माला-1426: क्या व्रत, स्नान और तीर्थ-भ्रमण से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,क्या व्रत, स्नान और तीर्थ-भ्रमण से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, व्रत रखना, तीर्थ-स्नान करना, दान देना और तीर्थ-यात्रा करना शुभ कर्म हैं, लेकिन केवल इनसे मोक्ष की प्राप्ति निश्चित नहीं होती। पुण्य कमाना और मोक्ष प्राप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं।

महाराज जी समझाते हैं कि शुभ कर्मों का फल स्वर्ग और दूसरे उच्च लोकों की प्राप्ति हो सकता है, लेकिन वहाँ भी जीव को वापस संसार में आना पड़ता है। मोक्ष का अर्थ है कर्मों के बंधन से मुक्त होना और अपने वास्तविक स्वरूप को जानना। इसके लिए भगवान के तत्त्व का ज्ञान, उनकी आराधना, ध्यान-साधना या भगवान के प्रति प्रेम का मार्ग अपनाना आवश्यक है।

वे इस बात पर जोर देते हैं कि साधक को सबसे पहले अपने गलत आचरणों का त्याग करना चाहिए। मांस, मदिरा, व्यभिचार और जुए जैसी बुराइयों से बचते हुए निरंतर भगवान का नामजप करना चाहिए। उठते-बैठते, चलते-फिरते और अपने कर्तव्य निभाते हुए भी भगवान का स्मरण जारी रखा जा सकता है।

महाराज जी के अनुसार, साधु-संतों का संग और उनके मार्गदर्शन में भजन करना बहुत महत्त्वपूर्ण है। केवल बाहरी धार्मिक क्रियाएँ करने के बजाय मन को भगवान में लगाने और उनसे प्रेम बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

महाराज जी की सीख है कि व्रत, स्नान और तीर्थ-यात्रा को शुभ कर्म मानें, लेकिन मोक्ष के लिए केवल उन्हीं पर निर्भर न रहें। नामजप, पवित्र आचरण, सत्संग और भगवान के प्रति प्रेम को अपने जीवन का आधार बनाएँ।

प्रश्न 2: ‘इति-इति’ करते हुए सारे विचार भगवान को समर्पित करना क्या उचित है?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, संसार में सर्वत्र भगवान को देखना और अपने विचारों को भगवान से जोड़ना भक्ति का मार्ग है। वे समझाते हैं कि जहाँ साधक को सबमें भगवान की उपस्थिति दिखाई देने लगती है, वहाँ उसके भीतर भगवान के प्रति प्रेम और तन्मयता बढ़ने लगती है।

महाराज जी बताते हैं कि मन में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं। ऐसे में यह देखना आवश्यक है कि कौन-से विचार अच्छे हैं और कौन-से अनुचित। अच्छे विचारों को भगवान को समर्पित किया जा सकता है, लेकिन गलत विचारों को भगवान के सामने रखकर उनमें उलझते नहीं रहना चाहिए। उन्हें अस्वीकार करके मन को सही दिशा में लगाना चाहिए।

वे यह भी समझाते हैं कि विचारों के प्रति न तो अनावश्यक राग रखना चाहिए और न ही द्वेष। साधक को धीरे-धीरे मन के व्यर्थ विचारों से उपराम होना सीखना चाहिए। जब कोई विचार आता है, तो उसके पीछे बहने के बजाय अपने मन को फिर भगवान के स्मरण में लगाना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार, बार-बार मन को भगवान में लगाने का अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है। जब मन की वृत्तियाँ भगवान में स्थिर होने लगती हैं, तब साधना गहरी होती जाती है।

इसलिए प्रत्येक विचार को बिना विवेक के भगवान को समर्पित करने के बजाय विचारों की प्रकृति को समझना आवश्यक है। अच्छे विचारों को भगवान की ओर मोड़ें और अनुचित विचारों को स्वीकार न करें।

महाराज जी की सीख है कि मन में उठने वाले अच्छे विचारों को भगवान को अर्पित करें, गलत विचारों को त्यागें और बार-बार मन को अपने इष्टदेव के स्मरण में लगाएँ। इससे धीरे-धीरे मन एकाग्र होने लगता है।

प्रश्न 3: जीवन में सत्संग, नाम और कीर्तन का अखंड प्रवाह बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, जीवन में सत्संग, नामजप और कीर्तन का निरंतर प्रवाह बनाए रखने के लिए संतों का संग करना और भगवान के नाम में लगे रहना अत्यंत आवश्यक है। वे बताते हैं कि गुरु-वाणी और धार्मिक ग्रंथों में भी नामजप तथा साधु-संग की महिमा पर विशेष जोर दिया गया है।

महाराज जी समझाते हैं कि सत्संग से साधक को सही दिशा मिलती है और नामजप के प्रति उत्साह बढ़ता है। जब व्यक्ति महापुरुषों के संपर्क में रहता है और उनके उपदेशों को सुनता है, तो उसके भीतर भगवान के प्रति प्रेम तथा भजन की रुचि मजबूत होती है।

वे कहते हैं कि केवल सत्संग सुन लेना पर्याप्त नहीं है; उसके संदेश को जीवन में अपनाना भी आवश्यक है। साधक को भगवान का नाम निरंतर स्मरण करना चाहिए, धार्मिक वाणी का अध्ययन करना चाहिए और ऐसा संग छोड़ना चाहिए जो उसे सांसारिक उलझनों में अधिक फँसाता हो।

महाराज जी के अनुसार, गुरु-वाणी, नामजप, कीर्तन और संतों के संग को जीवन का नियमित हिस्सा बना लेना चाहिए। जब तक शरीर साथ दे, तब तक इस अभ्यास को जारी रखना चाहिए। संसार की अनावश्यक चर्चाओं और प्रपंच में उलझने के बजाय अपने आध्यात्मिक लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए।

वे इस मार्ग में गुरु-कृपा का भी विशेष महत्त्व बताते हैं। सत्संग और नामजप में निरंतर बने रहना साधक को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।

महाराज जी की सीख है कि सत्संग सुनें, संतों का संग बनाए रखें और अपने इष्टदेव के नाम का निरंतर जप करें। अनावश्यक सांसारिक चर्चाओं से बचते हुए गुरु-वाणी के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करें।

प्रश्न 4: क्या कर्तव्य-पालन किए बिना भजन और साधना सफल नहीं होंगे?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि सांसारिक कर्तव्यों का पालन करना और भगवान की प्राप्ति के लिए भजन करना, दोनों का अपना महत्त्व है। परिवार का पालन-पोषण करना, माता-पिता की सेवा करना और धर्मपूर्वक धन कमाना मनुष्य के लौकिक कर्तव्य हैं। वहीं भगवान का नामजप, ध्यान और पूजन आध्यात्मिक उन्नति के साधन हैं।

महाराज जी यह स्पष्ट करते हैं कि यदि किसी व्यक्ति से आर्थिक कठिनाइयों या अन्य परिस्थितियों के कारण परिवार की सभी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पा रही हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका नामजप व्यर्थ हो गया। लेकिन साधक को अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़कर केवल माला लेकर बैठ जाना भी उचित नहीं है, जबकि उसके माता-पिता या परिवार के सदस्य आवश्यकता में हों।

वे उदाहरण देते हैं कि जब माता-पिता ने बचपन में हमारा पालन-पोषण किया, तो वृद्धावस्था में उनकी सेवा करना भी हमारा कर्तव्य है। उनके पैर दबाना, कपड़े धोना, भोजन देना और उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना सेवा का ही भाग है।

महाराज जी कहते हैं कि यदि परिवार के कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान का नामजप किया जाए और धर्मपूर्वक धन कमाकर परिवार की देखभाल की जाए, तो घर भी साधना का स्थान बन सकता है। इसके लिए कहीं दूर जाना ही आवश्यक नहीं है।

इसलिए गृहस्थ जीवन में भक्ति और जिम्मेदारियों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं समझना चाहिए। अपने कर्तव्य निभाते हुए भगवान का स्मरण जारी रखा जा सकता है।

महाराज जी की सीख है कि परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए नामजप करें। माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों की सेवा करें, ईमानदारी से धन कमाएँ और अपने सभी कार्यों में भगवान का स्मरण बनाए रखें।

प्रश्न 5: युग बहुत बदल गया है, अब पहले जैसे लोग नहीं रहे। क्या करें?

उत्तर: पूज्य महाराज जी स्वीकार करते हैं कि आजकल समाज में अनेक प्रकार की समस्याएँ बढ़ती दिखाई दे रही हैं। वे नशे, भ्रष्टाचार, हिंसा, बेईमानी और अनुचित आचरण के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार, आधुनिक शिक्षा और सुविधाएँ होने के बावजूद यदि व्यक्ति के जीवन में धर्म और अच्छे संस्कार नहीं हैं, तो उसका आचरण बिगड़ सकता है।

महाराज जी पुराने समय का एक उदाहरण देते हैं। लगभग 45 वर्ष पहले किसी व्यक्ति को गेहूँ बेचने पर गलती से दस रुपये अधिक मिल गए थे। उस व्यक्ति ने बाद में पैसे गिने और अधिक रकम मिलने का पता चलने पर उसे वापस कर दिया। महाराज जी इस प्रसंग से समझाते हैं कि ईमानदारी और धर्म का पालन केवल बड़ी बातों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी परिस्थितियों में भी दिखाई देता है।

वे बताते हैं कि आज भी कुछ संत, धर्मात्मा गृहस्थ और भगवान के नाम का जप करने वाले लोग हैं, जिनके कारण समाज में धर्म और संयम की परंपरा बनी हुई है। इसलिए पूरे युग को देखकर निराश होने के बजाय स्वयं अपने आचरण को सुधारना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार, व्यक्ति को शास्त्रों में बताए गए धर्म का विचार करना चाहिए और अपनी स्थिति तथा जिम्मेदारियों के अनुसार उचित आचरण करना चाहिए। आधुनिक जीवन अपनाना गलत नहीं, लेकिन यदि आधुनिकता के नाम पर धर्म और मर्यादा छोड़ दी जाए, तो उससे समस्याएँ पैदा होती हैं।

महाराज जी की सीख है कि समय और समाज के बदलने की शिकायत करने के बजाय स्वयं धर्मपूर्वक जीवन जिएँ। ईमानदारी, संयम, नामजप और पवित्र आचरण बनाए रखें, ताकि आपका जीवन दूसरों के लिए भी अच्छा उदाहरण बन सके।

प्रश्न 6: भोजन के प्रति मेरी लालसा कम नहीं हो रही है; नए-नए खाने की रुचि बढ़ती जा रही है। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि स्वाद के प्रति अत्यधिक आकर्षण भी मनुष्य को सांसारिक भोगों में बाँध सकता है। हमारी इंद्रियाँ बार-बार नए सुखों और अनुभवों की ओर आकर्षित होती हैं। यदि साधक अपनी जीभ के स्वाद पर नियंत्रण नहीं रख पाता, तो उसके लिए दूसरी इंद्रियों को संयमित करना भी कठिन हो सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि भोजन शरीर को स्वस्थ रखने और जीवन चलाने के लिए करना चाहिए, केवल स्वाद के लिए नहीं। जितना भोजन शरीर के लिए आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करना चाहिए। पेट भरने के बाद भी केवल स्वाद के लिए खाते रहना उचित नहीं है।

वे सलाह देते हैं कि भोजन सात्त्विक और पवित्र होना चाहिए। भगवान को अच्छे पदार्थों का भोग अर्पित करके स्वयं सादा और उचित भोजन ग्रहण करें। शरीर को आवश्यकता से अधिक भोजन देने से वजन बढ़ सकता है, आलस्य और प्रमाद बढ़ सकते हैं तथा नियमित दिनचर्या प्रभावित हो सकती है।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उचित आहार के साथ व्यायाम और मेहनत करना आवश्यक है। स्वस्थ रहने का अर्थ केवल शरीर का बड़ा या भारी होना नहीं, बल्कि अपनी दिनचर्या के काम स्वयं करने में सक्षम रहना भी है।

इसलिए भोजन की लालसा कम करने के लिए अपनी आदतों में अनुशासन लाना चाहिए। स्वाद के पीछे भागने के बजाय भोजन को शरीर के पोषण का साधन समझें और बचा हुआ समय भजन में लगाएँ।

महाराज जी की सीख है कि स्वाद के लिए नहीं, शरीर की आवश्यकता के अनुसार भोजन करें। सात्त्विक आहार लें, ठाकुर जी को भोग अर्पित करें, नियमित व्यायाम करें और अपनी इंद्रियों को भगवान के भजन में लगाने का अभ्यास करें।

प्रश्न 7: मैं लेखिका हूँ। लोग मेरे लेख का विरोध करते हैं, तो समझ नहीं आता कि मैं सही हूँ या गलत। क्या करूँ?

उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि किसी लेख पर प्रशंसा और आलोचना दोनों होना स्वाभाविक है। हर व्यक्ति की सोच, स्वभाव और समझ एक जैसी नहीं होती। इसलिए केवल लोगों की प्रतिक्रिया देखकर यह तय नहीं करना चाहिए कि आपका लेख सही है या गलत।

महाराज जी बताते हैं कि सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव से लोगों की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग हो सकती हैं। किसी व्यक्ति को लेख की बात अच्छी और उपयोगी लग सकती है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसी बात से असहमत हो सकता है। इसलिए कुछ लोगों की प्रशंसा से अत्यधिक प्रसन्न हो जाना और कुछ लोगों की आलोचना से दुःखी हो जाना उचित नहीं है।

वे समझाते हैं कि यदि आप धर्म और उचित कर्तव्य के अनुसार लिख रही हैं, तो अपने उद्देश्य और लेख की बातों की सत्यता पर ध्यान दें। लेख लिखते समय यह विचार करना चाहिए कि उसमें कही गई बात सही है या नहीं, और क्या वह समाज के हित में है।

महाराज जी भगवान के उदाहरण से समझाते हैं कि जब भगवान के भी प्रशंसक और आलोचक दोनों होते हैं, तो संसार में किसी व्यक्ति की बात का विरोध होना असामान्य नहीं है। इसलिए आलोचना के कारण दूसरों के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर आलोचना को अनदेखा कर दिया जाए। यदि किसी की बात से लेख की कोई वास्तविक गलती सामने आती है, तो उसे स्वीकार करके सुधारना चाहिए। लेकिन केवल विरोध होने से सही बात को छोड़ देना भी उचित नहीं है।

महाराज जी की सीख है कि प्रशंसा से अत्यधिक प्रसन्न और आलोचना से अत्यधिक दुःखी न हों। अपने लेख की सत्यता, धर्मसम्मत उद्देश्य और समाज के हित पर ध्यान दें तथा दूसरों के प्रति द्वेष रखे बिना अपना कर्तव्य निभाते रहें।

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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