प्रश्न 1: महाराज जी,कुछ भी काम गलत हो जाता है, तो बहुत क्रोध आता है। मैं क्या करूँ?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि क्रोध आने का एक प्रमुख कारण हमारी इच्छाओं का पूरा न होना है। जब हम चाहते हैं कि कोई काम हमारी इच्छा के अनुसार हो, लेकिन वैसा नहीं होता, तो मन में क्रोध उत्पन्न हो जाता है। इसलिए क्रोध पर नियंत्रण पाने के लिए केवल बाहरी परिस्थिति बदलने के बजाय अपने मन और इच्छाओं को समझना आवश्यक है।
महाराज जी नामजप को क्रोध कम करने का महत्त्वपूर्ण साधन बताते हैं। जब मन में गलत विचार और प्रवृत्तियाँ उठें, तो भगवान के नाम का जप करते रहें। ऐसा अभ्यास बनाएँ कि खाली समय में भी नामजप चलता रहे।
वे विशेष रूप से समझाते हैं कि जब क्रोध आ जाए, तो उसी समय बोलना या बहस करना शुरू नहीं करना चाहिए। क्रोध की अवस्था में व्यक्ति के मुख से कटु वचन निकल सकते हैं, जिससे दूसरों को दुःख पहुँचता है और बाद में स्वयं भी पश्चाताप करना पड़ता है।
महाराज जी का सुझाव है कि क्रोध आते ही मौन धारण कर लें और उस परिस्थिति या स्थान से कुछ समय के लिए हट जाएँ। जब मन शांत हो जाए, तब आवश्यकता के अनुसार बात करें। क्रोध के समय प्रतिउत्तर देते रहने से विवाद बढ़ सकता है और स्थिति बिगड़ सकती है।
वे भगवान का नाम जोर-जोर से लेने की भी सलाह देते हैं, ताकि मन का ध्यान क्रोध से हटकर भगवान की ओर जा सके।
महाराज जी की सीख है कि क्रोध आने पर तुरंत चुप हो जाएँ, उस परिस्थिति से हट जाएँ और भगवान का नाम जपें। नियमित नामजप के साथ अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का अभ्यास करें, ताकि धीरे-धीरे क्रोध का प्रभाव कम हो सके।
प्रश्न 2: क्या अधिक पूजा करना भी हानिकारक हो सकता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि भगवान की पूजा और भक्ति अपने आप में हानिकारक नहीं हैं। हानिकारक वे कर्म हैं, जो मनुष्य को गलत आचरण की ओर ले जाते हैं, जैसे हिंसा, व्यभिचार, जुआ और मदिरापान। इसलिए अधिक पूजा करने से भगवान किसी को दुःख देते हैं, ऐसा मानना उचित नहीं है।
महाराज जी समझाते हैं कि कई बार भक्त के जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे भक्ति के कारण आई हैं। पूर्व में किए गए कर्मों का फल भी जीवन में सामने आ सकता है। भक्ति करने वाला व्यक्ति भी उन कर्मों के परिणामों का सामना कर सकता है, परंतु भगवान का आश्रय उसे कठिनाइयों में सहनशक्ति और आध्यात्मिक बल देता है।
वे अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि शारीरिक कष्ट होने के बावजूद उन्हें लोगों का प्रेम और भगवान के नाम का आनंद प्राप्त होता है। इसी प्रकार अनेक संतों के जीवन में भी कठिनाइयाँ आईं, फिर भी वे भगवान की भक्ति में आनंदित रहे।
महाराज जी के अनुसार, भक्ति का उद्देश्य दुःख पैदा करना नहीं, बल्कि जीव का मंगल करना है। भगवान की पूजा और नामजप से मनुष्य के भीतर आध्यात्मिक शक्ति विकसित होती है और वह अपने जीवन को सही दिशा देने में समर्थ होता है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति अधिक पूजा करता है और उसके जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तो उसे पूजा छोड़ने या भक्ति को दोष देने के बजाय अपने कर्मों और परिस्थितियों को समझना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि भगवान की पूजा से किसी का अहित नहीं होता। भक्ति जारी रखें, अपने आचरण को पवित्र बनाएँ और कठिन परिस्थितियों में भी भगवान पर विश्वास रखें।
प्रश्न 3: क्या बिना किसी नियम या विधि-विधान के की गई पूजा भी सार्थक हो सकती है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि भगवान की पूजा में नियम और विधि-विधान का महत्त्व है, लेकिन भाव की प्रधानता उनसे भी अधिक है। नियमों का उद्देश्य साधक को भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण की ओर ले जाना है। यदि पूजा में केवल नियम पूरे किए जाएँ, लेकिन हृदय में प्रेम और भक्ति का भाव न हो, तो पूजा का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह सकता है।
महाराज जी कर्माबाई का उदाहरण देते हैं, जो भगवान जगन्नाथ के प्रति गहरे प्रेम के कारण सुबह जल्दी उठकर उनके लिए खिचड़ी बनाती थीं। वे स्नान आदि करने से पहले ही प्रेमपूर्वक भगवान को भोग लगाने लगती थीं। एक दिन किसी नियमपरायण संत ने उन्हें समझाया कि भगवान के लिए भोग बनाने से पहले स्नान करके पवित्र होना चाहिए।
जब कर्माबाई ने अगले दिन पहले स्नान किया और फिर भोग बनाया, तो महाराज जी के वर्णन के अनुसार भगवान ने पहले जैसा प्रेमपूर्वक भोग स्वीकार नहीं किया। इस प्रसंग से यह समझाया गया कि भगवान केवल बाहरी नियमों से नहीं, बल्कि भक्त के प्रेमपूर्ण भाव से प्रसन्न होते हैं।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान को प्रेम से अर्पित किया गया थोड़ा-सा जल, एक पत्ता, फल या फूल भी स्वीकार्य है। इसलिए पूजा करते समय हृदय में भगवान के प्रति सच्चा प्रेम और समर्पण होना चाहिए।
इसका अर्थ यह नहीं कि नियमों की जानबूझकर उपेक्षा करनी चाहिए। नियम साधना में सहायक होते हैं, लेकिन उन्हें प्रेम से ऊपर नहीं रखना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि पूजा में नियमों के साथ भाव भी आवश्यक है। विधि-विधान का पालन करते हुए भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दें।
प्रश्न 4: भगवद्गीता में वर्णित तीन योगों में से कौन-सा श्रेष्ठ माना गया है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, भगवद्गीता में बताए गए कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग—तीनों अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं। इनमें से किस मार्ग पर चलना चाहिए, यह व्यक्ति की रुचि, स्वभाव और योग्यता पर निर्भर करता है। सभी व्यक्तियों को एक ही मार्ग पर चलाना उचित नहीं है।
महाराज जी बताते हैं कि जिस व्यक्ति में कर्म करने की अच्छी क्षमता है, जो अपने कर्तव्यों को पूरा करने में कुशल है और कर्म में रुचि रखता है, वह निष्काम भाव से कर्मयोग का अभ्यास कर सकता है। इसमें व्यक्ति शास्त्रों के अनुसार अपने कर्तव्यों को भगवान की प्रसन्नता और संसार के हित के लिए करता है।
दूसरी ओर, जिस व्यक्ति का हृदय भगवान की कथा सुनकर द्रवित होता है, जिसे भगवान का नाम प्रिय लगता है और जो स्वयं को भगवान के सामने असमर्थ समझकर उनकी शरण लेना चाहता है, उसके लिए भक्तियोग उपयुक्त मार्ग है।
महाराज जी के अनुसार, जो व्यक्ति अधिक विवेकशील, तर्कशील और वैराग्यवान है तथा सत्य को जानने की प्रबल इच्छा रखता है, वह ज्ञानयोग के मार्ग पर चल सकता है। इस मार्ग में सत्य-असत्य का विवेक और संसार के प्रति वैराग्य महत्त्वपूर्ण हैं।
वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि इन मार्गों की प्रक्रिया अलग-अलग है, लेकिन सभी का लक्ष्य आध्यात्मिक बंधनों से मुक्त होना है। ज्ञानमार्ग में आत्मस्वरूप का बोध, भक्तिमार्ग में भगवान के प्रति प्रेम और कर्मयोग में निष्काम कर्म के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति होती है।
महाराज जी की सीख है कि किसी एक योग को सबके लिए श्रेष्ठ मानने के बजाय अपने स्वभाव और योग्यता को समझें। जिस मार्ग में आपकी स्वाभाविक रुचि हो, उसमें शास्त्रों के अनुसार साधना करें और निरंतर आगे बढ़ते रहें।
प्रश्न 5: बचपन से सुनते आए हैं कि हम शरीर नहीं हैं, पर आज तक इस सत्य को क्यों नहीं जान पाए?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि केवल यह सुन लेना कि हम शरीर नहीं, बल्कि आत्मा हैं, पर्याप्त नहीं है। जब तक इस बात को अपने अनुभव में नहीं उतारा जाता, तब तक मनुष्य शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानता रहता है।
महाराज जी बताते हैं कि संसार ने हमें बाँध नहीं रखा है, बल्कि हमने स्वयं संसार की वस्तुओं, व्यक्तियों और संबंधों के प्रति अत्यधिक आसक्ति बना रखी है। हम अपने शरीर, नाम, पद, परिवार और संपत्ति को ही अपना वास्तविक परिचय मानने लगते हैं। इसी कारण शरीर से अलग अपने अविनाशी स्वरूप को समझना कठिन हो जाता है।
वे समझाते हैं कि केवल बौद्धिक रूप से यह कहने से कि मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर के प्रति आसक्ति समाप्त नहीं हो जाती। जब तक मन संसार के भोगों की ओर आकर्षित होता रहेगा, तब तक यह ज्ञान व्यवहार में पूरी तरह प्रकट नहीं होगा।
इस सत्य को जानने के लिए महाराज जी निरंतर भजन, नामजप, पवित्र आचरण और शास्त्रों के स्वाध्याय पर जोर देते हैं। साधना करते-करते मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होने लगती है और उसे धीरे-धीरे समझ में आता है कि संसार की वस्तुएँ और संबंध स्थायी नहीं हैं।
वे यह भी बताते हैं कि मनुष्य अनेक जन्मों से संसार के सुखों और संबंधों में उलझा हुआ है। इसलिए इस आसक्ति से मुक्त होने के लिए नियमित और दृढ़ अभ्यास आवश्यक है।
महाराज जी की सीख है कि केवल सुनकर संतुष्ट न हों, बल्कि नामजप, सत्संग और पवित्र आचरण के माध्यम से इस ज्ञान को जीवन में उतारें। निरंतर भजन से अपने वास्तविक स्वरूप को समझने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
प्रश्न 6: प्रेमयुक्त भक्ति और शास्त्रानुसार भक्ति—इन दोनों में अपनापन किससे अधिक प्रकट होता है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि शास्त्रानुसार भक्ति और प्रेमयुक्त भक्ति दो अलग-अलग मार्ग नहीं हैं। शास्त्रों के अनुसार भक्ति करते-करते ही हृदय में भगवान के प्रति प्रेम विकसित होता है। इसलिए प्रेम प्राप्त करने के लिए साधना और शास्त्रीय मर्यादा का पालन आवश्यक है।
महाराज जी बताते हैं कि साधक को भगवान का नामजप करना चाहिए, उनकी लीला-कथा सुननी चाहिए, कीर्तन करना चाहिए, भगवान का स्मरण और सेवा करनी चाहिए तथा अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करना चाहिए। इन साधनों के माध्यम से मन धीरे-धीरे संसार की आसक्तियों से हटकर भगवान की ओर बढ़ता है।
वे समझाते हैं कि प्रेम केवल इच्छा करने से उत्पन्न नहीं हो जाता। जैसे किसी ऊँचाई तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, वैसे ही भगवान के प्रति गहरा प्रेम प्राप्त करने के लिए निरंतर भजन करना पड़ता है। संतों का संग भी इसमें महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनके सानिध्य से साधक को उचित दिशा और प्रेरणा मिलती है।
महाराज जी के अनुसार, नवधा भक्ति के नौ अंगों—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—का अभ्यास करते-करते प्रेमलक्षणा भक्ति प्रकट होती है।
वे यह भी समझाते हैं कि संसार के प्रति हमारी जो ममता है, उसे धीरे-धीरे समेटकर भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए। परिवार और संसार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाया जा सकता है।
महाराज जी की सीख है कि शास्त्रानुसार भक्ति करते हुए नामजप, कीर्तन, कथा-श्रवण और सेवा में लगे रहें। इसी साधना से भगवान के प्रति अपनापन और प्रेम धीरे-धीरे गहरा होता जाता है।
प्रश्न 7: भगवान के दर्शन करते समय हमें क्या करना चाहिए, क्या बोलना चाहिए और क्या माँगना चाहिए?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि जब भगवान के दर्शन होते हैं, तो सबसे पहले अपने सौभाग्य का अनुभव करना चाहिए कि भगवान ने हमें उनके दर्शन करने का अवसर दिया। उस समय सांसारिक इच्छाओं की सूची लेकर भगवान से कुछ माँगने के बजाय उनके प्रति कृतज्ञता और प्रेम का भाव रखना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान के दर्शन स्वयं में बहुत बड़ा सौभाग्य हैं। इसलिए भक्त को उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान का यह सुंदर स्वरूप उसके नेत्रों में बसा रहे और उनका स्मरण निरंतर बना रहे।
वे समझाते हैं कि संसार की वस्तुएँ नश्वर हैं। धन, संपत्ति, पद और दूसरी सांसारिक उपलब्धियाँ एक दिन छूट जाती हैं। इसलिए भगवान से केवल उन्हीं वस्तुओं को माँगने में जीवन न लगा दें, जो स्थायी नहीं हैं। इसके बजाय भगवान से ऐसा प्रेम और नामस्मरण माँगें, जिससे जीवन का वास्तविक कल्याण हो सके।
महाराज जी सुदामा जी का उदाहरण देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा जी को बिना माँगे ही इतना कुछ प्रदान कर दिया कि उनकी नगरी समृद्ध हो गई। इस प्रसंग से वे समझाते हैं कि भगवान की कृपा हमारी सीमित इच्छाओं से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है।
इसलिए भगवान के दर्शन के समय उनसे यह प्रार्थना करना उचित है कि वे हमें अपने चरणों में प्रेम दें, उनका नाम निरंतर स्मरण होता रहे और उनके दर्शन का भाव हृदय में बना रहे।
महाराज जी की सीख है कि भगवान से नश्वर वस्तुओं की अपेक्षा उनके प्रति प्रेम और निरंतर स्मरण माँगें। प्रार्थना करें कि उनका स्वरूप आपके हृदय और नेत्रों में सदैव बसा रहे और आपका जीवन उनकी भक्ति में बीते।
Credit:
यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।
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