पास भी हो सकते हैं जो भगवान को नहीं मानते, इसलिए इन्हें भगवान की प्रसन्नता का निश्चित प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत संतों का सानिध्य और हरिकथा मिलना दुर्लभ है। इसलिए यदि हमें संतों का संग, भगवान की कथा और नाम-जप मिल रहा है तो इसे भगवान की विशेष कृपा समझना चाहिए।

महाराज जी भगवान की प्रसन्नता की एक और पहचान बताते हैं—हमारी चित्तवृत्ति संसार से हटकर भगवान के चिंतन में लगने लगे। भगवान की ओर मन का आकर्षण बढ़ना, भजन में रुचि आना और नाम-जप करने की इच्छा होना बहुत बड़ा संकेत है। केवल यह देखना कि हमारी नौकरी लग गई, व्यापार बढ़ गया या कोई सांसारिक इच्छा पूरी हो गई, भगवान की प्रसन्नता का प्रमाण नहीं है।

इसलिए यदि जीवन में सत्संग मिल रहा है, संतों के वचन सुनने का अवसर मिल रहा है, नाम-जप में रुचि बढ़ रही है और मन भगवान की ओर जाने लगा है तो इसे भगवान की कृपा मानना चाहिए। महाराज जी अंत में नाम-जप, बुजुर्गों की सेवा और सत्संग की प्रेरणा देते हैं। इन्हीं के माध्यम से जीवन धीरे-धीरे आनंदमय होने लगता है।


प्रश्न 10. भक्तमाल ने मेरा जीवन बदल दिया; मैं भक्तों की तरह संतों की सेवा कैसे करूँ?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि कलियुग में संत सेवा और नाम-जप दोनों का विशेष महत्व है। यदि कभी ऐसा अवसर मिल जाए कि कोई वास्तविक संत हमारे घर आएँ, तो प्रेमपूर्वक भोजन कराना, उनके चरण धोना और सम्मान करना बाहरी रूप से संत सेवा का एक स्वरूप है। लेकिन महाराज जी बताते हैं कि संतों की सेवा का इससे भी गहरा रूप है।

महाराज जी के अनुसार सभी संतों की वास्तविक इच्छा यही है कि जीव के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम जागे और उसे भगवान के नाम से प्रेम हो जाए। इसलिए यदि हम नियमित रूप से नाम-जप करते हैं और भगवान का चिंतन करते हैं, तो एक अर्थ में हम सभी संतों की सेवा ही कर रहे हैं। साथ ही भगवान की लीला और भक्तों के चरित्रों को पढ़ना-सुनना भी साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

महाराज जी संतों को धन देने के विषय में सावधानी की बात भी कहते हैं। किसी संत के वेश में आए व्यक्ति को केवल देखकर धन देना उचित नहीं है, क्योंकि यदि वह धन का गलत उपयोग करे तो उसका प्रभाव देने वाले पर भी पड़ सकता है। इसके विपरीत भूखे व्यक्ति को भोजन कराने में कोई निषेध नहीं है। संत वेश में कोई भूखा हो तो उसे भोजन कराया जा सकता है। आज के समय में बाहरी वेश देखकर किसी व्यक्ति की वास्तविक स्थिति तुरंत समझना कठिन है।

महाराज जी बताते हैं कि संत सेवा का भाव यह है कि संतों को भगवान के समान समझकर उनकी सेवा की जाए और उनके दोषों को देखने की कोशिश न की जाए। लेकिन साथ ही सावधानी भी रखनी चाहिए ताकि किसी गलत व्यक्ति के कारण संतों के प्रति हमारी श्रद्धा समाप्त न हो जाए।

इसलिए यदि प्रत्यक्ष संत सेवा का अवसर न मिले तो निराश होने की जरूरत नहीं है। खूब नाम-जप करें, भगवान के चरित्र पढ़ें, भक्तों के चरित्र पढ़ें और जब किसी वास्तविक संत की सेवा का अवसर मिले तो श्रद्धा से सेवा करें। महाराज जी बताते हैं कि भगवान को अपने चरित्र से भी बढ़कर अपने भक्तों के चरित्र प्रिय हैं।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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