प्रश्न 1: महाराज जी,भागवतिक अनुभूति केवल कुछ समय के लिए ही क्यों महसूस होती है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि साधना के दौरान मिलने वाला आनंद और वास्तविक भगवद्-अनुभूति, दोनों में अंतर है। साधना करते समय कभी मन को बहुत शांति मिलती है, कभी नामजप में आनंद आता है और कभी भगवान की लीला सुनकर हृदय भावुक हो जाता है। लेकिन इन अनुभवों का कुछ समय बाद कम हो जाना यह प्रमाण नहीं है कि साधक को भगवद्-अनुभूति हो गई थी और फिर वह समाप्त हो गई।
महाराज जी के अनुसार, वास्तविक भगवद्-अनुभूति होने पर स्थिति बदल जाती है। वे बताते हैं कि जब किसी को भगवान के दर्शन हो जाते हैं और भगवान का स्वरूप हृदय में बस जाता है, तब वह अनुभव क्षणिक नहीं रहता। भगवान का स्मरण और उनका स्वरूप उसके हृदय में निरंतर बना रहता है। उसका मन, बुद्धि और चित्त भगवान में तन्मय होने लगते हैं।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि भगवान के दर्शन होने के बाद भक्त की दृष्टि और जीवन में ऐसा परिवर्तन आता है कि उसे भगवान के अतिरिक्त दूसरी वस्तुएँ पहले जैसी आकर्षक नहीं लगतीं। इसलिए कभी आनंद आना और कभी उसका कम हो जाना साधना की एक अवस्था हो सकती है, लेकिन इसे पूर्ण भगवद्-अनुभूति नहीं मानना चाहिए।
ऐसी स्थायी अवस्था प्राप्त करने के लिए महाराज जी निरंतर नामजप, पवित्र भोजन, पवित्र आचरण और नियमित साधना पर जोर देते हैं। साधक को केवल किसी विशेष अनुभव की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि प्रतिदिन अपने भजन में लगे रहना चाहिए।
महाराज जी की सीख है कि साधना के दौरान मिलने वाले क्षणिक आनंद से संतुष्ट होकर रुकना नहीं चाहिए। निरंतर नामजप और पवित्र आचरण के माध्यम से भगवान की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
प्रश्न 2: जब भी कोई धर्म का कार्य करते हैं, तो प्रभु परीक्षाएँ और मुश्किलें क्यों खड़ी कर देते हैं?
उत्तर: पूज्य महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि धर्म का कार्य करने पर कठिनाइयाँ आना हमेशा भगवान द्वारा परीक्षा लेने का संकेत नहीं होता। कई बार धर्म के मार्ग पर चलते हुए अधर्म और विरोध का सामना करना पड़ता है। इन बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ना ही धर्म के मार्ग की विशेषता है।
महाराज जी समझाते हैं कि नीचे उतरना आसान होता है, लेकिन ऊपर चढ़ने में मेहनत लगती है। इसी प्रकार अधर्म के मार्ग पर चलना कई बार सहज लग सकता है, जबकि धर्म का पालन करने के लिए अपने स्वभाव और गलत प्रवृत्तियों से संघर्ष करना पड़ता है।
वे राजा युधिष्ठिर का उदाहरण देते हैं, जिन्हें धर्म का पालन करते हुए बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास सहना पड़ा। इससे यह समझाया गया है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को भी दुःख, अपमान और विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि कभी-कभी हम किसी का भला करते हैं, फिर भी वही व्यक्ति हमारा विरोध करने लगता है। ऐसी स्थिति में उसके व्यवहार के कारण अपने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। यदि हमने सही भावना से किसी की सहायता की है, तो उसके विरोध के कारण उसके प्रति बुरा व्यवहार करना उचित नहीं है।
इसलिए धर्म का पालन करते समय धैर्य, सहनशीलता और दृढ़ता बनाए रखना आवश्यक है। कठिनाइयाँ आने पर निराश होकर हार नहीं माननी चाहिए और न ही अपने धर्म के प्रति संशय करना चाहिए।
महाराज जी का संदेश है कि धर्म का मार्ग हमेशा सुविधाजनक नहीं होता। भगवान का नाम लेते हुए धैर्यपूर्वक कठिनाइयों का सामना करें और विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का साथ न छोड़ें।
प्रश्न 3: हर किसी के जन्म का उद्देश्य अलग-अलग होता है, तो हमें कैसे पता चलेगा कि हमारा उद्देश्य क्या है?
उत्तर: पूज्य महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में बताते हैं कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवान की प्राप्ति करना है। संसार में हर व्यक्ति अपने लिए अलग-अलग लक्ष्य बना लेता है। कोई धन कमाना चाहता है, कोई बड़ा पद प्राप्त करना चाहता है और कोई यश-प्रतिष्ठा पाने में लगा रहता है। लेकिन ये सभी लक्ष्य इसी जीवन तक सीमित हैं।
महाराज जी समझाते हैं कि हमें ऐसे उद्देश्य के बारे में विचार करना चाहिए, जो शरीर छूट जाने के बाद भी सार्थक बना रहे। व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा अधिकारी, नेता या धनवान क्यों न बन जाए, मृत्यु के बाद उसका पद, शरीर और सांसारिक संपत्ति यहीं रह जाते हैं। इसलिए केवल इन्हीं उपलब्धियों को जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेना उचित नहीं है।
वे कहते हैं कि मनुष्य जन्म केवल संसार के भोगों के लिए नहीं मिला है। इसका उपयोग अपने परलोक को सँवारने, मोक्ष प्राप्त करने और भगवान से जुड़ने के लिए करना चाहिए। संसार की उपलब्धियाँ जीवन चलाने के साधन हो सकती हैं, लेकिन जीवन का स्थायी उद्देश्य भगवान की प्राप्ति होना चाहिए।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि जब तक मनुष्य भगवान को अपने जीवन का उद्देश्य नहीं बनाता, तब तक वह संसार के अस्थायी लक्ष्यों में ही उलझा रह सकता है। इसलिए अपने जीवन की दिशा पर विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हमारी दिनचर्या हमें भगवान के निकट ले जा रही है या केवल सांसारिक इच्छाओं में उलझा रही है।
महाराज जी की सीख है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के लिए अपने कर्तव्य निभाते हुए भी जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवान की प्राप्ति रखना चाहिए। यही मनुष्य जीवन का शाश्वत उद्देश्य है।
प्रश्न 4: दो महीने से साधन-भजन में बहुत अधिक विघ्न हो रहा है, क्या करूँ?
उत्तर: पूज्य महाराज जी बताते हैं कि साधना के दौरान मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और प्रमाद जैसी प्रवृत्तियाँ बाधा डाल सकती हैं। विशेष रूप से नींद और आलस्य के कारण साधक का भजन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में निराश होकर भजन छोड़ने के बजाय अपनी दिनचर्या और अभ्यास को सुधारना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि यदि ब्रह्ममुहूर्त में ध्यान करते समय नींद आने लगे, तो उसी स्थिति में बैठे रहने की मजबूरी नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर खड़े होकर नामजप करें या टहलते हुए माला जपें। नींद को उचित समय दें, लेकिन भजन के समय बार-बार आलस्य के सामने हार न मानें।
वे लगभग छह घंटे की नींद को पर्याप्त बताते हुए कहते हैं कि इसके बाद शेष समय को अनावश्यक आलस्य में न गँवाएँ। यदि बैठकर भजन करते समय नींद आती है, तो खड़े होकर या चलते हुए नामजप किया जा सकता है।
महाराज जी भोजन को भी साधना से जोड़कर देखते हैं। वे पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और बाजार के ऐसे भोजन से बचने की सलाह देते हैं, जो स्वास्थ्य और मन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। साधक को सामान्य, सात्त्विक भोजन जैसे दाल, रोटी और सब्जी को प्राथमिकता देनी चाहिए।
वे यह भी समझाते हैं कि साधक को अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार भजन करना चाहिए। यदि मानसिक जप नहीं हो पा रहा, तो उपांशु जप करें और यदि वह भी कठिन हो, तो वाणी से स्पष्ट रूप से भगवान का नाम जपें।
महाराज जी का संदेश है कि भजन में विघ्न आने पर स्वयं को दोषी मानकर निराश न हों। अपनी दिनचर्या, नींद और भोजन को सुधारें तथा परिस्थिति के अनुसार नामजप करते हुए निरंतर अभ्यास बनाए रखें।
प्रश्न 5: मैं DRDO में वैज्ञानिक हूँ। प्रयास करता हूँ कि काम, क्रोध, लोभ आदि का प्रभाव न पड़े, पर ऐसा नहीं हो पाता!
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसी प्रवृत्तियाँ मनुष्य के अंतःकरण में प्रभाव डालती हैं। हमारा वास्तविक आत्मस्वरूप इन विकारों से अलग है, लेकिन जब हम स्वयं को केवल शरीर मानने लगते हैं, तब मन में उठने वाली इच्छाओं और प्रवृत्तियों को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठते हैं।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि जैसे गाड़ी में बैठा व्यक्ति गाड़ी से अलग होता है, वैसे ही आत्मा शरीर से अलग है। शरीर को उन्होंने परमार्थ की यात्रा के लिए मिली गाड़ी के समान समझाया है। लेकिन जब व्यक्ति शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है, तब शरीर की इच्छाएँ और मन के विकार उस पर अधिक प्रभाव डालने लगते हैं।
वे बताते हैं कि मन किसी वस्तु को देखना या भोगना चाहता है, तो हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हम स्वयं उसे चाहते हैं। इसी पहचान के कारण मन की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कठिन हो जाता है।
महाराज जी के अनुसार, केवल कुछ समय तक काम, क्रोध या लोभ का प्रभाव न दिखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उन पर पूरी तरह विजय प्राप्त हो गई है। जब तक देहाभिमान बना रहता है, तब तक ये प्रवृत्तियाँ दोबारा प्रभाव डाल सकती हैं।
इससे बाहर निकलने के लिए महाराज जी नामजप, सत्संग और शास्त्रों के स्वाध्याय पर जोर देते हैं। इनके माध्यम से धीरे-धीरे आत्मस्वरूप का ज्ञान विकसित होता है और व्यक्ति अपने मन की प्रवृत्तियों को समझने लगता है।
महाराज जी की सीख है कि काम, क्रोध और लोभ से संघर्ष करते हुए निरंतर नामजप करें, सत्संग सुनें और शास्त्रों का अध्ययन करें। धीरे-धीरे देहाभिमान कम होने पर इन विकारों का प्रभाव भी क्षीण होने लगता है।
प्रश्न 6: आप एक दिन हमें छोड़कर चले जाएँगे, यह सोचकर डर लगता है।
उत्तर: पूज्य महाराज जी समझाते हैं कि इस संसार में शरीर स्थायी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को एक दिन शरीर छोड़ना पड़ता है। बड़े-बड़े संत, महापुरुष, ज्ञानी और सिद्ध पुरुष भी इस संसार से विदा हुए हैं। इसलिए किसी के शरीर के हमेशा साथ रहने की अपेक्षा करना संभव नहीं है।
महाराज जी बताते हैं कि जब तक किसी महापुरुष का सानिध्य मिलता है, तब तक उनके सत्संग और उपदेशों से लाभ उठाना चाहिए। उनके जाने की कल्पना में दुःखी रहने के बजाय उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
वे विशेष रूप से कहते हैं कि महापुरुषों के उपदेश और उनके द्वारा दिया गया नाम ही उनके सानिध्य को जीवन में बनाए रखने का वास्तविक माध्यम हैं। यदि हमने उनके वचनों को सुना, लेकिन उन्हें अपने आचरण में नहीं उतारा, तो केवल बाहरी निकटता से स्थायी लाभ नहीं मिलेगा।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि संसार में किसी के शरीर का भरोसा नहीं है। जीवन श्वासों पर टिका है और किसी को नहीं मालूम कि कब शरीर छूट जाए। इसलिए वर्तमान समय को व्यर्थ की चिंता में न गँवाकर भगवान के नामजप और भजन में लगाना चाहिए।
यदि किसी महापुरुष के प्रति प्रेम है, तो उनके उपदेशों को जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्चा सम्मान है। उनके बताए मार्ग पर चलकर भगवान से संबंध मजबूत किया जा सकता है।
महाराज जी का संदेश है कि महापुरुषों के शरीर के बिछोह की चिंता में डूबने के बजाय उनके उपदेशों को जीवन में उतारें, निरंतर नामजप करें और भगवान का आश्रय बनाए रखें। यही संतों के सानिध्य का वास्तविक लाभ है।
प्रश्न 7: कैसे पता चले कि हम दीक्षा लेने के लिए तैयार हो चुके हैं?
उत्तर: पूज्य महाराज जी के अनुसार, दीक्षा लेने के लिए अपने आपको पूर्ण योग्य मानना आवश्यक नहीं है। वे समझाते हैं कि मनुष्य अपनी वर्तमान स्थिति में स्वयं को अयोग्य मानकर भी गुरु की शरण में जा सकता है। गुरु की कृपा ही साधक को योग्य बनाने में सहायता करती है।
महाराज जी पारस पत्थर का उदाहरण देते हैं। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही गुरु की कृपा से साधक के जीवन में परिवर्तन आ सकता है। इसलिए यह सोचकर गुरु की शरण में जाने से पीछे नहीं हटना चाहिए कि अभी हम पूरी तरह योग्य नहीं हैं।
लेकिन महाराज जी कुछ आचरणों को छोड़ने पर विशेष जोर देते हैं। उनके अनुसार, दीक्षा लेने की तैयारी में मांस, मदिरा, व्यभिचार, जुआ, परस्त्रीगमन और दूसरे के धन का अपहरण जैसे अनुचित कर्मों का त्याग आवश्यक है।
वे समझाते हैं कि गुरु की शरण में जाने का अर्थ है अपने जीवन को सुधारने और भगवान से जुड़ने की सच्ची इच्छा रखना। यदि मन में भगवान की प्राप्ति की प्रबल इच्छा जाग गई है, तो अपनी कमियों के कारण गुरु से दूर नहीं रहना चाहिए।
महाराज जी अस्पताल का उदाहरण देते हैं कि अस्पताल में रोगी ही उपचार के लिए जाते हैं। यदि यह शर्त रख दी जाए कि पहले पूरी तरह स्वस्थ होकर आओ, तभी प्रवेश मिलेगा, तो अस्पताल का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार गुरु की शरण उन लोगों के लिए भी है, जो अपने जीवन को सुधारना चाहते हैं।
इसलिए दीक्षा की तैयारी को केवल अपनी योग्यता के आकलन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। अपने आचरण को सुधारने और भगवान से जुड़ने की सच्ची लगन बनाए रखनी चाहिए।
महाराज जी की मुख्य सीख है कि भगवान से जुड़ने की प्रबल इच्छा ही गुरु की शरण में जाने की सबसे महत्त्वपूर्ण योग्यता है। अपनी कमियों को स्वीकार करें, अनुचित आचरणों का त्याग करें और श्रद्धापूर्वक गुरु की शरण ग्रहण करें।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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