प्रश्न 1: महाराज जी,साधक को खान-पान और दिनचर्या में क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, साधक का खान-पान सात्त्विक होना चाहिए। भोजन में मांस-मछली जैसे अभक्ष्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए। जिस होटल में मांस बनता हो, वहाँ वैष्णव को भोजन नहीं करना चाहिए। यदि किसी कारणवश बाहर भोजन करना आवश्यक हो, तो ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ मांस न बनता हो और भोजन की पवित्रता का ध्यान रखा जाता हो।
महाराज जी बताते हैं कि भोजन करने से पहले कुछ क्षण रुककर भगवान का नाम लेना चाहिए और भोजन उन्हें अर्पित करना चाहिए। यदि कोई विशेष मंत्र नहीं आता, तो सरल भाव से भगवान से प्रार्थना करें कि वे इस भोजन को स्वीकार करें। भगवान का स्मरण करते हुए भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए।
वे यह भी समझाते हैं कि भोजन और संग, दोनों का साधना पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए सत्संग करते रहें, संतों का आश्रय लें और कुसंग से बचें। आज मोबाइल के माध्यम से भी संतों के सत्संग सुने जा सकते हैं, इसलिए मोबाइल का उपयोग गलत सामग्री देखने के बजाय आध्यात्मिक उन्नति के लिए करना चाहिए।
महाराज जी के अनुसार, किसी के प्रति अत्यधिक ममता न रखते हुए सभी में भगवान की भावना से व्यवहार करना चाहिए।
इस प्रकार साधक को सात्त्विक भोजन, भोजन की पवित्रता, भगवान का स्मरण, सत्संग और अच्छे आचरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। गृहस्थ जीवन और नौकरी के बीच भी इन सावधानियों का पालन करते हुए नामजप जारी रखा जा सकता है।
प्रश्न 2: आपने भगवान के दर्शन किए हैं, कृपया भगवान के रूप का वर्णन करें।
उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि भगवान का वास्तविक स्वरूप अनिर्वचनीय है। भगवान पंचमहाभूतों से बने साधारण शरीर वाले नहीं हैं, बल्कि उनका स्वरूप चिदानंदमय है। इसलिए प्रकृति से बनी वाणी या किसी चित्र के माध्यम से उनके वास्तविक स्वरूप का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि भगवान के रूप का वर्णन करने के लिए करोड़ों कल्पों तक भी प्रयास किया जाए, तो भी उनकी सुंदरता का पूरा वर्णन संभव नहीं है। भगवान के रूप को देखने वाले का अनुभव और उस अनुभव को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास, दोनों अलग बातें हैं।
वे समझाते हैं कि चित्रकार भगवान के स्वरूप की कल्पना करके चित्र बना सकता है, लेकिन केवल चित्र बना लेने से भगवान के वास्तविक दिव्य स्वरूप का पूर्ण परिचय नहीं हो जाता। भगवान के स्वरूप का सच्चा अनुभव साधक को स्वयं होने पर ही समझ में आता है।
महाराज जी के अनुसार, भगवान के नाम और उनके रूप का गहरा संबंध है। जब साधक श्रद्धापूर्वक राधा-राधा या कृष्ण-कृष्ण नाम का जप करता है, तो नाम के प्रभाव से उसके सामने भगवान के स्वरूप की झाँकी प्रकट हो सकती है। इसलिए केवल बाहरी चित्रों पर निर्भर रहने के बजाय भगवान के नाम का आश्रय लेना चाहिए।
इसके साथ भगवान की लीलाओं का वर्णन करने वाले शास्त्रों को पढ़ना और ध्यानपूर्वक सुनना भी आवश्यक है। इससे भगवान के प्रति रुचि और प्रेम बढ़ता है।
महाराज जी का मुख्य संदेश है कि भगवान के वास्तविक स्वरूप को शब्दों में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता। उनके नाम का निरंतर जप करें, उनकी लीलाओं का श्रवण करें और श्रद्धा के साथ भजन करते रहें।
प्रश्न 3: मैं अभिनय करता हूँ; अच्छे किरदार तो कर लेता हूँ, पर बुरा किरदार करने में बहुत कठिनाई होती है।
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि अभिनय और व्यक्तिगत जीवन को अलग-अलग समझना चाहिए। एक अभिनेता को जो किरदार दिया जाता है, उसे पूरी निष्ठा और कुशलता से निभाना होता है। यदि उसे नकारात्मक किरदार मिला है, तो अभिनय में उस किरदार को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना उसका काम है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने वास्तविक जीवन में भी वैसा बन जाए।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि भगवान के पार्षद जय-विजय ने भी अलग-अलग जन्मों में राक्षसों के रूप में नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं। उनकी भूमिका ऐसी थी कि देखने वालों को उनका व्यवहार वास्तविक लगता था, लेकिन उनका वास्तविक स्वरूप भगवान के प्रति समर्पित ही था।
इसी प्रकार अभिनेता को अपने किरदार में पूरी तरह उतरना चाहिए, ताकि दर्शकों को अभिनय स्वाभाविक और वास्तविक लगे। लेकिन उसे यह समझते रहना चाहिए कि वह केवल एक भूमिका निभा रहा है। भूमिका के कारण अपने वास्तविक जीवन के मूल्यों और आचरण को नहीं बदलना चाहिए।
महाराज जी का कहना है कि व्यक्ति का निजी जीवन सकारात्मक और धर्मयुक्त होना चाहिए। अभिनय में अच्छा या बुरा, जैसा भी किरदार मिले, उसे पूरी कुशलता से निभाना ही अभिनय की विशेषता है।
इसलिए यदि नकारात्मक किरदार निभाते समय मन में कठिनाई होती है, तो यह अंतर समझें कि पर्दे पर निभाया जाने वाला किरदार और वास्तविक जीवन का व्यक्तित्व एक नहीं हैं।
महाराज जी की सीख है कि अभिनय में अपने किरदार को पूरी तरह निभाएँ, लेकिन व्यक्तिगत जीवन को धर्मयुक्त और दोषरहित बनाए रखने का प्रयास करें।
प्रश्न 4: एक गृहिणी की भागवतिक दिनचर्या कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, एक गृहिणी की दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए जिसमें भगवान का नामजप भी चलता रहे और परिवार के प्रति उसके कर्तव्यों का भी ठीक से पालन हो।
महाराज जी बताते हैं कि प्रातःकाल उठकर भगवान को प्रणाम करना चाहिए और नामजप करते हुए अपने परिवार की आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए। यदि पति को नौकरी पर जाना है या बच्चों को स्कूल जाना है, तो उनकी व्यवस्था करना भी गृहिणी का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है।
वे समझाते हैं कि पति और बच्चों को समय पर भोजन देना, उनका टिफिन तैयार करना तथा परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी भगवान की सेवा की भावना से किया जा सकता है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि पूजा-पाठ के कारण परिवार के आवश्यक कार्य अधूरे रह जाएँ।
गृहिणी रसोई बनाते समय, घर की सफाई करते समय और बर्तन साफ करते समय भी राधा-राधा नाम का जप कर सकती है। इस प्रकार रोजमर्रा के कार्यों के साथ नामजप जारी रखा जा सकता है।
जब परिवार के सदस्य अपने कार्यों के लिए चले जाएँ, तब गृहिणी अपने ठाकुर जी की सेवा, श्रृंगार और पूजा कर सकती है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि भगवान केवल मंदिर की मूर्ति में ही नहीं, बल्कि परिवार के सभी सदस्यों में भी हैं। इसलिए सास-ससुर, पति, बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों के प्रति ऐसा व्यवहार होना चाहिए जिससे उन्हें अनावश्यक दुःख न पहुँचे।
हालाँकि, किसी के दोष को सुधारने के लिए उचित अनुशासन रखना कर्तव्य का हिस्सा हो सकता है।
इसलिए गृहिणी की उत्तम भागवतिक दिनचर्या वही है जिसमें नामजप, ठाकुर जी की सेवा, परिवार के प्रति कर्तव्य और सभी के साथ उचित व्यवहार का संतुलन बना रहे।
प्रश्न 5: महाराज जी, जब आपकी कुंडलिनी जाग्रत हुई थी, तो आपको कैसा अनुभव हुआ था?
उत्तर: पूज्य महाराज जी ने अपने अनुभव का वर्णन करते हुए बताया कि कुंडलिनी के उत्थान के समय शरीर में बहुत तीव्र हलचल और गर्मी का अनुभव हो सकता है। उन्होंने बताया कि उस अवस्था में शरीर की नस-नाड़ियों में कंपन जैसा अनुभव होता है और कभी-कभी शरीर आसन से ऊपर उठने जैसा भी प्रतीत हो सकता है।
लेकिन महाराज जी इस विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात समझाते हैं कि योग-साधना से प्राप्त होने वाली शक्तियाँ और भगवान के प्रति प्रेम, दोनों अलग-अलग बातें हैं। साधना के माध्यम से कुछ लोगों को विशेष योगिक अनुभव या सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन केवल इन अनुभवों को भगवान की प्राप्ति नहीं मान लेना चाहिए।
वे बताते हैं कि कुछ महापुरुष योग की सिद्धियों तक पहुँच जाते हैं, लेकिन भगवान के प्रति प्रेम की अवस्था तक नहीं पहुँच पाते। सिद्धियों से विशेष क्षमताएँ प्राप्त हो सकती हैं, परंतु भगवान के धाम की प्राप्ति के लिए प्रेम का महत्त्व है।
महाराज जी के अनुसार, योगिक शक्तियों के साथ अहंकार भी आ सकता है। साधक को यह भाव हो सकता है कि उसके पास विशेष शक्ति है या वह दूसरों से अधिक समर्थ है। इसके विपरीत, भगवान के प्रेममार्ग में साधक अपने आपको अयोग्य और भगवान का दास अनुभव करता है।
वे हनुमान जी का उदाहरण देते हैं, जिन्हें अपनी शक्ति का स्मरण जामवंत जी ने कराया था। इससे यह समझाया गया है कि वास्तविक भक्ति में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय भगवान के कार्य में लगे रहना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
महाराज जी का मुख्य संदेश है कि साधना का उद्देश्य केवल कुंडलिनी जागरण या सिद्धियाँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न करना और अपने इष्टदेव में तन्मय होना है।
प्रश्न 6: आपने बताया था कि संतजन अपने शिष्यों के कष्ट ले लेते हैं, तो क्या शिष्य भी गुरु के कष्ट ले सकते हैं?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि समर्थ गुरु अपने ऐसे शिष्य के कष्ट या प्रारब्ध की बाधाओं को दूर करने में सहायता कर सकते हैं, जो वास्तव में भगवत्प्राप्ति के लिए पूरी तन्मयता से साधना कर रहा हो। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि केवल गुरु से संबंध बना लेने या नाममात्र का शिष्य होने से हर प्रकार के कष्ट अपने आप दूर हो जाएँगे।
जब शिष्य का लक्ष्य भगवत्प्राप्ति हो और वह पूरी निष्ठा से भजन कर रहा हो, तब समर्थ गुरु उसकी आध्यात्मिक उन्नति में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए कृपा कर सकते हैं।
जब प्रश्न किया गया कि क्या शिष्य भी नामजप के बल से गुरु के रोग या कष्ट अपने ऊपर ले सकता है, तो महाराज जी ने स्पष्ट किया कि समर्थ गुरु और साधारण साधक की सामर्थ्य समान नहीं होती। यदि साधक अपनी क्षमता से अधिक भार उठाने का प्रयास करेगा, तो वह स्वयं कमजोर पड़ सकता है और उसका भजन भी छूट सकता है।
महाराज जी नामजप के नियमित अभ्यास पर विशेष जोर देते हैं। वे बताते हैं कि पहले वाचिक जप किया जाता है, फिर अभ्यास बढ़ने पर उपांशु जप की स्थिति आती है और धीरे-धीरे नाम मन में निरंतर चलने लगता है।
जब नामजप लंबे समय तक नियमित, निरंतर, श्रद्धा और प्रेम के साथ किया जाता है, तो उसका अभ्यास दृढ़ हो जाता है। साधक के मन में हर समय भगवान के नाम का स्मरण रहने लगता है।
महाराज जी की सीख है कि गुरु के कष्ट अपने ऊपर लेने की शक्ति प्राप्त करने की अपेक्षा निरंतर और निष्काम भाव से नामजप करना चाहिए। दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक किया गया भजन साधक की आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”