माला-1298: “श्रीजी, मेरी ये इच्छा पूरी मत करना…” भक्त के मन में ऐसा भाव क्यों आता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, श्रीजी से कुछ मांगने का मन बनता है, लेकिन मांगने के बाद उसे वापस लेने का भाव क्यों आता है?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार यह स्थिति साधक के भीतर एक साथ चल रहे दो भावों का परिणाम है। एक ओर देहभाव है, जिसके कारण मनुष्य अपनी आवश्यकताओं, दुखों और इच्छाओं को लेकर भगवान से कुछ मांगना चाहता है। दूसरी ओर प्रेम का भाव है, जो कहता है कि यदि मांगी हुई वस्तु भगवान से दूर कर दे, तो ऐसी प्राप्ति का कोई मूल्य नहीं है।

जब साधक भगवान को अपना मानने लगता है, तब उसके भीतर यह भावना जागती है कि जो भी परिस्थिति भगवान ने दी है, वही उसके लिए सर्वोत्तम है। इसलिए मांगने के बाद मन कहता है कि प्रभु, यदि यह मेरे कल्याण में न हो तो इसे पूरा मत करना। महाराज जी बताते हैं कि भगवान को हमारी आवश्यकताओं का हमसे अधिक ज्ञान है। जैसे माता अपने बच्चे की जरूरत समझती है, वैसे ही भगवान भी जानते हैं कि कब क्या देना उचित है। इसलिए धीरे-धीरे साधक को मांग छोड़कर भगवान की इच्छा में संतोष करना सीखना चाहिए।


प्रश्न 2: मेरा मन बहुत अशांत रहता है, चित्त स्थिर नहीं रहता और हर समय किसी अनिष्ट की आशंका बनी रहती है। इसका क्या उपाय है?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि चिंता, भय, शोक और अनिष्ट की आशंका का मूल कारण भगवान से विमुखता और पापजन्य कर्म हैं। जब मन भगवान के नाम, भजन और सत्संग से दूर हो जाता है, तब वह संसार, वासनाओं और नकारात्मक चिंतन में उलझ जाता है। यही स्थिति आगे चलकर भय और अशांति का कारण बनती है।

महाराज जी कहते हैं कि किसी टोने-टोटके या बाहरी उपाय से यह समस्या दूर नहीं होगी। इसका वास्तविक समाधान भगवान का नाम जप, सत्संग और शुद्ध आचरण है। जब साधक भगवान पर भरोसा करना सीखता है और अपने जीवन को धर्म के अनुसार ढालता है, तब उसका भय कम होने लगता है। भगवान की शरण में रहने वाला व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका रक्षक स्वयं परमात्मा है। इस विश्वास के साथ चित्त धीरे-धीरे शांत होने लगता है और अनिष्ट की कल्पनाएं समाप्त होने लगती हैं।


प्रश्न 3: क्या केवल नाम जप और सत्संग से चिंता, भय और मानसिक अशांति से मुक्ति मिल सकती है?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार चिंता, भय, शोक और मानसिक अशांति का स्थायी समाधान अध्यात्म में ही है। संसार की वस्तुएं, धन या सुविधाएं कुछ समय के लिए मन को बहला सकती हैं, लेकिन भीतर के भय को समाप्त नहीं कर सकतीं। क्योंकि मनुष्य जानता है कि एक दिन सब कुछ छूट जाने वाला है।

नाम जप और सत्संग मन को भगवान से जोड़ते हैं। जब मन भगवान के नाम में लगने लगता है, तब धीरे-धीरे पुराने पाप संस्कार कमजोर होने लगते हैं। साधक को यह अनुभव होने लगता है कि उसके जीवन का संचालन भगवान कर रहे हैं। यह भरोसा ही मानसिक शांति का आधार बनता है।

महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि यदि चित्त भगवान में लग जाए, तो भय और चिंता टिक नहीं सकती। इसलिए केवल समस्या के बारे में सोचते रहने से कुछ नहीं होगा। निरंतर नाम जप, भगवत चिंतन और सत्संग के माध्यम से मन को भगवान में लगाना ही वास्तविक उपाय है।


प्रश्न 4: क्या भगवान की कृपा सब पर समान रूप से होती है?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं कि भगवान की कृपा किसी विशेष व्यक्ति तक सीमित नहीं है। भगवान सभी जीवों पर समान रूप से दया करते हैं। उन्होंने सबको बुद्धि, वाणी, नेत्र, हाथ और जीवन दिया है। अंतर केवल इस बात का है कि मनुष्य इन शक्तियों का उपयोग कैसे करता है।

यदि कोई व्यक्ति अपनी वाणी से भगवान का नाम लेता है, अच्छे कर्म करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है, तो उसे भगवान की कृपा का अनुभव अधिक होता है। वहीं यदि कोई व्यक्ति गलत आचरण में जीवन बिताता है, तो उसे कृपा का अनुभव नहीं हो पाता। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान की कृपा नहीं है, बल्कि व्यक्ति स्वयं उससे दूर हो गया है।

महाराज जी बताते हैं कि जैसे माता-पिता का प्रेम सभी बच्चों के लिए समान होता है, वैसे ही भगवान का प्रेम भी सबके लिए समान है। इसलिए यह कहना कि भगवान केवल कुछ लोगों पर कृपा करते हैं, सही नहीं है। कृपा सब पर है, अनुभव करने की पात्रता अलग-अलग है।


प्रश्न 5: यदि भगवान हमारे भीतर हैं, तो हमें अपने निर्णयों और कार्यों पर संदेह क्यों होता है?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार भगवान हमारे भीतर अवश्य विराजमान हैं, लेकिन उनके अनुभव के लिए साधना आवश्यक है। केवल यह जान लेना कि भगवान भीतर हैं, पर्याप्त नहीं है। जब तक मन और बुद्धि शुद्ध नहीं होती, तब तक संशय बना रहता है।

महाराज जी दूध और घी का उदाहरण देते हैं। घी दूध में मौजूद होता है, लेकिन उचित प्रक्रिया के बिना दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार परमात्मा हमारे भीतर हैं, लेकिन नाम जप, भजन, संयम और साधना के बिना उनका अनुभव नहीं हो सकता। इसलिए मनुष्य अपने निर्णयों में उलझा रहता है और उसे बार-बार संदेह होता है।

जब साधना के द्वारा हृदय शुद्ध होता है, तब भगवान का अनुभव होने लगता है। उस समय संशय धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है और साधक के भीतर विश्वास उत्पन्न होता है। इसलिए संशय का कारण भगवान की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि साधना की कमी है।

प्रश्न 6: भगवान हमारे भीतर हैं, इसका अनुभव कैसे हो? इस संशय को कैसे दूर किया जाए?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि भगवान हमारे भीतर ही विराजमान हैं, लेकिन उनका अनुभव केवल तर्क या कल्पना से नहीं होता। इसके लिए साधना की आवश्यकता होती है। जब तक मनुष्य भोगों, वासनाओं और देहाभिमान में उलझा रहता है, तब तक भगवान का अनुभव नहीं हो पाता और संशय बना रहता है।

महाराज जी कहते हैं कि जैसे दूध में घी छिपा रहता है और उचित प्रक्रिया के बाद ही प्रकट होता है, वैसे ही परमात्मा का अनुभव भी भजन, नाम जप, सत्संग और संयम से होता है। साधक जब निरंतर भगवान का स्मरण करता है, तब उसका हृदय पवित्र होने लगता है। हृदय की पवित्रता बढ़ने पर संशय अपने आप समाप्त होने लगता है।

भगवान के अनुभव के लिए केवल जानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भगवान को पाने की तीव्र चाह भी आवश्यक है। जब साधक का मन भगवान के लिए व्याकुल होता है, तब भगवान स्वयं उसके अनुभव में आने लगते हैं।


प्रश्न 7: सेवा में निस्वार्थ भाव कैसे उत्पन्न हो सकता है?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार सेवा में निस्वार्थ भाव तभी आता है जब सामने वाले में भगवान का भाव दिखाई देने लगे। जब तक हम सेवा को अपने पुण्य, सम्मान या प्रसिद्धि से जोड़कर देखते हैं, तब तक उसमें स्वार्थ बना रहता है। लेकिन जब यह समझ में आ जाता है कि सेवा वास्तव में भगवान की ही सेवा है, तब निष्काम भाव उत्पन्न होने लगता है।

महाराज जी समझाते हैं कि जैसे कोई व्यक्ति अपने पुत्र, माता-पिता या प्रियजन की सेवा करते समय किसी फल की अपेक्षा नहीं रखता, वैसे ही यदि संसार में भगवान का भाव जाग जाए तो सेवा स्वतः निस्वार्थ हो जाती है। उस समय सेवा बोझ नहीं लगती, बल्कि प्रेम का स्वाभाविक परिणाम बन जाती है।

सच्ची सेवा वही है जिसमें स्वयं को केवल निमित्त माना जाए। भगवान ने जो कुछ दिया है, उसी को भगवान के कार्य में लगा देना ही निस्वार्थ सेवा का आधार है। यही भाव धीरे-धीरे साधक को निष्कामता की ओर ले जाता है।


प्रश्न 8: “नेकी कर दरिया में डाल” वाली स्थिति कैसे प्राप्त होती है?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं कि जब तक अहंकार बना रहता है, तब तक व्यक्ति अपने अच्छे कार्यों का प्रचार चाहता है। उसे लगता है कि लोगों को पता चलना चाहिए कि उसने कितना दान किया, कितनी सेवा की या कितना पुण्य कमाया। यह अहंकार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।

लेकिन जब साधक को यह समझ आने लगती है कि वास्तविक देने वाला भगवान है और वह केवल एक माध्यम है, तब यह भावना बदल जाती है। महाराज जी रहीम दास जी का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कहा कि देने वाला कोई और है और लोग भ्रमवश हमें दाता मान लेते हैं।

निष्काम सेवा का भाव तब आता है जब व्यक्ति अपने कार्यों का श्रेय स्वयं को देना छोड़ देता है। उसे लगता है कि जो कुछ मिला है, वह भगवान का है और जो कुछ दिया जा रहा है, वह भी भगवान का ही है। इस समझ के साथ सेवा करने पर प्रसिद्धि की इच्छा धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।


प्रश्न 9: परिवार में रहकर विरक्त जीवन जीने वाले साधकों को किन सावधानियों का पालन करना चाहिए?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार परिवार में रहते हुए साधना करने वाले अविवाहित साधकों को अत्यंत सावधानी से जीवन व्यतीत करना चाहिए। विशेष रूप से ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए अपने शयन, आसन और भोजन के पात्र अलग रखने चाहिए। क्योंकि संगति और संस्कारों का मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

महाराज जी बताते हैं कि जिस स्थान पर भोगप्रधान जीवन जीने वाले लोग रहते हैं, वहां के संस्कार भी वातावरण में उपस्थित रहते हैं। इसलिए साधक को अपनी दिनचर्या, रहन-सहन और संपर्कों के प्रति सजग रहना चाहिए। शुद्धता, संयम और नियमित स्नान जैसी बातें भी साधना में सहायक हैं।

इसके साथ ही ऐसे वार्तालाप, दृश्य और संगति से बचना चाहिए जो मन को विषयों की ओर ले जाएं। परिवार में रहते हुए भी यदि साधक अपनी मर्यादाओं का पालन करे और भगवान के नाम में लगा रहे, तो उसकी साधना सुरक्षित रह सकती है।


प्रश्न 10: गृहस्थ जीवन में रहते हुए आजीवन ब्रह्मचर्य की रक्षा कैसे की जा सकती है?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि गृहस्थ वातावरण में ब्रह्मचर्य का पालन कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए अत्यधिक संयम, सतर्कता और शुद्ध जीवन आवश्यक है। साधक को अपने भोजन, संगति, शयन और विचारों की रक्षा करनी चाहिए।

महाराज जी विशेष रूप से कहते हैं कि ऐसे लोगों की संगति से बचना चाहिए जो विषय-विकारों की बातें करते हों। आंखों और मन को भी अनुशासित रखना आवश्यक है। यदि कोई ऐसा दृश्य सामने आ जाए जो मन को विचलित करे, तो उसे बार-बार नहीं देखना चाहिए।

इसके साथ ही नियमित नाम जप, स्नान, सात्विक भोजन और भगवान का स्मरण ब्रह्मचर्य को मजबूत बनाते हैं। महाराज जी के अनुसार ब्रह्मचर्य केवल शरीर का विषय नहीं, बल्कि मन और चिंतन की पवित्रता का भी विषय है। जो साधक इन बातों का ध्यान रखता है, वह गृहस्थ वातावरण में भी अपनी साधना और ब्रह्मचर्य की रक्षा कर सकता है।

प्रश्न 11: यदि हम अपने पिछले जन्मों को नहीं जानते, तो हमें प्रारब्ध कर्मों का फल इस जन्म में क्यों भोगना पड़ता है?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार कर्म का नियम हमारी स्मृति पर नहीं, बल्कि हमारे कर्मों पर आधारित है। यदि कोई व्यक्ति किसी कर्म को करने के बाद उसे भूल जाए, तो इससे उसके कर्म का फल समाप्त नहीं हो जाता। उसी प्रकार पिछले जन्मों के कर्मों का प्रभाव भी जीव के साथ बना रहता है, चाहे उसे वे याद हों या नहीं।

महाराज जी समझाते हैं कि हमें इसी जन्म की अनेक बातें याद नहीं रहतीं। मां के गर्भ में बिताया समय भी याद नहीं है, लेकिन उसका अस्तित्व तो था। इसी प्रकार पिछले जन्मों के कर्म भी वास्तविक हैं और उनका फल भोगना पड़ता है। शरीर बदल जाता है, लेकिन जीवात्मा वही रहती है।

इसलिए प्रारब्ध को अन्याय नहीं समझना चाहिए। यह हमारे ही पूर्व कर्मों का परिणाम है। महाराज जी बताते हैं कि नाम जप और भगवान की भक्ति से संचित कर्मों का प्रभाव कम हो सकता है और जीवन मंगलमय बन सकता है, लेकिन प्रारब्ध का कुछ भाग भोगना ही पड़ता है।


प्रश्न 12: अहंकार को मिटाने का प्रयास करने के बाद भी बार-बार असफलता क्यों मिलती है?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं कि अहंकार का मूल कारण अज्ञान है। जब मनुष्य यह मान लेता है कि जो कुछ उसने प्राप्त किया है, वह उसकी अपनी क्षमता का परिणाम है, तब अहंकार उत्पन्न होता है। लेकिन जब वह गहराई से विचार करता है, तो उसे दिखाई देता है कि शरीर, बुद्धि, शक्ति, अवसर और सफलता सब भगवान की कृपा से मिले हैं।

महाराज जी समझाते हैं कि जिस बात पर हम अहंकार करते हैं, वह भी वास्तव में हमारी अपनी नहीं है। यदि भगवान बुद्धि न दें तो मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। इसलिए अहंकार का उपचार विवेक है। बार-बार यह विचार करना चाहिए कि सब कुछ भगवान का दिया हुआ है और हम केवल निमित्त हैं।

अहंकार तुरंत समाप्त नहीं होता। लेकिन जब साधक भगवान की कृपा को हर कार्य में देखने लगता है, तब अहंकार कमजोर होने लगता है। नाम जप और भगवत चिंतन इस प्रक्रिया को और भी सरल बना देते हैं।


प्रश्न 13: “मैं पुरुष हूँ” या “मैं स्त्री हूँ” यह देहाभिमान है, इसे कैसे समझें?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार स्त्री या पुरुष होना आत्मा की वास्तविक पहचान नहीं है। यह केवल शरीर की एक अस्थायी स्थिति है। आत्मा न स्त्री है और न पुरुष। शरीर बदलता रहता है, लेकिन जीवात्मा वही रहती है।

महाराज जी बताते हैं कि यह शरीर कुछ वर्षों के लिए मिला हुआ एक वस्त्र है। जन्म से पहले यह पहचान नहीं थी और मृत्यु के बाद भी नहीं रहेगी। फिर भी मनुष्य अपने को केवल शरीर मान लेता है और यही देहाभिमान बन जाता है।

जब हम स्वयं को केवल शरीर समझते हैं, तब काम, क्रोध, लोभ, मोह और अनेक वासनाएं उत्पन्न होती हैं। लेकिन जब साधक भगवान के नाम और सत्संग के द्वारा यह समझने लगता है कि उसका वास्तविक स्वरूप आत्मा है, तब देहाभिमान कमजोर होने लगता है। यही समझ आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


प्रश्न 14: क्या भगवान की शरण में जाने के लिए पहले देहाभिमान समाप्त करना आवश्यक है?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं कि भगवान की शरण में जाने के लिए पूर्ण रूप से देहाभिमान समाप्त होना आवश्यक नहीं है। यदि ऐसा होता, तो अधिकांश लोग कभी भगवान की शरण में जा ही नहीं पाते। भगवान की कृपा इतनी महान है कि वे साधक को उसकी वर्तमान स्थिति में भी स्वीकार कर लेते हैं।

महाराज जी बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने दोषों, वासनाओं और देहाभिमान सहित भी सच्चे मन से भगवान की शरण में चला जाए, तो भगवान स्वयं उसे शुद्ध करने का कार्य करते हैं। साधक का काम केवल समर्पण करना है।

इसलिए बार-बार अपने दोषों को देखकर निराश नहीं होना चाहिए। भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हम जैसे हैं, वैसे ही आपके हैं। आप हमें अपने योग्य बना लीजिए। ऐसा शरणागति भाव साधक को धीरे-धीरे देहाभिमान से ऊपर उठाने लगता है और अंततः भगवत प्राप्ति की ओर ले जाता है।


प्रश्न 15: क्या मन को सच्चा मित्र बनाया जा सकता है, या वह हमेशा धोखा देने वाला ही रहेगा?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार मन को मित्र बनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए निरंतर साधना आवश्यक है। यदि मन को मित्र बनाना संभव न होता, तो कोई भी महात्मा भगवत प्राप्ति नहीं कर पाता। मन स्वभाव से इंद्रियों और भोगों की ओर भागता है, इसलिए प्रारंभ में वह साधक को धोखा देता हुआ प्रतीत होता है।

महाराज जी पानी के प्रवाह का उदाहरण देते हैं। जैसे पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, वैसे ही मन भी विषयों की ओर जाता है। लेकिन उचित साधन और प्रयास से पानी को ऊपर भी पहुंचाया जा सकता है। इसी प्रकार नाम जप और मंत्र साधना मन को भगवान की ओर मोड़ सकते हैं।

जब मन की बात मानकर जीवन चलाया जाता है, तब वह शत्रु बन जाता है। लेकिन जब मन को भगवान के नाम में लगाया जाता है और उसे अनुशासन में रखा जाता है, तब वही मन साधक का सबसे बड़ा मित्र बन जाता है।

प्रश्न 16: मन को भोगों और इंद्रिय विषयों से हटाकर भगवान की ओर कैसे लगाया जाए?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति इंद्रियों और भोगों की ओर भागने की है। जैसे पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, वैसे ही मन भी विषयों की ओर आकर्षित होता है। इसलिए केवल इच्छा करने से मन भगवान में नहीं लगता, उसके लिए साधना की आवश्यकता होती है।

महाराज जी बताते हैं कि मन को ऊपर उठाने का साधन नाम जप और मंत्र है। जब साधक बार-बार भगवान का स्मरण करता है, तब धीरे-धीरे मन की दिशा बदलने लगती है। प्रारंभ में मन बार-बार भटकता है, लेकिन निरंतर अभ्यास से वह भगवान के नाम में टिकना सीख जाता है।

मन को भोगों से हटाने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति रुचि बढ़ाना है। जितना भगवान का नाम प्रिय लगेगा, उतना ही भोगों का आकर्षण कम होगा। इसलिए निरंतर नाम जप, सत्संग और भगवान का चिंतन ही मन को परमात्मा की ओर ले जाने का सबसे प्रभावी मार्ग है।


प्रश्न 17: मन बार-बार भोगों की ओर खींचता है और गलत आचरण की प्रेरणा देता है। इससे बचने का उपाय क्या है?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं कि मन पहले किसी भोग का आकर्षक चित्र प्रस्तुत करता है और फिर मनुष्य को उसके पीछे चलने के लिए प्रेरित करता है। वह सुख का लालच देता है और व्यक्ति को विश्वास दिलाता है कि यही करने में आनंद मिलेगा। यदि साधक उस समय सावधान नहीं रहता, तो वह मन के पीछे चल पड़ता है।

इससे बचने का उपाय यह है कि जैसे ही मन किसी अनुचित विचार या भोग को सामने लाए, उसी समय भगवान के नाम का आश्रय लिया जाए। महाराज जी बताते हैं कि पहली अवस्था में ही उस विचार को काट देना चाहिए। यदि उस पर विचार करते रहे, तो मन धीरे-धीरे उसे मजबूत कर देगा।

नाम जप मन की चालों को कमजोर करता है। साधक को यह समझना चाहिए कि मन का हर आकर्षण वास्तविक सुख नहीं देता। इसलिए भगवान के नाम में दृढ़ रहकर मन की प्रेरणाओं को अस्वीकार करना ही सुरक्षित मार्ग है।


प्रश्न 18: मन को वश में करने के लिए कठोरता अपनानी चाहिए या प्रेमपूर्वक समझाना चाहिए?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार मन को न तो केवल कठोरता से वश में किया जा सकता है और न ही केवल नरमी से। दोनों का संतुलित प्रयोग आवश्यक है। जहां प्रेम से समझाने की आवश्यकता हो, वहां प्रेम से काम लेना चाहिए और जहां डांटने की आवश्यकता हो, वहां दृढ़ता भी दिखानी चाहिए।

मन बहुत पुरानी आदतों का गुलाम है। यदि हर बार उसकी बात मान ली जाए, तो वह और अधिक शक्तिशाली हो जाता है। दूसरी ओर यदि केवल दबाव डाला जाए, तो भी संघर्ष बढ़ सकता है। इसलिए साधक को विवेक के साथ काम लेना चाहिए।

महाराज जी बताते हैं कि नाम जप करते हुए मन को बार-बार सही दिशा में लाना चाहिए। जब वह भटकता है, तो उसे समझाना चाहिए कि यह मार्ग उचित नहीं है। धीरे-धीरे यह अभ्यास मन को नियंत्रित कर देता है। समय के साथ वही मन साधक का सहयोगी बनने लगता है।


प्रश्न 19: नाम जप शुरू तो हो जाता है, लेकिन बीच-बीच में टूट जाता है। नाम में निरंतरता और रुचि कैसे बढ़े?

उत्तर:

महाराज जी के अनुसार नाम जप के छूटने का मुख्य कारण भगवान के नाम के प्रति पर्याप्त महत्त्व-बुद्धि का न होना है। जब कोई सांसारिक कार्य, व्यक्ति या विषय अधिक महत्वपूर्ण लगने लगता है, तब नाम पीछे छूट जाता है।

निरंतरता बढ़ाने के लिए साधक को बार-बार भगवान के नाम की महिमा पर विचार करना चाहिए। जितना नाम का महत्व हृदय में बढ़ेगा, उतना ही उसका स्मरण स्वाभाविक होने लगेगा। महाराज जी कहते हैं कि नाम को जीवन का सबसे बड़ा धन मानना चाहिए।

नाम जप को केवल नियम न समझकर अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए। जब साधक को यह अनुभव होने लगता है कि भगवान का नाम ही उसका वास्तविक सहारा है, तब जप में रुचि और स्थिरता दोनों बढ़ने लगती हैं। धीरे-धीरे नाम जीवन के प्रत्येक कार्य के साथ जुड़ जाता है।


प्रश्न 20: भगवान का भजन बार-बार क्यों छूट जाता है, जबकि संसार की बातें तुरंत मन को आकर्षित कर लेती हैं?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि जहां मनुष्य का महत्व और प्रेम होता है, वहीं उसका मन बार-बार जाता है। यदि संसार अधिक महत्वपूर्ण लगता है, तो मन उसी की ओर भागेगा। यदि भगवान अधिक प्रिय लगने लगें, तो भजन स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा।

भजन इसलिए छूटता है क्योंकि मन अभी भी संसार के सुखों में अधिक मूल्य देखता है। कोई व्यक्ति, कार्य, संबंध या लाभ सामने आते ही मन उसका अनुसरण करने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भजन असंभव है, बल्कि यह कि अभी भगवान के प्रति महत्व-बुद्धि पर्याप्त मजबूत नहीं हुई है।

महाराज जी के अनुसार जब साधक भगवान के नाम को सर्वोच्च धन मानने लगता है, तब संसार का आकर्षण कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए भजन को बढ़ाने का उपाय संसार से लड़ना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा को बढ़ाना है।


प्रश्न 21: भगवान के नाम और भजन के प्रति महत्त्व-बुद्धि कैसे विकसित हो?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं कि जिस वस्तु को मनुष्य सबसे अधिक मूल्यवान मानता है, उसका चिंतन अपने आप होता रहता है। इसलिए भगवान के नाम के प्रति महत्त्व-बुद्धि विकसित करने के लिए नाम की वास्तविक महिमा को समझना आवश्यक है।

जब साधक बार-बार सत्संग सुनता है, भगवान की कृपा का अनुभव करता है और नाम जप से मिलने वाली शांति को पहचानता है, तब उसके भीतर नाम के प्रति सम्मान बढ़ता है। धीरे-धीरे वह समझने लगता है कि संसार की वस्तुएं क्षणिक हैं, जबकि भगवान का नाम स्थायी सहारा है।

महाराज जी रसखान और संतों के उदाहरण देकर बताते हैं कि जैसे लोभी का मन धन में लगा रहता है, वैसे ही साधक का मन भगवान के नाम में लग सकता है। जब यह स्थिति आती है, तब भजन बोझ नहीं रहता, बल्कि जीवन का स्वाभाविक आनंद बन जाता है। यही महत्त्व-बुद्धि नाम को निरंतर बनाए रखने का आधार है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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