प्रश्न 1: क्या जो दान करोगे, वही मिलेगा?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि दान का फल इस बात पर निर्भर करता है कि दान करते समय हमारे हृदय में कैसा भाव है। ऐसा जरूरी नहीं है कि आपने किसी को जूते दिए हैं, तो आपको बदले में जूते ही मिलेंगे। भगवान बाहरी वस्तु को नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे हमारे भाव को देखते हैं।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि यदि आप किसी गरीब बच्चे को इसलिए जूते देते हैं कि उसके पैरों में गर्मी से छाले न पड़ें, उसे कंकड़ और काँटे न चुभें, तो आपके भीतर उसके प्रति सुख पहुँचाने की भावना है। यही भावना आपके जीवन में सुख का कारण बनेगी। भगवान आपको ऐसी कृपा और सामर्थ्य दे सकते हैं कि दूसरे की बातों से आपका हृदय दुखी न हो।
वे भोजन का उदाहरण भी देते हैं। एक दिन आप स्वयं अच्छा भोजन करके देखिए और दूसरे दिन अपने हिस्से का भोजन किसी भूखे व्यक्ति को खिलाकर देखिए। दोनों में से किससे अधिक आनंद मिलता है, इसका अनुभव स्वयं हो जाएगा। इसी प्रकार ठंड में काँपते हुए किसी व्यक्ति को अपनी शॉल ओढ़ा देने से जो आत्मिक आनंद मिलता है, वह केवल स्वयं सुख-सुविधा प्राप्त करने से नहीं मिलता।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि यदि आपके पास किसी की सहायता करने के साधन नहीं हैं, लेकिन हृदय में उसके सुख की सच्ची भावना है, तो उस भावना का भी पुण्य मिलता है।
इसलिए दान में केवल वस्तु का महत्त्व नहीं है, बल्कि उसके पीछे की भावना का महत्त्व है।
महाराज जी की सीख है कि दान करते समय बदले में वही वस्तु पाने की इच्छा न रखें। दूसरों को सुख पहुँचाने की भावना से दान और परोपकार करें, क्योंकि भगवान बाहरी वस्तु से अधिक आपके हृदय का भाव देखते हैं।
प्रश्न 2: भगवान कहते हैं कि काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं, पर अगर ये स्वयं सामने से आएँ तो क्या करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य के सामने अनेक प्रकार के भोग और इच्छाएँ आती रहती हैं, लेकिन हर इच्छा को पूरा करना उचित नहीं है। हमारे भीतर विवेक होना चाहिए कि कौन-सा कार्य धर्म के अनुकूल है और कौन-सा धर्म के विरुद्ध। जो कार्य शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार है, उसे स्वीकार करना चाहिए और जो अधर्म की ओर ले जाता है, उसका त्याग करना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान ने गीता में काम, क्रोध और लोभ को नरक के द्वार कहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर प्रकार की कामना या इच्छा गलत है। भगवान ने अपनी विभूतियों में धर्मयुक्त काम को भी अपना स्वरूप बताया है। उदाहरण के लिए, शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार विवाह करके पति-पत्नी का गृहस्थ धर्म निभाना और संतान उत्पत्ति के उद्देश्य से संबंध स्थापित करना अनुचित नहीं है।
वे समझाते हैं कि कामना की पूर्ति में बाधा आने पर क्रोध उत्पन्न होता है और कामना पूरी होने पर लोभ बढ़ता है। इस प्रकार कामना ही क्रोध और लोभ का मूल कारण बनती है। जब तक निष्कामता विकसित नहीं होगी, तब तक स्थायी शांति और आनंद प्राप्त करना कठिन है।
महाराज जी युवाओं को विशेष रूप से गलत संगति, व्यभिचार और अनुचित संबंधों से बचने की सलाह देते हैं। मनुष्य को अपनी इंद्रियों के सामने आने वाले प्रत्येक आकर्षण के पीछे नहीं भागना चाहिए। पहले विवेक से निर्णय करना चाहिए कि वह भोग धर्मयुक्त है या अधर्मयुक्त।
इसके लिए भगवान का नामजप, संतों का संग और शास्त्रों का स्वाध्याय आवश्यक है।
महाराज जी की सीख है कि मन के सामने कोई भी इच्छा आए, तो बिना सोचे उसके पीछे न चलें। विवेक से धर्म और अधर्म का निर्णय करें, गलत इच्छाओं का त्याग करें और भगवान के नाम का आश्रय लें।
प्रश्न 3: देहाभिमान का नाश कैसे हो?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि देहाभिमान का अर्थ है स्वयं को शरीर का कर्ता और भोगता मानना। जब व्यक्ति सोचता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ और मैं ही इसका सुख भोग रहा हूँ, तब उसके भीतर देहाभिमान बना रहता है। इसे कम करने के लिए मन में उठने वाली विषय-वासनाओं और कामनाओं पर नियंत्रण करना आवश्यक है।
महाराज जी इसके बनने की प्रक्रिया समझाते हैं। सबसे पहले मन में किसी विषय का विचार आता है। बुद्धि उस पर निर्णय करती है, चित्त उसका चिंतन करने लगता है और यदि उस विषय में प्रीति हो जाए, तो संकल्प बनता है। संकल्प से कामना पैदा होती है और कामना व्यक्ति को उस कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है। फिर उस कार्य से सुख भोगने की इच्छा पैदा होती है। इस प्रकार कर्ता और भोगता का भाव मजबूत होता जाता है।
महाराज जी बताते हैं कि साधक को इस पूरी प्रक्रिया के आरंभ में ही सावधान होना चाहिए। विषय का विचार आते ही उसमें आसक्ति न बढ़ने दें। यदि संकल्प बन जाए, तो उसे कामना और फिर क्रिया में बदलने से रोकें।
इसके लिए निरंतर नामजप करना आवश्यक है। भोजन भी सात्त्विक और आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए। अत्यधिक बाजारू और उत्तेजक भोजन से रजोगुण तथा तमोगुण बढ़ सकते हैं, जबकि सात्त्विक आहार भजन में सहायक होता है। असत् आचरण से देहाभिमान मजबूत होता है और सदाचरण से वह कमजोर पड़ता है। संतों का संग भी इसमें सहायक है।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि अपने पद और जिम्मेदारी के अनुसार संसार में काम करते रहें, लेकिन स्वयं को हर कर्म का स्वतंत्र कर्ता न मानें। सभी में भगवान की सत्ता देखते हुए अपना कर्तव्य निभाएँ।
महाराज जी की सीख है कि देहाभिमान को कम करने के लिए निरंतर नामजप, सात्त्विक आहार, पवित्र आचरण और संतों का संग अपनाएँ। मन में उठने वाली गलत कामनाओं को संकल्प और क्रिया बनने से पहले ही रोकने का अभ्यास करें।
प्रश्न 4: शास्त्रों का श्रवण करते हैं और उन पर चलने का प्रयास भी करते हैं, फिर भी मन मलिन है। क्या करें?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि केवल शास्त्रों को सुनने और पढ़ने से मन निर्मल नहीं होता। सुनी हुई बातों को अपने जीवन में उतारना और उनका निरंतर अभ्यास करना भी आवश्यक है। कई बार व्यक्ति बहुत कुछ सुन लेता है, लेकिन उसके आचरण में वास्तविक परिवर्तन नहीं आता। यही कारण है कि मन की पुरानी प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं।
महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी ग्रंथ की एक पंक्ति भी पढ़ी है, तो उसे समझकर बार-बार चिंतन करना चाहिए। केवल अधिक से अधिक पढ़ने और सुनने में समय लगाने के बजाय सीखी हुई बातों को व्यवहार में लाने का प्रयास करें।
वे निरंतर नामजप पर विशेष जोर देते हैं। नामजप करते समय माला चल रही हो, जिह्वा से भगवान का नाम निकल रहा हो और मन भी उसी नाम का चिंतन कर रहा हो। यदि माला हाथ में चल रही है, मुख से नाम निकल रहा है, लेकिन मन संसार के विचारों में भटक रहा है, तो साधना में एकाग्रता नहीं बन पाएगी।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि यदि आप महामंत्र का जप कर रहे हैं, तो मंत्र की पूरी पंक्ति का ध्यान रखें। उसे बोलें भी, अपने कानों से सुनें भी और मन में उसी का चिंतन भी करें। जब माला, जिह्वा और मन का जुड़ाव एक साथ होगा, तब नामजप में आनंद आने लगेगा।
वे गुरु द्वारा निर्धारित जप-संख्या का पालन करने की भी सलाह देते हैं। शुरुआती साधकों को 11 माला जैसी निर्धारित संख्या पूरी करनी चाहिए। साथ में पाँच या दस मिनट अतिरिक्त समय निकालकर ध्यानपूर्वक या लिखित नामजप का अभ्यास कर सकते हैं। धीरे-धीरे इस समय को बढ़ाएँ, लेकिन अतिरिक्त अभ्यास के कारण पहले से मिला नियम न छोड़ें।
महाराज जी की सीख है कि केवल शास्त्रों का श्रवण पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके अनुसार आचरण और नियमित नामजप आवश्यक है। माला, जिह्वा और मन को एक साथ भगवान के नाम में लगाएँ तथा गुरु द्वारा निर्धारित जप-संख्या का पालन करें।
प्रश्न 5: भगवान से जुड़ने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि भगवान से जुड़ने का सबसे अच्छा तरीका हृदय से उनकी शरण में चले जाना है। जब मनुष्य भीतर से यह स्वीकार कर लेता है कि मैं भगवान का हूँ और भगवान ही मेरे हैं, तब उसके जीवन में वास्तविक भक्ति का आरंभ होता है।
महाराज जी सुग्रीव जी का प्रसंग सुनाते हैं। सुग्रीव जी अपने भाई बाली के भय से ऋष्यमूक पर्वत पर छिपकर रहते थे। उन्होंने भगवान की प्राप्ति के लिए कोई विशेष साधना नहीं की थी। हनुमान जी के माध्यम से उनका भगवान श्रीराम से मिलन हुआ। भगवान ने अग्नि को साक्षी मानकर सुग्रीव जी को अपना मित्र स्वीकार किया और उन्हें भय से मुक्त होने का आश्वासन दिया।
इस प्रसंग से महाराज जी समझाते हैं कि भगवान अपने शरणागत को स्वीकार करते हैं। भगवान ने बाली से भी कहा था कि सुग्रीव मेरा शरणागत है, इसलिए उसका मित्र मेरा मित्र है और उसका शत्रु मेरा शत्रु है। इससे भगवान की शरणागति की महिमा समझ में आती है।
महाराज जी बताते हैं कि केवल बाहरी रूप से शरणागति कहना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अपनी ममता और आसक्ति को संसार के अनेक संबंधों से समेटकर भगवान के चरणों में समर्पित करना पड़ता है। जब तक मनुष्य परिवार, धन, संबंध और सांसारिक सुखों में ही अपना वास्तविक आश्रय खोजता रहेगा, तब तक भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण विकसित नहीं होगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि गृहस्थ अपने परिवार के कर्तव्यों को छोड़ दे। बल्कि अपने सभी संबंधों और जिम्मेदारियों को भगवान के आश्रय में रहते हुए निभाए।
महाराज जी की सीख है कि भगवान से जुड़ने के लिए सबसे पहले हृदय से उनकी शरण स्वीकार करें। अपने मन में यह दृढ़ भाव रखें—हे भगवान, मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। फिर नामजप और भजन के माध्यम से इस संबंध को मजबूत करते रहें।
प्रश्न 6: संतोष और संयम की रेखा क्या है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि संतोष कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे बाहर से प्राप्त किया जाए। यह मन की एक अवस्था है। जब व्यक्ति अपनी वर्तमान परिस्थिति में संतुष्ट रहना सीख लेता है और दूसरों से अनावश्यक अपेक्षाएँ नहीं रखता, तब उसके भीतर संतोष का भाव विकसित होता है।
महाराज जी संतोष का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि मनुष्य को जितना प्राप्त है, उसी में प्रसन्न रहना चाहिए। किसी व्यक्ति से लगातार कुछ पाने की इच्छा न रखें और न ही अपनी खुशी को दूसरों की पूर्ति पर निर्भर बनाएँ। भगवान ने जिस परिस्थिति में रखा है, उसमें संतुष्ट रहकर अपना कर्तव्य निभाना ही संतोष है।
इसके बाद महाराज जी संयम की मर्यादा समझाते हैं। संयम का अर्थ है कि किसी भी परिस्थिति में धर्म के विरुद्ध आचरण न करना। चाहे कितना भी आकर्षण सामने आए या कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाए, व्यक्ति को अपने धर्म और मर्यादा से पीछे नहीं हटना चाहिए।
वे सदन कसाई जी का प्रसंग सुनाते हैं। सदन जी भगवान के भक्त थे और भगवान के नाम का जप करते हुए जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए जा रहे थे। रास्ते में एक घर में रात्रि-विश्राम के दौरान घर की स्त्री ने उनके सामने अनुचित प्रस्ताव रखा। सदन जी ने उसे अस्वीकार कर दिया और स्पष्ट कहा कि वे धर्म के विरुद्ध आचरण नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कष्ट सहना पड़े।
उस स्त्री ने अपने पति की हत्या कर दी और सदन जी पर झूठा आरोप लगा दिया। परिणामस्वरूप सदन जी को मारपीट और दंड सहना पड़ा, यहाँ तक कि उनके हाथ भी कटवा दिए गए। इसके बावजूद उन्होंने अपने धर्म और संयम का त्याग नहीं किया।
महाराज जी इस प्रसंग से बताते हैं कि सच्चा संयम वही है, जिसमें व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धर्मविरुद्ध कार्य स्वीकार न करे।
महाराज जी की सीख है कि संतोष का अर्थ है—जितना मिला है, उसमें प्रसन्न रहना; और संयम का अर्थ है—किसी भी परिस्थिति में धर्म की मर्यादा न तोड़ना। भगवान पर भरोसा रखें, दूसरों से अनावश्यक अपेक्षाएँ न रखें और अपने आचरण को पवित्र बनाए रखें।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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