माला-1423: माता-पिता बच्चों की सुख-शांति के लिए क्या करें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,माता-पिता बच्चों की सुख-शांति के लिए क्या करें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, यदि माता-पिता अपने बच्चों का जीवन सुखमय और सफल बनाना चाहते हैं, तो उन्हें बचपन से ही अच्छी शिक्षा के साथ आध्यात्मिक संस्कार भी देने चाहिए। केवल आधुनिक शिक्षा प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है; बच्चों के भीतर विनम्रता, संयम, पवित्रता और अच्छे आचरण का विकास होना भी आवश्यक है।

महाराज जी बताते हैं कि माता-पिता को बच्चों को रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत जैसे धार्मिक ग्रंथों की कथाएँ सुनानी चाहिए। उन्हें भगवान का नामजप करने की प्रेरणा देनी चाहिए और अच्छे-बुरे आचरण के बीच अंतर समझाना चाहिए। इससे बच्चों में सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।

बच्चों को अपने माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना, विनम्रता से बात करना और दूसरों के प्रति मर्यादित व्यवहार करना सिखाना चाहिए। साथ ही, मोबाइल पर अनुचित सामग्री देखने और गलत संगति में पड़ने से भी बचाना चाहिए।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि आध्यात्मिक शिक्षा आधुनिक शिक्षा के विरुद्ध नहीं है। बच्चे आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें, लेकिन उनके जीवन में धर्म और आध्यात्मिकता का आधार भी मजबूत होना चाहिए, ताकि वे अपने ज्ञान का उपयोग सही कार्यों के लिए कर सकें।

महाराज जी की सीख है कि बच्चों को बचपन से नामजप, सत्संग, धार्मिक कथाओं, पवित्र भोजन और अच्छे आचरण की शिक्षा दें। माता-पिता स्वयं भी आध्यात्मिक जीवन अपनाएँ, क्योंकि बच्चे अपने बड़ों के व्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं।

प्रश्न 2: संतों में दोष-दर्शन हो जाता है!

उत्तर: पूज्य महाराज जी इस विषय में बहुत सावधान करते हैं। वे समझाते हैं कि किसी संत या साधक में दोष खोजने की आदत आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बन सकती है। हम किसी व्यक्ति के बाहरी रूप, पहनावे या व्यवहार को तो देख सकते हैं, लेकिन उसके हृदय की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं जान सकते। इसलिए अपने मन से किसी के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि यदि मन में किसी संत के प्रति गलत विचार आने लगें, तो तुरंत भगवान का नामजप करना चाहिए और मन को दूसरी दिशा में लगाने का प्रयास करना चाहिए। जिस संत के प्रति दोष-दर्शन हुआ हो, उन्हें मन ही मन प्रणाम करें और भगवान से प्रार्थना करें कि हमारे हृदय को शुद्ध करें तथा हमें सही दृष्टि प्रदान करें।

वे यह भी समझाते हैं कि हर व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर एक जैसा नहीं होता। कोई साधक अभी साधना के आरंभिक चरण में हो सकता है और उसमें कुछ कमियाँ भी रह सकती हैं। इसलिए किसी को देखकर तुरंत उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। हमें दूसरों की कमियाँ खोजने के बजाय अपने आचरण को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।

महाराज जी संतों के प्रति मर्यादा बनाए रखने और अनावश्यक निकटता से बचने की भी सलाह देते हैं। संतों के उपदेश सुनें, उचित सेवा करें और अपनी मर्यादा का पालन करें।

महाराज जी की सीख है कि दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने भीतर झाँकें। यदि गलती से मन में नकारात्मक विचार आ जाएँ, तो तुरंत नामजप करें, प्रणाम करें और भगवान से सद्बुद्धि की प्रार्थना करें। किसी की वाणी से निंदा करने से विशेष रूप से बचें।

प्रश्न 3: जिन लोगों की तन-मन-धन से सहायता करता हूँ, वही लोग धोखा देते हैं। ऐसा क्यों होता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि यदि हम किसी की सहायता करते हैं और बदले में वही व्यक्ति हमारे साथ छल या बुरा व्यवहार करता है, तो उसके कारण निराश नहीं होना चाहिए। हमें अपने कर्म और दूसरे व्यक्ति के व्यवहार को अलग-अलग समझना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार, यदि हम किसी जरूरतमंद की सहायता करते हैं, तो हमारी ओर से किया गया वह अच्छा कर्म है। सामने वाला व्यक्ति उसके बदले में धोखा देता है, तो उससे हमारा पुण्य समाप्त नहीं हो जाता। महाराज जी बताते हैं कि संभव है, हमारे पूर्व कर्मों का कोई हिसाब चुकता हो रहा हो और उस परिस्थिति के माध्यम से हमें किसी का दुःख दूर करने का अवसर मिला हो।

वे उदाहरण देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति दुःख में है और हम उसे अस्पताल पहुँचाकर उसकी सहायता करते हैं, तो यह भी भगवान की व्यवस्था से मिला अवसर हो सकता है। इसलिए सहायता करके पछताने के बजाय इस बात का विचार करना चाहिए कि भगवान ने हमें किसी के दुःख को कम करने का अवसर दिया।

महाराज जी यह भी कहते हैं कि जब हम केवल लोगों के व्यवहार को देखते हैं, तो निराशा और दुःख बढ़ सकता है। लेकिन यदि हम सबमें भगवान की उपस्थिति का भाव रखें, तो परिस्थितियों को समझने की हमारी दृष्टि बदल सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी के बार-बार धोखा देने पर भी विवेक छोड़ दिया जाए। सहायता करते समय उचित सावधानी और मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है।

महाराज जी की सीख है कि दूसरों का हित करने के बाद उनके व्यवहार से निराश न हों। अपने अच्छे कर्म करते रहें, परिणाम को लेकर अत्यधिक चिंता न करें और भगवान की व्यवस्था पर विश्वास रखें।

प्रश्न 4: मैं चाहकर भी गलत आचरण को रोक नहीं पा रहा हूँ। कृपया मुझे बल प्रदान करें।

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि गलत आचरण से बचने के लिए केवल मन में इच्छा कर लेना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए निरंतर नामजप, पवित्र जीवन, अच्छी संगति और अपने व्यवहार पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना आवश्यक है।

महाराज जी हरिदास जी का उदाहरण देते हैं, जो निरंतर भगवान के नाम का जप करते थे। उनके जीवन के प्रसंग से वे बताते हैं कि भगवान के नाम में बहुत सामर्थ्य है। इसलिए साधक को अपने ऊपर विश्वास खोकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि वह अपनी गलत आदतों से कभी बाहर नहीं निकल सकता।

वे विशेष रूप से सलाह देते हैं कि मोबाइल पर गंदी सामग्री देखने से बचें, गलत संगति से दूर रहें और खान-पान को पवित्र बनाएँ। मन जिन दृश्यों को देखता है, जिन बातों को सुनता है और जिस प्रकार की संगति में रहता है, उनका प्रभाव उसके विचारों पर पड़ सकता है। इसलिए गलत आचरण को रोकने के लिए उन कारणों से भी बचना आवश्यक है जो मन को उस दिशा में ले जाते हैं।

महाराज जी नामजप के साथ शारीरिक अनुशासन का भी सुझाव देते हैं। वे सुबह दंड-बैठक लगाने और दौड़ने जैसे अभ्यासों का उल्लेख करते हैं। नियमित दिनचर्या तथा संयम के माध्यम से साधक अपने मन को अधिक अनुशासित बना सकता है।

यदि मन बार-बार गलत दिशा में जाने लगे, तो भगवान से प्रार्थना करें और उसी समय नामजप में लग जाएँ। गलती होने पर निराश होकर साधना छोड़ने के बजाय अपने प्रयास को और दृढ़ करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि निरंतर नामजप करें, गलत दृश्य और संगति से बचें, भोजन तथा दिनचर्या सुधारें और अपने भीतर संयम विकसित करने का प्रयास करें। अभ्यास और भगवान के आश्रय से गलत प्रवृत्तियों पर विजय पाने की शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 5: शरीर में प्राण क्या है और उसके संचालन का कार्य कौन करता है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि शरीर के संचालन में पाँच प्रमुख प्राणों की भूमिका बताई गई है। इनके नाम हैं—प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान। शरीर में वायु की विभिन्न क्रियाओं और उसके संचालन को समझाने के लिए इन पाँच प्राणों का वर्णन किया जाता है। इनके अतिरिक्त पाँच उपप्राणों का भी उल्लेख मिलता है, इसलिए इन्हें दस प्राण भी कहा जाता है।

महाराज जी समझाते हैं कि शरीर की गतिविधियाँ केवल दिखाई देने वाले अंगों के कारण नहीं चलतीं। शरीर के भीतर जीवन और गति बनाए रखने वाली सत्ता भी महत्त्वपूर्ण है। वे उदाहरण देते हैं कि जैसे अनेक प्रकार के उपकरण बिजली से चलते हैं, वैसे ही शरीर में विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ होती हैं, लेकिन उनके पीछे परमात्मा की सत्ता को समझना चाहिए।

उनके अनुसार, परमात्मा ही सभी प्राणियों में स्थित होकर शरीर के संचालन का आधार हैं। चाहे व्यक्ति अच्छा कर्म करे या बुरा, ज्ञानी हो या अज्ञानी, सभी में जीवन की मूल सत्ता उसी परमात्मा से जुड़ी है।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि मनुष्य अपने शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है। जबकि शरीर को उन्होंने परमार्थ की यात्रा के लिए मिली गाड़ी के समान बताया है। वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए मनुष्य को शरीर से आगे आत्मतत्त्व का विचार करना चाहिए।

इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए वे नामजप, शास्त्रों के स्वाध्याय, सत्संग और पवित्र आचरण पर जोर देते हैं।

महाराज जी की मुख्य सीख है कि प्राण शरीर की विभिन्न क्रियाओं के संचालन से जुड़े हैं, लेकिन उनके पीछे परमात्मा की सत्ता को समझना चाहिए। मनुष्य को केवल शरीर तक सीमित न रहकर अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 6: कुछ समय से नामजप में कमी आ गई है। पहले आनंद आता था, लेकिन अब मन भोगों की ओर आकर्षित होता है। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि साधना में कभी-कभी रुचि कम हो जाना और कभी अधिक आनंद अनुभव होना, मन पर अलग-अलग गुणों के प्रभाव से भी जुड़ा हो सकता है। वे बताते हैं कि जब सत्त्वगुण बढ़ता है, तब भजन में रुचि बढ़ती है। रजोगुण बढ़ने पर मन संसार और भोगों की ओर आकर्षित हो सकता है, जबकि तमोगुण बढ़ने पर नींद, आलस्य और प्रमाद बढ़ते हैं।

इसलिए यदि पहले नामजप में आनंद आता था और अब मन भोगों की ओर जा रहा है, तो निराश होकर भजन छोड़ना उचित नहीं है। महाराज जी सलाह देते हैं कि सबसे पहले अपने खान-पान, संगति, देखने-सुनने की आदतों और दिनचर्या पर ध्यान दें।

वे बाजार के भोजन जैसे पिज्जा, बर्गर और नूडल्स से बचने तथा सात्त्विक और अल्पाहार करने पर जोर देते हैं। रजोगुण बढ़ाने वाली सामग्री और ऐसी संगति से भी सावधान रहने को कहते हैं, जो मन को लगातार बाहरी विषयों की ओर खींचती है।

महाराज जी नामजप को परिस्थिति के अनुसार जारी रखने की सलाह देते हैं। यदि मन में मानसिक जप नहीं चल रहा, तो उपांशु जप करें। यदि उपांशु जप भी न हो पा रहा हो, तो स्पष्ट आवाज में नामजप करें। इस प्रकार नाम का अभ्यास टूटने न दें।

वे यह भी बताते हैं कि यदि किसी वैष्णव या संत के प्रति दोष-दृष्टि जैसे अपराध हो जाएँ, तो तुरंत प्रणाम करके भगवान से क्षमा माँगें। अपने आचरण की कमियों को पहचानकर सुधारना भी आवश्यक है।

महाराज जी की सीख है कि भजन में कमी आने पर घबराएँ नहीं, बल्कि अपने जीवन की आदतों को सुधारें और नामजप का प्रयास बढ़ाएँ। सात्त्विक भोजन, उचित संगति, पवित्र आचरण और नियमित साधना से भजन में रुचि फिर बढ़ सकती है।

प्रश्न 7: कर्मयोगी, स्थितप्रज्ञ और प्रेमलक्षणा भक्ति—क्या इन तीनों के बीच कोई संबंध है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि कर्मयोगी, स्थितप्रज्ञ और प्रेमलक्षणा भक्ति आध्यात्मिक मार्ग की अलग-अलग अवस्थाओं या स्वरूपों से संबंधित हैं। इन तीनों का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति है, लेकिन उनकी परिभाषा और विशेषताएँ एक जैसी नहीं हैं।

महाराज जी के अनुसार, कर्मयोगी वह है जो शास्त्रों के अनुसार निष्काम भाव से कर्म करता है। वह अपने कर्मों को केवल निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि भगवान की प्रसन्नता या संसार के हित के लिए करता है। इस प्रकार कर्म करते हुए वह अपनी साधना को आगे बढ़ाता है।

स्थितप्रज्ञ उस सिद्ध पुरुष को कहा गया है, जिसकी चित्तवृत्ति स्थिर होकर भगवान में तन्मय हो गई है और जो सांसारिक स्मृतियों तथा मानसिक विक्षेपों से ऊपर उठ चुका है। यह केवल कर्म करने का अभ्यास नहीं, बल्कि एक परिपक्व आध्यात्मिक अवस्था है।

वहीं प्रेमलक्षणा भक्ति वह अवस्था है, जिसमें साधक नवधा भक्ति के माध्यम से आगे बढ़ते हुए भगवान के प्रति गहरे प्रेम को प्राप्त करता है। इस अवस्था में भक्त का मन अपने इष्टदेव में पूरी तरह तन्मय होने लगता है।

महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि कर्मयोग साधना का मार्ग है, जबकि स्थितप्रज्ञ और भगवान के प्रेम को प्राप्त भक्त सिद्ध अवस्था को दर्शाते हैं। इसलिए इन तीनों को बिल्कुल एक जैसा नहीं कहा जा सकता।

वे यह भी जोर देकर कहते हैं कि केवल इन विषयों पर चर्चा करने से आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं होती। साधना को वास्तव में जीवन में अपनाना पड़ता है।

महाराज जी की सीख है कि निष्काम भाव से अपने कर्तव्य निभाएँ, भगवान का नामजप करें और पवित्र आचरण रखें। साधना को निरंतर मजबूत करने से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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