माला-1195:क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: गुरु की अंग सेवा की इच्छा — स्वार्थ या विशुद्ध प्रीति? उत्तर:महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि संसार की प्रीति और गुरु-इष्ट की प्रीति में अंतर है। संसार में जो प्रेम है, उसमें राग, आसक्ति और स्वार्थ मिला होता है। लेकिन गुरु और इष्ट के प्रति जो भाव है, वह परमार्थ स्वरूप है।

माला-1194:क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है? फिर उसे करना क्या है? उत्तर:महाराज जी बहुत स्पष्ट कहते हैं — आत्मा को कुछ पाना नहीं है। आत्मा स्वयं पूर्ण है, निर्विकार है, आनंद का समुद्र है। वह चैतन्य घन है। उसे किसी क्रिया, किसी फल, किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं। समस्या

माला-1193:क्या जन्म वास्तविक है या सब स्वप्न मात्र है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

1️⃣ प्रश्न: आपका जन्म क्यों हुआ है? उत्तर:महाराज जी बड़ी सरलता से कहते हैं — “मेरा जन्म हुआ ही नहीं।” जन्म तो स्वप्न है। जैसे स्वप्न में हम शरीर मान लेते हैं और सुख-दुख भोगते हैं, वैसे ही यह जागृत जीवन भी एक स्वप्न के समान है। वास्तविकता में आत्मा अजन्मा है, निर्विकार है। जो

माला-1192:संत महापुरुषों के दर्शन का वास्तविक फल क्या है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: संत महापुरुषों के दर्शन का वास्तविक फल क्या है? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि संत दर्शन कोई साधारण घटना नहीं है। संत मिलना ही दुर्लभ है। संत का वेश धारण करना आसान है, पर साधुता का आ जाना बहुत कठिन है। वास्तविक संत वह है जिसके भीतर काम, क्रोध, लोभ, दंभ का अंश

माला-1191:गुरुदेव में भगवान की भावना कैसे पुष्ट करें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1:महाराज जी, अब तक इतना बोध हो गया है कि मैं यह देह नहीं हूँ, न मैं करता हूँ। वस्तुतः मैं साक्षी मात्र हूँ। पर यह व्यवहार में स्थिर नहीं हो पा रहा। क्या करें? उत्तर: महाराज जी पहले ही सावधान करते हैं — “अभी भूल में मत रहना।” केवल यह समझ लेना कि

माला-1190:मन पूर्ण समर्पण से क्यों डरता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, जब आप नौजवान अवस्था में साधना कर रहे थे, तब आपकी सुबह से शाम तक की दिनचर्या क्या थी? उत्तर (महाराज जी की वाणी के अनुसार) देखो, उस समय जीवन बिल्कुल साधना प्रधान था। क्रिया प्रधान नहीं, चिंतन प्रधान। रात्रि के लगभग 1 बजे उठना होता था। 1 बजे से 4

माला-1189:आत्मज्ञान के बाद ‘मैं’ समाप्त हो जाता है या रहता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी की साधना-कालीन डायरी का सबसे महत्वपूर्ण सार क्या था? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि उनकी पूरी साधना-यात्रा का सार एक ही बात में समाहित है—मनुष्य को निरंतर भगवान की स्मृति में स्थित रहना चाहिए। विभिन्न सिद्ध महापुरुषों से जो वचन प्राप्त हुए, वे सब इसी दिशा में ले जाने वाले थे

माला-1188:“जिसमें तेरी रज़ा है उसी में राज़ी” यह भाव स्थायी कैसे बने? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: राम-नाम जप करने पर भी लौकिक धन-समृद्धि क्यों नहीं मिलती? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि भगवान का नाम किसी सांसारिक सौदे की वस्तु नहीं है। नाम का उद्देश्य धन, पद या सुविधा दिलाना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की दरिद्रता को मिटाना है। बाहरी धन सीमित है और नश्वर भी है, पर नाम

माला-1186:भक्ति करते-करते “मैं कुछ बन गया हूँ” ऐसा अहंकार क्यों आता है और इससे कैसे बचें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: भक्ति करते-करते “मैं कुछ बन गया हूँ” ऐसा अहंकार क्यों आता है और इससे कैसे बचें? उत्तर:महाराज जी समझाते हैं कि साधना के मार्ग में यह एक अत्यंत सूक्ष्म और खतरनाक मोड़ होता है। प्रारम्भ में साधक स्वयं को दोषपूर्ण देखता है, इसलिए विनम्रता रहती है। लेकिन जब जप बढ़ता है, नियम बनने

माला-1185:भगवान को अपना मानकर संसार में व्यवहार कैसे करें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: राधा बाबा और भाई जी महाराज के मिलन से प्रेम-भक्ति का जो दिव्य परिवर्तन हुआ, वह भक्ति-रस क्या है और कैसे मिलता है? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि अनेक जन्मों की साधना, पवित्रता और आंतरिक पात्रता का फल था। भगवान की कृपा सर्वत्र उपलब्ध रहती है,