माला-1407:भगवान की कृपा होने पर वे सबसे दूर कर देते हैं, ऐसे में तो अकेलापन हो जाएगा? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1:महाराज जी,भगवान की कृपा होने पर वे सबसे दूर कर देते हैं, ऐसे में तो अकेलापन हो जाएगा?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह डर ही हमारी गलत धारणा है कि अगर भगवान की कृपा से संसार से दूरी हो गई तो हम अकेले हो जाएंगे। वास्तव में हम अभी भी अकेले ही हैं। जिन लोगों को हम अपना मान रहे हैं, वे हमारे साथ हमेशा रहने वाले नहीं हैं। पति, पत्नी, पुत्र, परिवार और दूसरे संबंध—सब अपने-अपने समय तक साथ हैं। कब कौन चला जाए, कब बिछड़ जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है।

लेकिन हमारे भीतर जो भगवान हैं, जो हमारे प्रीतम हैं, वे हर कदम और हर पल हमारे साथ हैं। फिर हमें अकेलेपन की चिंता क्यों करनी चाहिए? महाराज जी कहते हैं कि अगर भगवान का सानिध्य अनुभव होने लगे तो संसार के लोगों की कमी महसूस नहीं होती। बल्कि असली अकेलापन तो तब है जब हम परिवार के बीच रहते हुए भी भगवान से दूर हैं।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि भगवान जब किसी से उसका “सब कुछ” हर लेते हैं तो उसका अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि उसकी संपत्ति, परिवार या बाहरी चीजें छीन ली जाएँ। भगवान वास्तव में उसकी आसक्ति, राग और अहंकार को हरते हैं। जैसे अम्बरीष जी के पास बहुत बड़ा ऐश्वर्य था, लेकिन उन्हें अपने वैभव का अभिमान नहीं था। इसलिए बाहरी चीजें रहते हुए भी भीतर उनका भगवान से संबंध था। 1407

इसलिए केवल घर छोड़ देना या लोगों से दूर हो जाना ही वैराग्य नहीं है। कोई व्यक्ति घर में बैठा हो लेकिन भीतर उसका सारा मन संसार में ही लगा हो तो उसने क्या छोड़ा? और कोई गृहस्थ अपने कर्तव्य करते हुए भी भीतर भगवान को अपना माने, तो वह संत जैसा जीवन जी सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि जब भगवान से प्रेम बढ़ेगा तो संसार का साथ कम होने पर भी अकेलापन नहीं लगेगा। क्योंकि तब मनुष्य को पता चलेगा कि उसका वास्तविक साथी कौन है। भगवान के प्रेम का अनुभव होने के बाद बाहरी संग की कमी उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती।

प्रश्न 2: कार्यस्थल पर बहुत ज्यादा दोष-दर्शन होता है, जिससे नामजप छूटता है, क्या करूँ?

उत्तर:
महाराज जी इसका बहुत सरल उपाय बताते हैं। वे कहते हैं कि जिस तरह हम फिल्म देखते समय पर्दे पर होने वाली घटनाओं को वास्तविक जीवन का सच मानकर परेशान नहीं होते, उसी तरह संसार को भी एक नाटक या फिल्म की तरह देखना सीखना चाहिए।

फिल्म में कोई खलनायक होता है, कोई हीरो होता है, कोई अच्छा पात्र होता है और कोई नकारात्मक भूमिका निभाता है। हम जानते हैं कि यह एक फिल्म है, इसलिए हम पात्रों को देखकर मनोरंजन करते हैं। उसी प्रकार महाराज जी कहते हैं कि इस जगत को भी एक जगन्नाटक की तरह देखो। यहां अलग-अलग लोग अलग-अलग भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन भीतर वही परमात्मा है। 1407

जब हम बार-बार किसी व्यक्ति के दोष को देखने लगते हैं तो हमारा अपना मन भी उसी में उलझ जाता है। इसलिए कार्यस्थल पर किसी व्यक्ति के दोष दिखाई दें तो उसे पकड़कर बैठने के बजाय अपने भीतर नाम को पकड़ना है। महाराज जी कहते हैं कि दूसरों की तरफ देखने के बजाय अपने भीतर देखना ही परमार्थ है।

उन्होंने एक बहुत सुंदर बात कही—“जो दिल खोजू अपनो”। यानी दूसरे में दोष खोजने से पहले अपने मन को देखो। यदि हम दूसरों को देखते-देखते अपना नामजप खो देते हैं तो हमें समझना चाहिए कि साधना अभी और बढ़ाने की जरूरत है।

महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप और भजन थोड़ा और बढ़ाओ। जब भीतर भजन की गंभीरता बढ़ेगी तो बाहर के लोगों के व्यवहार का प्रभाव कम होने लगेगा। फिर व्यक्ति वही काम करते हुए भी अपने भीतर भगवान को याद रख सकता है।

इसलिए कार्यस्थल पर लोगों के दोष दिखें तो उनसे लड़ने या हर बात पर प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है। मन में यह भाव रखो कि यह भी भगवान के जगन्नाटक का एक पात्र है। अपना काम ईमानदारी से करो, लेकिन दूसरों के दोषों को अपने मन का विषय मत बनाओ।

धीरे-धीरे अभ्यास ऐसा बनाना है कि बाहर कितनी भी परिस्थितियाँ हों, भीतर नाम चलता रहे। यही अभ्यास दोष-दर्शन से बचाने में मदद करेगा।

प्रश्न 3: ज़्यादा आवाज़ या हल्ला होने पर मंत्र-जप में परेशानी होती है, ऐसे समय में क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा उपाय अभ्यास है। शुरुआत में शोर निश्चित रूप से परेशान करेगा, लेकिन हमें पहले ही यह मान लेना चाहिए कि शोर “विक्षेप” है। जैसे ही हमने उसे विक्षेप मान लिया, हमारा मन उसी के पीछे चला जाता है।

महाराज जी अपने अनुभव से बताते हैं कि गांव में विवाह आदि के समय बड़े-बड़े भोंपू बजते थे और उससे साधना में बहुत परेशानी होती थी। उन्होंने धीरे-धीरे अभ्यास किया। पहले भोजन करते समय विक्षेप दूर करने का अभ्यास किया, फिर बात करते समय सामने वाले के मुख पर नाम लिखने का अभ्यास किया। इसी तरह धीरे-धीरे भीतर नाम को मजबूत किया। 1407

महाराज जी कहते हैं कि हमें ऐसी स्थिति तक अभ्यास करना चाहिए कि बाहर कितना भी शोर हो, भीतर मंत्र चलता रहे। वे बताते हैं कि यदि नगाड़ा भी बजता रहे तो भी भीतर मंत्र चलता रह सकता है। लेकिन इसके लिए लगातार अभ्यास चाहिए।

जब शोर हो तो यह सोचकर परेशान मत हो कि “मेरा जप खराब हो गया।” इसके बजाय और मजबूत होकर एक-एक अक्षर मंत्र का चिंतन करो। यदि सुनने में परेशानी हो रही है तो मन में मंत्र को लिखते हुए चलो—जैसे “राधा, राधा।” बाहर जितना शोर हो, भीतर नाम को उतना ही स्पष्ट करने का प्रयास करो। 1407

महाराज जी एक बहुत सुंदर बात कहते हैं कि हर विघ्न को साधना बना लो। कोई भी विघ्न हमें परास्त न करे। बाहर बैंड बज रहा हो और भीतर भगवान का नाम चल रहा हो, तो धीरे-धीरे ऐसा अभ्यास हो सकता है कि बाहर की आवाज बहुत हल्की महसूस होने लगे।

यह अवस्था तुरंत नहीं आएगी। शुरुआत में परेशानी होगी, लेकिन अभ्यास से भीतर का नाम मजबूत होता जाएगा। इसलिए शोर को अपनी साधना रोकने का कारण न बनाकर उसी को साधना का अभ्यास बना लेना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार जब यह अभ्यास पक्का हो जाता है तो बाहर कितनी भी आवाज हो, भीतर मंत्र की धारा चलती रहती है। यही अभ्यास आगे चलकर नाम-जप में स्थिरता देता है।

प्रश्न 4: धर्म और कर्म के बीच निर्णय नहीं ले पाता, क्या करूँ?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि धर्म और कर्म को दो अलग-अलग चीजों की तरह नहीं देखना चाहिए। कर्म दो प्रकार के होते हैं—एक निषिद्ध कर्म, जिन्हें नहीं करना चाहिए, और दूसरे शुभ कर्म, जिन्हें करना चाहिए। जो धर्म के अनुसार करने योग्य है, वही हमारा कर्म है और जो धर्म के विरुद्ध है, उसे छोड़ देना चाहिए। 1407

महाराज जी बहुत सरल उदाहरण देते हैं। अपनी पत्नी के प्रति धर्मपूर्वक रहना हमारा कर्तव्य है, लेकिन दूसरे की पत्नी के प्रति गलत भावना रखना अधर्म है। इसी तरह जीवन के हर क्षेत्र में देखना चाहिए कि क्या करना उचित है और क्या नहीं।

कई बार समस्या तब आती है जब हमारे सामने ऐसा निर्णय होता है जिससे किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान हो सकता है। यहां महाराज जी कहते हैं कि केवल यह देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए कि सामने वाले को तत्काल नुकसान हो रहा है या नहीं। यह भी देखना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं वह वास्तव में धर्मसम्मत कर्तव्य है या नहीं।

उन्होंने प्रबंधक का उदाहरण देकर समझाया कि अगर कोई कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा है तो अधिकारी का कर्तव्य है कि पहले उसे समझाए, फिर आवश्यकता हो तो कड़ी चेतावनी दे और अंत में भी सुधार न हो तो अपने अधिकार का प्रयोग करे। लेकिन किसी को बिना अवसर दिए सीधे नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है। 1407

अर्थात निर्णय लेते समय केवल भावना से नहीं, बल्कि अपने धर्म और कर्तव्य को देखकर चलना है। यदि सामने वाला गलती कर रहा है तो उसे सुधारने का अवसर देना भी धर्म का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि वह बार-बार समझाने और चेतावनी देने के बाद भी गलत करता रहे और संस्था या दूसरों को नुकसान पहुंचाता रहे, तब अपने अधिकार का प्रयोग करना भी कर्तव्य हो सकता है।

महाराज जी के अनुसार धर्मपूर्वक किया गया कर्म कल्याण करता है और अधर्मपूर्वक किया गया कर्म पतन की ओर ले जाता है। इसलिए धर्म और कर्म को अलग-अलग समझकर उलझने के बजाय यह देखना चाहिए कि इस परिस्थिति में धर्मसम्मत कर्तव्य क्या है।

प्रश्न 5: धर्म पर चलने से अहंकार आ जाता है कि मैं दूसरों से ज़्यादा धर्मावलंबी हूँ। इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी बिल्कुल स्पष्ट कहते हैं कि अगर मन में यह भावना आ गई कि “मैं दूसरों से ज्यादा धर्मात्मा हूं”, तो धर्म का लाभ ही नहीं मिला। क्योंकि धर्म का उद्देश्य अहंकार बढ़ाना नहीं, बल्कि अहंकार को समाप्त करना है। 1407

इससे बचने का उपाय महाराज जी बताते हैं कि दूसरे व्यक्ति में भी भगवान को देखो। जब सामने वाले को केवल एक साधारण व्यक्ति मानने के बजाय उसके भीतर परमात्मा का भाव आएगा तो फिर अपने श्रेष्ठ होने का अभिमान कैसे रहेगा?

महाराज जी समझाते हैं कि हमें अपने को सेवक मानना है। जब संसार में चराचर को भगवान का रूप मानकर हम स्वयं को उनका सेवक समझेंगे, तब “मैं सबसे श्रेष्ठ हूं” वाली भावना टिक नहीं पाएगी। धर्म के पालन का परिणाम हृदय में दैन्य भाव, विनम्रता और सहनशीलता के रूप में आना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि अपने को तिनके से भी छोटा समझना, वृक्ष की तरह सहनशील होना, दूसरों को मान देना और स्वयं मान की इच्छा न रखना—ये भगवत् मार्ग के लक्षण हैं। अगर इसके विपरीत हमें लगे कि “मैं सबसे श्रेष्ठ हूं”, तो समझना चाहिए कि हम आध्यात्मिक रूप से गिर रहे हैं। 1407

एक और बहुत महत्वपूर्ण बात महाराज जी बताते हैं—हमारे अंदर जो भी अच्छाई या धर्म है, वह हमारी अपनी कमाई नहीं है। वह गुरु, आचार्य और महापुरुषों की कृपा से मिला है। फिर उसका अहंकार किस बात का?

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि यदि भगवान ने हमें ऐसी योग्यता दी है जिससे हम किसी दूसरे को सुख दे सकें तो हमें गर्व नहीं, बल्कि भगवान को धन्यवाद देना चाहिए। यह उनकी दी हुई वस्तु है और उसी को हम उनके काम में लगा रहे हैं। 1407

इसलिए धर्म का पालन करते समय अपने मन को बार-बार देखना चाहिए। यदि किसी दूसरे को देखकर लगे कि “मैं इससे अच्छा हूं”, तो उसी समय भीतर याद करना है—“मैं सेवक हूं, मेरे अंदर जो कुछ है वह भगवान और गुरु की कृपा है।” यही भावना धर्म को अहंकार बनने से बचाती है।

प्रश्न 6: संतोष और संयम की रेखा क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि संतोष कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाहर से पकड़कर रखा जाए, बल्कि यह एक स्थिति है। संतोष तब है जब मन में किसी से कुछ पाने की चाह पैदा न हो और जैसी परिस्थिति में भगवान ने रखा है, उसी में मन प्रसन्न रहे।

महाराज जी संतोष को इस भाव से समझाते हैं कि जो मिला है, जैसा मिला है और जिस परिस्थिति में भगवान ने रखा है, उसमें संतुष्ट रहना। मन बार-बार यह न चाहे कि मुझे किसी दूसरे से कुछ चाहिए। “यथा लाभ संतोष सदा”—जितना प्राप्त है उसमें संतोष रखना और किसी के सामने चाह लेकर न जाना संतोष की स्थिति है। 1407

महाराज जी कहते हैं कि यदि मन में यह भाव आ जाए—“जैसे मुझे भगवान रख रहे हैं, उतने में मैं संतुष्ट हूं”, तो यही संतोष है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने कर्तव्य या प्रयास को छोड़ दे। बल्कि भीतर से किसी वस्तु या व्यक्ति पर अपनी चाह को टिकाकर नहीं रखना है।

वहीं संयम की सीमा यह है कि धर्म के विरुद्ध कोई भोग नहीं भोगना। परिस्थिति कैसी भी हो, चाहे उसके लिए कितनी भी कठिनाई क्यों न सहनी पड़े, धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए।

महाराज जी ने सदन कसाई जी का उदाहरण देकर संयम की गंभीरता समझाई। वे कठिन परिस्थिति में भी धर्म के विरुद्ध जाने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने मृत्यु को स्वीकार करना बेहतर समझा, लेकिन धर्मविरुद्ध आचरण स्वीकार नहीं किया। बाद में उन्हें कष्ट सहना पड़ा, लेकिन उनके संयम की परीक्षा में वे सफल हुए। 1407

इसलिए संतोष का अर्थ है—किसी से चाह न रखना और भगवान ने जैसी परिस्थिति दी है उसमें प्रसन्न रहना।

और संयम का अर्थ है—किसी भी परिस्थिति में धर्म के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा पूरी न करना।

महाराज जी के अनुसार जब व्यक्ति इन दोनों को जीवन में उतारता है तो उसका संतोष और संयम सफल माना जाता है। चाहे परिस्थिति कठिन हो, मनुष्य को धर्म की सीमा नहीं छोड़नी चाहिए।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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