माला-1404:राधा नाम का ध्यान कैसे किया जाता है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,राधा नाम का ध्यान कैसे किया जाता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि राधा नाम को मन में स्थिर और स्पष्ट करने के लिए सबसे जरूरी चीज है—निरंतर और आदरपूर्वक अभ्यास। शुरुआत में हमारा मन एक जगह टिकता ही नहीं। कभी बीती हुई बातें याद आती हैं, कभी भविष्य की चिंता होती है और कभी मन अपने ही तरह-तरह के विचारों में उलझा रहता है। लेकिन अगर हम लंबे समय तक लगातार अभ्यास करते रहें तो धीरे-धीरे मन की यह चंचलता कम होने लगती है।

महाराज जी समझाते हैं कि अभ्यास कमजोर रहेगा तो मन अपनी दुनिया चलाता रहेगा, लेकिन अभ्यास दृढ़ हो जाए तो आंखें खुली हों या बंद, हमारा लक्ष्य हमारे सामने बना रहता है। फिर व्यक्ति अपने सांसारिक काम भी करता रहता है और भीतर-ही-भीतर नाम का स्मरण चलता रहता है। भगवान ने भी स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य करने की बात कही है। इसलिए नामजप का अर्थ यह नहीं कि हम संसार के जरूरी काम छोड़ दें। बल्कि काम करते हुए भी भीतर नाम चलता रहे, यही अभ्यास करना है।

महाराज जी बताते हैं कि जब अभ्यास और अधिक पक जाता है तो स्थिति ऐसी हो सकती है कि व्यक्ति किसी से बातचीत करते हुए भी भीतर नाम से जुड़ा रहे। इसके लिए बोलने की अपेक्षा सुनने की आदत डालनी चाहिए, कम बोलना चाहिए और ऐसी बात नहीं करनी चाहिए जिससे किसी का अहित या अमंगल हो। बार-बार नाम का स्मरण करते रहने से गृहस्थ में रहते हुए भी साधना मजबूत हो सकती है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि जितना अभ्यास बढ़ेगा, उतना ही मन धीरे-धीरे टिकने लगेगा। पहले अगर एक मिनट भी मन नहीं टिकता था और अब एक मिनट टिकने लगा, तो यह भी साधना में प्रगति है। हमें इसी समय को धीरे-धीरे बढ़ाते जाना है। जब मन भजन में लगने लगता है तो फिर वहां से हटना नहीं चाहता।

अगर नामजप करते-करते नाम अपने आप मन में चलने लगे तो महाराज जी इसे रोकने के बजाय उसका सहारा लेने को कहते हैं। वाचिक जप से उपांशु और फिर मानसिक जप की ओर जाना स्वाभाविक प्रगति हो सकती है। जब मन में नाम चलने लगे और साधक उसे सुन भी रहा हो, तो जितनी देर चले उसे चलने दें। जब मन फिर संसार की ओर भाग जाए तो दोबारा वाचिक या उपांशु जप का सहारा लें।

इसलिए राधा नाम का ध्यान किसी एक दिन में सिद्ध होने वाली चीज नहीं है। बार-बार अभ्यास, नाम का निरंतर स्मरण और मन को संसार से हटाकर भगवान की ओर लगाने का प्रयास ही इसका रास्ता है। जितना अभ्यास करेंगे, उतना ही नाम भीतर स्थिर होता जाएगा।


प्रश्न 2: जीवन में सुखी हों तो भगवान से निकटता के लिए दुःख वाला भाव कैसे लाएँ?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न में सबसे पहले यह समझाते हैं कि जिसे हम संसार में सुख समझ रहे हैं, वास्तव में वह स्थायी सुख नहीं है। अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े, पद, प्रतिष्ठा, बैंक बैलेंस या महंगी गाड़ी—इनमें से किसी को भी ऐसा सुख नहीं कहा जा सकता जो हमेशा हमारे साथ रहने वाला हो। मृत्यु के समय शरीर, गाड़ी, पैसा, पद और प्रतिष्ठा सब यहीं छूट जाएंगे और मनुष्य अकेला चला जाएगा।

महाराज जी कहते हैं कि संसार को भगवान ने “दुःखालयम् अशाश्वतम्” बताया है। लेकिन हमारी स्थिति यह है कि हम दुःख की छाया को सुख समझ लेते हैं। जो वस्तु हमें भगवान को भुला दे, उसे वास्तविक सुख मान लेना ही सबसे बड़ी भूल है। क्योंकि संसार की हर प्राप्ति नाशवान है और अंततः उससे अलग होना ही पड़ेगा।

इसलिए भगवान के निकट जाने के लिए अलग से कोई कृत्रिम दुःख पैदा करने की आवश्यकता नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि हमारा दुख तो पहले से ही मौजूद है, क्योंकि मृत्यु निश्चित है और संसार की कोई भी वस्तु हमारे साथ जाने वाली नहीं है। हमें केवल इस वास्तविकता को समझना है। अगर हमें यह स्मरण रहे कि एक दिन शरीर भी छूट जाएगा और संसार की सारी प्रिय वस्तुएं पीछे रह जाएंगी, तो संसार के प्रति जो अत्यधिक आसक्ति है, उसमें अपने आप कमी आने लगेगी।

महाराज जी इसके लिए मृत्यु के स्मरण का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से पता हो कि अगले दिन उसे फांसी दी जाएगी, तो दुनिया के सारे सुख सामने रख दिए जाएं, फिर भी उसके मन में आनंद नहीं आएगा। उसे बार-बार मृत्यु ही याद आएगी। हमारी स्थिति तो उससे भी अधिक अनिश्चित है, क्योंकि हमें यह पता ही नहीं कि हमारी अगली सांस चलेगी या नहीं। इसलिए हमें सावधान होकर निरंतर भगवान का नाम लेना चाहिए।

महाराज जी कहते हैं कि हमें सुख मांगने के लिए अलग से दुःख मांगने की जरूरत नहीं है। संसार में जो मिला हुआ है, उसी को समझना है। नामजप करना है और भगवान के स्मरण को बढ़ाना है। जब भगवान का नाम जीवन में बढ़ने लगता है तो धीरे-धीरे विषयों की ओर आकर्षण कम होने लगता है। भजन में मन लगने लगे तो संसार के विषयों से मन हटना अपने आप शुरू हो जाता है।

इसलिए “दुःख वाला भाव” बनाने का अर्थ खुद को दुखी करना नहीं है। इसका अर्थ है यह समझना कि जो भगवान से दूर कर रहा है, वह वास्तविक सुख नहीं है, और जो हमें भगवान के नाम से जोड़ रहा है, उसी दिशा में जीवन को लगाना है।


प्रश्न 3: एक साधक तो नियम आदि से चलता है, दूसरा कम पालन करते हुए भी अच्छी भूमिका पर होता है; ऐसा क्यों?

उत्तर:
महाराज जी इस बात को स्वीकार नहीं करते कि कोई साधक नियमों का ठीक से पालन न करते हुए भी केवल देखने में बहुत ऊंची स्थिति में दिखाई दे और इसलिए उसे वास्तव में ऊंची अवस्था वाला मान लिया जाए। वे स्पष्ट करते हैं कि साधक की पहचान नियम-निष्ठा और आचरण से होती है। केवल बाहरी रूप, बोलचाल या किसी विशेष भूमिका से किसी की वास्तविक साधना की स्थिति तय नहीं की जा सकती।

महाराज जी इसके लिए अभिनय का उदाहरण देते हैं। कोई व्यक्ति किसी नाटक, सीरियल या फिल्म में साधु का बहुत अच्छा अभिनय कर सकता है, लेकिन केवल साधु का अभिनय करने से वह साधु नहीं बन जाता। उसी तरह कोई व्यक्ति बाहर से आध्यात्मिक दिखाई दे, लेकिन उसका आचरण नियमों के अनुसार न हो, तो केवल बाहरी रूप देखकर उसकी साधना की ऊंचाई तय नहीं की जा सकती।

साथ ही महाराज जी यह भी कहते हैं कि पिछले जन्म के भजन का प्रभाव मानकर इस जन्म के प्रयास को छोड़ देना ठीक नहीं है। हमें यह सोचकर नहीं बैठना चाहिए कि पिछले जन्म में बहुत भजन किया होगा इसलिए इस जन्म में बिना मेहनत के ही सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। यह मानव जन्म हमें अपने जीवन में नया इतिहास और नया भाग्य बनाने के लिए मिला है। हमें इसी जन्म में नामजप, तप और पवित्र आचरण के द्वारा अपना जीवन बनाना है।

महाराज जी एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं—छेद वाले घड़े का। यदि घड़े में बहुत सारे छेद हैं तो उसमें कितना भी पानी डालते रहिए, वह टिकेगा नहीं। इसी तरह साधक नामजप तो करता रहे, लेकिन उसके साथ गंदा चिंतन, गलत आचरण, गलत खान-पान और दूसरी गलत आदतें चलती रहें, तो साधना का अनुभव भीतर टिकने में कठिनाई होगी। पहले उन छेदों को बंद करना होगा।

इसलिए साधक को अपना न्यायाधीश स्वयं बनना चाहिए। अपने भीतर देखकर पूछना चाहिए कि मेरे कौन-से आचरण धर्म, शास्त्र और गुरु की शिक्षा के विपरीत जा रहे हैं। जब इन कमियों को पहचानकर धीरे-धीरे सुधारा जाता है और साथ में नाम का चिंतन बढ़ाया जाता है, तब साधना का अनुभव भी बढ़ता है।

महाराज जी के अनुसार छोटी-मोटी सिद्धियों के पीछे भागना भी साधना का उद्देश्य नहीं है। सबसे बड़ी सिद्धि निरंतर भगवान का स्मरण होना है। मन में राधा नाम लगातार बना रहे, यही वास्तविक उपलब्धि है।

इसलिए किसी दूसरे साधक को देखकर यह तुलना करना कि वह कम नियम पालन करके भी आगे कैसे दिखाई दे रहा है, हमारे लिए उपयोगी नहीं है। हमें अपने जीवन को देखना है—नाम कितना बढ़ा, आचरण कितना सुधरा, चिंतन कितना पवित्र हुआ और भगवान का स्मरण कितना निरंतर हुआ।


प्रश्न 4: कक्षा में बच्चों को घंटों समझाने के बाद भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे उनके भविष्य की बहुत चिंता होती है।

उत्तर:
महाराज जी इस चिंता को समझते हुए कहते हैं कि आज के बच्चों में कई तरह की समस्याएं बढ़ रही हैं और केवल समझा देने से हमेशा तुरंत प्रभाव पड़ना जरूरी नहीं है। बच्चों पर शिक्षा का प्रभाव तभी गहरा होता है जब उनके भीतर श्रद्धा और विश्वास पैदा हो। केवल तर्क से आध्यात्मिक बातों को उनके भीतर बैठाना कठिन है।

महाराज जी बताते हैं कि बच्चों के संस्कार केवल स्कूल में नहीं बनते। माता-पिता का आचरण, घर का वातावरण और बचपन से दिए गए संस्कार भी बहुत प्रभाव डालते हैं। पहले बच्चों को माता-पिता, गुरु और बड़ों के प्रति सम्मान करना सिखाया जाता था। सुबह उठकर धरती माता का स्मरण करना, माता-पिता और गुरु का सम्मान करना जैसे संस्कार बचपन से ही दिए जाते थे। ऐसे संस्कारों का प्रभाव आगे जीवन में दिखाई देता है।

महाराज जी कहते हैं कि आज बच्चों की बुद्धि बहुत तेज है, लेकिन केवल तेज बुद्धि पर्याप्त नहीं है। बुद्धि के साथ विवेक और पवित्रता भी चाहिए। यदि बुद्धि तेज हो लेकिन उसका उपयोग गलत दिशा में हो रहा हो तो वही बुद्धि नुकसान का कारण बन सकती है। इसलिए बच्चों को केवल जानकारी देने की जगह उनके संस्कार और विवेक को भी मजबूत करना आवश्यक है।

इस स्थिति में शिक्षक क्या करे? महाराज जी कहते हैं कि शिक्षक अपना काम छोड़ न दें। वे समझाते रहें, स्वयं अच्छा आचरण करें और बच्चों के सामने संतों तथा शास्त्रों की बातें रखें। यदि खुद किसी बात को प्रभावी ढंग से समझाने में कठिनाई हो तो संतों की वाणी सुनाई जा सकती है। भले ही पूरी बात किसी बच्चे पर तुरंत प्रभाव न डाले, लेकिन यदि सौ में से कुछ बच्चों के जीवन में भी कोई अच्छी बात बैठ गई तो वह भी महत्वपूर्ण है।

महाराज जी स्कूलों में थोड़े समय के लिए नामकीर्तन, गीता की बातें या संतों की वाणी सुनाने का सुझाव देते हैं। उन्होंने बताया कि जब बच्चों को ऐसे वातावरण में लाया जाता है तो उनके भीतर नम्रता और सभ्यता जैसे संस्कार दिखाई देने लगते हैं।

लेकिन इसके साथ शिक्षक को यह भी समझना होगा कि केवल डर से बच्चों को लंबे समय तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। आज जब बच्चे बहुत कुछ मोबाइल और इंटरनेट से देख-सुन सकते हैं, तब केवल दंड या भय के सहारे संस्कार देना कठिन है। इसलिए श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक वातावरण ज्यादा जरूरी है।

महाराज जी के अनुसार विद्या का परिणाम विनय होना चाहिए। यदि डिग्री तो मिल जाए लेकिन विनय, गंभीरता, शील और सौम्यता न आए, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। इसलिए बच्चों को केवल पढ़ाना ही नहीं, बल्कि उन्हें भगवान, अध्यात्म, संस्कार और अच्छे आचरण से जोड़ना भी जरूरी है।

इसलिए शिक्षक को चिंता में टूटने के बजाय अपना प्रयास जारी रखना चाहिए। आप समझाइए, स्वयं आचरण करके दिखाइए, संतों की वाणी सुनाइए और बच्चों के भीतर श्रद्धा एवं विश्वास जगाने का प्रयास कीजिए। हर बच्चे पर असर एक जैसा और तुरंत नहीं होगा, लेकिन एक भी बच्चा सही दिशा में आ गया तो वह प्रयास सार्थक है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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